अब ग़ज़ल की बारी है। विगत कुछ प्रविष्टियों में इधर-उधर की सुनाने के बाद अब एक ग़ज़ल। पुरानी है, मेरे चंद साथियों के लिये जो
श्री पंकज सुबीर जी के ब्लौग के नियमित पाठक हैं| पुरानी ग़ज़ल नये लिबास में कि मतले में बदलाव है और चंद अशआर नये जोड़े हैं। जानता हूँ कि मेरे कुछ कवि-मित्र और कुछ एक बुद्धिजीवी साथी नाक-भौं सिकोड़ेंगे इन सस्ते रूमानी शेरों पर। जानता हूँ...फिर भी खास उन्हीं बंधुओं को समर्पित ये ग़ज़ल कि प्रेम-चतुर्दशी का फ्लेवर उतरा नहीं है...कि प्रेम से ज्यादा शाश्वत और प्रेम से ज्यादा सामयिक कुछ भी नहीं है...कि भटकी सामाजिकता और छिछली राजनीति में डगमगाते मानवीय-संतुलन के लिये ये सस्ते रुमानी हुस्नो-इश्क वाली ग़ज़ल भी बीच-बीच में सही बटखरे लेकर आती है...कि तल्ख और तीखे तेवरों के मध्य तनिक जायका बदलने के लिये इन शेरों की उपस्थिति आवश्यक है।...तो इन तमाम "
कि" की खातिर पेश है ये ग़ज़ल:-
ये बाजार सारा कहीं थम न जाये
न गुजरा करो चौक से सर झुकाये
कोई बंदगी है कि दीवानगी ये
मैं बुत बन के देखूँ, वो जब मुस्कुराये
समंदर जो मचले किनारे की खातिर
लहर-दर-लहर क्यों उसे आजमाये
सितारों ने की दर्ज है ये शिकायत
कि कंगन तेरा, नींद उनकी उड़ाये
मचे खलबली, एक तूफान उट्ठे
झटक के जरा जुल्फ़ जब तू हटाये
हवा जब शरारत करे बादलों से
तो बारिश की बंसी ये मौसम सुनाये
हवा छेड़ जाये जो तेरा दुपट्टा
जमाने की साँसों में साँसें न आये
हैं मगरूर वो गर, तो हम हैं मिजाजी
भला ऐसे में कौन किसको मनाये
उफनता हो ज्वालामुखी जैसे कोई
तेरा हुस्न जब धूप में तमतमाये
...और ग़ज़ल के बाद हमेशा की तरह इस बहरो-वजन पर आधारित कुछ प्रसिद्ध फिल्मी गीतों का जिक्र। इस बहरो-वजन(मुतकारिब की चार रुक्नी बहर) पर ढ़ेरों फिल्मी गीत याद आते हैं। महेन्द्र कपूर का गाया मेरा सर्वकालीन पसंदीदा गाना "
मेरा प्यार वो है कि मरकर भी तुमको"...फिल्म मासूम का "
हुजूर इस कदर भी न इतरा के चलिये"...किशोर कुमार का गाया "
हमें और जीने की चाहत न होती"....और रफ़ी साब के उस प्रसिद्ध युगल-गीत "
वो जब याद आये बहुत याद आये " का मुखड़ा(सिर्फ मुखड़ा, अंतरे किसी और बहर में हैं)। अरे हाँ, जगजीत सिंह की गायी वो जबरदस्त हिट नज़्म "
वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी " भी इसी बहरो-वजन पे तो है। किंतु इस बहरो-वजन का जिक्र फिल्म
मुगले-आज़म के गीत "
मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोये " के बगैर पूरा नहीं हो सकता है। ऊपर वर्णित तमाम गानों को "मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोये" की धुन पे गाकर देखिये एक बार- बस मजे के लिये। इस बहरो-वजन पर लिखी गयी किसी भी ग़ज़ल को आराम से इन धुनों पर गुनगुनाया जा सकता है।
इसी जमीन पर मशहूर शायर
भभ्भड़ भौंचक्के जी की एक बेहतरीन ग़ज़ल और होली का मूड लाती एक जबरदस्त हज़ल के लिये
यहाँ क्लीक करें। शायर का असली नाम जानने के लिये उस पोस्ट की टिप्पणियों को गौर से पढ़ें। फिलहाल इतना ही। होली की आपसब को अग्रिम रंगभरी शुभकामनायें!