21 August 2017

छू लिया उसने ज़रा मुझको तो झिलमिल हुआ मैं...

छू लिया उसने ज़रा मुझको तो झिलमिल हुआ मैं
आस्माँ ! तेरे सितारों के मुक़ाबिल हुआ मैं

नाम बेशक न लिया उसने कभी खुल के मेरा
चंद ग़ज़लों में मगर उसकी तो शामिल हुआ मैं

हाल मौसम का, नई फिल्म या यूँ ही कुछ भी
कह गया सब, न कहा दिल की, यूँ बुज़दिल हुआ मैं

पर्स में वो तो लिए फिरता है तस्वीर मेरी
और सरगोशियों में शह्‍र की दाख़िल हुआ मैं

ऊँगलियाँ उठने लगीं हाय मेरी ज़ानिब अब
उसको पाने की तलब में किसी क़ाबिल हुआ मैं

उसने जो पूछ लिया कल कि "कहो, कैसे हो"
बाद मुद्दत के ज़रा ख़ुद को ही हासिल हुआ मैं




ज़िंदगी बह्‍र से खारिज हुई बिन उसके, और
काफ़िये ढूँढता मिसरा कोई मुश्किल हुआ मैं 

[ पाल ले इक रोग नादाँ के पन्नों से ]


07 August 2017

कितने हाथों में यहाँ हैं कितने पत्थर, गौर कर...

{कथादेश के जून 2017 अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का चौथा पन्ना}

इन दिनों दुष्यंत का एक शेर अपने पूरे उफ़ान पर है नीचे वादी में आजादी के नारों के साथ...”कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो” | ख़ूब-ख़ूब उछाले जा रहे हैं पत्थर | वादी में पत्थरों पर बरस रही इनायत इन दिनों ख़ुदा की जानिब उछाली गयी दुआओं पर भी भारी पड़ रही है | शिद्दत से उछाले जा रहे हैं पत्थर...तबीयत से उछाले जा रहे हैं पत्थर | लेकिन कमबख्त सूराख नहीं हो रहा आकाश में । वर्दियों के सर फूट रहे हैं, कंधे चटख रहे हैं, घुटने खिसक रहे हैं...लेकिन आसमान में छेद नहीं हो रहा और हो भी कैसे ! जब दुष्यंत तबीयत से पत्थर उछालने का आह्‍वान कर गये थे तो उसमें सच्चाई की ताकत वाली बात छुपी हुई थी | यहाँ बहके हुए, भटके हुए किसी छद्म सपने के आगोश में लिपटे हुये पत्थर भले ही कितनी ही तबियत से उछाले जा रहे हों, उनकी पहुँच सर-कंधों-घुटनों तक ही सीमित रहने वाली है...आसमान में छेद करने की बिसात नहीं है इनकी | पत्थरों की ये बारिश हम तक भी नहीं पहुँच रही इन ऊँचे तुंग पहाड़ों पर |

 नीचे गाँव से हमारे राशन और अन्य सामान लाने वाले कश्मीरी पोर्टरों को कल लंगर में अपने जवानों के साथ बैठ कर खाना खाते देख कर रोक ना पाया ख़ुद को | शामिल हो गया उनकी पंगत में और जब पूछा उनसे कि उधर नीचे वादी के अपने भाई-बंधुओं की तरह तुमलोग भी क्यों नहीं पत्थर उठाते इस जानिब...इक्कीस वर्षीय उस्मान छेती के जवाब ने सुड़पते मटन की सरसराहट के मध्य एक जबरदस्त सम्मिलित ठहाकों की ऐसी गूँज उठायी कि मैं घबड़ा ही गया कहीं एवलांच ना आ जाए !  उस्मान ने हौले से आदाब करते हुए अपनी छितरी-छितरी दाढ़ी में छुपे होठों पर एक दिलकश मुस्कान बिखेरते हुए कहा कि “ऐसा है ना साब, नीचे वादी में दुआ के लिए सजदे में झुकी कमर पर भी आजादी लिख दी गयी है | जैसे भूत की कहानी सुन-सुन कर बड़े हुए बच्चे जानते हैं कि भूत नहीं होता, फिर भी भूतों की कहानियाँ सुनते हैं...सुनाते हैं...कुछ वैसा ही हाल नीचे वादी के लड़कों का है | आजादी क्या है, नहीं है...कुछ नहीं मालूम उन लड़कों को...लेकिन बचपन से सुनते आये हैं तो आजादी कह रहे हैं, आजादी बोल रहे हैं और साथ में मस्ती के लिए पत्थर फ़ेंक रहे हैं !”

इधर इन बरसते पत्थरों से मन उतना विचलित नहीं होता, जितना झेलम की उदासीनता से | जी करता है, इस मौन-शांत प्रवाह में रमी झेलम को झिंझोड़ कर कहूँ कि तू इतनी निर्विकार कैसे रह सकती है जब तेरे किनारे खेलने-कूदने वाले बच्चे राह भटक रहे हैं चंद सरफ़िरों के इशारे पर | इन "भारतीय कुत्तों वापस जाओ" के नारों से मन उतना खिन्न नहीं होता जितना चिनारों के बदस्तूर खिलखिलाने से | मन करता है वादी के एक-एक चिनार को झकझोड़ कर पूछूँ कि तुम इतना खिलखिला कैसे सकते हो जब तुम्हारी छाया में पले-बढ़े नौनिहाल तुम्हारे अपने ही मुल्क को गंदी गालियाँ निकाल रहे हों | इन आजादी की बेतुकी माँगों से मन उतना उदास नहीं होता जितना बगीचों में ललियाते रस लुटाते सेबों को देखकर होता है। दिल करता है इस सेबों को कुतर-कुतर कर कहूं कि किस काम का तुम्हारे मीठे स्वाद जब तुम्हें चख कर बड़े हुए लड़के ऐसे कड़वे नारे बुलंद कर रहे हों ! 

जी करता है...मन करता है...दिल करता है...बस यूँ ही करता रहता है ! कर कुछ नहीं पाता हक़ीकत में ! ऐसे में निराश मन जब अखबारों, चैनलों और सोशल मीडिया पर नजर दौड़ाता है तो वहाँ से भी उसे दुत्कार मिलती ही दिखती है | हर तरफ...हर ओर | निष्पक्ष मिडिया, ईमानदार बंधुगण कश्मीर के जख्मी लोगों की तस्वीर तो दिखाते हैं लेकिन उनके कैमरे के लैंस, उनकी कलम की स्याही जाने कैसे फूटे सर वाले पुलिसकर्मी, टूटे कंधों वाले सीआरपीएफ़ के जवान और लंगड़ाते सुरक्षाबलों की टुकड़ी को नजरंदाज कर जाते हैं | इन टूटे-फूटे सुरक्षाकर्मियों की तस्वीर टीआरपी रेटिंग जो नहीं बढ़ाती...इन लंगड़ाते-कराहते पुलिसवालों का जिक्र फेसबुक पर बहस जो नहीं बढ़ाता !

कैसे-कैसे क़िस्से आ रहे हैं नीचे वादी से...तहसीलदार के कार्यालय को जलाने में लिप्त चंद सरफ़िरे युवाओं में से कुछ की मौत उसी कार्यालय में उन्हीं के द्वारा लगायी आग से फटे गैस के सिलेंडर से होती है और इल्जाम वर्दीवालों पर जाता है | कई दिनों से अस्पताल में भर्ती एक बीमार बुजूर्ग दम तोड़ते हैं और जब उनका जनाजा घर आता है तो अफवाह उड़ायी जाती है गली-कूचों में कि पुलिस के डंडों से मर गये हैं और पत्थरों की बारिश कहर बन कर टूटती है सुरक्षाकर्मियों पर | एक आठ साल का बच्चा दौड़ते हुये गिर पड़ता है और उसके तमाम भाई-बंधु उसे अकेला छोड़ कर भाग जाते हैं तो सुरक्षाबलों की टुकड़ी में हरियाणा के एक जवान को उस गिरे बच्चे को देखकर दूर गाँव में अपने बेटे की याद आती है, वो उसे अपनी गोद में उठाकर पानी पिलाता है, अपनी गाड़ी में अस्पताल छोड़ कर आता है और जब उस बच्चे की मौत हो जाती है अस्पताल में तो उसी बच्चे को बर्बरतापूर्वक कत्ल कर देने का इल्जाम भी अपने सर पर लेता है | अपने ही मुख पर “भारतीय कुत्तों” के विशेषण को सुनकर संयम बरतना बड़ा ही जिगर वाला काम है | ऐसे में सीआरपीएफ के जवानों द्वारा नीचे वादी में दर्शाया जा रहा संयम पूरी दुनिया के लिए मिसाल है | एक सरफ़िरा नौजवान एक वर्दीवाले के पास आकर उसके युनिफार्म का कालर पकड़ उसके चेहरे पर चिल्ला कर कहता है बकायदा अँग्रेजी झाड़ते हुये "यू ब्लडी इंडियन डॉग गो बैक" और बदले में वो वर्दीवाला मुस्कुराता है और सरफ़िरे नौजवान को भींच कर गले से लगा लेता...पूरी भीड़ हक्की-बक्की रह जाती है और वो वर्दीवाला अपने संयम को मन-ही-मन हजारों गालियाँ देता हुआ आगे बढ़ जाता है | एक इलाके के एसपी साब का सर बड़े पत्थर से फूट चुका है...वर्दी पूरी तरह रक्त-रंजित हो चुकी है, किंतु वो महज एक हैंडीप्लास्ट लगाकर भीड़ के सामने खड़े रहते हैं अपने मातहतों को सख्त आदेश देते हुये कि कोई भी भीड़ पर चार्ज नहीं करेगा | दूसरे दिन चिकित्सकों की टोली सर पर लगे चोट की वजह से उनके एक कान को निष्क्रिय घोषित कर देती है |

...कितने ही क़िस्से आ रहे हैं रोज़ नीचे से ऐसे-ऐसे | सुन कर अपनी और अपने जवानों की खुशकिस्मती पर रश्क होता है कि शुक्र है हम इन बर्फ़ीले पहाड़ों पर सरहद की निगरानी में हैं और उधर नीचे वादी में तैनाती नहीं है हमारी ! अगर होती तो क्या ऐसा संयम बरत पाते हम...!



24 July 2017

हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज ~ 2

वर्ष दो हजार दस का उतरार्ध था वो । जून के महीने ने अपने आगमन की किलकारी भरी ही थी । चोटियों से पिघलती बर्फ़ की आमद वादी की सतह को वो फिचफिचाती कीचड़ वाली बनाने में बड़ी शिद्दत से जुटी हुई थी । श्रीनगर से लेह को जाने वाले फ़ौजी गाड़ियों के दैनिक लंबे काफ़िले ने अभी-अभी उसकी चौकी की जिम्मेदारी वाली सड़क के लगभग पचीस किलोमीटर वाले फैलाव को पार कर पड़ोस वाले सैन्य चौकी के इलाके में प्रवेश कर लिया था । वायरलेस सेट पर इस ख़बर की पुष्टि होते ही उस नाॅट-सो-टाॅल, लेकिन निश्चित रूप से डार्क और हैंडसम कैप्टेन ने चैन की गहरी साँस भरी । पचीस किलोमीटर के फैलाव में मुस्तैदी से तैनात अपने जवानों को एलर्ट रहने की ताकीद कर वो लौट ही रहा था अपनी चौकी की तरफ कि वायरलेस पर आ रहा उत्तेजित सा संदेश उसके पूरे वजूद के संग-संग इर्द-गिर्द की हवा को भी जैसे हजार वाट का करेंट दे गया ।

"चार्ली पिकेट फाॅर टाइगर... जल्दी आओ वरना केहर सिंह मार डालेगा इस औरत को...ओवर !"

वायरलेस आॅपरेटर की आवाज़ में छुपी हुई व्याकुलता कैप्टेन के कानों से उतरती हुई रगों में दौड़ने लगी थी, जब उसने अपने ड्राइवर को जिप्सी वापस मोड़ने का हुकुम दिया चार्ली पिकेट की जानिब । बमुश्किल दस मिनट आगे ही था वो चार्ली पिकेट और इस दस मिनट में कैप्टेन साब ने हवलदार केहर सिंह का पूरा बायोडाटा अपने स्मृति-पटल पर दसियों बार दौड़ा लिया । सीधा-सादा, एकदम डिसिप्लीन्ड, दो बच्चों का पिता, तनिक वज़नदार लेकिन शारीरिक रूप से बिलकुल फिट केहर...क्या समस्या खड़ी कर सकता है वो ? जिप्सी की रफ़्तार के साथ जैसे कैप्टेन की बेचैनी रेस लगा रही थी उस सर्पिल सी टेढी-मेढी सड़क पर ।

अच्छा-खासा मजमा जमा हुआ था वहाँ, जब कैप्टेन पहुँचा । पिकेट से सटी हुई बस्ती के स्थानीय कश्मीरियों की भीड़ में घिरे पिकेट के चार जवान दूर से ही दिख रहे थे कैप्टेन को जिप्सी की विंड स्क्रीन के पार । किसी अनिष्ट की आशंका के लिये ख़ुद को तैयार करता हुआ कैप्टेन जब जिप्सी से उतरा तो बस्ती के तमाम लोग हँसते-ठिठयाते दिखे उसे और हवलदार केहर सिंह एक लगभग दस वर्षीया कश्मीरी गुड़िया को गोद में बिठाये अपने पैक्ड लंच से पूरियाँ खिला रहा था । कहानी यूँ खुली कि अनिष्ट की आशंका से डसा हुआ कैप्टेन अपने बुलंद अट्टहास को रोक ना पाया...

... उस कश्मीरी गुड़िया की माँ जाने किस आवेश में अपनी बेटी की बेतरह पिटाई कर रही थी और उस छुटकी का रुदन दूर कुमाऊँ के पहाड़ों में बैठी अपनी बेटी की याद दिला रहा था हवलदार केहर को, जो उस वक़्त अपनी ड्यूटी पर वहीं निकट खड़ा था । औरत को तीन-चार बार गुहार लगाया उसने छुटकी को छोड़ देने के लिये, मगर जब वो नहीं मानी तो फिर केहर सिंह के रौद्रावतार ने पहले तो ज़ोर का धक्का दिया औरत को और छुटकी को गोद में उठा लिया । माँ जब उग्रचंडिका बनी हुई केहर पर झपटी तो फिर सब कुछ केहर सिंह की बर्दाश्तीय क्षमता से परे हो गया था । कैप्टेन को बस्ती वालों ने बताया कि कैसे छुटकी को गोद में उठाये थप्प्ड़ों की मूसलाधार वृष्टि ले आया थे हविलदार साहिब ! छुटकी के पिताश्री समस्त बस्ती वालों के समूह में सबसे अग्रणी थे केहर के समर्थन में ये कहते हुये कि ठीक किया हविलदार साहिब ने इस बदतमीज़ औरत के साथ... ऐसे ही करती है ये बच्चों के साथ हर रोज़...अब अक़ल ठिकाने रहेगी ।

वापस लौटते हुये मुस्कुराते कैप्टेन साब के पास शाम के लिये अपनी शरीक़े-हयात को मोबाइल पर सुनाने के लिये एक दिलचस्प क़िस्सा था !







हाथ थे मिले कि ज़ुल्फ़ चाँद की संवार दूँ
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूँ ... 


( तस्वीर गूगल से साभार और आख़िर की पंक्तियाँ नीरज के एक विख्यात गीत से )

18 July 2017

इश्क़ उचक कर देख रहा है, हुस्न छुपा है ज़रा-ज़रा...

एक अरसा ही तो बीत गया जैसे ब्लौग पर कोई ग़ज़ल लगाए...तो इस 'एक अरसे' का अंत यहीं एकदम तुरत ही और एक ताज़ा ग़ज़ल:- 

आधी बातें, आधे गपशप, क़िस्सा आधा-आधा है
इसका, उसका, तुम बिन सबका चर्चा आधा-आधा है

जागी-जागी आँखों में हैं ख़्वाब अधूरे कितने ही
आधी-आधी रातों का अफ़साना आधा-आधा है

तुमसे ही थी शह्र की गलियाँ, रस्ते पूरे तुमसे थे
तुम जो नहीं तो, गलियाँ सूनी, रस्ता आधा-आधा है

इश्क़ उचक कर देख रहा है, हुस्न छुपा है ज़रा-ज़रा
खिड़की आधी खुली हुई है, पर्दा आधा-आधा है

उन आँखों से इन आँखों के बीच है आधी-आधी प्यास
झील अधूरी, ताल अधूरा, दरिया आधा-आधा है

ग़ुस्से में तो फाड़ दिया था, लेकिन अब भी अलबम में
जत्न से रक्खा फोटो का वो टुकड़ा आधा-आधा है

बाद तुम्हारे जाने के ये भेद हुआ हम पर ज़ाहिर
रोना तो पूरा ही ठहरा, हँसना आधा-आधा है


[ jankipul.com में प्रकाशित ] 

10 July 2017

इक ज़ख़्म मैं मुरीद तो इक ज़ख़्म पीर मैं...

{कथादेश के मई अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का तीसरा पन्ना}

जी ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत...कि रात-दिन बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किये हुए...ढेर-ढेर सारी फ़ुरसतें...दोस्तों-से-झूठी-मूटी-दूसरों-का-नाम-लेकर-वो-तेरी-बातें-करना-वाली फ़ुरसतें कि इन लम्बी-लम्बी रातों के अफ़साने गढ़ सकूँ इन फ़ुरसतों में | सरहद पर रातें लंबी होती हैं...अक्सर तो उम्र से भी लंबी...बेचैन, आशंकित, चौकस रतजगों में लिपटी हुईं | इन रतजगों के जाने कितने अफ़साने हैं जो लिखे नहीं जा सकते...जो सुनाये नहीं जा सकते...और सुनाये जाने पर भी इनके आम समझ से ऊपर निकल जाने का भय रहता है | युद्धइन तमाम अफ़सानों का केन्द्रीय किरदार होता | कश्मीर की दुर्गम, बर्फ़ में दबी-ढँकी ठिठुरती-सिहरती हुई सरहदों पर हर रोज़ ही तो एक युद्ध होता है | कौन देख पाता है इन अंतहीन रोज़-रोज़ के युद्धों को, सिवाय इन प्रहरियों के !

वैसे युद्ध बस सरहद पर ही नहीं लड़े जाते ! कई बार सैनिकों के लिए भी...युद्ध बस सरहद पर नहीं लड़े जाते सामने पत्थर-फेंक दूरी पर खड़ा आँखों से आँखें मिलाता हुआ दुश्मन या फिर ज़मीनी बनावट और ख़राब मौसमों का फायदा उठाकर कथित जेहाद के नाम पर अंदर घुस आने को उतावले आतंकवादियों का दस्ता...ये सब मिलकर या अलग-अलग विगत तीन-साढ़े तीन दशकों से लगातार युद्द जैसी स्थित ही तो उत्पन्न करते रहे हैं | कहने को  बेशक इसे लो इंटेसिटी कंफ्लिक्टकह कर नकारने की कोशिश करते रहें हम, हर तीसरे दिन की शहादत कुछ और कहानी कहती है...कहानी, जो सौ साल पहले के उस महान प्रथम विश्व-युद्ध के बनिस्पत एक लघु-कथा से ज्यादा और कुछ नहीं, किन्तु यही लघु-कथा रात-दिन इन ठिठुरती-सिहरती सरहदों पर निगरानी में खड़े एक भारतीय सैनिक के लिए किसी महाकाव्य से कम का विस्तार नहीं देती है | पूरे मुल्क की सोचों, निगाहों में अलग-थलग कर दिया ये अकेला भारतीय सैनिक इसी अनकही कहानी के पार्श्व में एक सवाल उठाता है कि क्या वजह है कि सौ साल पहले के उस महायुद्ध के पश्चात जब सम्पूर्ण यूरोप, अमेरिका या फिर जर्मनी भी एक मजबूत ताकत के रूप में, एक व्यवस्थित विकसित मुल्क के रूप में उभर कर आए और अपना ये मुल्क स्वतंत्रता-प्राप्ति के उपरांत पाँच-पाँच युद्ध देख चुकने के बाद भी एक चरमरायी सी, असहाय विवश व्यवस्था की छवि प्रस्तुत करता है पूरे विश्व के समक्ष ?

युद्ध कभी भी वांछित जैसी चीज नहीं हो सकती है...और खास कर एक सैनिक के लिए तो बिलकुल ही नहीं | किसी भी युद्ध के दौरान एक सैनिक को मौत या दर्द या ज़ख्म से ज्यादा डर उसको अपने वर्दी की और अपने रेजीमेंट की इज्जत खोने का होता है और कोई भी युद्ध वो इन्हीं दो चीजों के लिए लड़ता है...बस ! अपनी हरी वर्दी के लिए और अपने रेजिमेंट के नाम-नमक-निशान के लिए ! ऐसी हर लड़ाई के बाद वो अपने मुल्क और इसके लोगों की तरफ बस इतनी-सी इच्छा लिए देखता है कि उसके इस जज़्बे को पहचान मिले...उसकी इस क़ुरबानी को सम्मान मिले | प्रथम विश्व-युद्ध के पश्चात उसमें शामिल हर मुल्क में सैनिकों को उसी स्नेह और सम्मान से देखा गया (देखा जा रहा है) जिसकी ज़रा सी भी अपेक्षा वहाँ के सैनिकों के मन में थी | किन्तु यहाँ इस मुल्क में अपेक्षा के विपरीत उपेक्षा का दंश लगातार झेलते रहने के बावजूद भारतीय सैनिक फिर भी हर बार हर दफ़ा जरूरत पड़ने पर यहाँ सरहद के लिये जान की बाज़ी लगाता है | वो देखता है असहाय अवाक-सा कि कैसे कुछ मुट्ठी भर उसके भाई-बंधुओं द्वारा चलती ट्रेन में की गई बदतमीजी को उसके पूरे कुनबे पर थोप दिया जाता है...कि कैसे चंद गिने-चुने उसके साथियों के हाथों उत्तर-पूर्व राज्यों या कश्मीर के इलाकों में हुई ज्यादातियों के सामने उसके पूरे युग भर की प्रतिबद्धता को नकार दिया जाता है एक सिरे से...वो तिलमिलाता है, तड़पता है, फिर भी ड्यूटी दिये जाता है | सरहद पर चीड़ और देवदार के पेड़ों से उसे ज्यादा स्नेह मिलता है, बनिस्पत अपने मुल्क के बाशिंदों से | सामने वाले दुश्मन की छुद्रता, गुपचुप वार करने वाले आतंकवादियों की धृष्ठता, मौसम की हिंसक मार, मुश्किल ज़मीनी बनावट का बर्ताव जैसे हर रोज़ के छोटे-छोटे युद्धों से लड़ता वो अपने मुल्क के इस सौतेले व्यवहार से भी एक युद्ध लड़ता है...युद्ध बस सरहद पर नहीं लड़े जाते !

इधर अप्रैल का महीना तो आधा से ज़्यादा गुज़र चुका है, लेकिन ये वाला साल है कि पुराने साल की ठिठुरन को अब तलक अपने बदन पर लपेटे हुये है | बंकर से बाहर निकलने के लिए बर्फ ने जो सीढ़ियाँ तैयार कर रखी है, वो घटती मालूम ही नहीं पड़ रहीं | अभी तक उतुंग सी बेहया की तरह सर उठाये खड़ी हुयी हैं | सब कुछ जैसे गीला-गीला सा...पूरे का पूरा वजूद तक....वजूद की अनंत तलहट्टियाँ तक | प्रचंड सूर्य की प्रखर धूप के लिए बेचैन विकल मन समूचे सूर्य को ही उतार लाना चाहता है बंकर की छत पर मानो ! धूप की जलती सी रस्सी जो होती एक काश, जिस पर पूरे बदन को निचोड़ कर सूखने के लिए टांग देता कोई !

रातें उम्र से भी लंबी हैं और दिन उस लंबी उम्र का फकत एक लम्हा जैसे !

...और रात लिये रहती है याद-सी कोई याद तुम्हारीड्यूटी की तमाम बंदिशों में भी और रात भर बजता रहता है ये बगल में रखा छोटा-सा मोटोरोला का रेडियो-सेट, निकट दूर खड़े तमाम प्रहरियों से मेरे बंकर को जोड़ता हुआ...अल्फा ऑस्कर किलो ओवर” (ऑल ओके ! ओवर !!) करता हुआ | जानती हो, तुम्हारी याद दिलाता है ये कमबख़्त छोटा सा रेडियो सेट...हर बार, बार-बार...घड़ी-घड़ी ऑल ओके ओवरकी रिपोर्ट देता हुआ !

हाँ ! सच में !! तुम सा ही पतला-दुबला, तुम सा ही सलोना और भरोसेमंद भी...और जब भी बोलना होता है इसमें कुछ, लाना पड़ता है इसे होठों के बिलकुल पास...ठीक तुम-सा ही तो !

हँसोगी ना तुम जो कभी इस डायरी को पढ़ोगी ?

काश कि दूर इन बर्फीले पहाड़ों से इसी के जरिये कर पाता मैं...तुम संग भी ओके ओवर...कभी-कभार मिस यू ओवर...और थोड़ा-सा लव यू ओवरभी !

...और जो यूँ होता तो क्या तब भी ये रातें उम्र सी ही लंबी होतीं ?

हा हा...ये लम्बी ठहरी हुई पसरी-पसरी रातें और तो कुछ करें ना करें, मेरे अच्छे-भले सोल्जर को कहीं पोएट ना बना डालें ! फ़रहत एहसास का शेर याद आता है:-


मुझ तक है मेरे दुख के तसव्वुफ़ का सिलसिला
इक ज़ख़्म मैं मुरीद तो इक ज़ख़्म पीर मैं