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10 March 2010

यक़ीं कीजे, ये मैं ही हूँ, जरा फोटो पुरानी है

छुट्टियाँ कब बीत जाती हैं, पता भी नहीं चलता। ड्युटी पर आये हुये ये चौथा दिन और फिर से वही अहसास कि जैसे यहीं हूँ सदियों से। सतरह सालों बाद इस बार उपस्थित हो पाया था होली पर अपने गाँव में और क्या खूब होली जमी। अबके इधर कश्मीर में खूब-खूब बर्फ गिरी है...ग्लोबल वार्मिंग की तमाम धमकियों को धता बताते हुये। एक तरफ झेलम की हँसी छुपाये नहीं छुप रही तो दूसरी तरफ चिनारों के अट्टहास गुंजायमान हैं वादी के कोने-कोने में। यूं चंद सिरफिरों की उन्मादी हरकतें खलल डालती हैं बीच-बीच में वादी के इस हर्षोल्लास में, किंतु मुस्तैद हरी वर्दियाँ ज्यादा देर टिकने नहीं देती हैं इस खलल को।

...और इन समस्त व्यस्तताओं के मध्य मुझसे अपने प्रिय ब्लौगरों के कई पोस्ट छूट गये हैं। पकड़ता हूँ धीरे-धीरे सब "छूट गयों" को। फिलहाल आज की बात कि दिन खास है आज का। दिन बहुत खास है कि मेरे प्रिय शायर का जन्म-दिन है ये। कुमार विनोद का जन्म-दिन । वैसे पता तो ये भी चला है कि आज ही के दिन मैं भी पैदा हुआ था अहले सुबह करीब दस हजार साल पहले। लेकिन हम "पाल ले इक रोग नादां के..." के इस पन्ने पर मनायेंगे कुमार विनोद की सालगिरह उन्हीं की एक बेहतरीन ग़ज़ल गुनगुनाकर। आइये गुनगुनाते हैं उनकी लाजवाब बिम्बों और अनूठे अंदाज वाले शेरों से सजी इस ग़ज़ल को:-

कभी लिखता नहीं दरिया, फ़क़त कहता ज़बानी है
कि दूजा नाम जीवन का रवानी है, रवानी है

बड़ी हैरत में डूबी आजकल बच्चों की नानी है
कहानी की किताबों में न राजा है, न रानी है

कहीं जब आस्माँ से रात चुपके से उतर आये
परिंदा घर को चल देता, समझ लेता निशानी है

कहाँ जायें, किधर जायें, समझ में कुछ नहीं आता
कि ऐसे मोड़ पर लाती हमें क्यों जिंदगानी है

बहुत सुंदर से इस एक्वेरियम को गौर से देखो
जो इसमें कैद है मछली,क्या वो भी जल की रानी है

घनेरे बाल, मूँछें और चेहरे पर चमक थोड़ी
यक़ीं कीजे, ये मैं ही हूँ, जरा फोटो पुरानी है


...अपने गाँव से पटना की ट्रेन यात्रा के दौरान "शुक्रवार" पत्रिका के नये अंक को पलट कर देख रहा था तो नजर पड़ी कुमार विनोद की ग़ज़ल-संग्रह "बेरंग हैं सब तितलियाँ" {जिसकी चर्चा मैं कुछ दिनों पहले
यहाँ कर चुका था} की समीक्षा पर। अच्छा लगा देखकर...बहुत अच्छा लगा देखकर कि ग़ज़लों की बात हो रही है अच्छी पत्र-पत्रिकाओं में। कुमार विनोद जैसे शायर हों अपने आस-पास तो ग़ज़ल का भविष्य वैसे भी सुरक्षित दिखता है।

25 January 2010

कुमार विनोद : ग़ज़ल-गाँव का नया दुष्यंत

हिंदी-साहित्य की समस्त विधाओं में चाहे वो कहानी हो, कविता हो, गीत-नवगीत हो, उपन्यास हो, लेख, यात्रा-संस्मरण या आलोचना आदि हो...इन समस्त विधाओं में ग़ज़ल हमेशा से हाशिये पर ही खड़ी नजर आती है। आप कोई भी साहित्यिक पत्रिका उठा कर देख लीजिये...हफ़्ते, पखवारे, महीने या वर्ष के अंत में होने वाले किसी भी साहित्यिक लेखे-जोखे में आप कभी भी किसी ग़ज़लकार, शायर या ग़ज़ल-संग्रह का जिक्र नहीं पायेंगे। कभी भी नहीं। हर पत्रिका में जब भी उसके अगले महीने निकलने वाले अंक का जिक्र होता है, आप हमेशा पायेंगे "फलां-फलां की कहानियाँ और अमुक-अमुक की कवितायें अगले अंक का विशेष आकर्षण" किंतु आप कभी नहीं लिखा पायेंगे फलां-फलां या अमुक-अमुक की ग़ज़लें, चाहे दो से चार ग़ज़लें नियमित रुप से छपती हों उस पत्रिका में हर महीने। इस सौतेले व्यवहार के लिये जितना दोष इन कथित साहित्य-प्लेटफार्मों{?} का बनता है, उससे कहीं अधिक दोष एकदम से उमड़ आयी हम जैसे शायरों की उस पूरी फौज का भी बनता है जो ग़ज़ल के नाम पर बगैर उसका व्याकरण जाने शेर पे शेर जोड़े जाते हैं। किंतु उसी हाशिये पर- ग़ज़लकारों की हम जैसी अधकचरी जमात से परे- चंद राजेश रेड्डियों, आलोक श्रीवास्तवों, अशोक अंजुमों, पंकज सुबीरों, विनय मिश्रों, द्विजेन्द्र द्विजों, सर्वत जमालों, कुमार विनोदों, आदि जैसे नाम जब अपनी कलम लेकर आते हैं तो फिर हाशिये को धता बताते हुये ग़ज़ल के लिये पूरे पन्ने को भी कम पड़ने का अहसास दिला जाते हैं...और इसी अहसास की बदौलत ग़ज़ल अब तलक कविता की भाँति "अ-ग़ज़ल" या "बहर-मुक्त(छंदमुक्त की तर्ज पर)ग़ज़ल" नहीं हुई है...वो सिर्फ और सिर्फ ग़ज़ल ही है।

हिंदी-साहित्य में जब भी ग़ज़ल की बात उठेगी तो दुष्यंत कुमार का नाम आना स्वभाविक है। सच पूछिये तो ट्रेड-मार्क बन गये हैं दुष्यंत। ...तो कोई भी नया शायर जब अपनी ग़ज़लों से पहचान बनाने लगता है, खासकर अपने अशआरों के तेवर से तो लोग तुरत उसकी तुलना दुष्यंत से करने लगते हैं। अभी कुछ दिनों पहले किसी पत्रिका में छपी एक ग़ज़ल पढ़ रहा था मैं...पत्रिका शायद "आधारशिला" थी या "वर्तमान साहित्य", याद नहीं आ रहा। एक ग़ज़ल के शेर ने एकदम से ध्यान खींचा। शेर कुछ यूं था:-

देखकर बाजार की कातिल अदा
ख्वाहिशों को सर उठाना आ गया


...शेर की तिलमिलाहट दिल में घर कर गयी और साथ ही शायर के नाम ने। जगह-जगह शेर को quote करने लगा मैं। कुछ शायर मित्रों को भी जब सुनाया तो एक-दो लोगों का उद्‍गार निकला कि "अरे, ये तो कुमार विनोद का शेर है"...बिंगो! हमने सोचा कि जनाब के हमारी तरह और भी चाहने वाले हैं।...तो साहित्यिक पत्रिकाओं पे नजर फेरने वालों मित्रों से और उन सब पाठक बंधुओं से जो ग़ज़ल को भी साहित्य की एक सशक्त विधा मानते हैं, कुमार विनोद का नाम अब अपरिचित नहीं रहा होगा। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफेसर, कुमार विनोद साब हैरान करते हैं अपनी ग़ज़लों से। एक गणितज्ञ जब शायरी करेगा तो यकीनन सब कुछ नपा-तुला होगा। वो इंगलिश का शब्द है ना precise...बिल्कुल वही। उनके चुने काफ़िये लाजवाब करते हैं तो तनिक हटकर के लिये गये रदीफ़ अचंभित। हर शेर पढकर लगे कि उफ़्फ़्फ़! ये मैंने क्यों नहीं लिखा!! इन सब अनुभवों से गुजरने के लिये आपसब को उनकी सद्यःप्रकाशित ग़ज़ल-संग्रह "बेरंग हैं सब तितलियाँ" से रुबरु होना पड़ेगा। फिलहाल उनकी इसी ग़ज़ल-संग्रह से मैं आपसब को उनकी एक बेहतरीन ग़ज़ल पढ़वाता हूँ:-

लाख चलिये सर बचाकर, फायदा कुछ भी नहीं
हादसों के इस शहर का, क्या पता, कुछ भी नहीं

उस किराने की दुकाँ वाले को सहमा देखकर
मौल* मन ही मन हँसा, लेकिन कहा कुछ भी नहीं(*shopping mall)

काम पर जाते हुये मासूम बचपन की व्यथा
आँख में रोटी का सपना, और क्या कुछ भी नहीं

एक अन्जाना-सा डर, उम्मीद की हल्की किरण
कुल मिलाकर जिंदगी से क्या मिला, कुछ भी नहीं

एक खुद्दारी लिये आती है सौ-सौ मुश्किलें
रोग ये लग जाये तो इसकी दवा कुछ भी नहीं

वक्त से पहले ही बूढ़ा हो गया हूँ दोस्तों
तेजरफ़्तारी से अपना वास्ता कुछ भी नहीं

...है ना एक अजीब-सी तिलमिलाहट लिये ये अशआर सारे-के-सारे? उनकी कुछ रचनायें आप यहाँ और यहाँ क्लीक करके भी पढ़ सकते हैं। समस्त ग़ज़लों का लुत्फ़ उठाने के लिये और उनकी किताब के लिये कुमार साब को फोन घुमाइये। नंबर है- 09416137196| गज़ब के सौम्य-स्वभाव वाले और मृदुभाषी कुमार विनोद साब से बात करने का भी एक अलग ही मजा है। मैं जब-तब समय निकाल कर अपने ब्लौग पर आपसब को उनकी ग़ज़लों से मिलवाता रहूँगा। फिलहाल विदा दें और कुमार साब की ग़ज़ल पसंद आयी हो तो उन्हें फोन करके बताइये। अरे हाँ, मैं कुमार विनोद जैसे शेर कहने की कूबत भले ही न रखूँ, लेकिन जन्म-दिन उनके साथ ही साझा करता हूँ। सुन रहे हैं, विनोद सर...??? :-)

पुनश्चः
आधार प्रकाशन से प्रकाशित ये ग़ज़ल-संग्रह महज सौ रुपये में उपलब्ध है और किताब मँगवाने के लिये 9417267004 पर संपर्क किया जा सकता है।