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22 September 2014

रगों में गश्त कुछ दिन से कोई आठों पहर दे है...

क्या होता है कि अचानक से...एकदम अचानक से ही लहू की जगह कोई और दौड़ने लगता है रगों में...सरपट, अनवरत, बेकायदा, बेलौस...रातों की नक्काशियाँ एकदम से चटख रंग भर जाती हैं सुबह के कैनवास पर और कोई पुरानी ग़ज़ल फिर से सज कर मचल उठती है सुनाये जाने को ... 

वो जब अपनी ख़बर दे है
जहाँ भर का असर दे है
 
रगों में गश्त कुछ दिन से
कोई आठों पहर दे है

चुराकर कौन सूरज से
यूं चंदा को नज़र दे है

ये रातों की है नक्काशी
जो सुबहों में कलर दे है

कहाँ है ज़ख्म औ' हाकिम
भला मरहम किधर दे है

ज़रा-सा मुस्कुरा कर वो
नयी मुझको उमर दे है

तुम्हारे हुस्न का रुतबा

मुहब्बत को हुनर दे है
{मासिक "आजकल" के जुलाई 2013 अंक में प्रकाशित}

15 December 2008

जरा-सा मुस्कुरा कर जब मेरी बेटी मुझे देखे...

अभी उसी दिन तोरूपम जी ने अपने ब्लौग पर एक बड़ी ही प्यारी गज़लनुमा कविता सुनायी थी अपनी नन्हीं बेटी की बाल-कारगुजारियों पर.पढ़ कर एक अपना शेर याद आया.सुनाना चाहता हूँ.लेकिन साथ में शेष गज़ल भी सुननी होगी.

बहर है:- बहरे हज़ज मुसमन सालिम
वजन है:- १२२२-१२२२-१२२२-१२२२

उठेंगी चिलमनें अब तो यहाँ तू देख किस-किस की
चलो खोलो किवाड़ें,दब न जाये कोई भी सिसकी

जलूँ जब मैं, जलाऊँ संग अपने लौ मशालों की
जलाये दीप जैसे जब जले इक तीली माचिस की

सितारे उसके भी,हाँ,गर्दिशों में रेंगते देखा
कभी थी सुर्खियों में हर अदा की बात ही जिस की

उसी के नाम का दावा यहाँ हाकिम की गद्‍दी पर
फ़सादें जो सदा बोता रहा है, यार चहुँ दिस की

हवाओं के परों पर उड़ने की यूँ तो तमन्ना थी
पड़ा जब सामने तूफां,जमीं पैरों तले खिसकी

अगर जाना ही है तुमको,चले जाओ,मगर सुन लो
तुम्हीं से है दीये की रौशनी औ’ हुस्न मजलिस की

...और अंत में मेरी बेटी तनया{मेरी इकलौती मुकम्मल गज़ल} के लिये

जरा-सा मुस्कुरा कर जब मेरी बेटी मुझे देखे
थकन सारी मैं भूलूँ यक-ब-यक दिन भर के आफिस की


{मासिक पत्रिका "आजकल" के जून 2010 वाले अंक में प्रकाशित}