09 April 2018

क़िस्सागोई करती आँखें

ग़ज़ल जैसी विधा के साथ जिस तरह का सौतेला सलूक होता आया है इस हिन्दी-साहित्य में, उस बिना पर किसी युवा रचनाकार द्वारा इस विधा को अपनाने के निर्णय पर कई सवाल उठते हैं मन में | पाठकों, लेखको और आलोचकों द्वारा समवेत...सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली विधा, सबसे ज्यादा गुनी जाने वाली विधा जाने क्यों हिन्दी साहित्य के पन्नों पर हाशिये पर ही रखी जाती है तमाम विमर्शों में, सारी चर्चाओं में, समस्त समीक्षाओं में | ऐसे में कविता की छंद-मुक्त आसानी को छोड़ कर ग़ज़ल की अनुशासित मुश्किल ज़मीन पर पाँव बढ़ाने का निर्णय लेते हुये जब कोई प्रदीप कान्त जैसा रचनाकार दिखता है, तो प्रथम दृष्टि में ऐसे रचनाकार के लिए एक सहानुभूति सी उपजती है…लेकिन फिर ग़ज़ल का विचक्राफ्ट ही कुछ ऐसा है कि वो सहानुभूति एकदम से कब सम्मान में बदल जाती है, पता ही नहीं चलता | साल भर से प्रदीप की ये ग़ज़लों की किताब "क़िस्सागोई करती आँखें" मेरे हाथों में है...अपने मुखतलीफ़ मिसरों के जरिये मुझसे क़िस्सागोई करती हुयी |

प्रदीप छोटी बहर वाले बड़े शायर होने की संभावना लिए हुये दिखते हैं अपनी ग़ज़लों में | ख़ुद टूटे-फूटे शेर कह लेता हूँ तो जानता हूँ कि छोटी बहर में शेर बुनना कितना दुश्वार होता है | कुल 67 ग़ज़लों की ये किताब प्रदीप के अंदर के कुलबुलाते कवि की महज एक छोटी-सी झलकी दिखाती है...जैसा कि प्रसिद्ध गीतकार यश मालवीय जी किताब की भूमिका में लिखते हैं “समकालीन कविता के सारे तकाजे पूरे करता प्रदीप के भीतर का कवि इस कठिन और मुश्किल समय की आँखों में आँखें डालकर बोलता-बतियाता है” | “कबीरा” रदीफ़ को लेकर हज़ारों ग़ज़लें कही गई होंगी अब तक, लेकिन प्रदीप एकदम अलग से खड़े दिखते हैं जब इस रदीफ़ को चस्पाँ कर बुनते हैं वो मिसरे अपनी ग़ज़ल के लिये और यही वो ग़ज़ल थी जिसे बहुत पहले किसी पत्रिका में पढ़ने के बाद प्रदीप कान्त का नाम भी मेरे ज़ेहन में उनकी रदीफ़ की तरह चस्पाँ रह गया था...

गुज़र रही है उमर कबीरा
हुआ नहीं कुछ मगर कबीरा
बड़ा वक़्त का सच है लेकिन
छोटी तेरी बहर कबीरा
आती-जाती रहती तट पर
कब रुकती है लहर कबीरा

अपने मिसरों के टटकेपन से, कहन की फ्रेशनेस से और क़ाफ़ियों के चुनाव से प्रदीप कई बार शॉक सा देते हैं मुझ जैसे पाठकों को | उनका लिखा ये दो शेर तो जाने कितनी दफ़ा कोट कर चुका हूँ मैं...

बुरे वक़्त में दिलासों की तरह
यादें कुछ रहीं कुहासों की तरह
राज़ उनका भी सुन लिया हमने
तमाम दूसरे खुलासों की तरह

“पेट है, पीठ है, सर भी है / और उसूलों की फिकर भी है” या फिर ”कौन गया है रखकर इतने / आँखें दो हैं, मंज़र इतने” या...या फिर “थोड़े अपने हिस्से हम / बाकी उनके किस्से हम” जैसे शेर बुनकर प्रदीप हठात खुद भी चौंकते होंगे कि अरे ये तो बड़ा-सा शेर हो गया | हम पाठक तो चौंकते ही हैं...पढ़कर एक उफ़ सी निकालते हुये | “क़िस्सागोई करती आँखें” के सफ़े-दर-सफ़े पर उड़ते हुये आप अचानक से होवर करने लगते हैं किसी ख़ास शेर पर और या तो फिर उस शेर को अपनी ज़ुबान पर उसी वक़्त रट्टा मारा कर सहेज लेते हैं या थोड़ी मेहनत करके उतार लेते हैं अपनी छोटी-सी डायरी में | एक रचनाकर के लिये इस से बड़ा ईनाम भला और क्या हो सकता है कि उसका पाठक उसके लिखे को कहीं और सहेज ले | ऐसे कितने ही शेरों पर धूल उड़ाते हेलीकॉप्टर की तरह होवर करते हुये (जहाँ होवर करते हुये हेली के रोटर्स धूल उड़ाते हैं, एक पाठक के ज़ेहन में रचनाकार का लिखा विचारों की धूल उड़ाता है) जब आप ठिठके रहते हैं एक किसी ख़ास मिसरे पर...वज़ह बेशक कुछ भी हो...प्रदीप के संदर्भ में वो कोई सेलेक्टेड क़ाफ़िया हो सकता है, कहन हो सकती है, शेर की बुनावट हो सकती है ...एक बात एकदम से कौंधती है कि जैसे शायर ने सचमुच इन बातों को जीया है, महसूस किया है | ऐसे ही होवर करता मेरा पाठक-मन जिन चंद शेरों को उठा कर अपनी हर जगह साथ ले जाने वाली डायरी में सहेज लेता है, उनमें से कुछ की बानगी...

फ़िक्र अगर हो रोटी की तो
ख़्वाब चुभेगा बिस्तर में फिर

जितने हुये साकार, बहुत हैं
यूँ तो ख़्वाब फ़लक भर आये

मोड़ के आगे मोड़ बहुत
रही उम्र भर दौड़ बहुत

काम न आये ग़ज़लों के
भूले-बिसरे मिसरे हम

जग के दुख में खोया फिर से
देख कबीरा रोया फिर से
रहा जमूरा भूखा-प्यासा
मस्त मदारी सोया फिर से

कहाँ हमारा हाल नया है
कहने को ही साल नया है
नहीं सहेगा मार दुबारा
गाँधी जी का गाल नया है

प्रदीप के इन तमाम अच्छी-अच्छी बातों से परे, जब हम ग़ज़ल की बात कर रहे होते हैं, तो साथ में कायदे-क़ानून, डिसिप्लीन और ग्रामर की भी बात कर रहे होते हैं | साहित्य की तमाम विधाओं में बस ग़ज़ल ही वो एक विधा है जो डिसिप्लीन के नाम पर आपको टस से मस नहीं होने देती और इसी डिसिप्लीन के दायरे में “क़िस्सागोई करती आँखें” तनिक कमज़ोर नज़र आती है | काफ़ियों का भटकाव, बहर का घुमाव, रदीफ़ का अलगाव...ये सब अलग-अलग और कई बार एक साथ मिलकर प्रदीप की कुछ ग़ज़लों को ग़ज़ल कहलवाने की अनुमति नहीं देता | दो-एक बार झुंझलाहट भी होती है कि क्यों किया कवि ने ऐसा | नहीं, ऐसा तो नहीं है कि उसे मालूम नहीं है...एक तरह की जल्दबाज़ी-सी दिखती है या फिर किसी दो-एक शेर के प्रति उभरा हुआ अतिरिक्त मोह दिखता है जो प्रदीप को किताब में नहीं रखने की हिम्मत नहीं दे पाता | व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि प्रदीप ने थोड़ी-सी शीघ्रता दिखाई है किताब प्रकाशित करने में |

बोधि प्रकाशन से निकली हुयी ये किताब अपनी छपाई और अपने आवरण और बाइंडिंग से मन मोह लेती है | वैसे इन दो-एक सालों में बोधि प्रकाशन ने एक तरह की क्रान्ति का आगाज़ किया है प्रकाशन की दुनिया में अपनी अच्छी छपाई के बावजूद किताब का दाम कम-से-कम रखकर | इस किताब का दाम भी महज चालीस रुपये है | पेपर-बैक में इतने अच्छे पन्नों और और इतनी शानदार प्रिंटिंग के साथ इतना कम दाम रखने लिये तमाम बोधि प्रकाशन की टीम को एक कड़क सैल्यूट |



प्रदीप कान्त को समस्त शुभकामनाओं के साथ उनको इस ख़ास शेर के लिये शुक्रिया :-

तमाम शहर की हँसी कम थी
एक बच्चा अगर उदास रहा

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26 March 2018

अजब हैंग-ओवर है सूरज पे आज...


गुज़र जाएगी शाम तकरार में
चलो ! चल के बैठो भी अब कार में

अरे ! फ़ब रही है ये साड़ी बहुत
खफ़ा आईने पर हो बेकार में

तुम्हें देखकर चाँद छुप क्या गया
फ़साना बनेगा कल अख़बार में

न परदा ही सरका, न खिड़की खुली
ठनी थी गली और दीवार में

अजब हैंग-ओवर है सूरज पे आज
ये बैठा था कल चाँदनी-बार में

दिनों बाद मिस-कॉल तेरा मिला
तो भीगा हूँ सावन की बौछार में

मिले चंद फोटो कपिल देव के
कि बचपन निकल आया सेलार में

खिली धूप में ज़ुल्फ़ खोले है तू
कि ज्यूँ मिक्स 'तोड़ी' हो 'मल्हार' में

भला-सा था 'गौतम', था शायर ज़हीन
कहे अंट-शंट अब वो अश'आर में


[ पाल ले इक रोग नादाँ के पन्नों से ]

26 February 2018

मेरे साथ ही साथ बड़ा हो गया है मेरा डर

[ कथादेश के फरवरी 2018 के अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का बारहवाँ पन्ना ]


नये साल के मचलते यौवन की शरारत कुछ इस क़दर सर चढ़ कर बोलने लगी थी कि मौसम ने एकदम से गंभीर अभिभावक वाला चोगा पहन लिया है और मौसम के इस गंभीर अवतार ने रूखे-सूखे-हरे-भूरे पहाड़ों को भी धवल श्वेत दुशाला उढ़ा कर मानो प्राणायाम रत योगी में तब्दील कर दिया हो | दो हफ़्ते पहले तक निष्ठुर कठोर दिखते ये पहाड़ कैसे अचानक से शांत समाधिस्थ तपस्वी की तरह दिखने लगे हैं ! बर्फ़बारी तनिक विलंब से ज़रूर शुरू हुई है, लेकिन अब जो शुरू हुई है तो जैसे थमने का नाम ही नहीं ले रही... विख्यात पोल-वाल्ट खिलाड़ी सर्जेई बुबका की तरह पिछले साल के ख़ुद अपने ही बनाए कीर्तिमान को ध्वस्त करते हुए | तीन हफ़्ते में ही अठारह फीट...हायsss ! सरहद पर खड़ी कंटीली बाड़ का जैसे कोई वजूद ही ना रह गया हो | इस पार से लेकर उस पार तक सब कुछ सफ़ेद | कोई फ़र्क नहीं पड़ता बर्फ़ की इस सफ़ेद चादर को सरहद द्वारा की गयी इलाक़ाई बँटवारे से |

...और इस बर्फ़बारी से शून्य से भी नीचे गिरता तापमान भी कहाँ कोई भेदभाव करता है किसी में ! सरहद-प्रहरियों और सरफिरे जेहादियों...दोनों को बिलकुल बराबर-बराबर सर्दी पहुँचाता है | प्रहरियों को तो खैर कोई विकल्प ही नहीं दिया है उनकी हरी वर्दी ने...उन्हें तो बदस्तूर अपनी ड्यूटी निभानी है | हाँ, कथित जेहाद के तमाम भूत-प्रेत हड्डियों को भेदती इस सर्दी की सिहरन में डर कर दुबके पड़े हैं कहीं कम्बलों में तपिश भरते काँगड़ियों को बदन से चिपकाये | फिलहाल उनका और उस पार बैठे उनके आकाओं का जेहाद के लिए लिया गया कश्मीर को आज़ाद करवाने का तथाकथित प्रण-व्रण आकस्मिक अवकाश पर गया लगता है | जिहाद का एक पखेरू तक नज़र नहीं आ रहा दूर-दूर तक बिछी इस सफ़ेद चादर के अंतहीन फैलाव में |

इधर परतों का अम्बार लगाती बर्फ़बारी ने यूँ सुकून तो दिया है थोड़ा सा कि हर लम्हा चौकन्ना रहने की दरकार नहीं, लेकिन मुश्किलें अब अलग किस्म की हैं ...बंकरों के छतों और खिड़कियों पर से गिरती बर्फ़ को लगातार हटाते रहने की मुश्किलें कि कहीं छत उनके बोझ से दरक ही ना जाए और रायफलों की नालें बंद हुई खिड़कियों से दुश्मन को निशाने पर ना ले पाए ...एक बंकर से दूसरे बंकर तक के बीच रास्तों की हर घंटे-दो घंटे में सफाई करते रहने की मुश्किलें कि सरहद पर गश्त बरकरार रहे और बंकरों तक राशन पहुँचता रहे | यूँ हर एक बंकर में चाय बनाने की प्रचुर सामग्री, ढेर सारे मैगी के पैकेट्स, मिट्टी के तेल के बैरल वगैरह रखवा दिए गए हैं | कई बार बर्फ़ीले तूफ़ान में दो-दो दिन तक एक बंकर से दूजे बंकर तक की सत्तर से सौ मीटर तक की दूरी तय करना भी दुश्वार हो जाता है | लेकिन इन सबसे ज्यादा मुश्किल और डर ताज़ा गिरी बर्फ़ों पर एवलांच आने का रहता है | यूँ अब तो बटालियन के सारे जवान पूरी तरह प्रशिक्षित हो चुके हैं इस विपदा से निबटने के लिए ...लेकिन फिर भी हर पल एक आशंका सी बनी तो रहती ही है | जब तक एक भी गश्ती-दल बाहर रहता है बंकर से, चैन से बैठा नहीं जाता इधर | एक अजीब सी बेचैनी घेरे रहती है...और इस बेचैनी में वायरलेस सेट पर आते हर मैसेज से पहले की वो  शुरुआती “किर्र-किर्र” ह्रदय की धड़कनों को सौ-सौ बाँस की उछाल भर देता है, जब तक कि वायरलेस ऑपरेटर का उस “किर्र-किर्र” के तुरत बाद आया हुआ “ऑस्कर-किलो-ओवर” कानों तक ना पहुँच जाये | अपनी इन जब-तब उछलती धड़कनों पर तरस खाकर ही ये स्टैण्डर्ड ऑर्डर जारी कर रखा है मैंने कि किसी भी संदेशे की शुरुआत में “ऑल ओके, ओवर” कहा जाएगा, फिर मुख्य संदेशे पर आना है | अब तो खैर ये ट्रेंड ही बन चुका है |

देखो ना डायरी डियर, इन विगत डेढ़-दो सालों में यूँ लगता है पूरा का पूरा अस्तित्व जैसे आशंकाओं, अंदेशों और एक हर पल के अनजाने-से भय में लिपटी हुई मूरत बन चुका है | अपने जवानों...अपने जूनियर ऑफिसरों के समक्ष जोश, जज़्बे और बहादुरी की बात करता हुआ कर्नल अपने इन्हीं जवानों और जूनियर ऑफिसरों की सलामती के लिए अन्दर से कितना डरा रहता है, कोई जान भी नहीं पायेगा कभी | जाने क्यों होता है ये डर...ये भय ? और उम्र के एक मोड़ के बाद यही डर, यही भय अपने लिए कम किन्तु अपने अपनों के लिए ज़्यादा क्यों हो जाता है ? इस डर के भी जाने कितने अलग-अलग रूप हैं | वक़्त-वक़्त के हिसाब से जाने कितने चोगे बदल-बदल कर अवतरित होते रहता है ये भय अपने भिन्न-भिन्न विकराल शक्लों में | प्रेमचंद के उपन्यास ‘सेवा-सदन’ का प्रसंग याद आ रहा है | रात के अँधेरे में जब सदन को गाँव से निकलना था किसी ज़रूरी कार्य के लिए और उस अँधेरी रात में जब वो चाह कर भी भूत-प्रेत का ख़याल अपने मन में नहीं लाना चाहता था...लेकिन ना चाहते हुए भी वही ख़याल मन-मस्तिष्क पर धावा बोलते रहेत हैं और तभी उस कुख्यात पीपल पेड़ का रस्ते में आना जिसके बारे में गाँव में मशहूर था कि उस पर भूतों का डेरा रहता है | सदन की वो मानसिक स्थिति ! भय की...डर की पराकाष्ठा ! जाने कैसी-तो-कैसी मानसिक विचलन की स्थिति में आकर सदन का उस पीपल के पेड़ का पहले तो परिक्रमा करना और फिर उसके तने को पकड़ कर ज़ोर-ज़ोर से झिझोड़ना | वहीं प्रेमचंद लिखते हैं कि “भय की चरम सीमा ही साहस है” | जहाँ तक मेरी याददाश्त कहती है तो यह एक पंक्ति प्रेमचंद ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में सबसे अधिक बार...बार-बार लिखा है |

लेकिन अपने इस अजाने से, इस अपरिभाषित से भय का चरम कहाँ से ढूँढ कर लाऊँ मैं | आया कहाँ से यक-ब-यक ही ये कमबख्त़ ? बचपन से तो बड़ा नहीं हुआ साथ-साथ गुपचुप ? किसी रोज़...हाँ, एक रोज़ ज़रूर इस डर के...इस भय के चंद ऐसे क़िस्से लिखूँगा, जो अब तक ना सुना गया है और ना ही सुनाना गया है...

हर्फ़ों की जुबानी हो बयां कैसे वो क़िस्सा
लिक्खा न गया है जो सुनाया न गया है

नरेश सक्सेना की एक कविता सर उठाती है इस सर्द बर्फ़ीली रात के दूसरे पहर एकदम अचानक से...

हवा के चलने से
बादल कुछ इधर-उधर होते हैं
लेकिन कोई असर नहीं पड़ता
उस लगातार काले पड़ते जा रहे आकाश पर

मुझे याद आता है बचपन में
घर के सामने तारों से लटका
एक मरे हुए पक्षी का काला शरीर

मेरे साथ ही साथ बड़ा हो गया है मेरा डर
मरा हुआ वह काला पक्षी आकाश हो गया है


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05 February 2018

हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज

हमारी नयी किताब आयी है | कहानियों की पहली किताब | हिन्दी-साहित्य में सेना और सैनिक हमेशा से एक अछूता विषय रहा है | गिनी-चुनी कहानियाँ हैं सैन्य-जीवन पर...गिने-चुने उपन्यास हैं | एक अदनी सी कोशिश है उसी कमी को थोड़ा कम करने की | कुछ कहानियाँ आपलोग इस ब्लौग पर पहले ही पढ़ चुके हैं | कुल इक्कीस कहानियाँ हैं....कुछ छोटी और कुछ बड़ी,  जिनमें से चंद पहले ही हंस, वागर्थ, पाखी, परिकथा, कथादेश, लमही, जनसत्ता, अहा ज़िन्दगी जैसी पत्रिकाओं में आ चुकी हैं | अब ये सब की सब संकलित होकर राजपाल प्रकाशन से किताब के रूप में आप सब के सामने है :- 




कुछ अलौकिक सा होने का दावा तो नहीं करता, लेकिन किताब में शामिल लगभग सारी कहानियाँ सच्ची घटनाओं से प्रेरित है...कुछ आँखों देखी, कुछ कानों सूनी | कहानियों के किरदार सच्चे हैं...उनकी बातें सच्ची हैं...कहानी की जगहें सच्ची हैं | कहानी का शिल्प और सुनाने की कला के बारे में इतना तो ऐलान कर ही सकता हूँ कि आपको बोर नहीं होने देंगी और सैनिकों के जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं से आप सबको परिचित करवाएंगी |

किताब उपलब्ध है समस्त नामचीन रेलवे स्टेशनों पर ए एच व्हीलर के पास, नज़दीक की दुकानों में और ऑन लाइन मंगवाने के लिए अमेजन पर, जिसे नीचे दिए गए लंक पर क्लिक करने से पाया जा सकता है :- 

हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज

नवाज़िश करम शुक्रिया मेहरबानी !

30 January 2018

छबीला रंगबाज़ का शहर

इक शहर खुलता है अपने पूरे विस्तार में...पन्नों पर बिखरे काले हर्फ़ों से निकल कर अपने चंद अजब-ग़ज़ब से किरदारों को संभाले, जो कतई तौर पर उस शहर से संभाले नहीं संभल रहे होते,...और इन तमाम असंभाल ‘संभालों’ के दरम्यान हमें मिलता है एक युवा क़िस्सागो की करिश्माई क़िस्सागोई का निशान ! प्रवीण कुमार की किताब “छबीला रंगबाज़ का शहर” दो सौ बीस पन्ने में फैली हुई चार कहानियाँ सुनाती है हम पाठकों को...और किस अदा से सुनाती है, उफ़ !

इन कहानियों से गुज़रते हुए एक अपरिभाषित किस्म का सुकून हासिल होता है...एक तरह का आश्वासन जैसा कुछ कि लिखने वालों की हर रोज़ उमड़ती जा रही भीड़ में भी क़िस्सागोई की कला गुम नहीं हुई है...कि प्रवीण जैसे कुछ युवा भी हैं इस भीड़ में जो अपने हट-कर-के शिल्प, अपनी सम्मोहक शैली और अपने-बिलकुल ख़ास अपने- ‘विट’ से एक आम सी लगने वाली कहानी को भी कितना विशिष्ट बना देते हैं |

किताब की पहली कहानी, जो कि शीर्षक कहानी भी है, अपेक्षाकृत लम्बी है और अपने फैलाव में उपन्यास का विस्तार समेटे हुए है | कथ्य कुछ इस कदर से बुना है लेखक ने कि शहर का नाम कहीं ना आते हुए भी पाठक के ज़ेहन में वो मुल्क के नक़्शे वाला असली शहर आकर बैठ जाता है...चाहे वो जैन धर्म के अवशेषों की चर्चा मात्र से हो या फिर अमर सेनानी कुंवर साब के ज़िक्र से | यूँ कहानी बुने जाने के क्रम में पत्रकार अरूप का किरदार मुख्य किरदार से कहीं ज्यादा वृहत हो गया है....जाने ये लेखक का सायास प्रयास था या फिर उसकी विलक्षण क़िस्सागोई की ही असंख्य अदाओं में एक और अदा ! दूसरी कहानी “लादेन ओझा का संसार” तनिक प्रेडिक्टेबल होते हुए भी अपनी कसी हुई बुनावट और चंद अनूठे किरदारों के लिए याद रखी जाने वाली कहानी है | “नया ज़फरनामा” मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य पर सम्मोहक सटायर करते हुए जाने कैसी तो टीस उठाती है पढ़ते वक़्त सीने की अनंत गहराईयों में | किताब की चौथी और आख़िरी कहानी “चिल्लैक्स लीलाधारी” हास्य और करुण रस का ऐसा बेजोड़ कॉकटेल है कि पाठक-मन बस उह-आह करते रह जाता है लेखक की लेखकीय बाज़ीगरी पर |

“छबीला रंगबाज़ का शहर” अपने किताबी अवतार में मनमोहक है और क़िस्सागोई की लुप्त होती कला को एक अलग ही आयाम देती है | प्रवीण कुमार का क़िस्सागो बड़ी चतुराई से कथ्य में नयेपन की कमी का अपनी लेखनी के गुदगुदाते विट, अपनी भाषा की दमकती सुन्दरता और अपने शिल्प की चटकती ताज़गी से आभास तक नहीं होने देते | यही इस किताब की ख़ूबसूरती है | राजपाल की बाइंडिंग, प्रिंटिंग और पन्नों की क्वालिटी क़ाबिले-तारीफ़ है | कवर का डिजाइन, किताब के अंदर बने हुए स्केच और कहानियों के शीर्षक का आकर्षक फौंट में दिया जाना...सब मिलकर जुलकर जैसे लेखक के जुदा से शिल्प को कॉम्प्लीमेंट से करते नज़र आते हैं |

बस दो सौ पचीस रुपये की क़ीमत पर उपलब्ध ये किताब ख़रीदे जाने और ख़रीद कर अपनी आलमारी में संजोये जाने की ज़िद करती है | किताब के ऑन-लाइन ऑर्डर के लिए अमेजन के इस लिंक का इस्तेमाल किया जा सकता है :-

अमेजन 



...और अंत में प्रवीण कुमार को टोकरी भर-भर कर धन्यवाद इन लाजवाब कहानियों के लिए और समस्त शुभकामनाएँ उनके लम्बी लेखकीय पारी के लिए जिसकी शुरूआत ही इतनी धमाकेदार हुई है !