Showing posts with label ग़ज़ल. Show all posts
Showing posts with label ग़ज़ल. Show all posts

28 December 2013

कुहरे की मुस्तैद जवानी जैसे सैनिक रोमन...उफ़

बूढ़े साल की आखिरी सांसें सर्दी की जवान रातों को तनिक और बेरहम बना रही हैं...और पहाड़ों का पूरा कुनबा बर्फ की सफ़ेद शॉल ओढ़कर उम्रभर के लिए जैसे समाधिस्थ हो गया है...तो ऐसे में एक ठिठुरी हुई ग़ज़ल :-    

ठिठुरी रातें, टीन का छप्पर, दीवारों की सीलन...उफ़
और दिसम्बर ज़ालिम उस पर फुफकारे है सन-सन ...उफ़

दरवाजे पर दस्तक देकर बात नहीं जब बन पायी
खिड़की की छोटी झिर्री से झाँके है अब सिहरन...उफ़

छत पर ठाठ से पसरा पाला शब भर खिच-खिच शोर करे
सुब्ह को नीचे आए फिसल कर, गीला-गीला आँगन...उफ़

बूढ़े सूरज की बरछी में जंग लगी है अरसे से
कुहरे की मुस्तैद जवानी जैसे सैनिक रोमन...उफ़

ठंढ के मारे सिकुड़े-सिकुड़े लोग चलें ऐसे जैसे
सिमटी-सिमटी शरमायी-सी नई-नवेली दुल्हन...उफ़

हाँफ रही है धूप दिनों से बादल में अटकी-फटकी
शोख़ हवा ऐ ! तू ही उसमें डाल ज़रा अब ईंधन...उफ़

जैकेट-मफ़लर पहने महलों की किलकारी सुन-सुन कर
चिथड़े में लिपटा झुग्गी का थर-थर काँपे बचपन...उफ़

पछुआ के ज़ुल्मी झोंके से पिछवाड़े वाला पीपल
सीटी मारे दोपहरी में जैसे रेल का इंजन...उफ़
{त्रैमासिक 'अनंतिम' के अक्टूबर-दिसम्बर 2013 अंक में प्रकाशित} 


06 December 2013

ऊँगली छुई थी चाय का कप थामते हुये...

मेरी ऐं वें सी एक ग़ज़ल को अर्चना चावजी ने अपना मखमली स्वर देकर कुछ खास ही बना दिया था अभी कुछ दिनों पहले ही तो...तो पहले वो ग़ज़ल, फिर अर्चना जी की आवाज़ :-

करवट बदल-बदल के ही, आँखों में ही सही
कमबख़्त रात ये भी गुज़र जायेगी सही
उट्ठी हैं हिचकियाँ जो बिना बात यक-ब-यक
तो सोचता है मुझको कोई.. वाक़ई… सही
ऊँगली छुई थी चाय का कप थामते हुये
दिल तो गया ही, जान भी निकली रही-सही
तौहीन बादलों की ज़रा हो गई तो क्या
निकला तो आफ़ताब दिनों बाद ही सही
छूटी गली जो उसकी तो अफ़सोस क्या करें
रास आ रही है क़दमों को आवारगी सही
दिन-रात कितनी सीटी बजाऊँ, तुम्हीं कहो
आओ भी बालकोनी में ख़ुद …सरसरी, सही
भूल आपको गये, न किया फ़ोन हमने गर ?
‘अच्छा ये आप समझे हैं ! अच्छा यही सही’
तारें उदास बैठे हैं अम्बर की गोद में
अब आ भी जा ऐ चाँद ! कि हो तीरगी सही
आयी अभी तलक न वो, ऐ यार क्या करूँ
सिगरेट ही पिला दे ज़रा अधफुंकी सही
सब कुछ सही, इस उम्र का अंदाज़ ऐसा है
वहशत सही, जुनूँ सही, दीवानगी सही

25 October 2010

जरा सी नींद क्या है चीज पूछो इक सिपाही से

व्यस्तता अपने चरम पर है। कुछ-कुछ ऐसा कि जैसे बोर्ड परिक्षाओं वाले दिन वापस आ गये हों। दिसम्बर मध्य तक यही स्थिति कायम रहने वाली है मेरे संग। जितना कश्मीर को मिस कर रहा हूँ, उतना ही आपसब को भी। भला हो डा० अनुराग की इस अद्‍भुत चर्चा का, जिसे पढ़ने के लिये तनिक समय चुरा कर निकाला तो ख्याल आया कि लगे हाथों एक पोस्ट भी ठेल दूँ। एक पुरानी ग़ज़ल...लगभग दो साल पहले की लिखी हुई, किंतु ब्लौग के लिये नयी। सुनिये:-

उठी इक हूक जो इन मौसमों की आवाजाही से
बना जाये है इक तस्वीर यादों की सियाही से


कि होती जीत सच की बात ये अब तो पुरानी है
दिखे है रोज सर इसका कटा झूठी गवाही से

नहीं दरकार है मुझको किनारों की मिहरबानी
बुझाता प्यास हूँ दरिया की मैं अपने सुराही से


किया है जुगनुओं ने काम कुछ आसान यूँ मेरा
बुनूँ मैं चाँद का पल्ला सितारों की उगाही से

जिबह होता है इक हिस्सा उमर का रोज ही मेरा
सुबह जब मुस्कुराता है ये सूरज बेगुनाही से

अजब आलम हुआ जब मौत आई देखने मुझको
दिखा तब देखना उनका झरोखे राजशाही से


घड़ी तुमको सुलाती है घड़ी के साथ जगते हो
जरा सी नींद क्या है चीज पूछो इक सिपाही से
{त्रैमासिक अभिनव प्रयास के जुलाई-सितम्बर,2010 अंक में प्रकाशित}



...फिलहाल इतना ही। जल्द ही लौटूँगा आपसब के ब्लौग पर। कुछ बंधुगण मेरे मोबाइल पर मुझसे संपर्क करने की कोशिश कर रहे होंगे, तो दिसम्बर मध्य तक उस नंबर पर उपलब्ध नहीं हूँ मैं। उस नंबर-विशेष की आवश्यकता कुछ अपरिहार्य कारणों से उधर मेरी कर्मभूमि में ज्यादा थी। आपसब को दीपावली की अग्रीम शुभकामनायें...!!!

30 August 2010

दबी होती है चिंगारी, धुँआ जब तक भी उठता है

रमजान के पवित्र महीने की मुबारकबाद आपसब को। कश्मीर में हालात थोड़े सुधरे हैं। पत्थरबाजी इधर तो कम हुई है, किंतु ब्लौगजगत में अभी भी यत्र-तत्र जारी है और ऐसे तमाम पत्थरों से इतना ही कहना है बस कि किसी की विनम्रता को उसकी कमजोरी कदापि न समझा जाये। खैर, बहुत दिन हो गये थे अपनी कोई ग़ज़ल सुनाये हुये ब्लौग पर।...तो एक अदनी-सी ग़ज़ल प्रस्तुत है, जिसे मुफ़लिस जी ने कहने लायक बना दिया है:-

न समझो बुझ चुकी है आग गर शोला न दिखता है
दबी होती है चिंगारी, धुँआ जब तक भी उठता है

बड़े हो तुम कि तुम तो चाँदनी से घर सजाते हो
हमारी झुग्गियों में चाँद भी छन-छन के चुभता है

गया वो इस अदा से छोड़ कर चौखट कि मत पूछो
हर इक आहट पे अब देखो ये दरवाजा तड़पता है

बता ऐ आस्मां कुछ तो कि करने चाँद को रौशन*
तपिश दिन भर लिये सूरज भला क्यूं रोज़ जलता है {*ये शेर खास तौर पर लोकप्रिय कवि लाल्टू को समर्पित है}

बना कर इस कदर ऊँचे महल, तू छीन मत मुझसे
हवा का एक झोंका जो मेरी खिड़की में रहता है

चलो, चलते रहो, पहचान रुकने से नहीं बनती
बहे दरिया तो पानी पत्थरों पर नाम लिखता है

वो बचपन में कभी जो तितलियाँ पकड़ी थीं बागों में
बरस बीते, न अब तक रंग हाथों से उतरता है

कहो मत खोलने मुट्ठी हमारी, देख लो पहले
कि कैसे बंद मुट्ठी से यहाँ तूफ़ान रिसता है

किताबें बंद हैं यादों की जब सारी मेरे मन में
ये किस्से जेह्‍न में माजी के रह-रह कौन पढ़ता है

कई रातें उनिंदी करवटों में बीतती हैं जब
कि तब जाकर नया कोई ग़ज़ल का शेर बनता है
{त्रैमासिक ’कथन’ के अप्रैल-जून 2010 अंक में प्रकाशित}


...और हमेशा की तरह इस ग़ज़ल की बहरो-वजन पर चर्चित गीतों और ग़ज़लों का जिक्र। मेरा बहुत ही पसंदीदा गीत है एक महेन्द्र कपूर साब का गाया हुआ "किसी पत्थर की मूरत से मुहब्बत का इरादा है" वाला और उन्हीं का गाया एक और गीत याद आता है इसी बहर पर "चलो एक बार फिर से अजनबी बन जायें हमदोनों"।


फिलहाल इतना ही।

05 April 2010

जुगलबंदी - दर्पण और अर्श की

कुछ अनूठे और आधुनिक बिम्बों का अपनी कविता, त्रिवेणी, क्षणिका और इन दिनों अपनी कहानी में भी इस्तेमाल कर, दर्पण ने कम समय में ही अपना एक बहुत ही खास स्थान बना लिया है हिंदी ब्लौग-जगत में। वहीं दूसरी तरफ अपने इश्किया शेरों और नाज़ुक ग़ज़लों को लेकर अर्श की पहचान किसी परिचय की मोहताज नहीं रह गयी है। आज प्रस्तुत है दोनों की जुगलबंदी- जहाँ दर्पण की एक प्यारी-सी ग़ज़ल को एक बहुत ही खूबसूरत धुन और अपनी दिलकश आवाज़ से सँवारा है अर्श ने।

दिल्ली में हाल ही में संपन्न हुये विश्व पुस्तक मेला के एक भ्रमण के बाद जमी बैठकी में ये जुगलबंदी साकार हुई, जहाँ सम्मोहित-सा बैठा मैं कुछ यादें चुराता रहा अपने कैमरे में और अपनी एक छोटे से आडियो-रिकार्डर में। पेश है ये खास जुगलबंदी:-






मुस्कुराते रहे दिल लुभाते रहे
बात कुछ और थी, तुम छुपाते रहे

दर्द जैसा मुसलसल ग़ज़ल हो कोई
लोग सदियों इसे गुनगुनाते रहे

इस कदर मुफ़लिसी का चढ़ा है जुनूं
अपने अहसास भी हम लुटाते रहे

एक शोखी नयी, इक नया-सा सुकूं
इस भरम में ही पीते-पिलाते रहे

खैर दुनिया तो हमने भी देखी नहीं
हाँ, मगर एक दुनिया बनाते रहे

जिंदगी रूठ जाने की हद हो गयी
जिंदगी भर तुझे हम मनाते रहे

तुम चले भी गये औ’ गये भी नहीं
होंठ में स्वाद से याद आते रहे

आज जाकर मुकम्मल हुई इक ग़ज़ल
आज अपना ही लिक्खा मिटाते रहे


...ग़ज़ल तो खैर खूबसूरत है ही, इस लाजवाब धुन ने और मोहक आवाज ने इसकी खूबसूरती और बढ़ा दी है। कहीं-कहीं जो अर्श गाते हुये अटक रहे हैं, तो दोष दर्पण की लिखावट का है। बहरो-वजन को तौलते हुये तुरत-फुरत धुन बना कर गा देना, अर्श के ही सामर्थ्य की बात थी। इस बहरो-वजन का जिक्र पहले ही कर चुका हूँ मैं, इसी जमीन पर लिखी मेरी एक ग़ज़ल को जब आप सब के साथ साझा किया था।

फिलहाल इतना ही। अगली पोस्ट पर मिलता हूँ जल्द ही...

10 March 2010

यक़ीं कीजे, ये मैं ही हूँ, जरा फोटो पुरानी है

छुट्टियाँ कब बीत जाती हैं, पता भी नहीं चलता। ड्युटी पर आये हुये ये चौथा दिन और फिर से वही अहसास कि जैसे यहीं हूँ सदियों से। सतरह सालों बाद इस बार उपस्थित हो पाया था होली पर अपने गाँव में और क्या खूब होली जमी। अबके इधर कश्मीर में खूब-खूब बर्फ गिरी है...ग्लोबल वार्मिंग की तमाम धमकियों को धता बताते हुये। एक तरफ झेलम की हँसी छुपाये नहीं छुप रही तो दूसरी तरफ चिनारों के अट्टहास गुंजायमान हैं वादी के कोने-कोने में। यूं चंद सिरफिरों की उन्मादी हरकतें खलल डालती हैं बीच-बीच में वादी के इस हर्षोल्लास में, किंतु मुस्तैद हरी वर्दियाँ ज्यादा देर टिकने नहीं देती हैं इस खलल को।

...और इन समस्त व्यस्तताओं के मध्य मुझसे अपने प्रिय ब्लौगरों के कई पोस्ट छूट गये हैं। पकड़ता हूँ धीरे-धीरे सब "छूट गयों" को। फिलहाल आज की बात कि दिन खास है आज का। दिन बहुत खास है कि मेरे प्रिय शायर का जन्म-दिन है ये। कुमार विनोद का जन्म-दिन । वैसे पता तो ये भी चला है कि आज ही के दिन मैं भी पैदा हुआ था अहले सुबह करीब दस हजार साल पहले। लेकिन हम "पाल ले इक रोग नादां के..." के इस पन्ने पर मनायेंगे कुमार विनोद की सालगिरह उन्हीं की एक बेहतरीन ग़ज़ल गुनगुनाकर। आइये गुनगुनाते हैं उनकी लाजवाब बिम्बों और अनूठे अंदाज वाले शेरों से सजी इस ग़ज़ल को:-

कभी लिखता नहीं दरिया, फ़क़त कहता ज़बानी है
कि दूजा नाम जीवन का रवानी है, रवानी है

बड़ी हैरत में डूबी आजकल बच्चों की नानी है
कहानी की किताबों में न राजा है, न रानी है

कहीं जब आस्माँ से रात चुपके से उतर आये
परिंदा घर को चल देता, समझ लेता निशानी है

कहाँ जायें, किधर जायें, समझ में कुछ नहीं आता
कि ऐसे मोड़ पर लाती हमें क्यों जिंदगानी है

बहुत सुंदर से इस एक्वेरियम को गौर से देखो
जो इसमें कैद है मछली,क्या वो भी जल की रानी है

घनेरे बाल, मूँछें और चेहरे पर चमक थोड़ी
यक़ीं कीजे, ये मैं ही हूँ, जरा फोटो पुरानी है


...अपने गाँव से पटना की ट्रेन यात्रा के दौरान "शुक्रवार" पत्रिका के नये अंक को पलट कर देख रहा था तो नजर पड़ी कुमार विनोद की ग़ज़ल-संग्रह "बेरंग हैं सब तितलियाँ" {जिसकी चर्चा मैं कुछ दिनों पहले
यहाँ कर चुका था} की समीक्षा पर। अच्छा लगा देखकर...बहुत अच्छा लगा देखकर कि ग़ज़लों की बात हो रही है अच्छी पत्र-पत्रिकाओं में। कुमार विनोद जैसे शायर हों अपने आस-पास तो ग़ज़ल का भविष्य वैसे भी सुरक्षित दिखता है।

22 February 2010

सितारों ने की दर्ज है ये शिकायत...

अब ग़ज़ल की बारी है। विगत कुछ प्रविष्टियों में इधर-उधर की सुनाने के बाद अब एक ग़ज़ल। पुरानी है, मेरे चंद साथियों के लिये जो श्री पंकज सुबीर जी के ब्लौग के नियमित पाठक हैं| पुरानी ग़ज़ल नये लिबास में कि मतले में बदलाव है और चंद अशआर नये जोड़े हैं। जानता हूँ कि मेरे कुछ कवि-मित्र और कुछ एक बुद्धिजीवी साथी नाक-भौं सिकोड़ेंगे इन सस्ते रूमानी शेरों पर। जानता हूँ...फिर भी खास उन्हीं बंधुओं को समर्पित ये ग़ज़ल कि प्रेम-चतुर्दशी का फ्लेवर उतरा नहीं है...कि प्रेम से ज्यादा शाश्वत और प्रेम से ज्यादा सामयिक कुछ भी नहीं है...कि भटकी सामाजिकता और छिछली राजनीति में डगमगाते मानवीय-संतुलन के लिये ये सस्ते रुमानी हुस्नो-इश्क वाली ग़ज़ल भी बीच-बीच में सही बटखरे लेकर आती है...कि तल्ख और तीखे तेवरों के मध्य तनिक जायका बदलने के लिये इन शेरों की उपस्थिति आवश्यक है।...तो इन तमाम "कि" की खातिर पेश है ये ग़ज़ल:-

ये बाजार सारा कहीं थम न जाये
न गुजरा करो चौक से सर झुकाये

कोई बंदगी है कि दीवानगी ये
मैं बुत बन के देखूँ, वो जब मुस्कुराये

समंदर जो मचले किनारे की खातिर
लहर-दर-लहर क्यों उसे आजमाये

सितारों ने की दर्ज है ये शिकायत
कि कंगन तेरा, नींद उनकी उड़ाये

मचे खलबली, एक तूफान उट्ठे
झटक के जरा जुल्फ़ जब तू हटाये

हवा जब शरारत करे बादलों से
तो बारिश की बंसी ये मौसम सुनाये

हवा छेड़ जाये जो तेरा दुपट्टा
जमाने की साँसों में साँसें न आये

हैं मगरूर वो गर, तो हम हैं मिजाजी
भला ऐसे में कौन किसको मनाये

उफनता हो ज्वालामुखी जैसे कोई
तेरा हुस्न जब धूप में तमतमाये

...और ग़ज़ल के बाद हमेशा की तरह इस बहरो-वजन पर आधारित कुछ प्रसिद्ध फिल्मी गीतों का जिक्र। इस बहरो-वजन(मुतकारिब की चार रुक्नी बहर) पर ढ़ेरों फिल्मी गीत याद आते हैं। महेन्द्र कपूर का गाया मेरा सर्वकालीन पसंदीदा गाना "मेरा प्यार वो है कि मरकर भी तुमको"...फिल्म मासूम का "हुजूर इस कदर भी न इतरा के चलिये"...किशोर कुमार का गाया "हमें और जीने की चाहत न होती"....और रफ़ी साब के उस प्रसिद्ध युगल-गीत "वो जब याद आये बहुत याद आये " का मुखड़ा(सिर्फ मुखड़ा, अंतरे किसी और बहर में हैं)। अरे हाँ, जगजीत सिंह की गायी वो जबरदस्त हिट नज़्म "वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी " भी इसी बहरो-वजन पे तो है। किंतु इस बहरो-वजन का जिक्र फिल्म मुगले-आज़म के गीत "मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोये " के बगैर पूरा नहीं हो सकता है। ऊपर वर्णित तमाम गानों को "मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोये" की धुन पे गाकर देखिये एक बार- बस मजे के लिये। इस बहरो-वजन पर लिखी गयी किसी भी ग़ज़ल को आराम से इन धुनों पर गुनगुनाया जा सकता है।

इसी जमीन पर मशहूर शायर भभ्भड़ भौंचक्के जी की एक बेहतरीन ग़ज़ल और होली का मूड लाती एक जबरदस्त हज़ल के लिये यहाँ क्लीक करें। शायर का असली नाम जानने के लिये उस पोस्ट की टिप्पणियों को गौर से पढ़ें। फिलहाल इतना ही। होली की आपसब को अग्रिम रंगभरी शुभकामनायें!

01 February 2010

अब शहीदों की चिताओं पर न मेले सजते हैं

भूल तो नहीं गये आपलोग मोहित शर्मा को, ऋषिकेश रमानी को, आकाशदीप को या फिर...या फिर सुरेश सूरी को ??? घबड़ाइये मत, मैं नहीं भूलाने दूँगा। इस छब्बीस जनवरी को भव्य परेड के दौरान महामहीम के हाथों मोहित की पत्नि ऋषिमा को तो देखा ही होगा आपसब ने अपने पति की शहादत पर अशोकचक्र का मेडल पाते हुये। कश्मीर के इन सुदूर चीड़ के जंगलों में भी मेजर मोहित की शहादत, उसकी बहादुरी को पहचाना गया ये मेरे लिये सुखद आश्चर्य था। शांतिकाल में अपने देश में दिया जाने वाला सर्वोच्च वीरता-पदक है अशोकचक्र। इसी क्रम में दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान पर क्रमशः कीर्तिचक्र, शौर्यचक्र और सेना-मेडल आते हैं।

अपने इसी ब्लौग पर ही पहले कभी लिखा था मैंने कि कोई कितना बहादुर होता है ये इस बात पर भी निर्भर करता है कि उसे अपनी बहादुरी दिखाने का अवसर कहाँ मिलता है। वर्तमान परिपेक्ष्य में "जगह" ज्यादा महत्वपूर्ण हो गयी है एक जांबाज की बहादुरी की डिग्री को निर्धारित करने के लिये। दिल्ली के संसद-भवन के समक्ष या फिर मुम्बई के ताज होटल या नरीमन प्वाइन्ट पर दी गयी शहादत अचानक से बड़ी हो जाती है बनिस्पत कश्मीर के इन सघन चीड़ के वनों में दिखाई गयी शहादत से। मेजर सुरेश सूरी को कीर्तिचक्र, मेजर आकाशदीप को शौर्यचक्र और मेजर ऋषिकेश रमानी को सेनामेडल से नवाजा गया है- तीनों के तीनों मरणोपरांत। ईश्वर जाने कौन-से इंच-टेप द्वारा इन तीन जांबाजों की बहादुरी को नापा गया...!!! वहीं दूसरी तरफ एक नौटंक, जो किसी करीना नामक बाला से इश्क लड़ाने के बाद बचे हुये समय में एक विदेशी कंपनी के बने आलू-चिप्स के नये फ्लेवर को तलाशने में गुजारता है, पद्मश्री ले जाता है।

...इधर इन समस्त विसंगतियों की वजह से ये अचानक मेरे बाँयें हाथ में टीस क्यों बढ़ आती है? जाने क्यों...??

जिस दिन मेजर ऋषिकेश शहीद हुआ था, एक ग़ज़ल की पैदाइश हुई थी मेरी चोट खायी लेखनी से। एक मिस्रा उछाला गया था गुरुदेव द्वारा "रात भर आवाज देता है कोई उस पार से", जो बाद में उन्हीं के ब्लौग पर मुशायरे में शामिल हुआ था। पेश है वही ग़ज़ल:-

चीड़ के जंगल खड़े थे देखते लाचार से
गोलियाँ चलती रहीं इस पार से उस पार से

मिट गया इक नौजवां कल फिर वतन के वास्ते
चीख तक उट्ठी नहीं इक भी किसी अखबार से

कितने दिन बीते कि हूँ मुस्तैद सरहद पर इधर
बाट जोहे है उधर माँ पिछले ही त्योहार से

अब शहीदों की चिताओं पर न मेले सजते हैं
है कहाँ फुरसत जरा भी लोगों को घर-बार से

मुट्ठियाँ भीचे हुये कितने दशक बीतेंगे और
क्या सुलझता है कोई मुद्दा कभी हथियार से

मुर्तियाँ बन रह गये वो चौक पर, चौराहे पर
खींच लाये थे जो किश्ती मुल्क की मझधार से

बैठता हूँ जब भी "गौतम" दुश्मनों की घात में
रात भर आवाज देता है कोई उस पार से

...इस बहरो-वजन पर कई सारी ग़ज़लों और गीतों की चर्चा मैं कर ही चुका था अभी अपनी पिछली ग़ज़ल जब पढ़वायी थी आपसब को। इसी बहर पर दुष्यंत कुमार की एक विषयानुकूल ग़ज़ल सुनवाता हूँ आपसब को। सुनिये:-



मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

18 January 2010

घर में सूबेदारनी के क्या दिवाली फाग क्या

कई दिनों से अपनी कोई ग़ज़ल नहीं लगायी थी मैंने ब्लौग पर, तो आज मूड-सा बना ग़ज़ल का। पुरानी ग़ज़ल है, जिसे शायद कुछ सुधि पाठकों ने कोलकाता से निकलने वाली मासिक पत्रिका वागर्थ के अक्टूबर 09 वाले अंक में पढ़ा होगा और कुछ पाठकों ने साहित्य-शिल्पी पर भी पढ़ा होगा। एक बचपन से मुझे हिंदी-साहित्य के कुछ कहानिकारों ने अजब मोह-पाश में बाँध रखा है। कुछ नाम जैसे कि गुलेरी, मोहन राकेश, कमलेश्रर, मंटो, मन्नु भंडारी, अमृता प्रीतम और प्रेमचंद...उनके रचे चरित्र अजीबो-गरीब ढ़ंग से जुड़ आते थे(हैं) मेरी रोजमर्रा की जिंदगी में। दो साल पहले इन्हीं कुछ चरित्रों को लेकर ग़ज़ल के कुछ अशआर बुनने शुरु किये, जो बाद में गुरुजी के आशिर्वाद से मुक्कमल हुई। पेश है वही ग़ज़ल:-

जल गई है फ़स्‍ल सारी पूछती अब आग क्या
राख पर पसरा है "होरी", सोचता निज भाग क्या

ड्योढ़ी पर बैठी निहारे शह्‍र से आती सड़क
"बन्तो" की आँखों में सब है, जोग क्या बैराग क्या

खेत सारे सूद में देकर "रघू" आया नगर
देखता है गाँव को मुड़-मुड़, लगी है लाग क्या

चांद को मुंडेर से "राधा" लगाये टकटकी
इश्क के बीमार को दिखता है कोई दाग क्या

क्लास में हर साल जो आता था अव्वल "मोहना"
पूछता रिक्शा लिये, ’चलना है मोतीबाग क्या’

किरणों के रथ से उतर क्या आयेगा कोई कुँवर
सोचती है "निर्मला", देहरी पे कुचड़े काग क्या

जब से सीमा पर हरी वर्दी पहन कर वो गये
घर में "सूबेदारनी" के क्या दिवाली फाग क्या

...कुछ गुरुजन लोग आपत्ति उठायेंगे ग़ज़ल के चौथे और पाँचवें शेर के काफ़ियों पर। कायदे से इन दोनों काफ़ियों को नुक्ते के साथ आने चाहिये और इस लिहाज से ये अशआर खारिज हो जाते हैं। गुरुजनों की तमाम आपत्तियाँ सर-आँखों पर, किंतु इन काफ़ियों को प्रचलित हिन्दुस्तानी उच्चारणों को ध्यान में रखकर अशआर बुने गये हैं।

इस बहरो-वजन पे खूब प्यारी ग़ज़लों और गीतों को लिखा गया है बड़े-बड़े शायरों और कवियों द्वारा। मेरे इस ब्लौग के नाम के लिये प्रयुक्त हुआ फ़िराक गोरखपुरी का ये शेर "पाल ले इक रोग नादां..." इसी बहर में है। इस बहर पे कुछ अन्य लोकप्रिय ग़ज़लें जो याद आ रही हैं "चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है" और "होश वालों को खबर क्या जिंदगी क्या चीज है" या फिर "हमको किस के ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही" और एक-दो फिल्मी गीत जो इसी बहरो-वजन पर लिखे गये हैं और जो मुझे इस वक्त याद आ रहे हैं...लता दी का गाया "आपकी नजरों ने समझा प्यार के काबिल मुझे" और किशोर दा का युगल-गीत "आपकी आँखों में कुछ महके हुये से राज हैं" और फिर रफ़ी साब का गाया "दर्दे-दिल दर्दे ज़िगर दिल में जगाया आपने"...।

फिलहाल इतना ही...जल्द ही मिलता हूँ अपनी अगली पोस्ट के संग।

(हंस के मार्च २०१० अंक में भी प्रकाशित)

28 December 2009

टौफियाँ, कुल्फियाँ, कौफी के जायके...

कुछ टिप्पणियाँ वाकई संवाद के नये रास्ते खोलती हैं। अभी पिछली पोस्ट पर जो अपनी ग़ज़ल सुनायी थी आपलोगों को मैंने, उस पर वाणी जी की एक टिप्पणी ने मन को छू लिया। उन्होंने लिखा था - "एक काम्प्लेक्स सा आ जाता है ...कहाँ हम वही काल्पनिक प्रेम वीथियों में अटके रहते हैं और आप लोग जमीनी हकीकत से जुड़े रहते हैं .....!!" तो हमने सोचा कि भई ऐसी क्या बात है, आज आपलोगों को अपनी एक खालिस रोमांटिक ग़ज़ल सुना देते हैं। वैसे भी पूरा साल लड़ते-झगड़ते गुजर गया, अब इन आखिरी क्षणो में तो कुछ इश्क-प्रेम की बातें हो जाय। कुछ पाठकों ने यूँ तो इस ग़ज़ल को गुरुजी के दीवाली-मुशायरे में यहाँ पढ़ ही लिया होगा, शेष बंधुओं के लिये पेश कर रहा हूँ एक इश्किया ग़ज़ल:-

रात भर चाँद को यूँ रिझाते रहे
उनके हाथों का कंगन घुमाते रहे

इक विरह की अगन में सुलगते बदन
करवटों में ही मल्हार गाते रहे

टीस, आवारगी, रतजगे, बेबसी
नाम कर मेरे, वो मुस्कुराते रहे

शेर जुड़ते गये, इक गज़ल बन गयी
काफ़िया, काफ़िया वो लुभाते रहे

टौफियाँ, कुल्फियाँ, कौफी के जायके
बारहा तुम हमें याद आते रहे

कोहरे से लिपट कर धुँआ जब उठा
शौल में सिमटे दिन थरथराते रहे

मैं पिघलता रहा मोम-सा उम्र भर
इक सिरे से मुझे वो जलाते रहे

जब से यादें तेरी रौशनाई बनीं
शेर सारे मेरे जगमगाते रहे

...बहुत ही प्यारी बहर है ये। अनगिनत गाने याद आ रहे हैं जिनकी धुनों पर मेरी ये ग़ज़ल गायी जा सकती है। रफ़ी साब का वो ओजपूर्ण देशभक्ति गीत "ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम" या फिर महेन्द्र कपूर का गाया "तुम अगर साथ देने का वादा करो" या फिर लता दी का गाया "छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिये"। एक-से-एक धुनें हैं इस बहर के लिये। अरे हाँ, वो किशोर दा जब जम्पिंग जैकाल जितेन्द्र के लिये अपने अनूठे अंदाज में "हाल क्या है दिलों का न पूछो सनम" गाते हैं तो इसी बहरो-वजन पर गाते हैं। लेकिन इन धुनों की चर्चा अधुरी रह जायेगी अगर हमने जानिसार अख्तर साब के लिखे फिल्म शंकर हुसैन के गीत "आप यूं फासलों से गुजरते रहे" की चर्चा नहीं की तो, जिसे अदा जी सुनवा रही हैं अपने ब्लौग पर यहाँ


आपसब को आने वाले नये साल की समस्त शुभकामनायें...

21 December 2009

हाकिम का किस्सा...

उधर कई दिनों से >संजीव गौतम जी की ब्लौग पर अनुपस्थिति और फोन पर बात किये हुये एक लंबा अर्सा बीत जाना एकदम से चिंतित कर गया था कि जनाब ठीक तो हैं। फोन लगाया तो उनके कहकहों ने आश्वस्त किया और पता चला कि छुट्टी मनायी जा रही है। बातों ही बातों में वो लगे मेरी एक अदनी-सी ग़ज़ल की तारीफ़ करने जो अभी हाल ही में मुंबई से निकलने वाली त्रैमासिक युगीन काव्या के जुलाई-सितंबर वाले अंक में छपी थी। अब तारीफ़ सुन कर मेरा फुल कर कुप्पा हो जाना तो लाजिमी था...तारीफ़ अपने ग़ज़ल की और वो भी ग़ज़ल-गाँव के एक श्रेष्ठ शायर से। आहहाsssss!!!

...तो सोचा आपलोगों को वही ग़ज़ल सुनाऊँ आज। तकरीबन दो साल पहले लिखी थी। तब शेर कहना सीख ही रहा था। नोयेडा में एक अकेले वृद्ध की हत्या उन्हीं के नौकर द्वारा किये जाने की खबर थी अखबारों में तो यूं ही दो पंक्तियाँ बन गयी{वो "खादिम का किस्सा" वाला} और फिर जिसे बढ़ा कर पूरी ग़ज़ल की शक्ल देने की कोशिश की। ग़ज़ल को सँवारने की जोहमत विख्यात शायर >हस्ती मल हस्ती साब ने की है जो युगीन काव्या के संपादक भी हैं। पेश है:-

जब छेड़ा मुजरिम का किस्सा
चर्चित था हाकिम का किस्सा

जलती शब भर आँधी में जो
लिख उस लौ मद्‍धिम का किस्सा

सुन लो सुन लो पूरब वालों
सूरज से पश्‍चिम का किस्सा

छोड़ो तो पिंजरे का पंछी
गायेगा जालिम का किस्सा

जलती बस्ती की गलियों से
सुन हिंदू-मुस्लिम का किस्सा

बूढ़े मालिक का शव बोले
दुनिया से खादिम का किस्सा

कहती हैं बारिश की बूंदें
सुन लो तुम रिमझिम का किस्सा

...इस बहरो-वजन पर >नासिर काज़मी साब ने कुछ बेहरतीन ग़ज़लें कही हैं। अभी वर्तमान में >विज्ञान व्रत और >डा० श्याम सखा ने भी धूम मचा रखी हैं इस बहर की अपनी ग़ज़लों से।

चलते-चलते संजीव गौतम जी की दो बेमिसाल ग़ज़लें पढ़िये >यहाँ

23 November 2009

सितारे डूबते सूरज से क्या सामान लेते हैं

सोचा, बहुत दिन हो गये आपलोगों को अपनी ग़ज़ल से बोर किये हुये। तो आज एक ग़ज़ल- एकदम नयी ताजी। जमीन अता़ की है फ़िराक़ गोरखपुरी साब ने...."बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं/तुझे ए ज़िन्दगी, हम दूर से पहचान लेते हैं"...सुना ही होगा आपसब ने?...तो इसी जमीन पर एक तरही मुशायरे का आयोजन हुआ था आज की ग़ज़ल के पन्नों पर। उसी मुशायरे से पेश है मेरी ग़ज़ल:-

हमारे हौसलों को ठीक से जब जान लेते हैं
अलग ही रास्ते फिर आँधी औ’ तूफ़ान लेते हैं

बहुत है नाज़ रुतबे पर उन्हें अपने, चलो माना
कहाँ हम भी किसी मगरूर का अहसान लेते हैं

तपिश में धूप की बरसों पिघलते हैं ये पर्वत जब
जरा फिर लुत्फ़ नदियों का ये तब मैदान लेते हैं

हुआ बेटा बड़ा हाक़िम, भला उसको बताना क्या
कि करवट बाप के सीने में कुछ अरमान लेते हैं

हो बीती उम्र शोलों पर ही चलते-दौड़ते जिनकी
कदम उनके कहाँ कब रास्ते आसान लेते हैं

इशारा वो करें बेशक उधर हल्का-सा भी कोई
इधर हम तो खुदाया का समझ फ़रमान लेते हैं

है ढ़लती शाम जब, तो पूछता है दिन थका-सा रोज
"सितारे डूबते सूरज से क्या सामान लेते हैं?"

...बहरे हज़ज के इस मीटर पर कुछ गीतों और ग़ज़लों के बारे में जिक्र किया था मैंने अपनी पिछली ग़ज़ल सुनाते समय। फिलहाल कुछ और गाने जो याद आ रहे हैं इस बहरो-वजन पर...एक तो रफ़ी साब का गाया बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है...रफ़ी साब की ही गायी एक लाजवाब ग़ज़ल भरी दुनिया में आखिर दिल को समझाने कहाँ जाये...और एक याद आता है मुकेश की आवाज वाला तीसरी कसम का वो अमर गीत सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है। इस बहर पर एक गीत जो सुनाना चाहूंगा, वो है गीता दत्त और मुकेश की आवाज में फिल्म बावरे नैन का जो मुझे बेहद पसंद है खयालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते । लीजिये सुनिये गीता दत्त की मखमली आवाज:-





पुनश्‍चः -
अपनी लिखी ग़ज़लों के बहरो-वजन पर उपलब्ध फिल्मी गीत या सुनी ग़ज़लों का जो मैं अक्सर जिक्र करते रहता हूँ अपनी पोस्ट पर, उसका उद्‍देश्य कहीं से भी अपना ज्ञान बघारना नहीं है, बल्कि मैं खुद के लिये इसी बहाने एक डाटा बेस तैयार कर रहा हूँ और मेरे ही जैसे अन्य नौसिखुये को ये बताना है कि एक बहरो-वजन की किसी भी धुनों पर हम अपनी उसी बहरो-वजन पे लिखी रचना को गुनगुना सकते हैं। इधर छुट्टियाँ संपन्न होने को आयी। अगली पोस्ट में मिलूँगा आपसब को वादिये-कश्मीर से।

26 October 2009

खुद से ही बाजी लगी है, हाय कैसी जिंदगी है

उधर इलाहा्बाद में वो ब्लौगर-संगोष्ठी क्या संपन्न हुयी, विवादों के नये पिटारे खुल गये हैं। समझ में नहीं आता कि हम सबलोगों ने हर चीज का सकारात्मक पहलु देखना बंद क्यों कर दिया है। एक व्यर्थ की तना-तनी के लिये सब कोई कमर कसे तैयार बैठे रहते हैं। एक पहल हुई है, एक प्रशंसनीय शुरूआत है...उसकी सराहना करने के बजाय हम सब जुटे हुये हैं उसके तमाम कमजोर पहलुओं को बेवजह का मुद्दा बनाने में।

खैर, ...अपनी एक ग़ज़ल पेश करता हूँ फिलहाल, इस प्रार्थना से साथ कि अपने इस दुलारे हिंदी ब्लौग-जगत में सौहार्द का माहौल कायम रहे सदा-सदा के लिये।

खुद से ही बाजी लगी है
हाय कैसी जिंदगी है

जब रिवाजें तोड़ता हूँ
घेरे क्यों बेचारगी है

करवटों में बीती रातें
इश्क ने दी पेशगी है

रोया जब तन्हा वो तकिया
रात भर चादर जगी है

अर्थ शब्दों का जो समझो
दोस्ती माने ठगी है

दर-ब-दर भटके हवा क्यूं
मौसमे-आवारगी है

कत्ल कर के मुस्कुराये
क्या कहें क्या सादगी है
{मासिक पत्रिका ’वर्तमान साहित्य’ के अगस्त 09 अंक में प्रकाशित}
...बहरे रमल की इस दो रूक्नी मीटर{मुरब्बा सालिम} पर अपने ब्लौग-जगत में बिखरे चंद ग़ज़ल रूपी हीरे-मोती-पन्ने ढ़ूंढ़ने की कोशिश में कुछ लाजवाब ग़ज़लें पढ़ने को मिलीं। श्रद्धेय प्राण साब की इसी बहरो-वजन पर एक बेहतरीन ग़ज़ल पढिये नीरज जी के ब्लौग पर यहाँ। आदरणीय सर्वत जमाल साब की दो लाजवाब ग़ज़लें इसी बहरो-वजन पर पढ़िये यहाँ और यहाँदीपक गुप्ता जी की एक नायाब ग़ज़ल इसी बहर में पढ़ें यहाँ। युवा शायर अंकित सफ़र की एक बेहद खूबसूरत ग़ज़ल जो इसी बहरो-वजन पे बुनी गयी है को पढ़ने के लिये यहाँ क्लीक करें।...और चलते-चलते वीनस केसरी का कमाल देखिये इस बहर पे लिखी हुई सबसे छोटे मीटर{एक रूकनी} वाली ग़ज़ल यहाँ

पुनःश्‍च :-
हास्पिटल के सफेद-नीले लिबास से निजात पाये तीन दिन हो चुके हैं। काफी सुधार है। हाथ में कुछ अजीब सी पट्टियाँ बाँधे रखने का आदेश दिया है डाक्टरों ने और डेढ़ महीने बाद वापस बुलाया है। अभी फिलहाल अपने बेस हेड-क्वार्टर में हूँ और पाँच दिनों बाद जा रहा हूँ चार हफ़्ते के अवकाश पर।...तो अगली पोस्ट कोसी-तीरे बसे बिहार के एक सुदूर गाँव से।

...अरे हाँ, इन सब बातों में डाक्टर अनुराग तो रह ही गये! नहीं, उन्होंने मना किया है इस खासम-खास मुलाकात पर कुछ भी लिखने से।

श्रीनगर की उस शाम-विशेष के लिये ढ़ेरम-ढ़ेर शुक्रिया डाक्टर साब...!!!

19 October 2009

ऊँड़स ली तू ने जब साड़ी में गुच्छी चाभियों वाली

उम्र के इस पायदान पर भी अंदर का बचपन किलकारियाँ मार उठता है छोटी-छोटी खुशियों पर भी। छोटी-छोटी खुशियाँ...जैसे कि दीपावली की शाम को एक स्नेहिल नर्स द्वारा चुपके से आकर कैडबरिज का फ्रूट एंड नट वाला बड़ा-सा पैकेट पकड़ा देना। छोटी-छोटी खुशियाँ...जैसे कि एक दूर-निवासी दोस्त की तरफ से खूब अच्छे से पैक किया हुआ पार्सल का मिलना, जो मेरी पसंदीदा फिल्मों की ढ़ेर सारी डीवीडी से भरा हुआ होता है। छोटी-छोटी खुशियाँ...जैसे कि भारतीय भाषा परिषद की कोलकाता से निकलने वाली मासिक पत्रिका वागर्थ के इस अक्टूबर वाले अंक में अपनी दो ग़ज़लों को छपा देखना...!!! अब वो कैडबरिज या डीवीडी तो आपलोगों के साथ शेयर नहीं कर सकता, हाँ, वागर्थ में छपी अपनी दो ग़ज़लों में से एक जरूर शेयर करूँगा। तो पेश है, मुलाहिजा फरमायें:-

ऊँड़स ली तू ने जब साड़ी में गुच्छी चाभियों वाली
हुई ये जिंदगी इक चाय ताजी चुस्कियों वाली

कहाँ वो लुत्फ़ शहरों में भला डामर की सड़कों पर
मजा देती है जो घाटी कोई पगडंडियों वाली

जिन्हें झुकना नहीं आया, शजर वो टूट कर बिखरे
हवाओं ने झलक दिखलायी जब भी आँधियों वाली

भरे-पूरे से घर में तब से ही तन्हा हुआ हूँ मैं
गुमी है पोटली जब से पुरानी चिट्ठियों वाली

बरस बीते गली छोड़े, मगर है याद वो अब भी
जो इक दीवार थी कोने में नीली खिड़कियों वाली

खिली-सी धूप में भी बज उठी बरसात की रुन-झुन
उड़ी जब ओढ़नी वो छोटी-छोटी घंटियों वाली

दुआओं का हमारे हाल होता है सदा ऐसा
कि जैसे लापता फाइल हो कोई अर्जियों वाली

लड़ा तूफ़ान से वो खुश्क पत्ता इस तरह दिन भर
हवा चलने लगी है चाल अब बैसाखियों वाली

बहुत दिन हो चुके रंगीनियों में शह्‍र की ’गौतम’
चलो चल कर चखें फिर धूल वो रणभूमियों वाली
{त्रैमासिक पत्रिका लफ़्ज़ के दिसम्बर10-फरवरी 11 वाले अंक में भी प्रकाशित}

...ग़ज़ल यदि कहने लायक और जरा भी दाद के काबिल बनी है तो गुरूदेव के इस्लाह और डंडे से। इस बहरो-वजन पर बेशुमार गज़लें और गाने लिखे और गाये गये हैं। चंदेक जो अभी याद आ रहे हैं...चचा गालिब की "हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले" और फिर जगजीत सिंह की गायी वो प्यारी-सी ग़ज़ल तो आप सब ने सुनी ही होगी "सरकती जाये है रुख से नकाब आहिस्ता-आहिस्ता"...। इसी मीटर पर रफ़ी साब का गाया गाना याद आ रहा है जो मैं अक्सर गुनगुनाता हूँ "खुदा भी आस्मां से जब जमीं पर देखता होगा..."। इस बहर पर एक और रफ़ी साब का बहुत ही पुराना युगल गीत चलते-चलते याद आ गया। मेरे ख्याल से "भाभी" फिल्म का है और मुझे बहुत पसंद है- "छुपा कर मेरी आँखों को..."। चलिये ये गाना सुनाता हूँ आपसब को:-



इसी बहर पर अंकित सफ़र की एक बेहतरीन ग़ज़ल पढ़िये यहाँ और उनके ब्लौग पर जाकर इस नौजवां शायर की हौसलाअफ़जाई कीजिये।

21 September 2009

कभी मौत पर गुनगुना कर चले...

ईद का दिन है गले आज तो मिल ले ज़ालिम
रस्मे-दुनिया भी है, मौका भी है, दस्तूर भी है


मुगलिया सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के इस शेर को ईद के पावन मौके पर सुनाने से रोक नहीं पाता खुद को- विशेष कर अपनी चंद महिला-मित्रों को। फिलहाल चलिये एक ग़ज़ल सुनाता हूँ अपनी। ज़मीन अता की सुख़नवरी के पितामह मीर ने। "दिखाई दिये यूँ कि बेखुद किया, हमें आपसे ही जुदा कर चले" - इस एक ग़ज़ल के लिये शायद अब तक की सबसे महानतम जुगलबंदी हुई है। देखिये ना, अब जिस ग़ज़ल को लिखा हो मीर ने, संगीत पे ढ़ाला हो खय्याम ने और स्वर दिया हो लता जी ने...ऐसी बंदिश पे तो कुछ भी कहना हिमाकत ही होगी। ...और इस ग़ज़ल का ये शेर "परस्तिश की याँ तक कि ऐ बुत तुझे / नजर में सभू की खुदा कर चले" मुझे एक जमाने से पसंद रहा है। इसी शेर का मिस्‍रा दिया गया था तरही के लिये आज की ग़ज़ल पे एक बेमिसाल मुशायरे के लिये। तो पेश है मेरी ये ग़ज़ल:-

हुई राह मुश्किल तो क्या कर चले
कदम-दर-कदम हौसला कर चले

उबरते रहे हादसों से सदा
गिरे, फिर उठे, मुस्कुरा कर चले

लिखा जिंदगी पर फ़साना कभी
कभी मौत पर गुनगुना कर चले

वो आये जो महफ़िल में मेरी, मुझे
नजर में सभी की खुदा कर चले

बनाया, सजाया, सँवारा जिन्हें
वही लोग हमको मिटा कर चले

खड़ा हूँ हमेशा से बन के रदीफ़
वो खुद को मगर काफ़िया कर चले

उन्हें रूठने की है आदत पड़ी
हमारी भी जिद है, मना कर चले

जो कमबख्त होता था अपना कभी
उसी दिल को हम आपका कर चले
{भोपाल से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका "सुख़नवर" के जुलाई-अगस्त 10 वाले अंक में प्रकाशित}

...इस ज़मीन से परे लेकिन इसी बहर पे एक ग़ज़ल जो याद आती है वो बशीर बद्र साब की लिखी और चंदन दास की गायी "न जी भर के देखा न कुछ बात की / बड़ी आरजू थी मुलाकात की" तो आप सब ने सुनी ही होगी। अरे हाँ, प्रिंस फिल्म में जब शम्मी कपूर महफ़िल में बैजन्ती माला को देखकर एक खास लटक-झटक के साथ गाते हैं बदन पे सितारे लपेटे हुए..., तो इसी बहर पे गाते हैं।

इधर ब्लौग-जगत अपना फिर से व्यर्थ के विवादों में पड़ा है। विवादों से परे हटकर जरा लता दी की "दिखाई दिये यूं..." को रफ़ी साब की मस्ती में "बदन पे सितारे..." की धुन पे गाईये, या उल्टा! बड़ा मजा आयेगा...!

चलते-चलते, मनु जी का ये बेमिसाल शेर सुन लीजिये इसी मुशायरे से:-

खुदाया रहेगी कि जायेगी जां
कसम मेरी जां की वो खा कर चले

31 August 2009

ये तेरा यूं मचलना क्या...

इधर वादी में सर्दी की सुगबुगाहट शुरू हो गयी है और साथ ही बढ़ गयी है हमारी व्यस्तता। एक बार बर्फ गिरनी शुरू हो जाने पर, एक तो मेहमानों का आना कम हो जायेगा और दूसरे जो रहे-सहे आयेंगे भी तो उनकी आव-भगत में तनिक परेशानी होगी।...तो इसलिये इन दिनों ब्लौग-जगत को कम समय दे पा रहे हैं।

फिलहाल जल्दबाजी में फिर से अपनी एक हल्की-सी ग़ज़ल ठेल रहे हैं। अपनी रचनाओं को अच्छी पत्रिका में छपे देखने पर जो सुख रचनाकार को मिलता है, वो अवर्णनीय है। प्रस्तुत है ये एक छोटी बहर की मेरी ग़ज़ल जो वर्तमान साहित्य के अभी अगस्त वाले अंक में मेरी तीन अन्य ग़ज़लों के संग छपी है:-

ये तेरा यूँ मचलना क्या
मेरे दिल का तड़पना क्या

निगाहें फेर ली तू ने
दिवानों का भटकना क्या

सुबह उतरी है गलियों में
हर इक आहट सहमना क्या

हैं राहें धूप से लथ-पथ
कदम का अब बहकना क्या

दिवारें गिर गयीं सारी
अभी ईटें परखना क्या

हुआ मैला ये आईना
यूँ अब सजना-सँवरना क्या

है तेरी रूठना आदत
मनाना क्या बहलना क्या
{मासिक पत्रिका ’वर्तमान साहित्य’ के अगस्त 09 अंक में प्रकाशित}

...बहरे हज़ज की ये मुरब्बा सालिम ग़ज़ल 1222-1222 के वजन पर है। हमेशा की तरह इस बार इस रुक्न पर कोई ग़ज़ल या गीत याद नहीं आ रहा। आप में से किसी को कुछ याद आता है तो अवश्य बतायें| ग़ज़ल में जो कुछ अच्छा है, गुरूजी का स्नेहाशिर्वाद है और त्रुटियाँ सब की सब मेरी।

17 August 2009

शब्दों की दुनिया सजती है अलबेले फनकारों से...

उधर आपलोगों की तरफ, सुना है, "कमीने" ने खूब धूम मचा रखी है? सच है क्या? ...तो मुझे भी ख्याल आया कि अपनी गुल्लक तोड़ूँ, कोई गुडलक निकालूँ और ढ़ेनटरेनssss करके अपनी एक फड़कती हुई ग़ज़ल ठेलूँ !!!...तो पेश है अभी-अभी अशोक अंजुम द्वारा संपादित अभिनव प्रयास के जुलाई-सितंबर वाले अंक में छपी मेरी एक ग़ज़ल जो श्रद्धेय मुफ़लिस जी की नवाज़िश के बगैर कहने लायक बन नहीं पाती:-


पूछे तो कोई जाकर ये कुनबों के सरदारों से
हासिल क्या होता है आखिर जलसों से या नारों से

रोजाना ही खून-खराबा पढ़ कर ऐसा हाल हुआ
सहमी रहती मेरी बस्ती सुबहों के अखबारों से

पैर बचाये चलते हो जिस गीली मिट्टी से साहिब
कितनी खुश्बू होती है इसमें पूछो कुम्हारों से

हर पूनम की रात यही सोचे है बेचारा चंदा
सागर कब छूयेगा उसको अपने उन्नत ज्वारों से

जब परबत के ऊपर बादल-पुरवाई में होड़ लगी
मौसम की इक बारिश ने फिर जोंती झील फुहारों से

उपमायें भी हटकर हों, कहने का हो अंदाज नया
शब्दों की दुनिया सजती है अलबेले फनकारों से


ऊधो से क्या लेना ’गौतम’ माधो को क्या देना है
अपनी डफली, सुर अपना, सीखो जग के व्यवहारों से


....इस बहरो-वजन पर शायद सबसे ज्यादा ग़ज़ल कही गयी है। दो ग़ज़लें इस मीटर पर जो अभी फिलहाल ध्यान में आ रही हैं उनमे से एक तो मेरे प्रिय शायर क़तिल शिफ़ाई साब की लिखी चित्रा सिंह की गायी मेरी पसंदीदा ग़ज़ल अँगड़ाई पे अँगड़ाई लेती है रात जुदाई की है और...और...और दूजी जगजीत सिंह की गायी वो दिलकश ग़ज़ल तो आप सब ने सुनी ही होगी देर लगी आने में तुमको, शुक्र है फिर भी आये तो

इति ! अगली पेशकश के साथ जल्द हाजिर होता हूँ...

16 July 2009

आकाश छूने की कहानी फुनगियों से पूछ लो...

उस दिन जो एक वो शेर सुनाया था जिस पर गुरूजी ने खूब डंडे बरसाये थे कि "बिन बाप के..." लिखने की हिम्मत कैसे हुयी मेरी, तो वो ग़ज़ल अब मुक्कमल हो गयी गुरूजी के ही आशिर्वाद से। बहरे रज़ज पर बैठी हुई ये ग़ज़ल। इस बहर पर कुछ बहुत ही प्यारी ग़ज़लें कही गयी हैं बड़े शायरों द्वारा। विशेष कर दो ग़ज़लों का जिक्र करना चाहुँगा जो मेरी सर्वकालिन पंसदीदा हैं- पहली इब्ने इंशा जी की कल चौदवीं की रात थी, शब भर रहा चर्चा तेरा और दूसरी बशीर बद्र साब की सोचा नहीं अच्छा बुरा, देखा सुना कुछ भी नहीं।...तो पेश मेरी ये ग़ज़ल:-

है मुस्कुराता फूल कैसे तितलियों से पूछ लो
जो बीतती काँटों पे है, वो टहनियों से पूछ लो

लिखती हैं क्‍या किस्‍से कलाई की खनकती चूडि़यां
सीमाओं पे जाती हैं जो उन चिट्ठियों से पूछ लो

होती है गहरी नींद क्या, क्या रस है अब के आम में
छुट्टी में घर आई हरी इन वर्दियों से पूछ लो

जो सुन सको किस्सा थके इस शह्‍र के हर दर्द का
सड़कों पे फैली रात की खामोशियों से पूछ लो

लौटा नहीं है काम से बेटा, तो माँ के हाल को
खिड़की से रह-रह झाँकती बेचैनियों से पूछ लो

गहरी गईं कितनी जड़ें तब जाके क़द ऊंचा हुआ
आकाश छूने की कहानी फुनगियों से पूछ लो

लब सी लिये सबने यहाँ, सच जानना है गर तुम्‍हें
खामोश आँखों में दबी चिंगारियों से पूछ लो

होती हैं इनकी बेटियां कैसे बड़ी रह कर परे
दिन-रात इन मुस्तैद सीमा-प्रहरियों से पूछ लो

...पाचवें शेर का मिस्‍रा "लौटा नहीं है काम से बेटा, तो माँ के हाल को" अभी दुरूस्त नहीं हुआ है। आप सब कुछ सुझाव दें। जल्द ही मिलता हूँ अगले पोस्ट में।

आप सब ने दो उस्ताद शायरों की एक गज़ल की अनूठी जुगलबंदी देखी या नहीं? दोनों गुरूजनों को मेरा नमन इस बेजोड़ प्रस्तुति पर।

18 May 2009

कातिलों का सरगना तो हाय मेरा यार है...

...जमीन अता की है शहरयार साब ने, जिसे आसमान की बुलंदी तक ले जाने में मशहूर संगीतकार खैय्याम साब और स्वर-साम्राग्यी आशा भोंसले की अहम भूमिका रही। ये क्या जगह है दोस्तों ये कौन सा दयार है। इसी जमीन पर अपनी एक गज़ल पेश है

खबर मिली है जब से ये कि उनको हमसे प्यार है
नशे में तब से चाँद है, सितारों में खुमार है

मैं रोऊँ अपने कत्ल पर, या इस खबर पे रोऊँ मैं
कि कातिलों का सरगना तो हाय मेरा यार है

ये जादू है लबों का तेरे या सरूर इश्क का
कि तू कहे है झूठ और हमको ऐतबार है

सुलगती ख्वाहिशों की धूनी चल कहीं जलायें और
कुरेदना यहाँ पे क्या, ये दिल तो जार-जार है

ले मुट्ठियों में पेशगी महीने भर मजूरी की
वो उलझनों में है खड़ा कि किसका क्या उधार है

बनावटी ये तितलियाँ, ये रंगों की निशानियाँ
न भाये अब मिज़ाज को कि उम्र का उतार है

भरी-भरी निगाह से वो देखना तेरा हमें
नसों में जलतरंग जैसा बज उठा सितार है

...और आखिरी में चचा ग़ालिब से क्षमा-याचना सहित*

तेरे वो तीरे-नीमकश में बात कुछ रही न अब
खलिश तो दे है तीर, जो जिगर के आर-पार है


( त्रैमासिक पत्रिका "नयी ग़ज़ल" के अक्टूबर-दिसंबर 09 वाले अंक में प्रकाशित)

* कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरे-नीमकश को
वो खलिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

11 May 2009

तू जब से अल्लादिन हुआ, मैं इक चरागे- जिन हुआ...

...चीड़-देवदार-चिनारों से आच्छादित धरती के इस कथित जन्नत के एक कोने से आप सब के साथ इस ब्लौग-जगत से जुड़े रहने की कोशिश अपने-आप में बड़ा ही कठिन श्रम है। नेट की गति का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि मेल में एक साधारण-सी आडियो फाइल को अटैच करने में एक घंटे से ऊपर का समय लगता है और वो भी कोई जरूरी नहीं है कि प्रयास सफल ही हो। किंतु यहाँ इस बात की शिकायत करना तो ज्यादती होगी, क्योंकि मुझे याद है कि पाँच-छः बरस पहले यहाँ की अपनी पहली पोस्टिंग के दौरान घर वालों को फोन तक करने के लिये कितनी जद्दोजह्द उठानी पड़ती थी। अब तो मोबाइल की विलासिता और इंटरनेट की सुलभता उपलब्ध है। शिकायत तो कर ही नहीं सकता।

...अपने पिछले पोस्ट में मेरी एक तुच्छ-सी शंका के निबारन हेतु बढ़े उन समस्त मददों का शुक्रगुजार हूँ। ये अपना हिंदी ब्लौग-जगत सचमुच में एक विस्तृत परिवार बनता जा रहा है। विशेष रूप से अनुग्रहित हूँ हिंदी ब्लौगिंग के पुरोधा रविरतलामी साब का, श्रद्धेय गुरू पंकज सुबीर जी का, सुश्री अल्पना जी का, शैलेश जी का और अपनी अनुजा कंचन का।

...इधर बहुत दिनों से कोई ग़ज़ल नहीं हुई थी पोस्ट पर। गुरूजी का हुक्म हुआ, तो उन्हीं के आशिर्वाद से सँवरी एक छोटी बहर की ग़ज़ल प्रस्तुत है। बहरे-रज़ज में 2212-2212 के वजन पर।

तू जब से अल्लादिन हुआ
मैं इक चरागे- जिन हुआ

भूलूँ तुझे? ऐसा तो कुछ
होना न था,लेकिन हुआ

पढ़-लिख हुये बेटे बड़े
हिस्से में घर गिन-गिन हुआ

काँटों से बचना फूल की
चाहत में कब मुमकिन हुआ

झीलें बनीं सड़कें सभी
बारिश का जब भी दिन हुआ

रूठा जो तू फिर तो ये घर
मानो झरोखे बिन हुआ

आया है वो कुछ इस तरह
महफ़िल का ढ़ब कमसिन हुआ


(अशोक अंजुम द्वारा संपादित त्रैमासिक पत्रिका "अभिनव प्रयास" के जुलाई-सितंबर 09 अंक में प्रकाशित)