07 January 2019

यह विदाई है या स्वागत...?


एक और नया साल...उफ़्फ़ ! इस कमबख़्त वक्त को भी जाने कैसी तो जल्दी मची रहती है | अभी-अभी तो यहीं था खड़ा ये दो हज़ार अठारह अपने पूरे विराट स्वरूप में...यहीं पहलू में तो था ये खड़ा ! अचानक से जैसे पलकें झपकते ही अब दो हज़ार उन्नीस आ खड़ा हुआ है अपना विशाल सा मुख फाड़े | इतना विशाल मुख की जैसे अभी के अभी पूरे वजूद को निगल जाएगा ! सोच कर सिहरता हुआ बंकर के लूप-होल से बाहर देखता हूँ तो बर्फ़ की परतें और-और मोटी हुईं नज़र आती हैं...जैसे इन्हें भी होड़ लगी हो नए साल के विराट स्वरूप से | बादलों के ऊपर मुंडी उठाए बर्फ़ की इन मोटी परतों वाली सफ़ेद चादर लपेटे इस समाधिस्थ पहाड़ को जैसे कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता नए सालों के आते-जाते रहने से |

कहाँ से हासिल होगी इन बर्फ़ीले पहाड़ों सी समाधिस्थ मुद्रा ? एक सम्पूर्ण सैनिक को भी क्या ठीक इसी तरह बीतते वक़्त से एकदम बेपरवाह समाधिस्थ होने की हद तक प्रशिक्षित नहीं होना चाहिए ? इन बर्फ़ीले पहाड़ों के नीचे एक पूरा का पूरा फैला हुआ महबूब मुल्क अपना समस्त भरोसा, अपनी तमाम निश्चिंतता हम सैनिकों के हवाले कर ही तो तल्लीन नए साल की आमद में हर्षो-उल्लास में लिप्त है | सरहद पर मुस्तैद हर सैनिक का समर्पण, सच कहूँ डियर डायरी, तो इन्हीं उतुंग पहाड़ों की तरह अडिग, अविचल और मौसम की दुश्वारियों से बेफ़िक्र होना चाहिए...तभी तो इस महबूब मुल्क की संप्रभुता अक्षुण्ण रहेगी अनंत काल तक ले लिए |

मुल्क बदल रहा है | मुल्क के लोग बदल रहे हैं | कल ही एक संदेशा आया मोबाइल पर | एक दोस्त का संदेशा जो एक साथी की शहादत के बाद उसकी अंत्येष्टि में शामिल हुआ था...सुनो डायरी मेरी कि क्या कहता है ये संदेशा, जो उसी अंत्येष्टि से भेजा गया है...

मैं उलझन में हूँ ! यह विदाई है या स्वागत ?
यह एक उदास समापन होना चाहिए या खुशनुमा शुरूआत ?
सजे हुये खूबसूरत बैनर्स हैं हर ओर मुसकुराते सैनिकों की तस्वीरें लिए...
सड़कें रंगोलियों और फूलों से सजी हुयी हैं...
पाँच हज़ार से ऊपर लोग, हज़ार किलोग्राम से ज़्यादा के पुष्प, चमकदार वर्दी में सैकड़ों पुलिस और सेना के जवान और एक मृत शरीर...
यह विदाई है या स्वागत है ? मैं उलझन में हूँ !
सजी हुई सेना की गाड़ी पहुँचती है | तिरंगे में लिपटा हुआ ताबूत गाड़ी से उठ कर हरी वर्दी वालों के मजबूत कंधों पर आ टिकता है...एक सहज उत्कृष्ठता से |
वहाँ मौजूद मानव-समुद्र की हर लहर उस ताबूत को छूना चाहती है, कंधे देना चाहती है...लेकिन सबके सौभाग्य में नहीं वो स्पर्श |
हरी वर्दी वाले मजबूत कंधे क़दमों से कदम मिलाये धीमे चाल में आगे बढ़ते हैं...ताबूत भारी है, संवेदनाएं भारीतर |
भीड़ उमड़ती जा रही है | कई सारे लोग ऊंची पानी टंकी पर चढ़े हुये हैं, कितने ही छतों पर और कुछ पेड़ पर भी |
ऐसा दृश्य अब तक तो बस किसी क्रिकेट मैच के लिए या फिर किसी फिल्म की शूटिंग के दौरान ही द्रष्टव्य था |
लेकिन यहाँ तो ये दोनों ही बात नहीं...मैं उलझन में हूँ !
कितने ही कैमरे...यत्र-तत्र-सर्वत्र...सबको किसी बेहतर कोण की तलाश | वहीं पास में स्तब्ध से खड़े कुछ परिजन | यह ब्रेकिंग न्यूज़ है या एक टूटा परिवार !
मैं उलझन में हूँ !
शहीद की पत्नी पुष्पार्पण करती हैं और ताबूत को थामे रहती है देर तक...जैसे किसी माँ ने नवजात को पकड़ रखा हो...नन्ही बिटिया आकर सैल्यूट करती है...एकदम कडक सैल्यूट !
मेरी अब तक रुकी हुयी आँखों में सैलाब उमड़ आता है |
उस सैलाब के साथ-साथ वहाँ खड़ीं सैकड़ों जोड़ी जवान आँखों में सेना में शामिल होने का संकल्प कौंध उठता है | सैकड़ों माँएँ अपनी मौन सहमति देती हैं |
एक शेर की मौत हुई है या सैकड़ों शावकों का जन्म ?
मैं उलझन में हूँ !
निकटतम मित्रों का टोली चिता की अग्नि के साथ खड़ी है तस्वीर के लिए...यह मातम है या उत्सव ?
मैं उलझन में हूँ !
धीरे-धीरे हर कोई विदा ले रहा है अब | रात का अंधेरा उतर आया है | सर्द हवा बह रही है | मैं चिता की अग्नि के पास अकेला खड़ा हूँ |
यह उगते सूरज का उजास है या डूबते सूरज का निश्छल सन्नाटा ?
मैं उलझन में हूँ !
यह शायद अजीब बात है, लेकिन मन शांत है पूरी तरह अब | मुझे अपने दोस्तों पर प्यार उमड़ रहा है | मुझे लोगों से मुहब्बत हो रही है | मुझे अपने मुल्क से इश्क़ हो रहा है | फिर से...फिर-फिर से !
यह विदाई थी या स्वागत था ?
कहो ना दोस्त, यह समापन था कि थी शुरुआत ?

पढ़ता हूँ संदेशा बार-बार....कितनी ही बार और लगता है जैसे दोस्त की आँखों से छूट गया सैलाब इधर बादलों से भी ऊपर मुंडी उठाए इस समाधिस्थ पहाड़ के इस बंकर के लूप-होल से बाहर झाँकती इस एक जोड़ी आँखों में उमड़ आया है |

नया साल मुबारक हो तुम्हें ओ मेरे महबूब मुल्क !      


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26 December 2018

कितनी तुम कि मैं न रहूँ...


कितनी दूरी ! दूरी...कितनी दूर ! कितना दर्द कि बस उफ़ अब ! कितना शोर कि बहरी हों आवाज़ें और कितनी चुप्पी कि बोल उठे सन्नाटा ! कितनी थकन कि नींद को भी नींद ना आए...आह, कितनी नींद कि सारी थकन कोई भूल जाए ! 

कितनी उदासी कि खुशियाँ तरस जायें अपने वजूद को...कितनी खुशियाँ कि उदासी लापता ! कितनी नफ़रत...उफ़, कितनी नफ़रत कि मुहब्बत का नाम तक लेना दुश्वार...कितनी मुहब्बत कि नफ़रतों के होने पर हैरानी ! 

कितनी मुश्किलें कि सब कुछ आसान हो जैसे...कितनी आसानी कि मुश्किलों का तूफ़ान ही हो सामने ! कितनी सिहरन कि समूचा सूर्य आगोश में लिया जा सके...कितनी तपिश कि हिमालय तक कम पड़ जाये !

टीस सी कोई टीस...जाने कितनी टीस इन तपते तलवों में कि लंबी गश्त के बाद इन भारी जूतों को उतारते ही आभास भी न हो कि तलवें हैं या नहीं...कि उतर गए संग ही घंटों से भीगी-गीली जुराबों के ! कितना अनकहा सा कुछ कि कहने का कोई औचित्य ही नहीं...कितना कहा जा चुका कि जैसे कुछ भी अनकहा शेष नहीं अब !

कितनी बन्दूकों से निकलीं कितनी गोलियाँ कि एक मुल्क की रूह तक छलनी हुई जाती...कितनी भटकी रूहें कि विश्व भर की बन्दूकों की गोलियाँ ख़त्म ! 

कितनी शहादतें कि अब ज़मीन कम पड़ने लगी चिताओं के लिए...कितनी खाली पसरी हुई ज़मीनें कि शहादत की भूख मिटती ही नहीं ! कितने ताबूत कि लपेटने को तिरंगा न मिले अब...कितने ही बुने जाते तिरंगे कि ताबूतों का आना थमता ही नहीं !

कितना शौर्य कि भय का नामो-निशान तक नहीं...कितना भय कि कैसा शौर्य !

सामने के बंकर से किसी ने आवाज़ दी...सरहद पार से...“सो गए क्या जनाब”...इस जानिब से उपहास उठा...“चुप बे कमीनों ! बांग्लादेश से भी हार गए, चले हैं क्रिकेट खेलने” और उठे फिर ज़ोर के ठहाके | उधर की ख़ामोशी की खिसियाहट सर्द हवाओं में अजब सी गर्माहट भरने लगी |

कितने शब्द...अहा, कितने ही सारे शब्द कि क़िस्सों का लुत्फ़ ही लुत्फ़...कितने क़िस्से कि शब्द ढूंढें न मिलें ! कितने...कितने ही ठहाकों की गूँज कि आँसुओं के रिसने की कोई ध्वनि ही नहीं और कितने आँसू कि डूबती जाती है सब ठहाकों की गूँज ! 

कितनी सृष्टि में कितना प्रेम
कि कहना न पड़े
मुझे प्रेम है तुमसे !

कितना प्रेम
कि करने को पूरी उम्र
भी कम हो जैसे !

कितना मैं
कि तुम आओ
कितनी तुम
कि मैं न रहूँ !”

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18 December 2018

हाशिये का राग

विगत डेढ़-दो महीने से लगातार मुखड़े से लेकर आख़िरी अंतरे तक “हाशिये का राग” के साथ मैं संगत मिला रहा हूँ | सुर-ताल की ज्यादा समझ नहीं मुझे, लेकिन हँसी की थपकियों से लेकर गहरी-गहरी सोच वाली गुनगुनाहट के साथ सुशील सिद्धार्थ के इस छेड़े हुए राग के साथ आलाप लेते हुये मैं एक बेहतर समझ वाले पाठक के तौर पर विकसित हुआ हूँ या कथेतर हिन्दी-साहित्य में व्यंग्य-विधा के लिए नयी मुहब्बत पाले हुए आशिक़ का अवतार धारण कर चुका हूँ या फिर दोनों ही...ये जानना मेरे लिए ख़ुद ही बहुत दिलचस्प है | बेहतर-समझ-वाले-पाठक वाली बात इसलिए की मैंने कि किताब में शामिल व्यंग्य से गुज़रते हुए जाने कितनी जगहों पर यूँ लगा कि ये तो मैं भी करता हूँ और ये कटाक्ष दरअसल मुझ पर भी(ही) तो है | अमूमन पाँच से छ दिन में एक किताब पढ़ लेने वाला मेरा ‘मैं’ इस किताब को जाने क्यों सहेज-सहेज कर थम-थम कर पढ़ता रहा...एक दिन में बस एक चैप्टर की ज़िद लिए कि एक का स्वाद दूजे में मिक्स ना हो और कोई ख़तरनाक कॉकटेल ना तैयार हो जाए !
व्यंग्य में लिपटे चुभते-गुदगुदाते-चिकोटी काटते चौवालीस आलेखों (जिसमें एक दर्जन लघु आलेख अलग से गिनती माँगते हैं) के बोझ से जहाँ इस किताब को उठाये न उठना चाहिए, वहीं उलटा, पढ़ते हुए यह किताब अपने पाठक को इतना हल्का कर देती है...कुछ इतना हल्का कि लेखक के हर चुटीले वार के बाद आह-उफ़ करते हुए एकदम से तारो-ताज़ा हो अपने शेष बचे कार्यों को पूरा करने के लिए एक तरह से रिचार्ज्ड हो जाते हैं आप |
ऐसे-ऐसे नुकीले जुमले की जिनकी नोक मोटी-सी-मोटी चर्बी वाली संवेदनाओं को भी बेधने से बाज़ ना आये...ऐसे-ऐसे तीखे फ़िक़रे कि अरसे से बंद पड़ी स्वाद-ग्रंथियाँ भी अपनी ज़ंग लगी पोरों को स्वत: खोल बैठें...ऐसी-ऐसी रंगीन टिप्पणियाँ कि सात-के-सातों रंग अपने रंगीले होने पर गुमान करना भूल जायें ! मज़े की बात ये कि लेखक ये सारा चमत्कार बिलकुल ही अनजान तरीके से करते हैं और ये बात आपको किताब पढ़ते हुए ख़ुद ही आभास होता है कि जैसे ऐसा लिखा जाना कुछ एकदम नेचुरल-सा है लेखक के लिए...उनके पर्सोना का ही एक अदृश्य सा हिस्सा जो लिखने के बाद दृष्टिगोचर होता है |
सुशील सिद्धार्थ दरअसल अपने लिक्खे से...अपने लगातार लिक्खे से और उस लगातार लिक्खे में भी कहीं दोहराव ना आने देने से...हम पाठकों को मेस्मराइज्ड करते रहे हैं | सूर्यबाला जी के कहे को उधार लूँ तो, जो इस किताब के फ्लैप पर भी उद्धृत है...”जाने कैसे इतना लिखने के बाद भी रिपीटीशन के पॉपुलर ट्रेंड से बचे रहे हैं अब तलक सुशील और एक तरह से वर्तमान में अपना ब्रांड बनाए रखने में कामयाब रहे हैं” |
व्यंग्य का ये अनूठा संकलन किताबघर प्रकाशन से आया है और महज डेढ़ सौ रुपये में आपकी किताबों वाले सिरहाने पर रखे जाने की ज़िद करता है |


15 November 2018

एक ब्रह्मा का अवसान



"सुनो पीटर, हमारी मुहब्बत सलामत तो रहेगी ना ? उन्होंने ही तो संभाले रखा था अब तक, जब भी बिखरने को हुई ये !" परसों रात सुबकते हुये मेरी जेन ने पूछा था...
लगभग सत्तावन साल पहले एक नये 'यूनिवर्स' का अस्तित्व जब सामने आया था तो पूरी धरती पर हर्ष और हैरत से भरे कोलाहल का शोर जाने कितने ही उल्कापिंडों के अकस्मात् टूटने का कारण बना । शोर थमा तो इस नये 'यूनिवर्स' के सृजनकर्ता को दुनिया ने सीने से लगा लिया । उम्र के उन्चालीसवें पायदान पर खड़े स्टैन ली ने शायद उस वक़्त सोचा भी न होगा कि मार्वल कॉमिक्स में जिन किरदारों को वो बुन रहे हैं, ये सब मिलकर एक दिन एक ऐसे पैरेलल यूनिवर्स को खड़ा कर देंगे कि हम जैसे दीवाने पीढ़ी दर पीढ़ी पूरी तरह सम्मोहित हो वहीं बस जाने की सोचा करेंगे ।
नहीं, ऐसा तो नहीं था कि स्टैन ली द्वारा इस मार्वल यूनिवर्स के सृजन से पहले ऐसे किसी और यूनिवर्स का वजूद नहीं था । जव वो सत्रह साल के थे तो डीसी यूनिवर्स अपना जलवा कायम कर रहा था । मेट्रोपॉलिस के सुपरमैन और गॉथम के बैटमैन का जादू सर चढ़ कर बोल रहा था । लेकिन डीसी यूनिवर्स के शहर काल्पनिक थे और इसके सुपरहीरोज़ या तो बहुत ज़्यादा 'आइडियलिस्टिक' थे या फिर कुछ ज़्यादा ही 'ट्विस्टेड' । मेट्रोपॉलिस जहाँ एक 'मॉडल' शहर था, वहीं गॉथम एकदम 'डार्क' । सुपरमैन, बैटमैन, फ्लैश वगैरह की शक्तियाँ असीमित थीं । वे सब के सब 'लार्जर दैन लाइफ' की परिकल्पना के द्योतक थे ।
स्टैन ली ने अपने मार्वल यूनिवर्स की बुनियाद न्यूयॉर्क जैसे चिर-परिचित शहर में रखी, उसकी तमाम अच्छाइयों और बुराइयों के साथ । उनके सुपरहीरोज़ हमसब के अपने पड़़ोसियों जैसे देखे-से, भाले-से हैं । स्पाइडरमैन जैसे हीरो के पास अक्सर पेप्सी पीने तक के पैसे नहीं होते...शहर का सबसे ज़्यादा बिकने वाला अख़बार उसे ट्रौल करता है...अपनी तमाम शक्तियों के बावजूद वो अपनी प्रेमिका को ख़ुश नहीं रख पाता । स्टैन ली के यूनिवर्स वाले सुपरहीरोज़ अपनी तमाम ख़ूबियों के साथ उतने ही 'वल्नरेबल' दिखते हैं और यही बात स्टैन ली को इस विधा में सबसे दमकते सिंहासन पर बिठाती है । उनका जाना यक़ीनन एक अनूठे और हैरान करने वाले क़िस्सागो का जाना है ।
विगत सोलह सालों से लगातार मार्वल यूनिवर्स की चार कॉमिक्स को सब्सक्राइब करता आ रहा मेरा 'मैं' आज पहली बार अपने सब्सक्रिप्शन को बंद करने की सोच रहा है । कहाँ बिखेर पायेगा ये महबूब यूनिवर्स मेरा अब वैसा ही जादू अपने जादूगर के बिना !
...और अपने आँसू पोछते हुये पीटर पार्कर ने सुबकती मेरी जेन को बाँहों में भर कर कहा "विद ग्रेट पावर, कम्स ग्रेटर रिस्पॉन्सिबिलिटी । उनकी रूह हमारी मुहब्बत के साथ है, मेरी ।"


[ जाइये स्टैन ली सर कि इन दिनों उस परमपिता परमेश्वर को भी चंद सुपरहीरोज़ चाहिये स्वर्ग में ! सलाम !! ]

05 November 2018

भय को देखना हो नतमस्तक...


[ कथादेश के सितम्बर 2018 के अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का अठारहवाँ पन्ना ]

अभी कुछ दिन पहले डायरी के किसी बेतरतीब पन्ने से उलझे हुये एक पाठक का बहुत ही तरतीब सा कॉल आया था | बहुत देर बात हुई उनसे और डायरी के तमाम पन्नों से जुड़े उनके सवालों की फ़ेहरिश्त इतनी लम्बी थी कि आख़िर में उनसे कहना पड़ा कि आपके सारे सवालों का जवाब देना इस ऊँचे बर्फ़ीले पहाड़ की खड़ी चढ़ाई चढ़ना जैसा है | मोबाईल के उस पार उनकी छितरी-छितरी हँसी एक सुकून दे रही थी कि इस डायरी के ये बेतरतीब से पन्ने कमोबेश अपनी बात सही तरीक़े से कह पा रहे हैं | एक सवाल था जो देर तक मचलता रहा ज़ेहन में उनके फोन कट जाने के बाद और ये सवाल अमूमन हर दोस्त रिश्तेदार भी करते हैं |  सवाल जो कैसी-कैसी स्मृतियों का सैलाब लेकर आ गया है इस छोटे से बंकर में !

     कैसा लगता है किसी ख़तरनाक मिशन पर एक तयशुदा मृत्यु की तरफ़ जाते हुये सैनिकों को ?

     सच कहूँ, डायरी मेरी, तो कोई उचित शब्द नहीं हैं मेरे पास जिनसे सलीके का एक कोई वाक्य बुन सकूँ जवाब में ! उन्नीस साल पहले का वो युद्ध याद आता है | एक मिशन...जिस पर जाने से पहले बटालियन के कमान्डिंग ऑफिसर ने मिशन पर जाने वाली टीम के हम समस्त सदस्यों से एक-एक छोटा सा ख़त लिखवा कर रख लिया था अपने-अपने घरवालों के नाम कि अगर वापस सही-सलामत नहीं आयें तो... ! ये और बात है कि वो ख़त कभी प्रेषित नहीं हुये...पूरी टीम ही आधे रास्ते से वापस बुला ली गई थी कि युद्ध समाप्ति का ऐलान हो गया |

     लेकिन ऐसे अनगिनत ख़त मुल्क के जाने कितने घरों में पहुँचे भी...रोते-बिलखते परिवार के लोगों के पास | इनमें से कई ख़त तो शहीद सैनिक के पार्थिव शरीर के साथ-साथ ही पहुँचे घर | दरअसल युद्ध के दौरान किसी भी ख़तरनाक मिशन पर जाने से पहले, सैनिकों से उनके परिजनों के नाम की चिट्ठी लिखवा कर रख लिए जाने की एक पुरानी परिपाटी रही है |

     ...तो कैसा लगता है एक तयशुदा मृत्यु की तरफ़ बढ़ते हुये ?

     आओ डियर डायरी, आज तुम्हें एक बहादुर सैनिक का आख़िरी ख़त सुनाता हूँ इस सवाल के जवाब में | उन्नीस साल पहले अगर वो युद्ध नहीं हुआ होता कारगिल की उन बर्फ़ीली चोटियों पर तो उस उन्नीस साल पहले वाले जुलाई को निम्बु साब पचीस के होते | निम्बु साब....राजपूताना राइफल्स के कैप्टेन निकेजकौउ कैंगेरो, जिन्हें बाद में मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया...दुश्मनों के कब्ज़े से अपनी चोटी को छुड़ाने के लिए रॉकेट-लॉंचर लेकर बिना जूते के सोलह हज़ार फुट की ऊँचाई पर चढ़ जाने वाले निम्बु साब अपनी नियत मृत्यु से अच्छी तरह वाकिफ़ थे | उस आख़िरी मिशन पर जाने से पहले निम्बु साब का लिखा ख़त, जिसका निकटतम हिन्दी अनुवाद नीचे है, शुष्क से शुष्कतर संवेदनाओं को नम कर देने की क़ाबिलियत रखता है...

“मेरे प्यारे मम्मी-पापा,                   20 जून 1999 

कभी सोचा भी नहीं था कि मुझे ऐसी कोई चिट्ठी लिखने की आवश्यकता पड़ेगी | लेकिन आज यह ज़रूरी लग रहा है कि अपना आख़िरी संदेश आपलोगों के साथ साझा करूँ |

पाकिस्तानियों ने घुसपैठ करके हमारे कुछ इलाक़े पर कब्ज़ा कर लिया था, इसलिए हमें इधर कश्मीर के द्रास और बटालिक सेक्टर में आना पड़ा है | मुझे पता है कि ईश्वर मेरे साथ है और वो मेरी रक्षा करेगा...लेकिन यदि ईश्वर की यही इच्छा है कि मैं अपने जीवन की क़ुरबानी दूँ, तो फिर मुझे दुबारा मौक़ा नहीं मिलेगा आपलोगों से मुख़ातिब होने का

मन बहुत उदास है | मैं आपलोगों को अब कभी नहीं देख पाऊँगा, सोचकर ही बहुत दुखता है | लेकिन ईश्वर की इच्छा यही है तो मैं शिकायत भी कैसे कर सकता हूँ |

अगर मैं वापस नहीं आया तो मैं चाहता हूँ कि आपलोग मेरे कुछ शब्द याद रखें | मेरे प्यारे मम्मी-पापा, मैं आपलोगों से बहुत प्यार करता हूँ | आपलोगों का ख़्याल रखने के लिए मैंने हमेशा अपना सब कुछ देने की कोशिश की है और हमेशा यही चाहा है कि आपलोग ख़ुश रहें | लेकिन शायद मैं अपने इस छोटे से जीवन काल में सफल नहीं हो पाया ऐसा करने में |

 मैं जानता हूँ कि मैंने कई बार आपलोगों को शर्मिंदा किया है और बहुत परेशान किया है | कृपया मुझे मेरी ग़लतियों के लिए माफ़ कर दीजिएगा | आपदोनों ने मुझे इतना प्यार दिया है और इतना कुछ सिखाया है कि मैं जीवन के आखिर क्षणों तक एक अच्छा लीडर बना रहा हूँ | मैं कृतज्ञ हूँ | बहुत-बहुत शुक्रिया आपदोनों का |

मेरे प्यारे पापा, अभी रोना आ रहा है छोटे भाई और बहनों के बारे में सोचकर | आप उनको अच्छे से गाइड करना बेहतर मनुष्य बनने के लिए | उनसे कहिएगा कि मैं उनसे बहुत प्यार करता था | दादा जी और दादी माँ से भी कहिएगा कि मैं उन्हें प्यार करता था | सारे रिश्तेदारों और दोस्तों को मेरा प्रणाम कहिएगा और कहिएगा कि मुझे माफ़ कर दें जो कभी मैंने उनका दिल दुखाया हो |

मैं अगर ये बोलूँ भी कि जब मैं नहीं रहूँ तो आप मत रोना, लेकिन आप इतना प्यार करते हैं मुझसे कि मैं जानता हूँ आप रोएँगे | लेकिन ख़ुश रहिएगा यह सोच कर कि मैं आपसब की स्मृतियों में तो रहूँगा | मेरे सारे दोस्तों को लिख दीजिएगा ख़त, जिनके पते मेरे डायरी में हैं

पापा-मम्मी, आपदोनों से एक बहुत ही व्यक्तिगत बात बतानी थी | मेरी एक गर्लफ्रेंड है...उसका नाम कैर्मीला है | आप जानते भी हैं उसको | आपदोनों शायद उसको पसंद ना करें | लेकिन मैं उससे प्यार करता हूँ और वो भी मुझसे बहुत प्यार करती है | इस बार जब मैं छुट्टियों में आया था मई महीने में, मैंने उसका हाथ मांगा था और वो तैयार थी मुझसे शादी करने के लिए | अगर मैं वापस ना आऊँ तो कृपया उसका भी ख़्याल रखिएगा | वो एक सच्ची दोस्त है मेरी | हमदोनों एक-दूसरे से अपनी सारी समस्याएँ साझा करते थे | मैं जानता हूँ, वो मुझसे सच्चा प्यार करती है | मैं यदि वापस नहीं आ पाता हूँ तो उसके लिए कुछ कीजिएगा | यह मेरा आप दोनों से विनम्र निवेदन है |

आपदोनों पर ईश्वर का आशीर्वाद हमेशा बना रहे और आपदोनों के अच्छे स्वास्थ्य और शांति की कामना करता हूँ |

आपका प्यारा बेटा 
नीबू ”

     ...तो कैसा लगता है तयशुदा मौत की तरफ़ बढ़ते हुये ? नहीं, कोई जवाब नहीं है मेरे पास | डर...विछोह...अपने प्रियजनों को दुबारा ना देख पाने का नतमस्तक भय...और इन सबके बीच कहीं दबा-सा, छुपा-सा एक गिल्ट भी कि जैसे पर्याप्त नहीं कर पाये ज़िंदगी के लिए...अपनों के लिए ! कैसा लगता है...कि जैसे सब कुछ छूटा जा रहा ! नील कमल की एक कविता का अंश याद आता है...
“भय को देखना हो
नतमस्तक, करबद्ध
तो देखो उस आदमी की आँखों में
जिसे मालूम है
ज़िन्दगी की उलटी गिनती”



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