18 July 2017

इश्क़ उचक कर देख रहा है, हुस्न छुपा है ज़रा-ज़रा...

एक अरसा ही तो बीत गया जैसे ब्लौग पर कोई ग़ज़ल लगाए...तो इस 'एक अरसे' का अंत यहीं एकदम तुरत ही और एक ताज़ा ग़ज़ल:- 

आधी बातें, आधे गपशप, क़िस्सा आधा-आधा है
इसका, उसका, तुम बिन सबका चर्चा आधा-आधा है

जागी-जागी आँखों में हैं ख़्वाब अधूरे कितने ही
आधी-आधी रातों का अफ़साना आधा-आधा है

तुमसे ही थी शह्र की गलियाँ, रस्ते पूरे तुमसे थे
तुम जो नहीं तो, गलियाँ सूनी, रस्ता आधा-आधा है

इश्क़ उचक कर देख रहा है, हुस्न छुपा है ज़रा-ज़रा
खिड़की आधी खुली हुई है, पर्दा आधा-आधा है

उन आँखों से इन आँखों के बीच है आधी-आधी प्यास
झील अधूरी, ताल अधूरा, दरिया आधा-आधा है

ग़ुस्से में तो फाड़ दिया था, लेकिन अब भी अलबम में
जत्न से रक्खा फोटो का वो टुकड़ा आधा-आधा है

बाद तुम्हारे जाने के ये भेद हुआ हम पर ज़ाहिर
रोना तो पूरा ही ठहरा, हँसना आधा-आधा है


[ jankipul.com में प्रकाशित ] 

10 July 2017

इक ज़ख़्म मैं मुरीद तो इक ज़ख़्म पीर मैं...

{कथादेश के मई अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का तीसरा पन्ना}

जी ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत...कि रात-दिन बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किये हुए...ढेर-ढेर सारी फ़ुरसतें...दोस्तों-से-झूठी-मूटी-दूसरों-का-नाम-लेकर-वो-तेरी-बातें-करना-वाली फ़ुरसतें कि इन लम्बी-लम्बी रातों के अफ़साने गढ़ सकूँ इन फ़ुरसतों में | सरहद पर रातें लंबी होती हैं...अक्सर तो उम्र से भी लंबी...बेचैन, आशंकित, चौकस रतजगों में लिपटी हुईं | इन रतजगों के जाने कितने अफ़साने हैं जो लिखे नहीं जा सकते...जो सुनाये नहीं जा सकते...और सुनाये जाने पर भी इनके आम समझ से ऊपर निकल जाने का भय रहता है | युद्धइन तमाम अफ़सानों का केन्द्रीय किरदार होता | कश्मीर की दुर्गम, बर्फ़ में दबी-ढँकी ठिठुरती-सिहरती हुई सरहदों पर हर रोज़ ही तो एक युद्ध होता है | कौन देख पाता है इन अंतहीन रोज़-रोज़ के युद्धों को, सिवाय इन प्रहरियों के !

वैसे युद्ध बस सरहद पर ही नहीं लड़े जाते ! कई बार सैनिकों के लिए भी...युद्ध बस सरहद पर नहीं लड़े जाते सामने पत्थर-फेंक दूरी पर खड़ा आँखों से आँखें मिलाता हुआ दुश्मन या फिर ज़मीनी बनावट और ख़राब मौसमों का फायदा उठाकर कथित जेहाद के नाम पर अंदर घुस आने को उतावले आतंकवादियों का दस्ता...ये सब मिलकर या अलग-अलग विगत तीन-साढ़े तीन दशकों से लगातार युद्द जैसी स्थित ही तो उत्पन्न करते रहे हैं | कहने को  बेशक इसे लो इंटेसिटी कंफ्लिक्टकह कर नकारने की कोशिश करते रहें हम, हर तीसरे दिन की शहादत कुछ और कहानी कहती है...कहानी, जो सौ साल पहले के उस महान प्रथम विश्व-युद्ध के बनिस्पत एक लघु-कथा से ज्यादा और कुछ नहीं, किन्तु यही लघु-कथा रात-दिन इन ठिठुरती-सिहरती सरहदों पर निगरानी में खड़े एक भारतीय सैनिक के लिए किसी महाकाव्य से कम का विस्तार नहीं देती है | पूरे मुल्क की सोचों, निगाहों में अलग-थलग कर दिया ये अकेला भारतीय सैनिक इसी अनकही कहानी के पार्श्व में एक सवाल उठाता है कि क्या वजह है कि सौ साल पहले के उस महायुद्ध के पश्चात जब सम्पूर्ण यूरोप, अमेरिका या फिर जर्मनी भी एक मजबूत ताकत के रूप में, एक व्यवस्थित विकसित मुल्क के रूप में उभर कर आए और अपना ये मुल्क स्वतंत्रता-प्राप्ति के उपरांत पाँच-पाँच युद्ध देख चुकने के बाद भी एक चरमरायी सी, असहाय विवश व्यवस्था की छवि प्रस्तुत करता है पूरे विश्व के समक्ष ?

युद्ध कभी भी वांछित जैसी चीज नहीं हो सकती है...और खास कर एक सैनिक के लिए तो बिलकुल ही नहीं | किसी भी युद्ध के दौरान एक सैनिक को मौत या दर्द या ज़ख्म से ज्यादा डर उसको अपने वर्दी की और अपने रेजीमेंट की इज्जत खोने का होता है और कोई भी युद्ध वो इन्हीं दो चीजों के लिए लड़ता है...बस ! अपनी हरी वर्दी के लिए और अपने रेजिमेंट के नाम-नमक-निशान के लिए ! ऐसी हर लड़ाई के बाद वो अपने मुल्क और इसके लोगों की तरफ बस इतनी-सी इच्छा लिए देखता है कि उसके इस जज़्बे को पहचान मिले...उसकी इस क़ुरबानी को सम्मान मिले | प्रथम विश्व-युद्ध के पश्चात उसमें शामिल हर मुल्क में सैनिकों को उसी स्नेह और सम्मान से देखा गया (देखा जा रहा है) जिसकी ज़रा सी भी अपेक्षा वहाँ के सैनिकों के मन में थी | किन्तु यहाँ इस मुल्क में अपेक्षा के विपरीत उपेक्षा का दंश लगातार झेलते रहने के बावजूद भारतीय सैनिक फिर भी हर बार हर दफ़ा जरूरत पड़ने पर यहाँ सरहद के लिये जान की बाज़ी लगाता है | वो देखता है असहाय अवाक-सा कि कैसे कुछ मुट्ठी भर उसके भाई-बंधुओं द्वारा चलती ट्रेन में की गई बदतमीजी को उसके पूरे कुनबे पर थोप दिया जाता है...कि कैसे चंद गिने-चुने उसके साथियों के हाथों उत्तर-पूर्व राज्यों या कश्मीर के इलाकों में हुई ज्यादातियों के सामने उसके पूरे युग भर की प्रतिबद्धता को नकार दिया जाता है एक सिरे से...वो तिलमिलाता है, तड़पता है, फिर भी ड्यूटी दिये जाता है | सरहद पर चीड़ और देवदार के पेड़ों से उसे ज्यादा स्नेह मिलता है, बनिस्पत अपने मुल्क के बाशिंदों से | सामने वाले दुश्मन की छुद्रता, गुपचुप वार करने वाले आतंकवादियों की धृष्ठता, मौसम की हिंसक मार, मुश्किल ज़मीनी बनावट का बर्ताव जैसे हर रोज़ के छोटे-छोटे युद्धों से लड़ता वो अपने मुल्क के इस सौतेले व्यवहार से भी एक युद्ध लड़ता है...युद्ध बस सरहद पर नहीं लड़े जाते !

इधर अप्रैल का महीना तो आधा से ज़्यादा गुज़र चुका है, लेकिन ये वाला साल है कि पुराने साल की ठिठुरन को अब तलक अपने बदन पर लपेटे हुये है | बंकर से बाहर निकलने के लिए बर्फ ने जो सीढ़ियाँ तैयार कर रखी है, वो घटती मालूम ही नहीं पड़ रहीं | अभी तक उतुंग सी बेहया की तरह सर उठाये खड़ी हुयी हैं | सब कुछ जैसे गीला-गीला सा...पूरे का पूरा वजूद तक....वजूद की अनंत तलहट्टियाँ तक | प्रचंड सूर्य की प्रखर धूप के लिए बेचैन विकल मन समूचे सूर्य को ही उतार लाना चाहता है बंकर की छत पर मानो ! धूप की जलती सी रस्सी जो होती एक काश, जिस पर पूरे बदन को निचोड़ कर सूखने के लिए टांग देता कोई !

रातें उम्र से भी लंबी हैं और दिन उस लंबी उम्र का फकत एक लम्हा जैसे !

...और रात लिये रहती है याद-सी कोई याद तुम्हारीड्यूटी की तमाम बंदिशों में भी और रात भर बजता रहता है ये बगल में रखा छोटा-सा मोटोरोला का रेडियो-सेट, निकट दूर खड़े तमाम प्रहरियों से मेरे बंकर को जोड़ता हुआ...अल्फा ऑस्कर किलो ओवर” (ऑल ओके ! ओवर !!) करता हुआ | जानती हो, तुम्हारी याद दिलाता है ये कमबख़्त छोटा सा रेडियो सेट...हर बार, बार-बार...घड़ी-घड़ी ऑल ओके ओवरकी रिपोर्ट देता हुआ !

हाँ ! सच में !! तुम सा ही पतला-दुबला, तुम सा ही सलोना और भरोसेमंद भी...और जब भी बोलना होता है इसमें कुछ, लाना पड़ता है इसे होठों के बिलकुल पास...ठीक तुम-सा ही तो !

हँसोगी ना तुम जो कभी इस डायरी को पढ़ोगी ?

काश कि दूर इन बर्फीले पहाड़ों से इसी के जरिये कर पाता मैं...तुम संग भी ओके ओवर...कभी-कभार मिस यू ओवर...और थोड़ा-सा लव यू ओवरभी !

...और जो यूँ होता तो क्या तब भी ये रातें उम्र सी ही लंबी होतीं ?

हा हा...ये लम्बी ठहरी हुई पसरी-पसरी रातें और तो कुछ करें ना करें, मेरे अच्छे-भले सोल्जर को कहीं पोएट ना बना डालें ! फ़रहत एहसास का शेर याद आता है:-


मुझ तक है मेरे दुख के तसव्वुफ़ का सिलसिला
इक ज़ख़्म मैं मुरीद तो इक ज़ख़्म पीर मैं

01 July 2017

हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज ~ 1

साल 92 का अक्टूबर महीना था वो... हिमाचल की पहाड़ियाँ ठंढ से कुनमुनाने लगी थीं । उन्हीं पहाड़ियों पर बसे परवानू के ख्यात रिसौर्ट टिम्बर ट्रेल की केबल कार दो परिवारों के ग्यारह सदस्यों को लेकर बीच रस्ते में अटक गई, सवार लोगों की साँसें भी जस की तस अटकाती हुयी । एक सदस्य के नीचे घाटी में गिर जाने के बाद उस केबल कार में पसरा हुआ भय जाने कितना कम हुआ दूर से सेना के हेलिकाॅप्टर को आते देखकर, ये शोध का विषय हो सकता है ! सेना का हैलिकाॅप्टर आया रेसक्यू आॅपरेशन के लिये और साथ लेकर आया डेयर डेविल मेजर इवान क्रैस्टो को । उसके बाद की कहानी शौर्य व धीरता की मिसाल ही तो बन गई है !

हेलिकाॅप्टर के तेज़ गति से घूमते पंखों से हिलता हुआ केबल पूरे रेसक्यू
आॅपरेशन को दुश्वार कर रहा था और सर्द रात को ज़िद पड़ी थी एकदम से आने की । फैल रहे अँधेरे ने विवश कर दिया हेलिकाॅप्टर को वापस जाने के लिये । अभी तक बस पाँच लोग ही सकुशन निकाले गये थे । बचे हुये पाँच लोगों की मानसिक स्थिति की कल्पना ही की जा सकती है कि उस लटके हुये केबल कार में पूरी रात गुज़ारना और हेलिकाॅप्टर के वापस आने का सुबह तक इंतज़ार करना...स्वंय सृष्टि निर्माता भी साक्षात प्रगट होते तो उन पाँचों को ढाढस के दो बोल ना कह पाते !

किंतु मेजर ने आश्वस्ति के शब्दों को उकेरने के बजाय उन पाँचों के साथ उसी केबल कार में रात गुज़ारने का फैसला किया । मेजर का लाॅजिक बड़ा ही क्रिस्प और प्रिसाइज था कि ख़ुद दो बच्चों का पिता होकर उस केबल कार में फँसे लोगों के साथ रात गुज़ारने से बड़ा संबल और क्या हो सकता उनके लिये !

रात भारी थी । डरे लोगों की उल्टियाँ और अन्य विसर्जित अवशेषों की ख़ुश्बू केबल कार के नीेचे गिर जाने की सोच से कहीं ज़्यादा भयंकर थी । सुबह की पहली किरण जब हेलिकाॅप्टर लेकर आयी थी, ये जानना दिलचस्प होगा कि मौत के भय से आतंकित उन पाँच लोगों की ख़ुशी ज़्यादा बड़ी थी या नैसर्गिक ख़ुश्बू से मेजर को निजात पाने का सकून ज़्यादा बड़ा था । फेंकी हुई रस्सी से एक-एक कर उन पाँच लोगों को बाँध कर वापस हेलिकाॅप्टर में भेजने के बाद जब मेजर सबसे आख़िर में सवार हुआ, रात भर हनुमान चालीसा का जाप करने वाली प्रौढा ने मेजर को देर तक भींचे रखा हेलीकाॅप्टर में कि जैसे घनघोर तपस्या के बाद उनका बजरंग बली ही साकार रूप लेकर आ गया हो सेना की वर्दी में !

[ जो पढे आँखें मेरी मुझको वो दीवाना कहे / तू भी तो इनको कभी फ़ुरसत से पढ कर, ग़ौर कर ]

22 June 2017

(अ)सैनिक-व्यथा

उदासियों के बेतरतीब से मैट्रिक्स को तरतीब देती व्यथाओं का कोई पैटर्न नहीं होता...और जो हो भी, तो कौन जोहमत उठाये बुनने की ! कोई ठहराव आख़िरी कहाँ होता है ? हर ठहराव में भी एक चलना नहीं (अ)व्यक्त होता रहता है क्या हर लम्हा ?  और ये सारे सवाल भी आख़िर किससे...ठहराव से या चलते रहने से ? 

कि मेरे विराम में भी चलना निहित था
और तुम देखते रहे
बस ठहराव मेरा

कि उन क्षणों का आर्तनाद
जिन्हें तुम स्वप्न में भी
नहीं चाहोगे सुनना
और जिन्हें भोगना था मेरी नियति
भोगने की चीख़ नहीं सुनी तुमने
नियति की किलकारियाँ सुनी

कि प्रतिबद्धताओं की नई परिभाषायें
लिखने में टूटी उँगलियों से
लिखा नहीं जाता जवाब
तुम्हारे सवालों में छुपे आरोपों का

कि सच तो ये है
कोई मायने नहीं रखता
ये देखना
ये सुनना
ये सवाल उठाना...

...जब पिता की विलुप्त होती स्मृतियों में भी
नहीं रहता शेष
मेरा समर्पण या मेरा शौर्य

किंतु बचा रह जाता है
मेरी वाजिब अनुपस्थितियों का
ग़ैरवाजिब निकम्मापन

29 May 2017

तेरे ही आने वाले महफ़ूज ‘कल’ की ख़ातिर

( कथादेश के अप्रैल अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का दूसरा पन्ना )

दिन उदास है तनिक कि आज नहाना है | नहीं, हफ्ते का कोई एक दिन तय नहीं होता है...जिस रोज़ धूप मेहरबान होती है उसी रोज़ बस | उसी रोज़ ठंढ से ऐंठे पड़े इस जिस्म की सफाई के लिए बर्फ़ को उबाल कर भरी गई पानी की एक बाल्टी हाँफती हुयी पहुँचती हैं बंकर के कोने में बने एक सूराख भर जैसे स्नान-गृह में और फिर देर तक अपनी चढ़ आई साँसों का गुस्सा साबुन के झागों पर निकालती है | उस सूराख भर के स्नान-गृह में समस्त कपड़े उतारने और बदन पर पहला मग पानी उड़ेलने तक का वक्फ़ा इच्छा-शक्ति की तमाम हदबंदियों को परख लेता है | हाँफती हुयी बाल्टी का आक्रोश पहले तो साबुन को झाग निकालने से वंचित रखता है और एक बार जो गलती से झाग निकल आते हैं तो कमबख़्त कुछ इस कदर ज़िद्दी हो जाते हैं कि बदन से उतरने का नाम ही नहीं लेते...जैसे हाँफती हुई बाल्टी के उमड़ते आक्रोश पर अपना भी मुलम्मा चढ़ाने की कोशिश में हो साबुन के ये झाग | जैसे-तैसे मना-रिझा कर बदन से उन झागों के चिपचिपेपन को उतार लेने के बाद ताजा-ताजा महसूस करते हुये ठिठुरते दिन के पास अब एक बाल्टी पानी का कोटा शेष रहता है बस | उपलब्ध सामग्रियों के सुनियोजित प्रबंधन की शिक्षा इस तेरह हजार फुट ऊँचे बर्फीले पहाड़ों से बेहतर और कोई नहीं दे सकता पूरे विश्व भर में...

...उधर धुले हुये भारी-भरकम यूनिफॉर्म में लिपटा तारो-ताजा हुआ बदन बाहर खिली हुई धूप का लुत्फ़ नहीं लेने देने पर आमादा बर्फ़ उड़ाती हुई तेज हवा को सहस्त्रों शापों से नवाजता है पहले तो और फिर झक मार कर बंकर में अब तक सुलग कर लाल हो आये किरासन तेल वाली बुखारी से चिपक बैठ जाता है और सोचता है कि जनाब मोहसिन नक़वी साब के विख्यात शेर "तेज़ हवा ने मुझसे पूछा / रेत पे क्या लिखते रहते हो" में 'रेत' की जगह 'बर्फ़' भी आसानी से निभ सकता है कि ग़ज़ल की बहर के हिसाब से 'रेत' और 'बर्फ़' दोनों का वज़्न एक ही है | गुनगुना कर देखता भी गुलाम अली वाली धुन पर...हाँ, एकदम दुरुस्त..."बर्फ़ पे क्या लिखते रहते हो" | फोन की घंटी बजती है तभी...न ! न !! ये इंटरकॉम वाला फोन होता है...ऑफिस वाला, जिसका बजना खुशी नहीं कोफ़्त को आमंत्रित करता है हर बार | नियंत्रण-रेखा का निरीक्षण करने के लिए तड़के सुबह गया हुआ गश्ती-दल वापस आ गया है और सब सही-सलामत की रपट देता हुआ फोन और रपट मिलते ही चाय की तलब एकदम से सर उठाती है...जैसे नामुराद तलब को भी इसी रपट की प्रतीक्षा हो | दिन की ग्यारहवीं चाय | तेरह हजार फुट की इस ऊँचाई पर बोरोसिल के चमचमाते ग्लास में पी जा रही चाय बरिश्ता या कैफे कॉफी डे के स्वादिष्ट गर्म पेय पदार्थों से किसी भी वक़्त दो-दो हाथ कर सकती है...

...चाय की तीसरी या चौथी घूंट ही होगी कि बर्फ़ीली हवाओं ने अपना रुख बदला दक्षिण दिशा में और उपेक्षित सा पड़ा मोबाइल यक-ब-यक सबसे महत्वपूर्ण वस्तु बन जाता है...हवा का दक्षिण दिशा को मुड़ना और मोबाइल में सिग्नल आना | मोबाइल में सिग्नल आना कि व्हाट्स एप का क्रियान्वित हो उठना | व्हाट्स एप का क्रियान्वित होना कि दोस्तों और परिजनों का इस तेरह हजार फिट की बर्फ़ीली ऊँचाई पर भी इर्द-गिर्द आ जाना...
...उदास सा दिन मुस्करा उठता है | मुस्कुराते हुए दिन को याद आती है एकदम से बीती हुई रात की मुस्कान !

कार्ट-व्हील और समर-सॉल्ट करती हुयी रातों की धड़कनों का कोई पैमाना नहीं है | दुनिया की सर्वश्रेष्ट ईसीजी मशीनें भी शायद समर्पण कर दे जो कभी मापने आये इन धड़कनों को | कल रात जब बर्फ़ की सफ़ेद चादर पर उतराती हुई गहरी धुंध ने बस थोड़ी देर के लिए अपना परदा उठाया था और छलांगे लगाता हुआ हिरणप्रजाति का मझौले कद वाला वो शावक खौफ़ और आतंक की नई परिभाषा लिखता हुआ आ छुपा था एक बंकर में, रात की ये बेलगाम धड़कनें अपने सबसे विकराल रूप में उसकी सहमी आँखों में नृत्य कर रही थीं | तेंदुये का चार सदस्यों वाला छोटा सा परिवार उस शावक को अपना आहार बनाने के लिए सरहद पर लगे कँटीले बाड़ों के दुश्मन वाले पार से हौले-हौले गुर्रा रहा था और उलझन में था कि अपने आहार पर हक़ जमाने के लिये राइफल लिये खड़े सरहद-प्रहरियों से भिड़ना ठीक होगा कि नहीं | उस जानिब प्रहरियों द्वारा बर्फ़ के उलीचे गए चंद गोलों ने तत्काल ही तेंदुये परिवार की तमाम उलझनों को दरकिनार कर दिया और वापस लौट गए वो चारों नीचे दुश्मन की तरफ़ वाले जंगल में | बंकर के कोने में सिमटा हुआ शावक अपनी धौंकनी की तरह चढ़ती-उतरती साँसों पर काबू पाते हुये मानो दुनिया भर की निरीहता अपनी बड़ी-बड़ी आँखों में समेट लाया था | लेकिन उसे कहाँ ख़बर थी कि उनके रक्षक बने सरहद-प्रहरी, विगत तीन महीनों से भयानक बर्फबारी की वजह से बंद हो आए सारे रास्तों की बदौलत बस बंध-गोभी और मटर खा-खा कर तंग हो आयी अपनी जिह्वा पर नए स्वाद का लेप चढ़ाने के लिए उसे भूखी निगाहों से घूर रहे थे | छोटे से रेडियो-सेट पर प्रहरियों की तरफ़ से संदेशा भेजा गया मेरे बंकर में...अनुमति के लिए | मेरा वाला बंकर बड़ी देर तक उलझन में रहा था...रात की समर-सॉल्ट करती हुयी धड़कनें अचानक से बैक-फ्लिप करने लगी थीं | उधर दूर उस दूजे बंकर में शावक की आश्वस्त होती साँसों के साथ बर्फ़ीली चुप्पी पसरी हुई थी सरदार की अनुमति की प्रतीक्षा में  और फिर उसी पसरी हुई चुप्पी को चौंकाती सी आवाज़ उभरी रेडियो-सेट पर सरदार की सख़्त ताकीद के साथ कि उस शावक को छोड़ दिया जाये | सरदार का बड़ा ही सपाट सा तर्क था कि जो तुम्हारी शरण में ख़ुद अपनी प्राण-रक्षा के लिए आया हो, उसी का भक्षण कैसे कर सकते हो | भिन्नाये से प्रहरियों को आदेश ना मानने जैसा कोई विकल्प दिया ही नहीं था उनकी वर्दी ने | अब तक शांत और निश्चिंत हो आए शावक को पहले तो बंध-गोभी के ख़ूब सारे पत्ते खिलाये गए और फिर उसे बड़े स्नेह और लाड़ के साथ सरहद के अपनी तरफ वाले जंगल में छोड़ दिया गया |



सरहद पर की ये बर्फ़ीली रात अब मुसकुराती हुयी सुबह को आवाज़ दे रही थी गुनगुनाते हुए...

तेरे ही आने वाले महफ़ूज ‘कल’ की ख़ातिर

मैंने तो हाय अपना ये ‘आज’ दे दिया है