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26 March 2018

अजब हैंग-ओवर है सूरज पे आज...


गुज़र जाएगी शाम तकरार में
चलो ! चल के बैठो भी अब कार में

अरे ! फ़ब रही है ये साड़ी बहुत
खफ़ा आईने पर हो बेकार में

तुम्हें देखकर चाँद छुप क्या गया
फ़साना बनेगा कल अख़बार में

न परदा ही सरका, न खिड़की खुली
ठनी थी गली और दीवार में

अजब हैंग-ओवर है सूरज पे आज
ये बैठा था कल चाँदनी-बार में

दिनों बाद मिस-कॉल तेरा मिला
तो भीगा हूँ सावन की बौछार में

मिले चंद फोटो कपिल देव के
कि बचपन निकल आया सेलार में

खिली धूप में ज़ुल्फ़ खोले है तू
कि ज्यूँ मिक्स 'तोड़ी' हो 'मल्हार' में

भला-सा था 'गौतम', था शायर ज़हीन
कहे अंट-शंट अब वो अश'आर में


[ पाल ले इक रोग नादाँ के पन्नों से ]

31 July 2014

एक सिगरेट-सी दिल में सुलगी कसक और ब्लौगिंग के छ साल

कैसे तो कैसे बीत जाता है ये कमबख़्त वक़्त और हम खर्च होते रहते हैं इसके इस बीतते जाने में...नामालूम से | पता भी नहीं चला और इस ब्लौग पर लिखते-लिखते छ साल हो गए | तो "पाल ले इक रोग नादां..." की छठी पर एक पुरानी ग़ज़ल :- 

उफ़ ये कैसी कशिश ! बेबसी ? हाँ वही !
बेख़ुदी ? बेक़सी ? हाँ वही ! हाँ वही !

करवटों ने सुनी फिर कहानी कोई
रतजगों से जो लिक्खी गई ? हाँ वही !

एक सिगरेट-सी दिल में सुलगी कसक
अधजली, अधबुझी, अधफुकी ? हाँ वही !

सुब्ह बेचैन है, दिन परेशान है
रात की हाय ये दिल्लगी ? हाँ वही !

फोन पर बात तो होती है खूब यूँ
तिश्नगी फोन से कब बुझी ? हाँ वही !

सैकड़ों ख़्वाहिशें सर पटकती हैं रोज़
देख कर जेब की मुफ़लिसी ? हाँ वही !

ज़िंदगी जैसे हो इक अधूरी ग़ज़ल
काफ़ियों में ही उलझी हुई ? हाँ वही !
('लफ़्ज़' , 'गुफ़्तगू' और 'अभिनव प्रयास' में प्रकाशित)


25 October 2010

जरा सी नींद क्या है चीज पूछो इक सिपाही से

व्यस्तता अपने चरम पर है। कुछ-कुछ ऐसा कि जैसे बोर्ड परिक्षाओं वाले दिन वापस आ गये हों। दिसम्बर मध्य तक यही स्थिति कायम रहने वाली है मेरे संग। जितना कश्मीर को मिस कर रहा हूँ, उतना ही आपसब को भी। भला हो डा० अनुराग की इस अद्‍भुत चर्चा का, जिसे पढ़ने के लिये तनिक समय चुरा कर निकाला तो ख्याल आया कि लगे हाथों एक पोस्ट भी ठेल दूँ। एक पुरानी ग़ज़ल...लगभग दो साल पहले की लिखी हुई, किंतु ब्लौग के लिये नयी। सुनिये:-

उठी इक हूक जो इन मौसमों की आवाजाही से
बना जाये है इक तस्वीर यादों की सियाही से


कि होती जीत सच की बात ये अब तो पुरानी है
दिखे है रोज सर इसका कटा झूठी गवाही से

नहीं दरकार है मुझको किनारों की मिहरबानी
बुझाता प्यास हूँ दरिया की मैं अपने सुराही से


किया है जुगनुओं ने काम कुछ आसान यूँ मेरा
बुनूँ मैं चाँद का पल्ला सितारों की उगाही से

जिबह होता है इक हिस्सा उमर का रोज ही मेरा
सुबह जब मुस्कुराता है ये सूरज बेगुनाही से

अजब आलम हुआ जब मौत आई देखने मुझको
दिखा तब देखना उनका झरोखे राजशाही से


घड़ी तुमको सुलाती है घड़ी के साथ जगते हो
जरा सी नींद क्या है चीज पूछो इक सिपाही से
{त्रैमासिक अभिनव प्रयास के जुलाई-सितम्बर,2010 अंक में प्रकाशित}



...फिलहाल इतना ही। जल्द ही लौटूँगा आपसब के ब्लौग पर। कुछ बंधुगण मेरे मोबाइल पर मुझसे संपर्क करने की कोशिश कर रहे होंगे, तो दिसम्बर मध्य तक उस नंबर पर उपलब्ध नहीं हूँ मैं। उस नंबर-विशेष की आवश्यकता कुछ अपरिहार्य कारणों से उधर मेरी कर्मभूमि में ज्यादा थी। आपसब को दीपावली की अग्रीम शुभकामनायें...!!!

17 August 2009

शब्दों की दुनिया सजती है अलबेले फनकारों से...

उधर आपलोगों की तरफ, सुना है, "कमीने" ने खूब धूम मचा रखी है? सच है क्या? ...तो मुझे भी ख्याल आया कि अपनी गुल्लक तोड़ूँ, कोई गुडलक निकालूँ और ढ़ेनटरेनssss करके अपनी एक फड़कती हुई ग़ज़ल ठेलूँ !!!...तो पेश है अभी-अभी अशोक अंजुम द्वारा संपादित अभिनव प्रयास के जुलाई-सितंबर वाले अंक में छपी मेरी एक ग़ज़ल जो श्रद्धेय मुफ़लिस जी की नवाज़िश के बगैर कहने लायक बन नहीं पाती:-


पूछे तो कोई जाकर ये कुनबों के सरदारों से
हासिल क्या होता है आखिर जलसों से या नारों से

रोजाना ही खून-खराबा पढ़ कर ऐसा हाल हुआ
सहमी रहती मेरी बस्ती सुबहों के अखबारों से

पैर बचाये चलते हो जिस गीली मिट्टी से साहिब
कितनी खुश्बू होती है इसमें पूछो कुम्हारों से

हर पूनम की रात यही सोचे है बेचारा चंदा
सागर कब छूयेगा उसको अपने उन्नत ज्वारों से

जब परबत के ऊपर बादल-पुरवाई में होड़ लगी
मौसम की इक बारिश ने फिर जोंती झील फुहारों से

उपमायें भी हटकर हों, कहने का हो अंदाज नया
शब्दों की दुनिया सजती है अलबेले फनकारों से


ऊधो से क्या लेना ’गौतम’ माधो को क्या देना है
अपनी डफली, सुर अपना, सीखो जग के व्यवहारों से


....इस बहरो-वजन पर शायद सबसे ज्यादा ग़ज़ल कही गयी है। दो ग़ज़लें इस मीटर पर जो अभी फिलहाल ध्यान में आ रही हैं उनमे से एक तो मेरे प्रिय शायर क़तिल शिफ़ाई साब की लिखी चित्रा सिंह की गायी मेरी पसंदीदा ग़ज़ल अँगड़ाई पे अँगड़ाई लेती है रात जुदाई की है और...और...और दूजी जगजीत सिंह की गायी वो दिलकश ग़ज़ल तो आप सब ने सुनी ही होगी देर लगी आने में तुमको, शुक्र है फिर भी आये तो

इति ! अगली पेशकश के साथ जल्द हाजिर होता हूँ...

11 May 2009

तू जब से अल्लादिन हुआ, मैं इक चरागे- जिन हुआ...

...चीड़-देवदार-चिनारों से आच्छादित धरती के इस कथित जन्नत के एक कोने से आप सब के साथ इस ब्लौग-जगत से जुड़े रहने की कोशिश अपने-आप में बड़ा ही कठिन श्रम है। नेट की गति का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि मेल में एक साधारण-सी आडियो फाइल को अटैच करने में एक घंटे से ऊपर का समय लगता है और वो भी कोई जरूरी नहीं है कि प्रयास सफल ही हो। किंतु यहाँ इस बात की शिकायत करना तो ज्यादती होगी, क्योंकि मुझे याद है कि पाँच-छः बरस पहले यहाँ की अपनी पहली पोस्टिंग के दौरान घर वालों को फोन तक करने के लिये कितनी जद्दोजह्द उठानी पड़ती थी। अब तो मोबाइल की विलासिता और इंटरनेट की सुलभता उपलब्ध है। शिकायत तो कर ही नहीं सकता।

...अपने पिछले पोस्ट में मेरी एक तुच्छ-सी शंका के निबारन हेतु बढ़े उन समस्त मददों का शुक्रगुजार हूँ। ये अपना हिंदी ब्लौग-जगत सचमुच में एक विस्तृत परिवार बनता जा रहा है। विशेष रूप से अनुग्रहित हूँ हिंदी ब्लौगिंग के पुरोधा रविरतलामी साब का, श्रद्धेय गुरू पंकज सुबीर जी का, सुश्री अल्पना जी का, शैलेश जी का और अपनी अनुजा कंचन का।

...इधर बहुत दिनों से कोई ग़ज़ल नहीं हुई थी पोस्ट पर। गुरूजी का हुक्म हुआ, तो उन्हीं के आशिर्वाद से सँवरी एक छोटी बहर की ग़ज़ल प्रस्तुत है। बहरे-रज़ज में 2212-2212 के वजन पर।

तू जब से अल्लादिन हुआ
मैं इक चरागे- जिन हुआ

भूलूँ तुझे? ऐसा तो कुछ
होना न था,लेकिन हुआ

पढ़-लिख हुये बेटे बड़े
हिस्से में घर गिन-गिन हुआ

काँटों से बचना फूल की
चाहत में कब मुमकिन हुआ

झीलें बनीं सड़कें सभी
बारिश का जब भी दिन हुआ

रूठा जो तू फिर तो ये घर
मानो झरोखे बिन हुआ

आया है वो कुछ इस तरह
महफ़िल का ढ़ब कमसिन हुआ


(अशोक अंजुम द्वारा संपादित त्रैमासिक पत्रिका "अभिनव प्रयास" के जुलाई-सितंबर 09 अंक में प्रकाशित)