23 April 2017

अधूरे सच का बरगद

(कथादेश के मार्च 2017 अंक में प्रकाशित फ़ौजी की डायरी का पहला पन्ना) 

देर रात गए दूर कहीं पटाखों के फूटने की आवाज़ें आती हैं और किसी अनिष्ट की आशंका से नींद खुलती है चौंक कर | हड़बड़ायी-सी नींद को बड़ा समय लगता है फिर आश्वस्त करने में कि ये कश्मीर नहीं है...गाँव है अपना, तू छुट्टी पे है, ड्यूटी पर नहीं...यहाँ  तू बेफ़िक्र हो सुकून के आगोश में ख़्वाबों से गुफ़्तगू करती रह सकती है | उचटी हुई नींद का अफ़साना, लेकिन, जाने किस धुन पे बजता रहता है रात भर | सुकून का आगोश फिर कहाँ कर पाता है ख़्वाबों से गुफ़्तगू | किसी असहनीय निष्क्रियता का अहसास जैसे उस आगोश में काँटे पिरो जाता हो...उफ़्फ़ ! अधकहे से मिसरे...अधबुने से जुमले रतजगों की तासीर लिखते रहते हैं करवटों के मुख्तलिफ़ रंग से बिस्तर की सिलवटों पर | गाँव में की इन बेफ़िक्र रातों के रतजगे कितने अलग से हैं ना कश्मीर घाटी की उन आशंकित रातों से ! लेकिन क्या सचमुच ? कहाँ सहज हो पाती हैं रातें यहाँ छुट्टी में आकर भी ! रसोई में बर्तन गिरने की झंकार तक पर हृदय की धड़कनें उसी कदर कुलांचें भरने लगती हैं, जैसे वहाँ सरहद पर उन बंकरों में जब-तब भरा करती हैं |  छत पर उत्पात मचाती बंदरों की टोली हर बार, बार-बार उसी तरह से सशंकित कर जाती हैं जैसे उधर कश्मीर में छोटे-से-छोटा शोर कर जाया करती है |

     यहाँ भी तो सारे के सारे ख़्वाब रात की सतहों पर जैसे डूबने लगते हैं | उथली रातों में डूबते-उतराते ख़्वाबों को कोई तिनका तक नहीं मिलता शब्दों का, पार लगने के लिए | मर्मांतक-सी पीड़ा कोई ! चीख़ने का सऊर आया कहाँ है अभी तक इन ख़्वाबों को ? ...और आ भी जाये तो सुनेगा कौन इन ख़्वाबों की चीख़ ? छटपटाने की नियति ओढ़े हुये ये ख़्वाब, सारे ख़्वाब...कभी देवदारों की ऊँची फुनगियों पर चुकमुक बैठ बर्फ़ की उजली चादर पर खिंची सरहद वाली लकीर को देखना चाहते हैं किसी उदास शायर की आँखों से...तो कभी झेलम की नीरवता में छिपी आहों को यमुना तक पहुँचाना चाहते हैं...और कभी सदियों से ठिठके उन बूढ़े पहाड़ों को डल झील की तलहट्टियों में धकेल कर नहलाना  चाहते हैं | कितनी अटपटी-सी ख़्वाहिशें इन डूबते-उतराते ख़्वाबों की...!!!
    
उथली रातों के छिछले किनारों पर अटपटी-सी ख़्वाहिशों की एक लंबी फ़ेहरिश्त जाने कब से धँसी पड़ी है इन ख़्वाबों के रेत में | कश्यप था ना कोई ऋषि वो...हाँ, कश्यप ही तो था | सुनते हैं, देवताओं के संग आया था उड़नखटोले पर और सोने की
बड़ी मूठ वाली एक जादुई छड़ी घूमा कर जल-मग्न धरती के इस हिस्से को किया था तब्दील पृथ्वी के स्वर्ग में और नाम दिया था कश्मीर...”गर फ़िरदौस बर रूए ज़मीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त | अटपटी ख़्वाहिशों की ये फ़ेहरिश्त तभी से बननी शुरू हुई थी शायद | लेकिन ये बात शायद इन डूबते-उतराते ख़्वाबों को नहीं मालूम | उथली रातों ने वैसे तो कई बार बताना चाहा...लेकिन पार लगने की उत्कंठा या डूब जाने की आशंका इन ख़्वाबों को बस अपनी ख़्वाहिशों की फ़ेहरिश्त बनाने में मशगूल रखती है | हार कर ये उथली रातें बिनने लगती हैं इन ख़्वाबों की अटपटी ख़्वाहिशों को | ख़्वाहिशें...पहाड़ी नालों में बेतरतीब तैरती बत्तखों की टोली में शामिल होकर उन्हें तरतीब देने की ख़्वाहिश | ख़्वाहिशें...चिनारों के पत्तों को सर्दी के मौसम में टहनियों पर वापस चिपका देने की ख़्वाहिश | ख़्वाहिशें...सिकुड़ते हुये वूलर झील को खींच कर विस्तार देने की ख़्वाहिश | ख़्वाहिशें...इस पार उस पार में बाँटती सरफ़िरी सरहदी लकीर को अनदेखा करने की ख़्वाहिश | ख़्वाहिशें...सारे ‘हनुमंथप्पाओं’ को फिर से हँसते-गुनगुनाते देखने की ख़्वाहिश...

...वो एक कोई हनुमंथप्पा ही तो था जो अठारह साल पहले कश्मीर की पहली पोस्टिंग पर हौले से फुसफुसा गया था कानों में “जस्ट बिवेयर सर ! कश्मीर ग्रोज इन टू योअर नर्वस !!” लेकिन बिवेयर होने का मौका देती कहाँ है कश्मीर घाटी ? हाँ...छ दिन तक उस बर्फ़ीले कब्र में दबे रह कर भी हनुमंथप्पा वापस तो आ जाते हैं, लेकिन डॉक्टर बचा कहाँ पाते उसे ! वो जगह, जहाँ ये सब के सब ‘हनुंन्थप्पा’ मुस्तैद रहते हैं, वहाँ नब्ज़ दूनी रफ्तार से दौड़ती है...डर से कि गति धीमी हुई तो जम ही न जाय | वहाँ हृदय की धड़कनें धक-धक कर चलती नहीं, बाकायदा कार्ट-व्हील और समर-साल्ट करती हैं...खौफ़ से कि आहिस्ता हुई तो थम ही जायेंगी | वहाँ...हाँ, वहीं पर हनुमंथप्पाओंको फ्री राशन और फ्री एक्सट्रीम विंटर क्लोदिंग के साथ और भी ढ़ेर सारी चीजें फ्री में उपलब्ध हैं...अंतहीन गहराइयों वाले क्रिवास, हर पल निगलने को आतुर एवलांच, तयशुदा टेन्योर के बाद पके हुये बाल, कम होती श्रवण शक्ति, पस्त पाचन-तंत्र, हड्डी के जोड़ों में आकर बस जाने वाली जीवनपर्यंत टीस... | उस बादलों से भी ऊपर वाली बर्फ़ीली चोटी पर ड्यूटी देने जाने से पहले, तीन स्टेज वाला एक्लेम्टाइजेशन करते वक़्त इन हनुमंथप्पाओंको वहाँ जाने पर फ्री में हासिल होने वाली इन तमाम सुविधाओं की विस्तृत जानकारी दी जाती है | वे फिर भी जाते हैं और अपनी ड्यूटी अपनी क्षमता के आख़िरी औंस तक निभाते हैं...न ! न !! किसी देश, मुल्क, राष्ट्र के नाम पर नहीं...बल्कि अपने सेक्शन, अपनी प्लाटून, अपनी कंपनी और अपने रेजीमेंट के उस बैज के लिए जो उनकी टोपियों और उनके काँधों पर जगमगाता है |

एक्लेम्टाइजेशन के तीसरे स्टेज में इन हनुमंथप्पाओंको सिखाया जाता है कि एवलांच आने पर किस तरह उन्हें अपनी आँखें, नाकों और मुख को दोनों हाथों और घुटने के बीच छुपा कर बर्फ़ के सैलाब में दबे रहना है...और भरोसा रखना है कि उनके अन्य साथी आयेंगे उन्हें बचाने के लिए | बड़ी पतली सी डोर होती है उस भरोसे को और इच्छा-शक्ति को टूटने से बचाने वाली...और हनुमंथप्पानिकल आते हैं तीस फुट बर्फ़ के नीचे छ दिन तक दबे होकर भी | नहीं, ये चमत्कार नहीं | ये बस वो भरोसा है अपने रेजीमेंट के नाम-नमक-निशान पर...अपने साथियों पर...अपने कमान्डिंग ऑफिसर पर, वो कमान्डिंग ऑफिसर जो पूरी पलटन द्वारा नौ साथियों की मौत को स्वीकार कर लेने के बावजूद एवलांच वाली जगह पर ख़ुद जाकर बैठ जाता है छोटे से तम्बू में...कि उसे तीस फुट नीचे से भी इन हनुमंथप्पाओंकी कार्ट-व्हील करती धड़कनों की थपक सुनाई देती है उसे |

इन हनुमंथप्पाओंका वहाँ होना शौर्य और वीरता और जिजीविषा को अक्षरश: उच्चरित करना है...और इनकी कुर्बानियाँ बस एक विनम्र सा गुहार हैं कि हम सब इस मुल्क को एक मजबूत मुल्क बनाए रखने के लिए अपनी-अपनी काबिलियत के हिसाब से एक जिम्मेदार नागरिक बनें |

इधर माँ है कि गाँव में कहती रहती है सबसे अक्सर...गोली खाकर भी सही-सलामत आ गया बेटा कश्मीर से...दूसरा जनम हुआ है | सत्यनारायण का पाठ करवाती है, बगैर जाने-समझे कि पाठ में बैठा हुआ बेटा तो भगवान जी को कोस रहा है, ताने दे रहा कि इतने बड़े बचाने वाले हो तो क्यों नहीं बचाते उन सारे हनुमंथप्पाओंको | माँ पंडित जी से फुसफुसा कर कहती है...”दूसरा जनम हुआ है इसका...अबके नहीं जाने दूंगी इसको वापस कश्मीर” | मेरे कानों तक पहुँचती ये फुसफुसाहट गोली के उस ज़ख्म में जाने कैसी तो सिहरन पैदा कर देती है | कौन था वो शायर जो कह गया :-

“अधूरे सच का बरगद हूँ, किसी को ज्ञान क्या दूँगा
मगर मुद्दत से इक गौतम मेरे साये में बैठा है”


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04 November 2016

कविता की कॉन्सपिरेसी थ्योरी

अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे
उठाने ही होंगे
तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब...

मुक्तिबोध की लिखी ये पंक्तियाँ, जो उनकी ख्यात कविता “अँधेरे में” का हिस्सा हैं,शायद सबसे ज़्यादा उद्धृत की जाने वाले काव्य-पंक्तियों में शुमार किए जाने का रौब गाँठती हैं अपने दुरूह शिल्प और अबूझ बिम्बों का ताना-बाना लिए लगभग चालीस पृष्ठों में फैली (या सिमटी) हुई ये कविता आख़िर किस वज़्ह से नई कविता के सिरमौर का रुतबा अख़्तियार कर लेती है, समझने के लिए मेरे अंदर का निरीह सा पाठक इसे पढ़ता है...बार-बार पढ़ता है, सैकड़ों बार पढ़ता है। सस्वर पढ़ने की कोशिश करता है, बुरी तरह से पराजित होता है। थम-थम कर ठहर-ठहर कर पढ़ता है, एकदम पस्त निढ़ाल हो जाता है। और फिर कविता में यत्र-तत्र बिखरे कुछ अद्भुत जुमलों को उठाता है,अपनी डायरी में नोट कर इसे अपनी पाठकीय सफलता मान लेता है और देर तक इतराता है।
  

असंख्य अनगिन विमर्शों के इस हाहाकारी दौर में हिन्दी-साहित्य के हम जैसे कितने ही समर्पित पाठक तनिक कनफ्यूज़ से बैठे हैं। प्रगतिशीलता के नाम पर महज़ चंद कथित रूप से स्थापित नाम एक किसी रचना-विशेष को आख़िर किस पैमाने पर तौलते हैं और उसे भारी-भरकम विशेषणों, यथा “उत्तर-आधुनिक काल का प्रस्थान बिन्दु” या फिर “भूमंडलीकरण के ख़तरे के विरुद्ध शंख-नाद”, से सुशोभित कर हमारी तरफ उछाल देते हैं कि लो पढ़ो! नहीं समझ में आने का ऐलान आपको मूर्खों, जाहिलों की पंगत में बिठा देता है और “अहा, क्या कविता है” जैसे कुछ उद्गार आपको अपने पाठक-मन के प्रति बेईमान बनाता है। कई सारे सवाल उमड़-घुमड़ कर बरसते हैं लगातार। क्या कारण है कि ठीक उसी समय की मणींद्र नारायण चौधरी उर्फ़ राजकमल द्वारा लिखी हुई कविता “मुक्तिप्रसंग” अपने शिल्प, अपनी वेदना, अपनी कसावट में मुक्तिबोध की “अँधेरे में” के बनिस्बत कई गुणा बेहतर होते हुए भी एकदम से नकार दी जाती है? या फिर ख़ुद मुक्तिबोध की ही दूसरी कविता “ब्रह्मराक्षस”, जो हिन्दी-साहित्य की समस्त लंबी कविताओं में अपनी इमेजरी और खूबसूरत छंद (गीतिका/मरुकनिका या उर्दू का बहरे-रमल) की एक मिसाल है, को ही क्यों नहीं “अँधेरे में” के जैसा रुतबा दिया जाता है?

मेरे अंदर के सजग पाठक को यह सब कुछ एक बड़ी...बहुत बड़ी कॉन्सपिरेसी का शातिर हिस्सा लगता है। जानता हूँ, इस अदने से पाठक के इस उद्गार पर कई भृकुटियाँ उठ खड़ी होंगी... लेकिन प्रत्युतर में मैं ख़ुद अपने प्रिय कवि की ओट में जा खड़ा होता हूँ कि “अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे”। एक बड़ी साजिश के तहत चतुराई से पॉलिटीकली करेक्ट रहने की कुशलता आधुनिक कविता में अवसाद को स्थायित्व और कविताई को गुमशुदगी प्रदान करती जा रही है। कमाल की बात ये है कि जो कविता सारे मठ और गढ़ को तोड़ने का डंके की चोट पर ऐलान करती है, उसी कविता को वापस अघोषित किन्तु स्पष्ट रूप से दुष्टिगोचर मठ/गढ़ के निर्माण की नींव के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। साठोतरी कवियों और आलोचकों की एक पूरी पीढ़ी जिस तरह से कलावादी और प्रतिक्रियावादी कविताओं के ज़िक्र पर नाक-भौं सिकोड़ती दिखती है, उसी पीढ़ी को “अँधेरे में” का प्रतिक्रियावाद नज़र नहीं आता। जैसा कि “चाँद का मुँह टेढ़ा है”, जिसमें यह कविता पहली बार संकलित हो कर सामने आई, के प्रथम संस्करण की भूमिका में ख़ुद शमशेर जैसे हिन्दी कविता के महारथी लिखते हैं कि नागपुर में अपने प्रवास के दौरान एम्प्रेस मिल के मज़दूरों पर जब गोली चली तो मुक्तिबोध रिपोर्टर की हैसियत से घटनास्थल पर मौजूद थे। “अँधेरे में” शीर्षक कविता उनके नागपुर जीवन के बहुत सारे संदर्भ समेटे हुए है। क्या अधिकांश कविताएँ किसी न किसी घटना-विशेष, स्थान-विशेष, सत्ता या साम्राज्य विशेष की प्रतिक्रिया में ही नहीं लिखी जाती? फिर कैसे कोई कविता प्रतिक्रियावादी का ठप्पा लगा कर ख़ारिज कर दी जाती है, और कोई कविता तमाम तरह के गहनों से लाद दी जाती है? जिस कविता को राजेश जोशी “एक विराट स्वप्न फैंटेसी” और मंगलेश डबराल “हमारे समय का इकलौता महाकाव्य” का मैडल देते हैं, क्या कारण है कि हिन्दी-साहित्य के गिन के तीन सौ पाठक भी नहीं मिलते, जिन्होंने इस कविता को पढ़ा तक हो?


ये प्रश्न विचलित करते हैं मुझ जैसे कविताशिक़ों को। लेकिन कविता के पाठकों का कविता से विचलित होना भी कोई मुद्दा है भला? जन की कविता जन का विषय उठाती है बस, लिखी तो प्रबुद्धों के लिए जाती है बस। एक बेहतरीन समकालीन कवि (जो की दोस्त भी है) ठसक के साथ ऐलान करता है कि वो क्लास के लिए लिखता है मास के लिए नहीं। लेकिन उसकी साफ़गोई एक कवि की ईमानदारी है और उस ईमानदारी का एक पाठक के रूप में सम्मान करता हूँ। इतनी ही साफ़गोई की अपेक्षा तमाम कवियों से करता हूँ। “अँधेरे में” की कविताई में क्रिएट किया हुआ विस्तृत लैंड-स्केप, दरअसल मुक्तिबोध के कवि की पनाहस्थली है, जहाँ वो छुप कर बैठ जाता है। उस पनाहस्थली में कवि एक नायक का निर्माण करता है...नायक जो इस्केपिस्ट है। पता नहीं क्यों लगता है कि मुक्तिबोध ज़िंदा होते तो निश्चित रूप से खीजते, क्योंकि अपने दोस्त-कवि वाली ईमानदारी मुक्तिबोध में दिखती (मुक्तिबोध की तरह ही लिखूँ तो दीखती) है मुझे...इतनी कल्पना तो कर ही सकता हूँ उनका एक घनघोर पाठक होने के नाते। कम-से-कम इस एक कविता को इतनी बुलंदी प्रदान किए जाने के तिरकम पर तो निश्चित रूप से झुँझलाते वो। वही प्रगतिशील मोर्चा जो तुक (rhyme) को एक सिरे से नकारता है, उसी मोर्चे को “अँधेरे में” के हास्यास्पद की हद तक बन आए तुकों से कोई परेशानी नहीं। हनु के साथ मनु, अकेले के साथ दुकेले, हायहाय-नुमा के साथ टॉलस्ताय-नुमा...लम्बी फ़ेहरिश्त बन जाएगी। मुक्तिबोध की ही पंक्तियों का फिर से सहारा ले कर कहना चाहूँगा इन समस्त दुदुंभी बजाते मोर्चों से-

“स्क्रीनिंग करो मिस्टर गुप्ता, क्रॉस एक्ज़ामिन हिम थोरोली !”


जितना सोचता हूँ, यह सारा कुछ उतना ही एक बड़ी कॉन्सपिरेसी का हिस्सा लगता है यूँ इस ताह एक किसी कविता को सिरमौर घोषित कर देना। कविता पर चल रही, उठ रही तमाम बहसों की धमा-चौकड़ी में हम कविताशिक़ों को ये हिन्दी कविता का एक भीषण “लीन-पैच” वाला दौर नज़र आता है। लीन-पैच दरअसल क्रिकेट से जुड़ा शब्द है और उस बल्लेबाज के लिए इस्तेमाल होता है जो लगातार मैच दर मैच विफल हो रहा हो, रन ना बटोर पा रहा हो। एक तरह का मोह है ये लीन-पैच अपनी ही लिखी कविताओं के लिए अधिकांश कवियों का। दूर होते पाठकों को मृग-मरीचिका मान कर तमाम तरह की बहसें। अभी दो साल पहले एक स्थापित पत्रिका (वागर्थ) ने एक पीढ़ी-विशेष के कवियों की खेमेबाजी कर शेष सब कवियों को ख़ारिज करने की कॉन्सपिरेसी रची थी... “लॉन्ग नाईन्टीज” का ठप्पा लगा कर। हम सब पढ़ने वालों को दरअसल वो “नर्वस नाईन्टीज” की थरथराहट नज़र आई उसमें। ...कि तब जब कविता हर सफ़ेहर वरक़ पर असहाय कराहती नज़र आ रही थीआत्म-मुग्ध कवियों की एक टीम बाकायदा बैंड-बाजे के साथ सामने आती है और एक दशक-विशेष पर चर्चा के बहाने अपने नामों और अपनी ही कविताओं का फिर-फिर से ढ़ोल बजाती है। बड़े सलीके से एक प्रश्नावली बुनी जाती है और फिर उतने ही सलीके से चयनीत नामों की एक फ़ेहरिश्त को वो प्रश्नावली भेजी जाती है... कभी सुना था कि नई-कहानी नामक तथा-कथित आंदोलन के पार्श्व में कहानिकारों की एक तिकड़ी ने सुनियोजित साजिश रच कर एक सिरे से हिन्दी-कहानी के तमाम शेषों-अशेषों-विशेषों को नकारने की ख़तरनाक सुपाड़ी उठाई थी। कुछ वैसा ही प्रयास हुआ इस “लॉन्ग नाईन्टीज” विमर्श के बजरीये। सलीके की बुनावट इस कदर कि कोई नाराज़ भी न होकोई विवाद भी ना उठे...लेकिन पाठकों द्वारा नकारी हुई अपनी कविताओं पर चर्चा भी हो जाये। काश कि इतना ही सलीका इन महाकवियों ने अपने शिल्प और कविता की कविताई पर भी दिखाया होता...!!! हम पाठकों के ठहाके तो तब और ज़ोर-ज़ोर से छूटने लगते हैं, जब टीम-चयन के दौरान पहले तो एक कवि-विशेष (स्वप्निल श्रीवास्तव) को पूर्व-पीढ़ी का अंतिम कवि कहते हुये खारिज कर दिया जाता है और फिर तुरत ही उस कवि-विशेष द्वारा एतराज जताने पर पत्रिका के अगले अंक में उन्हें अपनी पीढ़ी का प्रथम कवि मान लिया जाता है... हाय रेsss , इतनी उलझन तो भारतीय क्रिकेट-टीम के चयनकर्ताओं के दरम्यान भी नहीं हुई होगी टीम चुनते समय।


इस पूरे “लॉन्ग नाईन्टीज” विमर्श में कॉन्स्पिरेसी की तमाम कलई तब बिखरती नज़र आती है, जब पहले तो ये सफाई दी जाती है कि कविता या साहित्य में दशकवाद घातक है... किसी दौर की रचना पर दशक के अनुसार विमर्श उचित नहीं और फिर तुरत ही अपनी दुदुंभी बजाने की उत्कंठा में ऐलान किया जाता है कि किन्तु लॉन्ग नाईन्टीज समय का प्रस्थान बिन्दु है... और जिसे पढ़ कर कविताई-आतंक से खौफ़ खाये हम पाठक मुस्कुराने लगते हैं इस शातिरपने पर। कैसी कविताकहाँ की कविता कि जिसके सत्यापन के लिए एक पत्रिका के तीन से चार अंकों में जाने कितने पन्ने काले कर दिये गये। हम कविताशिक़ पाठक जो अधिकांशतया गद्य के अनुच्छेदों की ऊपर-नीचे कर दी गई पंक्तियों को इन महाकवियों द्वारा कविता कह दिये जाने पर आँख मूँद भरोसा कर लेते हैं और पढ़ते जाते हैं कि एक जुमले में ही सहीकहीं तो कविता का कवितापन दिख जाये...मगर हाय रे हतभाग! महाप्राण निराला के मुक्त-छंद” के आह्वान को कब चुपके-चुपके छंद-मुक्त” बना दिया गया और होने लगे तमाम तरह के विमर्श भी उस पर... कविता की कॉन्सपिरेसी थ्योरी में ये सबसे अव्वल नंबर पर आती है। उधर पश्चिम में, पोएट्री फ्री-वर्स” ही है अब तलक...उस जानिब किसी ने वर्स-फ्री” बनाने की हिमाकत नहीं की है। क्योंकि उस जानिब अभी भी कविता को कविता बनाए रखना ही सबसे बड़ा विमर्श है ना कि कथित आलोचकों का मुंह जोहना। लेकिन इस मुद्दे पर तो अब कुछ भी बोलना हाथी-चले-बाज़ार-कुत्ता-भूँके-हजार की तर्ज़ पर ही होता है अक्सर, जहाँ हाथी बिला शक वर्तमान कवियों की पूरी टोली के लिए आया है जो मदमस्त हो रौंदे चले जा रहे हैं अपने मासूम पाठकों को।


आइये, एक और थ्योरी का अवलोकन करते हैं आख़िर में। उदय प्रकाश इस दौर के महानतम कथाकार हैं और जिस पर शायद ही किसी को संदेह हो, जिनकी कहानियों का तिलिस्म हम सब पर सम्मोहन की तरह छाया हुआ है और हमारी पूरी पीढ़ी ख़ुद को ख़ुशक़िस्मत मानती है कि हमने उस दौर में जन्म लिया जिसमें उदय प्रकाश ने कहानियाँ लिखीं। वही उदय प्रकाश अक्सर ही अपने वक्तव्यों में, विभिन्न साक्षात्कारों में ख़ुद को कहानीकार मानने से इंकार करते हैं और ख़ुद को एक कवि मनवाने में ही व्यस्त रहते हैं। हम जैसे उनकी मुहब्बत में डूबे उनके भक्तों को ये उनकी विनम्रता लगती है... लेकिन अतिशय विनम्रता भी कई बार संदेह की जननी होती है। ऐसा कह कर या ऐसा घोषित कर के शायद वो कविता के उस सिंहासन पर स्वयमेव जा बैठे हैं,जहाँ से वो जिसे चाहे महान कवि होने का कवच-कुंडल प्रदान कर सकते हैं। अभी हाल का ही भारत भूषण अग्रवाल सम्मान का विवाद इसी ओर इशारा नहीं करता? उस सिंहासन से जारी हुआ फ़रमान जहाँ एक स्थापित विलक्षण कवियत्री, जिससे हम पाठक हिन्दी-कविता के लिए ढेर सारी उम्मीदें बाँधे हुए थे, की अति-साधारण सी(अमूमन हर पाठकों के लिए) कविता को एकदम से साल की श्रेष्ठ कविता बना देता है, वहीं पैरोडी नामक एक चीप-सी विधा को कविता के प्रांगण में दाख़िला करवा देता है। निकट ही इसी कॉन्सपिरेसी का साइड-इफेक्ट यूँ होता है कि दो-तीन प्रतिभाशाली युवा कवियों की टोली छ्दम स्त्री नाम से फेसबुक पर कविता का हाहाकार मचा देती है। सोशल मीडिया पर उठे तूफ़ान के पीछे ज़रा सा हम झाँक कर देखें तो यह छद्म कविताई हाहाकार एक तरह से विरोध है इन युवा-कवियों का जो सवाल उठाता है कि यदि पोएटरी मैनेजमेंट उनमें से किसी ने लिखा होता तो शायद किसी का ध्यान तक नहीं जाता इस कविता पर।  


सच कहूँ, तो यह सब सोच कर एक सिहरन सी होने लगती एकदम से...कुछ कुछ वैसी ही सिहरन जो गुमनामी बाबा के सुभाष चंद्र बोस होने और उनके उस हवाई दुर्घटना में ज़िंदा बच जाने की बातों को सुन कर उत्पन्न होती है या फिर चाँद पर नील आर्मस्ट्रोंग के न उतरे होने की बाबत सुन कर कि वीडियो में तो आर्मस्ट्रोंग के पीछे का अमेरिकन फ्लैग लहराता दिखता है जबकि चाँद पर तो हवा होती ही नहीं...


और कविता की इन तमाम कॉन्सपिरेसी थ्योरी से बौखलाया हुआ ये कविताशिक़,प्रार्थना करता हुआ कि ये सब सिर्फ और सिर्फ एक थ्योरी ही हो और कविता इनसे परे,इन सबसे हट कर अभी भी शायद पवित्र बची हुई हो, लौटता है मुक्तिबोध की ओर आश्रय के लिए पुन:  

उन्हीं के शब्दों में –

खोजता हूँ पठार...पहाड़...समुन्दर
जहाँ मिल सके मुझे
मेरी वह खोयी हुई
परम अभिव्यक्ति अनिवार
आत्म-संभवा !

08 September 2016

दर्दपुरा

(दैनिक जनसत्ता 04 सितम्बर 2016 में आई मेरी एक कहानी)    

 “क्या बतायें हम डॉक्टर साब, उसे एके-47 से इश्क़ हो गया और छोड़ कर चली गई हमको”, कहते-कहते माजीद की आँखें भर आई थीं | माजीद...माजीद अहमद वानी...उम्र करीब सैंतीस-अड़तीस के आस-पास, मुझसे बस कुछेक साल बड़ा...मेहदी से रंगी हुई सफ़ेद दाढ़ी पर चढ़े हल्के भूरे रंग की परत उसकी आँखों के  कत्थईपन को जैसे सार्थक करती है |  तक़रीबन छह महीने पहले जब क्लीनिक खोली मैंने अपनी, कुपवाड़ा के मेन मार्केट से ज़्यादा नहीं बस थोड़ा ही आगे, माजीद का फार्मेसी में डिप्लोमाधारी होना मेरे लिए इस दूर-दराज़ इलाक़े में एकदम से सुकून की साँस लेकर आया था |  परिचय यहीं के एडिशनल एसपी ने करवाया था यह कहते हुये कि अच्छा नौजवान है...आसपास के औसत युवाओं से एकदम अलग सोच वाला और सुलझा हुआ |

     एडिशनल एसपी, सुरेश रैना, ख़ुद ही बड़े ही मिलनसार और सुलझे हुये निकले...अपने कथित पुलिसिया रौब से परे, बहुत ही सहज और सरल | जम्मू से घर छोड़ते समय, जब पापा और माँ के लाख समझाने पर भी मैं राज़ी नहीं हुआ था अपनी प्रैक्टिस वहीं घर के आस-पास जमाने के लिए, तो पापा ने अपने बचपन के मित्र का हवाला दिया था | एडिशनल एसपी साब पापा के उसी मित्र के इकलौते पुत्र थे | कश्मीर आकर इस सुदूर कुपवाड़ा में क्लीनिक खोलने की मेरी ज़िद के पीछे जहाँ मेडिसीन के ख़ुदा, हिप्पोक्रेट्स की फिलॉसोफी को अंगीभूत करने का एक तरह का लाल-गुलाबी-नीला-नीला सा रोमांटिसिज़्म था, वहीं दूसरी ओर बत्तीस-तैंतीस वर्ष पहले अपने पूर्वजों की ज़मीन से ज़बरन बेदख़ल कर दिये जाने के हरे-हरे  से और काले से प्रतिरोध को आत्म-सात करना भी था |

     नब्बे के दशक के उन शुरुआती वर्षों के खौफ़ की दास्तान जाने कितनी बार माँ-पापा और दीदी से सुन चुका हूँ और उनकी आँखों में जीवंत होते देख चुका हूँ | जम्मू के शरणार्थी-शिविर में बीता बचपन और फिर पापा की कश्मीर यूनिवर्सिटी से छूट गई प्रोफेसरी का जम्मू के एक कॉलेज में लग जाना और माँ के बुटीक-शॉप का अपना मुक़ाम बनाना, दीदी और मेरी पढ़ाई का खर्चा व ठीक-ठाक मध्यमवर्गीय जीवन निकाल ले गए |  

     जम्मू मेडिकल कॉलेज में मेडिसीन की पढ़ाई के दौरान ही बावरे मन की बावरी बातों में आकर अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस को मैंने कुपवाड़ा जाकर स्थापित करने का निर्णय ले चुका था | दोस्तों ने यूँ तो समझ-समझ-के-समझ-को-समझो की तर्ज़ पर बहुत समझाने की कोशिश की थी कि कहाँ उस मिलिटेन्सी की तपिश में सुलग रहे इलाक़े में जा रहे हो...कश्मीरी पंडितों के लिए अभी भी वो हिस्सा सुरक्षित नहीं है...कश्मीर में ही करना है तो श्रीनगर में बेस बना लो, कुपवाड़ा हॉट है...वगैरह-वगैरह, लेकिन इस जानिब नासमझ सी धुन थी कि बस किसी ज़िद्दी की तरह गले में पैठ गई थी |  फिर काजीगुंड नाम के किसी गाँव में सेबों का पैतृक बगान और लकड़ियों के बने एक घर, जिनकी धुंधली स्मृतियाँ तीन वर्षीय बालमन के चिलमन से अभी भी इतने सालों बाद कई बार एकदम से उभर कर आ जाती हैं, की झलक देखने की इच्छा इस धुन को सप्तम पर लिए जाती थी |

     क्लीनिक स्थापित हुये दूसरा ही तो दिन था और कुपवाड़ा में आए हुये बस एक हफ़्ता ही तो बीता था, जब मार्च की एक ठिठुरती दोपहर को माजीद आया था मिलने मुझसे एडिशनल एसपी साब के हुक्म पर...

     “सलाम वलेकुम, साब ! वो डॉक्टर अशोक भान आप ही हैं ?”, किसी गहरे कुएं से आती हुई एक अजब सी कशिश से भरी आवाज़ वाला माजीद अहमद वानी उस दिन से मेरा लगभग सब कुछ हो चुका था...मेरा कम्पाउंडर, मेरा हमसाया...मेरा फ्रेंड-फिलॉसोफर-गाइड | उसकी आँखों में एक कैसा तो कत्थईपन था जो हर वक़्त मानो पूरी की पूरी झेलम का सैलाब समाये रखता था अपनी रंगत में और हाथ इतने सुघड़ कि क्लीनिक का हर हिस्सा हर घड़ी दमकता रहता था | उन सुघड़ हाथों की बनी रोटियाँ जैसे अपनी पूरी गोलाई में स्वाद का हिज्जे लिखा करती थीं और यही स्वाद जब उसके हाथों से उतर कर करम के साग या फिर मटन के मार्फत जिह्वा की तमाम स्वाद-ग्रंथियों तक पहुँचता तो मेरा उदर अपने फैले जाने की परवाह करना छोड़ देता | अभी उस रात जब उसके हाथों के पकाये वाजवान का लुत्फ़ लेते हुये मैंने कहा कि “माजीद, तेरी बीवी तो जान छिड़कती होगी तुम्हारे हाथों का रिस्ता और गुश्ताबा खा कर” तो एकदम से जैसे कत्थई आँखों में हर वक़्त उमड़ती झेलम अपना पूरा सैलाब लेकर कमरे में ही बहने लगी थी | पहले तो बस पल भर को एक विचित्र सी हँसी हँसा वो...वो हँसी जो उसके पतले होठों से फिसल कर उसकी मेहदी रंगी दाढ़ी में पहले तो देर तक कुलबुलाती रही और फिर धच्च से आकर धँस गई मेरे सीने में कहीं गहरे तक |

     “क्या बतायें हम डॉक्टर साब, उसे एके-47 से इश्क़ हो गया और छोड़ कर चली गई हमको !”, दाढ़ी में कुलबुलाती हँसी के ठीक पीछे-पीछे चंद हिचकियाँ भी आ गई थीं दबे पाँव |
     “क्या मतलब ? क्या कह रहे हो, माजीद ?”, अगला निवाला मेरे मुँह तक जाते-जाते वापस प्लेट में आकर ठिठक गया था |
     “हमारी मुहब्बत, दो धूप-सी खिली-खिली बेटियाँ, भरा-पूरा घर और आपका ये रिस्ता गुश्ताबा वगैरह कुछ भी तो नहीं रोक पाया हमारी कौंगपोश को | इन सब पर एके-47 का करिश्मा और नामुराद जिहाद का जादू ज़ियादा भारी पड़ा, डॉक्टर साब |”
     “कौंगपोश ? तुम्हारी बीवी का नाम है ? बड़ा खूबसूरत नाम है ये तो ! क्या मानी होता है इसका ?”
     “जी साब ! केसर का फूल...उतनी ही ख़ूबसूरत भी थी वो, बिलकुल केसर के फूल की तरह ही !”, हिचकियाँ जिस तरह दबे पाँव आई थीं, उसी तरह विलुप्त भी हो गईं, लेकिन झेलम का सैलाब अब भी उमड़ ही रहा था अपने पूरे उफ़ान पर |
     “हुआ क्या माजीद ? तुम चाहो तो शेयर कर सकते हो मेरे साथ सब बात...अब तो हमदोनों दोस्त हैं ना !”
     “आप बहुत अच्छे हो, डॉक्टर साब ! हुआ कुछ नहीं, बस हमारी क़िस्मत को हमारी मुहब्बत से रश्क होने लगा था और हमारी मुहब्बत ने इस कश्मीर वादी के आवाम की तरह ही एके-47 के आगे अपनी जबीं टेक दी |
     “तुम तो शायरी भी करते हो माजीद !”, उसे छेड़ते हुये मैंने कहा तो झेलम का उमड़ता सैलाब थोड़ा-सा थमक गया जैसे |
     “मुहब्बत ने जितने बड़े शायर नहीं पैदा किए होंगे, बेवफ़ाई ने उससे कहीं ज़ियादा और उससे कहीं बड़े-बड़े शायर दिये हैं इस जहान को | कौंगपोश को शायरी वाले माजीद से ज़ियादा एके-47 वाला उस्मान भाया और वो चली गई एक दिन हमको छोड़ के |”

     सिहरते हुये सितम्बर की जुम्मे वाली ये रात एक नए माजीद से मिलवा रही थी मुझे, जो इन छ महीनों में अब तक छिपा हुआ था मुझसे | खाना ख़त्म करके बर्तन वगैरह धुल जाने के बाद, जब वो गर्म-गर्म कहवा लेकर आया तो उसकी आँखों के कत्थईपन ने अब झेलम के सैलाब को पूरी तरह ढाँप लिया था | कहवे के कप से इलायची और केसर की मिली-जुली ख़ुशबू लेकर उठती हुई भाप, कमरे में एकदम से आन टपकी चुप्पी को एक अपरिभाषित-सा स्टीम-बाथ दे रही थी | फ़र्श पर चुकमुक बैठा अपने दोनों हाथों से कहवे के कप को थामे हुये माजीद बस अपने लौकिक अवतार में ही उपस्थित था मेरे साथ...जाने कहाँ विचरण कह रहा था उसका मन | देर बाद स्वत: ही उसकी आवाज़ ने मुझे कहवे के स्वाद और सुगंध की तिलिस्मी दुनिया से बाहर खींचा | कुआँ जैसे थोड़ा और गहरा हो गया था...

     “उस्मान नाम है उसका, साब ! हमारे ही गाँव दर्दपुरा का है | दस बरस पहले जिहादी हो गया | उस पार गया था ट्रेनिंग लेने | गाँव में आता था फ़ौज से छुप-छुपा कर और कौंगपोश से मिलता था | उसे रुपये-पैसे देता था और उसके लिए खूब सारे तोहफ़े भी लाता था | हमारे दर्दपुरा की लड़कियों पर एक अलग ही रौब रहता है, साब, इन जिहादियों का | तक़रीबन सत्तर घर वाले हमारे गाँव में कोई भी घर ऐसा नहीं है, जिसका लड़का जिहादी ना हो | एक तरह का रस्म है साब, हमारे दर्दपुरा का | मेरे दोनों बड़े भाई भी जिहादी थे...मारे गये फ़ौज के हाथों | मुझपे भी बड़ा ज़ोर था, साब, भाई के मरने के बाद...लेकिन मुझे कभी नहीं भाया ये जिहाद-विहाद |”
     “हासिल तो कुछ होना ही नहीं है इस जिहाद से और इस आज़ादी के नारों से, माजीद ! जिस पाकिस्तान की शह पर ये बंदूक उठाए घूमते हैं, उसी पाकिस्तान से अपना मुल्क तो संभलता नहीं !”, मुझसे रहा नहीं गया तो उबल सा पड़ा था मैं...माँ पापा और दीदी की आँखों में फैला वो खौफ़ का मंज़र एकदम से नाच उठा मेरे सामने |
     “ख़ता हमारे क़ौम की भी नहीं है, साब | शुरुआत में जो हुआ सो हुआ...उसके बाद हमारी पीढ़ी के लिए आज़ादी का नारा उस भूत की तरह हो गया है, जिसके क़िस्से हम बचपन में अपनी नानी-दादी और वालिदाओं से सुनते आते हैं और बड़े होने के बाद ये समझते-बूझते भी कि भूत-प्रेत कुछ नहीं होते, मगर फिर भी ज़िक्र किए जाते हैं |”
     “ख़ता कैसे नहीं हुई, माजीद ? एक पूरी क़ौम ने मेरी पूरी क़ौम को जलावतन कर दिया और तुम कहते हो कि ख़ता क़ौम की नहीं है ?”, माँ-पापा की आँखों वाला खौफ़ का वो अनदेखा मंज़र जैसे मैंने ख़ुद देख लिया हो अभी के अभी इसी वक़्त | माजीद थोड़ा सहम-सा गया था मेरी इस औचक प्रतिक्रिया पर |
     “आपका गुस्सा सर-आँखों पर डॉक्टर साब ! उस एक ख़ता की जो आपकी क़ौम के साथ हुई...उसकी तो कोई तौबा ही नहीं साब ! वो जाने किस क़ाबिल शायर ने कहा है ना साब कि लम्हों ने ख़ता की है सदियों ने सजा पायी...उसी की सजा तो हम भुगत रहे हैं | पूरी की पूरी एक पीढ़ी गुम हो गई है साब | निकाह के लिए लड़के नहीं हैं अब तो हमारी क़ौम में | आप यक़ीन करोगे साब, हमारे दर्दपुरा में कुंवारी लड़कियों की गिनती लड़कों से दूनी से भी ज़ियादा है | लड़के बचे ही नहीं इस नामुराद जिहाद के चक्कर में |”, वो गहरा कुआँ जैसे एकदम से भर सा गया था और मुझे ख़ुद पर अफ़सोस होने लगा अपने इस बेवजह के गुस्से से | ख़ुद पर बरस पड़ी खीझ की भरपाई करने के लिए, एकदम से कह उठा मैं उस से...

     “मुझे अपने गाँव कभी नहीं ले चलोगे, माजीद ?”

...और माजीद तो जैसे किलक ही पड़ा ये सुनकर | तय हुआ कि कल और परसों सप्ताहांत का फ़ायदा उठाते हुये क्लीनिक को अवकाश दिया जाये और चला जाये दर्दपुरा |           

     74.420 डिग्री के अक्षांश और 34.311 डिग्री देशांतर पर बसे इस गाँव तक पहुँचने के लिये कुपवाड़ा शहर को दायें छोड़ते हुये मुख्य सड़क से फिर से दायीं तरफ उतरना पड़ता है | पहाड़ों पर घूमती कच्ची सड़क पर लगभग साढ़े चार घंटे की हिचकोले खाती ड्राइव के पश्चात चारों तरफ से पहाड़ों से घिरे इस गाँव तक पहुँचने पर सम्राट जहांगीर के कहे “गर फ़िरदौस बर रूए ज़मीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त”... का यथार्थ मालूम चलता है | दर्दपुरा, जहाँ आजादी के इन अड़सठ सालों बाद भी बिजली का खंभा तक नहीं पहुंचा हैजहाँ भेड़ों की देखभाल के लिये एक देसी डॉक्टर तो है लेकिन इन्सानों के डॉक्टर के लिये यहाँ के बाशिंदों को लगभग सत्तर किलोमीटर दूर कुपवाड़ा जाना पड़ता है, इतना ख़ूबसूरत होगा, मेरी कल्पना से परे था | कश्मीर में टूरिस्ट बस गुलमर्ग और सोनमर्ग के मिडोज़ देखकर जन्नत का ख़्वाब बुन लेते हैं, यहाँ तो जैसे साक्षात जन्नत अपनी बाँह पसारे पहाड़ों के दामन में बैठा हुआ था |  सुबह जब माजीद के घर पहुँचा तो जैसे पूरे का पूरा गाँव उमड़ा पड़ा था स्वागत की ख़ातिर |



     माजीद का परिवार, जिसमें उसके अब्बू और अम्मी और उसकी दो छोटी बेटियाँ, हीपोश और शिरीनजैसे दूर जम्मू में बैठा हुआ मुझे अपना परिवार यहाँ मिल गया था | माजीद ने अपनी बड़ी वाली नौ साल की बेटी से बड़े गर्व से मिलवाया और ज़िद की कि मैं उस से इंगलिश में कुछ पूछूँ | सकुचाहट को बड़े ही अंदाज़ में साक्षात अवतरित सी करती हुई उस गोरी-चिट्ठी सेब सी लाल-लाल गालों वाली छुटकी से उसका नाम पूछा तो उसका “माय नेम इज हीपोश...हीपोश अहमद वानी” कहना जैसे इस सदी का अब तक गुनगुनाया हुआ सबसे ख़ूबसूरत नगमा था |

“एंड व्हाट डज हीपोश मीन माय डियर ?”
“ओ...इट्स अ फ्लावर, अंकल ! जेस्मीन फ्लावर !”

     मन किया उस सकुचाई-सी बोलती हुई जेस्मीन के फूल को गोदी में उठा लूँ |

     धीरे-धीरे जब अधिकांश गाँव वाले वहाँ से रुख़सत हुये तो चंद बुजुर्गों के साथ अब मैं माजीद के परिवार के साथ अकेला था | ये तय कर पाना लगभग असंभव था कि पूरे परिवार का और ख़ास तौर पर माजीद के अब्बू का मुझ पर उमड़ता स्नेह महज़ इस वज़ह से था कि मैं उस परिवार के इकलौते कमाने वाले की आय का साधन था या फिर वो स्नेह हर मेहमान के लिए नैसर्गिक ही था |

     दालान में सबके साथ बैठा नमकीन चाय के दौर पर दौर चल रहे गोल-गोल सख़्त मीठी रोटियों के साथ का लुत्फ़ उठाता बस चुपचाप सुने जा रहा था मैं वहाँ बैठे बुजुर्गों की बातें | माजीद के अब्बू और उनके हमउम्र बुजुर्गों की क़िस्सागोई जैसे मुझे नब्बे के दशक से पहले वाले ख़ुशहाल कश्मीर की यात्रा पर ले चली थी | एक अपनी ही तरह की टाइम-मशीन में बैठा मैं सत्तर और अस्सी के दशक वाले कश्मीर की यात्रा पर था और तभी नज़र पड़ी मेरी माजीद के अब्बू के बायें हाथ पर | अंगूठे के छोड़ कर बाकी सारी ऊँगलियाँ नदारद थीं उनके बायें हाथ की | एक अजीब सी झुरझुरी दौड़ गई मेरे पूरे वजूद में उस महज़ अंगूठे वाले हाथ को देखकर | पूछा जब मैंने कि ये कैसे हुआ तो वहाँ बैठे तमाम के तमाम लोगों का जबर्दस्त मिला-जुला ठहाका गूँज उठा | मैं तो अकबका कर देखने लगा था क्षण भर को | माजीद भी सबके साथ ठहाके तो नहीं, एक स्मित सी मुस्कान जरूर बिखेर रहा था ...और तब जो मैंने उन कटी ऊँगलियों की कहानी सुनी तो बस दंग रह गया |

     अपने अब्बू के बायें हाथ की चारों ऊँगालियों को ख़ुद माजीद ने काटा था...वो भी कुल्हाड़ी से और वो भी तब जब वो बस ग्यारह साल का था | भेड़ पालने के अलावा माजीद के अब्बू का जंगल से लकड़ी काट कर लाने का भी व्यवसाय था | आतंकवाद का उफ़ान चढ़ा ही था कश्मीर में तब | माजीद के दोनों बड़े भाई जा चुके थे उस पार पाक अधिकृत कश्मीर के जंगलों में चल रहे किसी जेहादी ट्रेनिंग कैम्प में और अपनी दो बहनों के साथ माजीद था बस अपने अब्बू और अम्मी के साथ...अब्बू की भेड़ों की देखभाल में हाथ बँटाते हुये और बचपन की सुहानी पगडंडी पर एकदम से जवान होते हुये | बर्फ की चादर में लिपटे सर्दी वाले उन्हीं दिनों में कभी इक रोज़ एक देवदार को अपनी कुल्हाड़ी से धराशायी करते हुये उसके अब्बू के बायें हाथ की तरजनी के जोड़ में भयानक दर्द उठा था | दो रोज़ लगातार भयानक पीड़ा सहते रहे वो, तर्जनी जहाँ हथेली से जुड़ी रहती है | अम्मी के चंद एक घरेलू उपचार बेअसर रहे थे और तीसरे दिन झिमी झिमी गिरते बर्फ के फाहों में बाहर अपनी बहनों के साथ उधम मचाते माजीद को पकड़ कर ले गए वो भेड़ों के बाड़े में | पहले से पड़े देवदार के एक कटे तने पर अपनी बायीं हथेली बिछाते हुये उन्होंने अपनी कुल्हाड़ी की तेज धार को तर्जनी और हथेली के जोड़ पर रखा और माजीद को वहीं पड़ा पत्थर उठा कर कुल्हाड़े पर प्रहार करने का हुक्म दिया | सहमा सा माजीद डर से मना करता रहा देर तक, लेकिन फिर एक ना चली उसकी अब्बू की तेज़ आवाज़ में बार-बार दिये जा रहे हुक्म के आगे | उधर माजीद के दोनों हाथों से पकड़ा हुआ पत्थर पड़ा कुल्हाड़े पर और उधर तरजनी छिटक कर अलग हुयी हथेली से | अगली तीन सर्दियों तक ये सिलसिला फिर फिर से दोहराया गया और तरजनी की तरह ही मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा अलग होती गईं इम्तियाज़ अहमद वानी की बायीं हथेली से |

     दर्दपुरा के उस बुजुर्ग, इम्तियाज़ अहमद वानी, का ये अपने तरीके का खास उपचार था चिल-ब्लेन्स से निबटने का | एक उस गाँव में, जहाँ आज भी किसी सच के डॉक्टर से मिलने के लिए सत्तर किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है और वो भी बर्फ़बारी में अगर रास्ता बंद न हो तब...जहाँ शाम को सूरज ढलने के बाद अब भी लकड़ी की मशाल और कैरोसीन वाले लालटेन जलते हों, उन कटी हुई ऊँगलियों की हैरतअंगेज़ दास्तान पर मेरी हैरानी को चुपचाप तकता हुआ दर्दपुरा जैसे हौले-हौले मुझे चिढ़ा रहा था |

     अगले दिन, रविवार की उस सिली सी दोपहर को वापसी की यात्रा में गाँव को पलट कर निहारता हुआ मैं सोच रहा था कि पापा की प्रतिक्रिया क्या होगी, जब मैं उनको बताऊँगा कि मैं अपना क्लीनिक कुपवाड़ा से उठा कर किसी अनाम से गाँव में स्थान्तरित कर रहा हूँ |

जीप के रियर-व्यू मिरर में पीछे छूटते दर्दपुरा का चिढ़ाना जाने क्यों मुझे एकदम से एक मुस्कुराहट में बदलता नज़र आ रहा था | पलट कर पिछली सीट पर बैठे माजीद को बताने के लिए कि देखो तुम्हारा गाँव मुस्कुरा रहा है, मुड़ा तो सीट की पुश्त पर सिर टिकाये उसका ऊंघना मुझे बस उसे निहारते रहने को विवश कर गया |
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(photo credit to Razaq Vance) 

10 May 2016

तीन रोज़ इश्क़

“चार दिन की ज़िंदगी, तीन रोज़ इश्क़”...गुलज़ार जब ऐसा कहते हैं तो जफ़र से कहीं बहुत आगे निकल आते हैं जिन्होंने कहा कि “उम्रे-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन, दो आरजू में कट गए दो इंतज़ार में” | बहुत-बहुत सारी ख़ुशी और बहुत-बहुत सारी उदासी के बीच कहीं डूबती-उतराती कहानियों के साथ पूजा उपाध्याय जब
अपनी किताब “तीन रोज़ इश्क़” लेकर आती हैं तो जफ़र से लेकर गुलज़ार के पड़ाव के बीच और फिर उस से आगे की...कहीं बहुत आगे की किसी गुमशुदा-सी यात्रा पर लिए चलती हैं हम पाठकों को | “तीन रोज़ इश्क़” को पढ़ना...यूँ कि जैसे अल्फ़ाज़ की खुदी हुई नींव पर कहानियों का नया प्लॉट खड़ा करना है...या कि जैसे क़िस्सागोई की किसी बुलंद इमारत पर चंद और  फ्लोर्स को उठाना...या...या कि जैसे आस-पास के लगते किरदारों के बीच कुछ एलिएन्स को आमंत्रित कर उन्हें अपने पड़ोस में बसा लेना |

तक़रीबन एक सौ सत्तर पृष्ठों में एक नहीं, दस नहीं...पूरी छियालीस कहानियों के ज़रिये लेखिका हमें इस डिजिटलाइज्ड हो चुकी दुनिया में रखते हुये भी क़िस्सागोई के पारम्परिक संसार में आव-भगत करती हैं और वो भी पूरे ढ़ोल-पिपही के साथ | कहने का मंतव्य ये कि समकालीन समय में लिखी जा रही अधिकांश कहानियाँ जब आस-पड़ोस की किसी न किसी घटना या फिर लेखक के अपने जीवन में घटित होने वाली बातों से प्रेरित रहती हैं, तीन रोज़ इश्क़” को पढ़ते हुये आप साफ़ महसूस करेंगे कि ये सारे क़िस्से लेखिका की कल्पनाशीलता...सिर्फ और सिर्फ कल्पनाशीलता की उपज हैं | पढ़ते हुये या पढ़ लेने के बाद इस अहसास के सिर उठाते ही आप लेखिका के प्रति एक अपरिभाषित से “आव”...एक...एक तारीफ़ भरे सम्मान या कुछ ऐसी ही मिली-जुली अनुभूतियों से भर उठते हैं |

किताब सुनाती है कहानी...एक नीली नदी के किनारे बसे ख़्वाब रंगते रंगरेजों और दुआएं बुनते जुलाहों की...मंटो से दोज़ख में हॉट-लाइन पर बात करती एक सरफ़िरी लड़की की...किसी गुमशुदा हॉस्पिटल के आदमख़ोर कमरों में क़ैद रूहों की बेआवाज़ क्रांतियों की...वायलिन की स्ट्रींग्स पर अपनी ऊँगलियों को लहूलुहान करती और भाई को याद करते हुये छुटकी पर लाड़ बरसाती इश्क़ियायी बहन की...रात के टीसते ज़ख़्मों पर सस्ती शराब छिड़क कर आग लगाते प्रेमियों की...सिगरेट की डिब्बी पर किसी लड़की के नाम के उर्वर अक्षरों को तलाशते एक लड़के की...अपनी मुहब्बत को अपने ही दोस्त पर क़ुरबान करते सुसाइडल आशिक़ के एकालाप की...रूठे सूरज की उदास नज़मों को सुनाने वाले एक पोस्टकार्ड की...कच्ची उम्र की पीठ पर शाबासी के लिए फेरे गए हाथों में छुपे घृणित वासनाओं की...लवर्स से बेस्ट फ्रेंड्स के दरम्यान के एक कनफ्यूज से टू एंड फ्रो जर्नी की...धड़कनों की डिसिप्लिन को तोड़ती किसी निगाहों में डूबी जाती चालीस साला स्त्री की...कुरियर के पार्सल में आये हुये किसी लम्स के फिंगरप्रिंट को समोए एक साबुन की...कलाई की नस काट कर खून की पिचकारी से बनाए गए किसी पेंटिंग की...कवि को लिखती हुई एक कविता की...और जिस्मों के काले जादू की |

कैसी तो कैसी कहानियाँ...टीस छेड़तीं...हुकहुकी उठातीं...अजब-गज़ब सी लड़कियों की कहानियाँ | कहानी...उस लड़की की जो कटी ऊँगली से रिसते ख़ून को व्हिस्की में डालकर कॉकटेल बनाती है | कहानी...उस लड़की की जिससे ख़ुद आसमान ही इश्क़ कर बैठा इक रोज़ | कहानी...उस लड़की की जो जब मुसकुराती है तो उसकी आँखों का काजल उसके प्रेमी की रातों में बह आता है | कहानी...उस लड़की की जो चाँद के संग अपने बाइक पर रेसिंग करती है | कहानी...नागफनी से आहिस्ता-आहिस्ता  टकीला बनती लड़की की | कहानी...वो एक नीली बोगनविलिया की टूटी पंखुरियाँ ढूँढने वाली लड़की की | कहानी...सुनहली रेत वाले देश के शहजादे को ऊसर मिट्टी की दास्तान सुनाने वाली लड़की की | कहानी...घोड़े पर शहर दर शहर दर घूम कर अनगिन पुरुषों से प्रेम करने वाली लड़की की | कैसी तो कैसी लड़कियाँ और उनकी कैसी तो कैसी कहानियाँ...कि इन कहानियों को पढ़ो तो उन लड़कियों को ढूंढ कर उनके इश्क़ में डूब जाने का जी करे |

ये कहानियाँ अपने मूल रूप में इश्क़ की कहानियाँ हैं | समस्त कहानियाँ आपस में जुदा होकर भी घुली-मिली सी...और कई बार एक-दूजे का एक्सटेंशन सी प्रतीत होती हैं | दरअसल पूजा उपाध्याय की ये कहानियाँ अपने-आप में क़िस्सागोई से परे कुछ अद्भुत किरदारों को बुनने की व्याकुलता है और इसी व्याकुलता के चरम पर कई बार कहानियाँ अपना कथ्य खोकर किरदार का एकालाप बन कर रह जाती हैं | लेकिन इस बारे में लेखिका कोई मुगालता भी नहीं रखतीं कि इस किताब का टैगलाइन ही है “गुम होती कहानियाँ” और किताब का बैक-कवर पहले ही ऐलान करता है कि “इन छोटी कहानियों में एक चोर दरवाज़ा है जिससे आप कहानी में दाख़िल होकर उसे जी सकते हैं” ...अब ये जिस चोर दरवाज़े का लेखिका ऐलान करती हैं, वो पाठक-दर-पाठक मुखतलिफ़ खुलता है | किसी पर कहानी की पहली पंक्ति के साथ ही तो किसी के साथ कहीं बीच में...एकदम भक्क से कि अरे ! ये क्या !! ...और इन सब पर तुर्रा ये कि भाषा-सौंदर्य की चौंध आपकी मिचमिचायी आँखों के सामने कब कोई नया दरवाज़ा खोल देगी, आपको पता ही नहीं चलेगा | ये कहानियाँ एक क़िस्म की ढीटाई सी करती हैं...पाठको को टीज़ करती हुई कि जैसे ही आप उस चोर दरवाज़े से अंदर दाख़िल हुए कि वो गुम हो गईं और ये ढिठाई जहाँ एक अजीब सा सस्पेंस देती है, वहीं क़िस्सागोई के शिल्प को एक नया आयाम भी |

ये छोटी-छोटी कहानियाँ बाज़ दफ़ा किरदारों की डायरियों के या उनके लिखे ख़तों का भान दिलाती हैं और कई-कई बार किसी क़िस्से के गुमशुदा पड़े विस्तृत प्लॉट की उपलब्धि का आभास भी कराती हैं | भगजोगनी याद होगा आप सब को...भगजोगनी...शिवपूजन सहाय की भगजोगनी...उनकी चर्चित कहानी “कहानी का प्लॉट” की भगजोगनी | तो ऐसी कई भगजोगनियाँ’, पूजा उपाध्याय अपनी इस किताब में हमारे लिए छोड़ गई हैं...कोई आए उठा ले इनको और बुन ले एक नई कहानी | इसे लेखिका का शायद ख़ुद का लिमिटेशन कहा जा सकता है, जो कि एक्सप्लोर किया जाना माँगता है...खुद उनके द्वारा ही | पूजा उपाध्याय की कहानी बुनने की कला जैसे कि मानो एक छुपा हुआ ब्लास्ट है, जिसकी तीव्रता अभी पाठकों तक पहुंचनी है | हम जैसे कुछ जो इस ब्लास्ट की रेडियस में आ चुके हैं, उनकी इस क़िस्सागोई के महत्तम तक जाना चाहते हैं अब | क्योंकि लेखिका के अंदर का छुपा हुआ कथाकार किताब की आख़िरी कहानी, जो इस किताब की शीर्षक कहानी है और जो इकलौती लंबी कहानी भी है, में हम पाठकों से मानो पूछता सा प्रतीत होता  है कि सुनो हम लम्बी कहानी भी सुना सकते हैं...वक़्त है तुम्हारे पास ना ?

किताब का आवरण टैगलाइन को सार्थक करता है, साथ ही पेंगुइन की छपाई और बाइंडिंग फील-गुड का अहसास देती है पढ़ते वक़्त | साल भर में अपने पहले संस्करण को सोल्ड आउट कर चुकी ये किताब इतनी घोषणा तो करती ही है कि इसे पाठकों द्वारा पसंद किया जा रहा है किताब ऑन-लाइन खरीदने के लिए इस लिंक पर जाया जा सकता है :-




अव्वलो आख़िरश दरम्याँ दरम्याँ...पूजा उपाध्याय को ढ़ेर दुआयें कुछ अद्भुत किरदारों से हमें मिलवाने के लिए और समस्त शुभकामनायें कि ये किताब और और पाठकों तक पहुँचें !