कैसे तो कैसे बीत जाता है ये कमबख़्त वक़्त और हम खर्च होते रहते हैं इसके इस बीतते जाने में...नामालूम से | पता भी नहीं चला और इस ब्लौग पर लिखते-लिखते छ साल हो गए | तो "पाल ले इक रोग नादां..." की छठी पर एक पुरानी ग़ज़ल :-
उफ़ ये कैसी कशिश !बेबसी ?हाँ वही !
बेख़ुदी ?बेक़सी ?हाँ वही !हाँ वही !
करवटों ने सुनी फिर कहानी कोई
रतजगों से जो लिक्खी गई ?हाँ वही !
एक सिगरेट-सी दिल में सुलगी कसक
अधजली,
अधबुझी, अधफुकी
?हाँ
वही !
सुब्ह बेचैन है, दिन परेशान है
रात की हाय ये दिल्लगी ? हाँ वही !
फोन पर बात तो होती है खूब यूँ
तिश्नगी फोन से कब बुझी ? हाँ वही !
सैकड़ों ख़्वाहिशें सर पटकती हैं रोज़
देख कर जेब की मुफ़लिसी ? हाँ वही !
ज़िंदगी जैसे हो इक अधूरी ग़ज़ल
काफ़ियों में ही उलझी हुई ? हाँ वही !
('लफ़्ज़' , 'गुफ़्तगू' और 'अभिनव प्रयास' में प्रकाशित)
उम्र के इस पायदान पर भी अंदर का बचपन किलकारियाँ मार उठता है छोटी-छोटी खुशियों पर भी। छोटी-छोटी खुशियाँ...जैसे कि दीपावली की शाम को एक स्नेहिल नर्स द्वारा चुपके से आकर कैडबरिज का फ्रूट एंड नट वाला बड़ा-सा पैकेट पकड़ा देना। छोटी-छोटी खुशियाँ...जैसे कि एक दूर-निवासी दोस्त की तरफ से खूब अच्छे से पैक किया हुआ पार्सल का मिलना, जो मेरी पसंदीदा फिल्मों की ढ़ेर सारी डीवीडी से भरा हुआ होता है। छोटी-छोटी खुशियाँ...जैसे कि भारतीय भाषा परिषद की कोलकाता से निकलने वाली मासिक पत्रिका वागर्थ के इस अक्टूबर वाले अंक में अपनी दो ग़ज़लों को छपा देखना...!!! अब वो कैडबरिज या डीवीडी तो आपलोगों के साथ शेयर नहीं कर सकता, हाँ, वागर्थ में छपी अपनी दो ग़ज़लों में से एक जरूर शेयर करूँगा। तो पेश है, मुलाहिजा फरमायें:-
ऊँड़स ली तू ने जब साड़ी में गुच्छी चाभियों वाली हुई ये जिंदगी इक चाय ताजी चुस्कियों वाली
कहाँ वो लुत्फ़ शहरों में भला डामर की सड़कों पर मजा देती है जो घाटी कोई पगडंडियों वाली
जिन्हें झुकना नहीं आया, शजर वो टूट कर बिखरे हवाओं ने झलक दिखलायी जब भी आँधियों वाली
भरे-पूरे से घर में तब से ही तन्हा हुआ हूँ मैं गुमी है पोटली जब से पुरानी चिट्ठियों वाली
बरस बीते गली छोड़े, मगर है याद वो अब भी जो इक दीवार थी कोने में नीली खिड़कियों वाली
खिली-सी धूप में भी बज उठी बरसात की रुन-झुन उड़ी जब ओढ़नी वो छोटी-छोटी घंटियों वाली
दुआओं का हमारे हाल होता है सदा ऐसा कि जैसे लापता फाइल हो कोई अर्जियों वाली
लड़ा तूफ़ान से वो खुश्क पत्ता इस तरह दिन भर हवा चलने लगी है चाल अब बैसाखियों वाली
बहुत दिन हो चुके रंगीनियों में शह्र की ’गौतम’ चलो चल कर चखें फिर धूल वो रणभूमियों वाली {त्रैमासिक पत्रिका लफ़्ज़ के दिसम्बर10-फरवरी 11 वाले अंक में भी प्रकाशित}
...ग़ज़ल यदि कहने लायक और जरा भी दाद के काबिल बनी है तो गुरूदेव के इस्लाह और डंडे से। इस बहरो-वजन पर बेशुमार गज़लें और गाने लिखे और गाये गये हैं। चंदेक जो अभी याद आ रहे हैं...चचा गालिब की "हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले" और फिर जगजीत सिंह की गायी वो प्यारी-सी ग़ज़ल तो आप सब ने सुनी ही होगी "सरकती जाये है रुख से नकाब आहिस्ता-आहिस्ता"...। इसी मीटर पर रफ़ी साब का गाया गाना याद आ रहा है जो मैं अक्सर गुनगुनाता हूँ "खुदा भी आस्मां से जब जमीं पर देखता होगा..."। इस बहर पर एक और रफ़ी साब का बहुत ही पुराना युगल गीत चलते-चलते याद आ गया। मेरे ख्याल से "भाभी" फिल्म का है और मुझे बहुत पसंद है- "छुपा कर मेरी आँखों को..."। चलिये ये गाना सुनाता हूँ आपसब को:-
इसी बहर पर अंकित सफ़र की एक बेहतरीन ग़ज़ल पढ़िये यहाँ और उनके ब्लौग पर जाकर इस नौजवां शायर की हौसलाअफ़जाई कीजिये।
नव वर्ष की आप सब को शुभकामनायें.प्रस्तुत है पिछले साल वाली पूरी गज़ल.श्रद्धेय गुरू पंकज सुबीर जी के सतत स्नेह और आदरणीय सतपाल जी के सुझावों से कहने लायक हो सकी है.२२२२-२२२२-२२२२-२२२ के मीटर पर बाँधी गयी,पेश है :-
दूर क्षितिज पर सूरज चमका,सुब्ह खड़ी है आने को धुंध हटेगी,धूप खिलेगी,साल नया है छाने को
प्रत्यंचा की टंकारों से सारी दुनिया गुंजेगी देश खड़ा अर्जुन बन कर गांडिव पे बाण चढ़ाने को
साहिल पर यूं सहमे-सहमे वक्त गंवाना क्या यारों लहरों से टकराना होगा पार समन्दर जाने को
हुस्नो-इश्क पुरानी बातें,कैसे इनसे शेर सजे आज गज़ल तो तेवर लायी सोती रूह जगाने को
पेड़ों की फुनगी पर आकर बैठ गयी जो धूप जरा आँगन में ठिठकी सर्दी भी आये तो गरमाने को
टेढ़ी भौंहों से तो कोई बात नहीं बनने वाली मुट्ठी कब तक भींचेंगे हम,हाथ मिले याराने को
साल गुजरता सिखलाता है,भूल पुरानी बातें अब साज नया हो,गीत नया हो,छेड़ नये अफ़साने को
अपने हाथों की रेखायें कर ले तू अपने वश में तेरी रूठी किस्मत ’गौतम’,आये कौन मनाने को
(त्रैमासिक पत्रिका "लफ़्ज़" के सितम्बर-नवंबर 09 अंक में प्रकाशित)