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08 February 2021

मल्लिका - मनीषा कुलश्रेष्ठ

 पौ फटते ही कुहासे को चीर कर आती हुई ठाकुरद्वारे की घंटी की मद्धम सी आवाज़ जैसे गलियों से गुज़रती हुई घर की ड्योढ़ी तक पहुँचती है और अपनी पवित्र गूंज से सुबह होने का ऐलान करती है हर रोज़, ‘मल्लिका’ कुछ यूँ ही खुलती है पन्ना-दर-पन्ना मेरे पाठक-मन की तलहटी में…और एक बार खुलती है तो कुछ इस क़दर अपने बाहुपाश में जकड़ लेती है कि विवश सा मेरा पाठक ‘ज्यू’(भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) को पदस्थापित कर ख़ुद को वहाँ देखने की ललक से भर उठता है| जाने ये लेखिका की भाषा का जादू है या अपनी समग्रता में बनारस और बंगाल के स्वाद को एक साथ समेटते हुए इस उपन्यास द्वारा घोला गया अद्भुत कॉकटेल या…या फिर स्वयं मल्लिका के किरदार का सम्मोहन ही, सालों बाद ऐसा हुआ है कि किसी किताब को पढ़ने के पश्चात इतने अरसे तक इसके जादू-स्वाद-सम्मोहन में कुनमुनाता हुआ मेरा पाठक इसके पन्नों में ही सिमटा रहना चाहता है|

कौन थी मल्लिका? हिन्दी साहित्य के सिरमौर, एक विराट व्यक्तित्व की प्रेयसी भर? या उस से हटकर कुछ और भी? उपन्यास के प्राक्कथन में ही लेखिका की दुविधा स्पष्ट होती है कि जिस किरदार के जन्म, मृत्य, आरम्भ और अंत का ही कुछ अता-पता नहीं था और जिसके बारे में उठती तमाम जिज्ञासा यत्र-तत्र-सर्वत्र उस विराट व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द घूमते जवाबों तक ही सिमट कर रह जाती है…ऐसे में एक बस गल्प का ही सहारा शेष बचता था लेखिका के पास इस गुमनाम से किरदार को पन्नों पर साकार करने के लिए| कितनी मुश्किल हुई होगी लेखिका को भारतेन्दु के बरगदी फैलाव की छाँव से बचाकर भी मल्लिका की नन्हीं पौध को इतनी ख़ूबसूरती से सींचते हुए और उसे रोप कर पुष्पित करते हुए…!  उपन्यास के लगभग एक सौ साठ पन्नों में वैसे कई बार आप पायेंगे लेखिका को ख़ुद भी भारतेन्दु के मोहपाश में बंधते हुए, लेकिन ये कहीं-न-कहीं से मल्लिका के किरदार को जैसे आत्मसात करना ही है…और लेखिका का अपने किरदार से ये आत्मिक मिलाप हमें रूबरू करवाता है प्राचीन बंगाल की समृद्ध साहित्यिक परम्परा से, तत्कालीन बनारस की सुगंध और दुर्गन्ध से, बाल-विवाह की टीस मारती चुभन से, वैधव्य का असह्य बोझ उठाये फिरती स्त्रियों की व्यथा से, साहित्य रचना की पेचीदा बुनाइयों से, कविता से, छंद से और प्रेम के अविश्वसनीय विस्तार से| उपन्यास का फ़लक इतना विस्तृत है कि बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय और ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जैसे ‘लिजेंड’ भी ‘गेस्ट-अपियरेंस’ में विचरते दृष्टिगोचर होते हैं|

शब्द-शब्द और एक-एक पन्ने से उभरते हुए अपने कसे हुए शिल्प और अप्रतिम भाषाई सुन्दरता पर इतराती हुई यह किताब, चार उपन्यास(शिगाफ़, पंचकन्या, शालभंजिका, स्वप्नपाश) और सात कहानी-संग्रहों(बौनी होती परछाई, कुछ भी तो रूमानी नहीं, कठपुतलियाँ, केयर ऑफ़ स्वातघाटी, गंधर्व गाथा, अनामा, किरदार) के बाद एकदम से मनीषा कुलश्रेष्ठ के पहले से स्थापित बुलंद लेखकीय हस्ताक्षर को ना सिर्फ रेखांकित(अंडरलाइन) करती है…बल्कि उसे और-और बोल्ड व ‘इनवर्टेड कॉमा’ से सुसज्जित करती है|

किताब राजपाल एंड सन्स से आयी है और दो सौ पैतीस रुपये की क़ीमत पर ख़रीद कर पढ़े जाने की ज़िद करती है| ऑनलाइन ख़रीदने के लिए अमेजन के इस लिंक का इस्तेमाल किया जा सकता है

…इन सबसे परे, मनीषा कुलश्रेष्ठ की मुहब्बत में हम जैसे बौराए पाठक उनके हर लिक्खे को चौन्धियाए से अपनी आँखों में समेटे उनके और-और लिक्खे की प्रतीक्षा में हैं कि कोई और शाहकार उनकी तिलस्मी लेखनी से उत्पन्न हो और कमबख्त़ ‘मल्लिका’ के सम्मोहन से हम उबर पायें|




13 October 2020

मैंने अपनी माँ को जन्म दिया है

"प्रतीक्षा के बाद बची हुई असीमित संभावना"...यही! बिलकुल यही सात शब्द, बस! अगर शब्दों का अकाल पड़ा हो मेरे पास और बस एक पंक्ति में "मैंने अपनी माँ को जन्म दिया है" के पन्नों में संकलित कविताओं को समेटना हो तो बस ये सात शब्द लिख कर चुप हो जाना चाहूँगा कि रश्मि भारद्वाज की कवितायें प्रतीक्षा-के-बाद-बची-हुई-असीमित-संभावनाओं की कवितायें हैं। कवि के ही मिसरे को उधार लेकर कवि की कविताओं को परिभाषित करना कितना उचित है, बहस का विषय हो सकता है बेशक...लेकिन बहसें शुद्धतावादियों और आलोचकों का शग्ल ठहरीं। मैं विशुद्ध रूप से पाठक हूँ और दशक भर से हिंदी साहित्य की लगभग हर पत्र-पत्रिकाओं और ज्ञानपीठ से आये पहले कविता-संग्रह "एक अतिरिक्त अ" में देखते-पढ़ते-गुनते, रश्मि भारद्वाज की कविताओं का आशिक़। 


एक ग़ज़ब का 'पोयेटिक इज़' और एक अजब सा 'रिदमिक सॉफ्टनेस'...रश्मि की कविताओं में मिसरा दर मिसरा तारी रहता है। कहीं भी मह्ज़ बात कहने के लिये कहन का बनावटीपन ओढ़ते नहीं नज़र आती हैं वो। सहजता ऐसी कि पढ़ते हुए पाठक मन अनायास ही कविता के पार्श्व तक पहुँच जाता है बिना किसी अतिरिक्त मेहनत के... सरे-आईना-मेरा-अक्स-है-पसे-आईना-कोई-और-है की दुविधा से एकदम परे। 

रश्मि भारद्वाज की कविताई बड़ी बेबाक़ी से यह स्वीकार करती है कि कठोर होने के बाद भी वो निष्ठुर कभी न हो सकी। समस्त घृणाओं के मध्य अक्षुण्ण रह गये क्षमा भाव और छल-प्रपंचों के बीच भी बचे रह गये भरोसे ने उन्हें कम दुनियावी ज़रूर बनाये रखा हो, लेकिन कविता पर कोई आँच नहीं आने दिया। कविता का यही बचा रह जाना रश्मि को समकालीन हिंदी साहित्य का एक ना-नज़रअंदाज़ किये जा सकने वाला हस्ताक्षर बनाता है। 

रश्मि की कविताओं में जहाँ दो शहरों के पहचान की कश्मकश वाली पीड़ा का बखान अपनी पीढ़ी को नया आख्यान सौंपता है, वहीं अपने पुरखों की अनसुनी प्रार्थनाओं की शिनाख़्त कविताई विरासत को भी नया स्वर देती है। घर की दरकती दीवारों को देखकर काँपती हुई हमारी 'लोकल' कवि पेपर-टाउन का ज़िक्र करते ही एकदम से 'ग्लोबल' हो जाती हैं। रश्मि भारद्वाज का यह 'रीच' उन्हें हिंदी कविता का महज एक और 'स्त्री-स्वर' नहीं रहने देता(जैसा कि हाल-फिलहाल में किसी की टिप्पणी ऐसा कुछ कहने की कोशिश कर रही थी रश्मि की कविताओं के संदर्भ में), बल्कि उनकी समकालीनता को एक अतिरिक्त विस्तार देता है।

इस किताब की कितनी ही कविताओं का बार-बार पाठ किया है कि उन सबका ज़िक्र करना जैसे उन कविताओं को थपकियाँ देने जैसा है कि इस बारम्बार पाठ से थक तो नहीं गयीं ये...अब चाहे वो "एक स्त्री का आत्म संवाद" हो या फिर "पक्षपाती है ईश्वर" हो या...या फिर "वयस में छोटा प्रेयस हो" और या फिर "पति की प्रेमिका के नाम"। जहाँ केदारनाथ सिंह जी की स्मृति में कही गयी कविता तमाम स्मृति-शेष कविताओं की शृंखला में एक युवा कवि का अपने वरिष्ठ को दी गयी कविताई-श्रद्धांजलि का जैसे 'एपीटमी' सा कुछ है...वहीं अनामिका जी पर की नन्हीं सी कविता समकालीन अग्रजा की ओर उलीचा गया एक अद्भुत 'एक्लेम'।

किताब की समस्त कविताओं का ज़िक्र करने बैठूँ(जो कि मेरा कविताशिक़ मन बेतरह करना चाहता है) तो बौराये वक़्त के बेतहाशा लम्हे मुझ पर बेरहमी से टूट पड़ेंगे। आख़िर में बस एक पसंदीदा कविता की चंद पंक्तियाँ उद्धृत करना चाहता हूँ कि जिनसे जितनी बार गुज़रता हूँ, उतनी बार हाँट करती हैं ये आत्मविश्लेषण करने को विवश करती हुईं...

"एक पुरुष लिखता है सुख
वहाँ संसार भर की उम्मीद समायी होती है
एक स्त्री ने लिखा सुख
यह उसका निजी प्रलाप था

एक पुरुष ने लिखा प्रेम
रची गयी एक नयी परिभाषा
एक स्त्री ने लिखा प्रेम
लोग उसके शयनकक्ष का भूगोल तलाशने लगे

एक पुरुष ने लिखी स्त्रियाँ
ये सब उसके लिये प्रेरणाएँ थीं
एक स्त्री ने लिखा पुरुष
वह सीढ़ियाँ बनाती थी"




[ किताब सेतु प्रकाशन से आयी है और ख़ूबसूरत बाइंडिंग व सज्जा में बस एक सौ तीस रुपये में उपलब्ध है, जिसे अमेजन के इस लिंक से खरीदा जा सकता है... ]

18 December 2018

हाशिये का राग

विगत डेढ़-दो महीने से लगातार मुखड़े से लेकर आख़िरी अंतरे तक “हाशिये का राग” के साथ मैं संगत मिला रहा हूँ | सुर-ताल की ज्यादा समझ नहीं मुझे, लेकिन हँसी की थपकियों से लेकर गहरी-गहरी सोच वाली गुनगुनाहट के साथ सुशील सिद्धार्थ के इस छेड़े हुए राग के साथ आलाप लेते हुये मैं एक बेहतर समझ वाले पाठक के तौर पर विकसित हुआ हूँ या कथेतर हिन्दी-साहित्य में व्यंग्य-विधा के लिए नयी मुहब्बत पाले हुए आशिक़ का अवतार धारण कर चुका हूँ या फिर दोनों ही...ये जानना मेरे लिए ख़ुद ही बहुत दिलचस्प है | बेहतर-समझ-वाले-पाठक वाली बात इसलिए की मैंने कि किताब में शामिल व्यंग्य से गुज़रते हुए जाने कितनी जगहों पर यूँ लगा कि ये तो मैं भी करता हूँ और ये कटाक्ष दरअसल मुझ पर भी(ही) तो है | अमूमन पाँच से छ दिन में एक किताब पढ़ लेने वाला मेरा ‘मैं’ इस किताब को जाने क्यों सहेज-सहेज कर थम-थम कर पढ़ता रहा...एक दिन में बस एक चैप्टर की ज़िद लिए कि एक का स्वाद दूजे में मिक्स ना हो और कोई ख़तरनाक कॉकटेल ना तैयार हो जाए !
व्यंग्य में लिपटे चुभते-गुदगुदाते-चिकोटी काटते चौवालीस आलेखों (जिसमें एक दर्जन लघु आलेख अलग से गिनती माँगते हैं) के बोझ से जहाँ इस किताब को उठाये न उठना चाहिए, वहीं उलटा, पढ़ते हुए यह किताब अपने पाठक को इतना हल्का कर देती है...कुछ इतना हल्का कि लेखक के हर चुटीले वार के बाद आह-उफ़ करते हुए एकदम से तारो-ताज़ा हो अपने शेष बचे कार्यों को पूरा करने के लिए एक तरह से रिचार्ज्ड हो जाते हैं आप |
ऐसे-ऐसे नुकीले जुमले की जिनकी नोक मोटी-सी-मोटी चर्बी वाली संवेदनाओं को भी बेधने से बाज़ ना आये...ऐसे-ऐसे तीखे फ़िक़रे कि अरसे से बंद पड़ी स्वाद-ग्रंथियाँ भी अपनी ज़ंग लगी पोरों को स्वत: खोल बैठें...ऐसी-ऐसी रंगीन टिप्पणियाँ कि सात-के-सातों रंग अपने रंगीले होने पर गुमान करना भूल जायें ! मज़े की बात ये कि लेखक ये सारा चमत्कार बिलकुल ही अनजान तरीके से करते हैं और ये बात आपको किताब पढ़ते हुए ख़ुद ही आभास होता है कि जैसे ऐसा लिखा जाना कुछ एकदम नेचुरल-सा है लेखक के लिए...उनके पर्सोना का ही एक अदृश्य सा हिस्सा जो लिखने के बाद दृष्टिगोचर होता है |
सुशील सिद्धार्थ दरअसल अपने लिक्खे से...अपने लगातार लिक्खे से और उस लगातार लिक्खे में भी कहीं दोहराव ना आने देने से...हम पाठकों को मेस्मराइज्ड करते रहे हैं | सूर्यबाला जी के कहे को उधार लूँ तो, जो इस किताब के फ्लैप पर भी उद्धृत है...”जाने कैसे इतना लिखने के बाद भी रिपीटीशन के पॉपुलर ट्रेंड से बचे रहे हैं अब तलक सुशील और एक तरह से वर्तमान में अपना ब्रांड बनाए रखने में कामयाब रहे हैं” |
व्यंग्य का ये अनूठा संकलन किताबघर प्रकाशन से आया है और महज डेढ़ सौ रुपये में आपकी किताबों वाले सिरहाने पर रखे जाने की ज़िद करता है |


15 November 2018

एक ब्रह्मा का अवसान



"सुनो पीटर, हमारी मुहब्बत सलामत तो रहेगी ना ? उन्होंने ही तो संभाले रखा था अब तक, जब भी बिखरने को हुई ये !" परसों रात सुबकते हुये मेरी जेन ने पूछा था...
लगभग सत्तावन साल पहले एक नये 'यूनिवर्स' का अस्तित्व जब सामने आया था तो पूरी धरती पर हर्ष और हैरत से भरे कोलाहल का शोर जाने कितने ही उल्कापिंडों के अकस्मात् टूटने का कारण बना । शोर थमा तो इस नये 'यूनिवर्स' के सृजनकर्ता को दुनिया ने सीने से लगा लिया । उम्र के उन्चालीसवें पायदान पर खड़े स्टैन ली ने शायद उस वक़्त सोचा भी न होगा कि मार्वल कॉमिक्स में जिन किरदारों को वो बुन रहे हैं, ये सब मिलकर एक दिन एक ऐसे पैरेलल यूनिवर्स को खड़ा कर देंगे कि हम जैसे दीवाने पीढ़ी दर पीढ़ी पूरी तरह सम्मोहित हो वहीं बस जाने की सोचा करेंगे ।
नहीं, ऐसा तो नहीं था कि स्टैन ली द्वारा इस मार्वल यूनिवर्स के सृजन से पहले ऐसे किसी और यूनिवर्स का वजूद नहीं था । जव वो सत्रह साल के थे तो डीसी यूनिवर्स अपना जलवा कायम कर रहा था । मेट्रोपॉलिस के सुपरमैन और गॉथम के बैटमैन का जादू सर चढ़ कर बोल रहा था । लेकिन डीसी यूनिवर्स के शहर काल्पनिक थे और इसके सुपरहीरोज़ या तो बहुत ज़्यादा 'आइडियलिस्टिक' थे या फिर कुछ ज़्यादा ही 'ट्विस्टेड' । मेट्रोपॉलिस जहाँ एक 'मॉडल' शहर था, वहीं गॉथम एकदम 'डार्क' । सुपरमैन, बैटमैन, फ्लैश वगैरह की शक्तियाँ असीमित थीं । वे सब के सब 'लार्जर दैन लाइफ' की परिकल्पना के द्योतक थे ।
स्टैन ली ने अपने मार्वल यूनिवर्स की बुनियाद न्यूयॉर्क जैसे चिर-परिचित शहर में रखी, उसकी तमाम अच्छाइयों और बुराइयों के साथ । उनके सुपरहीरोज़ हमसब के अपने पड़़ोसियों जैसे देखे-से, भाले-से हैं । स्पाइडरमैन जैसे हीरो के पास अक्सर पेप्सी पीने तक के पैसे नहीं होते...शहर का सबसे ज़्यादा बिकने वाला अख़बार उसे ट्रौल करता है...अपनी तमाम शक्तियों के बावजूद वो अपनी प्रेमिका को ख़ुश नहीं रख पाता । स्टैन ली के यूनिवर्स वाले सुपरहीरोज़ अपनी तमाम ख़ूबियों के साथ उतने ही 'वल्नरेबल' दिखते हैं और यही बात स्टैन ली को इस विधा में सबसे दमकते सिंहासन पर बिठाती है । उनका जाना यक़ीनन एक अनूठे और हैरान करने वाले क़िस्सागो का जाना है ।
विगत सोलह सालों से लगातार मार्वल यूनिवर्स की चार कॉमिक्स को सब्सक्राइब करता आ रहा मेरा 'मैं' आज पहली बार अपने सब्सक्रिप्शन को बंद करने की सोच रहा है । कहाँ बिखेर पायेगा ये महबूब यूनिवर्स मेरा अब वैसा ही जादू अपने जादूगर के बिना !
...और अपने आँसू पोछते हुये पीटर पार्कर ने सुबकती मेरी जेन को बाँहों में भर कर कहा "विद ग्रेट पावर, कम्स ग्रेटर रिस्पॉन्सिबिलिटी । उनकी रूह हमारी मुहब्बत के साथ है, मेरी ।"


[ जाइये स्टैन ली सर कि इन दिनों उस परमपिता परमेश्वर को भी चंद सुपरहीरोज़ चाहिये स्वर्ग में ! सलाम !! ]

24 October 2018

कंचन सिंह चौहान की कहानी 'ईज़’ को पढ़ते हुये...

केमिस्ट्री दोनों किरदारों के बीच शुरू के ही संवाद से शुरू हो जाती है...एक अजब सी कशिश और कसमसाहट भरी केमिस्ट्री, जो पाठकों को थोड़ी सी तिलमिलाती हुई छोड़ देती है आख़िर में कि कुछ तो हुआ ही नहीं | लेकिन हंस के अक्टूबर अंक में प्रकाशित कंचन चौहान की कहानी ‘ईज़’ कोई प्रेम-कहानी तो है नहीं कि इसमें नायक और नायिका के बीच किसी केमिस्ट्री की गुंज़ाइश हो ! फिर भी गौर से देखने पर वो केमिस्ट्री दिखती है, एक विलक्षण केमिस्ट्री, जो बेशक प्रेम को ना स्पर्श करती हो...मगर अपने अनूठे से विमर्श को उठाती हुई ये अद्भुत कहानी अपने पार्श्व में एक छुपे से प्रेम का ट्रेलर भर दिखाती ज़रूर है | अब ये लेखिका का सायास प्रयास है या अनायास ही होता है ऐसा, ये कहना मुश्किल है |

‘ईज़’ कहानी का फ़लक अपने चुस्त और कसे हुए शिल्प में एक ‘सेक्स वर्कर’ और एक ‘बूचर’ के प्रोफेशन की तलहटियों में झाँकते हुए बगैर किसी स्पौन्सर्ड चेष्टा के “गंदा है पर धंधा है ये” की फिलॉस्फ़ी को हौले से...बस हौले से छूता है | बगैर जजमेंटल हुए ! लेखिका को पहले तो इस दुर्लभ थीम पर बधाई देने का मन करता है और फिर इस थीम को इतनी सहजता से ट्रीट करने के लिए फिर-फिर बधाई देने का मन करता है | दुनिया के दो सबसे प्राचीन व्यवसाय आधुनिक शब्दावली का चोगा पहन कर किस तरह एक अलग ही रुतबा जैसा कुछ अपने लिए तैयार करते हैं, ये समझना जितना दिलचस्प है उतना ही ह्रदयस्पर्शी भी | एक जानिब ‘ब्रोदेल’ से ‘एस्कोर्ट सर्विस’ तक का रूपांतरण और दूजी तरफ़ ‘ढ़ाबे’ से ‘रेस्टोरेंट’ ...या फिर 'प्रॉस्टीच्यूट' से 'कॉल-गर्ल' और 'एस्कोर्ट' तक की यात्रा...और कसाई से ‘बूचर’ या ‘नॉनवेज रेस्टोरेंट ओनर’ तक का कायांतरण...एक तरह से जस्टिफाय करने जैसा कुछ | ...और इस तमाम जस्टिफिकेशन या स्वीकृत होने की क़वायद को कहानी जिस खूबसूरती से दोनों प्रोटगोनिस्ट के संवाद के ज़रिये उभार कर लाती है, वो कुछ तिलिस्मी सा है |
इसके अलावा एक छोटे से पैरेलल में एक और अदद किरदार है, जो इस अजब से विमर्श वाली कहानी को तनिक स्त्री-विमर्श का भी पुट देते हुए अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है...कसाई की बीवी | इस तीसरे किरदार के आने से जाने क्यों और कैसे कहानी में डूब चुके मेरे पाठक को एक त्रिकोण सा बनता नज़र आता है...कुछ-कुछ विख्यात हॉलीवुड फिल्म-श्रृंखला “द ट्वाईलाईट सागा” के प्रेम-त्रिकोण की तरह | वेम्पायर, वियरवुल्फ और ह्यूमेन वाला त्रिकोण | यहीं से कहानी के और विस्तृत होने का विकल्प खुलता है | लेकिन जाहिर है कि ये मेरे अतृप्त पाठक मन का अनर्गल सा प्रलाप है, लेखिका की मंशा कुछ और ही थी कहानी बुनते वक़्त |
कहानी की सधी हुई बुनावट, उसका क्रिस्प शिल्प और उसका मारक कथानक...सब मिलजुल कर कंचन चौहान के क़िस्सागो को परिपक्व हो जाने का ऐलान करते हैं | अभी तक सात कहानी - यदि साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होने को मानक रखा जाए - लिख चुकी इस लेखिका की पहली प्रकाशित कहानी से एक पाठक के रूप में जुड़ा होना और उसकी क़िस्सागोई को ग्रो करते देखना, एक विलक्षण अनुभव है अपने में | हम पाठकों को एक बेहतरीन कहानी देने के लिए कंचन चौहान को ढेरम-ढेर धन्यवाद और साथ ही ये भी कि इस कहानी से उनके पाठकों की उम्मीदें अब और बढ़ गयी हैं |
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09 April 2018

क़िस्सागोई करती आँखें

ग़ज़ल जैसी विधा के साथ जिस तरह का सौतेला सलूक होता आया है इस हिन्दी-साहित्य में, उस बिना पर किसी युवा रचनाकार द्वारा इस विधा को अपनाने के निर्णय पर कई सवाल उठते हैं मन में | पाठकों, लेखको और आलोचकों द्वारा समवेत...सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली विधा, सबसे ज्यादा गुनी जाने वाली विधा जाने क्यों हिन्दी साहित्य के पन्नों पर हाशिये पर ही रखी जाती है तमाम विमर्शों में, सारी चर्चाओं में, समस्त समीक्षाओं में | ऐसे में कविता की छंद-मुक्त आसानी को छोड़ कर ग़ज़ल की अनुशासित मुश्किल ज़मीन पर पाँव बढ़ाने का निर्णय लेते हुये जब कोई प्रदीप कान्त जैसा रचनाकार दिखता है, तो प्रथम दृष्टि में ऐसे रचनाकार के लिए एक सहानुभूति सी उपजती है…लेकिन फिर ग़ज़ल का विचक्राफ्ट ही कुछ ऐसा है कि वो सहानुभूति एकदम से कब सम्मान में बदल जाती है, पता ही नहीं चलता | साल भर से प्रदीप की ये ग़ज़लों की किताब "क़िस्सागोई करती आँखें" मेरे हाथों में है...अपने मुखतलीफ़ मिसरों के जरिये मुझसे क़िस्सागोई करती हुयी |

प्रदीप छोटी बहर वाले बड़े शायर होने की संभावना लिए हुये दिखते हैं अपनी ग़ज़लों में | ख़ुद टूटे-फूटे शेर कह लेता हूँ तो जानता हूँ कि छोटी बहर में शेर बुनना कितना दुश्वार होता है | कुल 67 ग़ज़लों की ये किताब प्रदीप के अंदर के कुलबुलाते कवि की महज एक छोटी-सी झलकी दिखाती है...जैसा कि प्रसिद्ध गीतकार यश मालवीय जी किताब की भूमिका में लिखते हैं “समकालीन कविता के सारे तकाजे पूरे करता प्रदीप के भीतर का कवि इस कठिन और मुश्किल समय की आँखों में आँखें डालकर बोलता-बतियाता है” | “कबीरा” रदीफ़ को लेकर हज़ारों ग़ज़लें कही गई होंगी अब तक, लेकिन प्रदीप एकदम अलग से खड़े दिखते हैं जब इस रदीफ़ को चस्पाँ कर बुनते हैं वो मिसरे अपनी ग़ज़ल के लिये और यही वो ग़ज़ल थी जिसे बहुत पहले किसी पत्रिका में पढ़ने के बाद प्रदीप कान्त का नाम भी मेरे ज़ेहन में उनकी रदीफ़ की तरह चस्पाँ रह गया था...

गुज़र रही है उमर कबीरा
हुआ नहीं कुछ मगर कबीरा
बड़ा वक़्त का सच है लेकिन
छोटी तेरी बहर कबीरा
आती-जाती रहती तट पर
कब रुकती है लहर कबीरा

अपने मिसरों के टटकेपन से, कहन की फ्रेशनेस से और क़ाफ़ियों के चुनाव से प्रदीप कई बार शॉक सा देते हैं मुझ जैसे पाठकों को | उनका लिखा ये दो शेर तो जाने कितनी दफ़ा कोट कर चुका हूँ मैं...

बुरे वक़्त में दिलासों की तरह
यादें कुछ रहीं कुहासों की तरह
राज़ उनका भी सुन लिया हमने
तमाम दूसरे खुलासों की तरह

“पेट है, पीठ है, सर भी है / और उसूलों की फिकर भी है” या फिर ”कौन गया है रखकर इतने / आँखें दो हैं, मंज़र इतने” या...या फिर “थोड़े अपने हिस्से हम / बाकी उनके किस्से हम” जैसे शेर बुनकर प्रदीप हठात खुद भी चौंकते होंगे कि अरे ये तो बड़ा-सा शेर हो गया | हम पाठक तो चौंकते ही हैं...पढ़कर एक उफ़ सी निकालते हुये | “क़िस्सागोई करती आँखें” के सफ़े-दर-सफ़े पर उड़ते हुये आप अचानक से होवर करने लगते हैं किसी ख़ास शेर पर और या तो फिर उस शेर को अपनी ज़ुबान पर उसी वक़्त रट्टा मारा कर सहेज लेते हैं या थोड़ी मेहनत करके उतार लेते हैं अपनी छोटी-सी डायरी में | एक रचनाकर के लिये इस से बड़ा ईनाम भला और क्या हो सकता है कि उसका पाठक उसके लिखे को कहीं और सहेज ले | ऐसे कितने ही शेरों पर धूल उड़ाते हेलीकॉप्टर की तरह होवर करते हुये (जहाँ होवर करते हुये हेली के रोटर्स धूल उड़ाते हैं, एक पाठक के ज़ेहन में रचनाकार का लिखा विचारों की धूल उड़ाता है) जब आप ठिठके रहते हैं एक किसी ख़ास मिसरे पर...वज़ह बेशक कुछ भी हो...प्रदीप के संदर्भ में वो कोई सेलेक्टेड क़ाफ़िया हो सकता है, कहन हो सकती है, शेर की बुनावट हो सकती है ...एक बात एकदम से कौंधती है कि जैसे शायर ने सचमुच इन बातों को जीया है, महसूस किया है | ऐसे ही होवर करता मेरा पाठक-मन जिन चंद शेरों को उठा कर अपनी हर जगह साथ ले जाने वाली डायरी में सहेज लेता है, उनमें से कुछ की बानगी...

फ़िक्र अगर हो रोटी की तो
ख़्वाब चुभेगा बिस्तर में फिर

जितने हुये साकार, बहुत हैं
यूँ तो ख़्वाब फ़लक भर आये

मोड़ के आगे मोड़ बहुत
रही उम्र भर दौड़ बहुत

काम न आये ग़ज़लों के
भूले-बिसरे मिसरे हम

जग के दुख में खोया फिर से
देख कबीरा रोया फिर से
रहा जमूरा भूखा-प्यासा
मस्त मदारी सोया फिर से

कहाँ हमारा हाल नया है
कहने को ही साल नया है
नहीं सहेगा मार दुबारा
गाँधी जी का गाल नया है

प्रदीप के इन तमाम अच्छी-अच्छी बातों से परे, जब हम ग़ज़ल की बात कर रहे होते हैं, तो साथ में कायदे-क़ानून, डिसिप्लीन और ग्रामर की भी बात कर रहे होते हैं | साहित्य की तमाम विधाओं में बस ग़ज़ल ही वो एक विधा है जो डिसिप्लीन के नाम पर आपको टस से मस नहीं होने देती और इसी डिसिप्लीन के दायरे में “क़िस्सागोई करती आँखें” तनिक कमज़ोर नज़र आती है | काफ़ियों का भटकाव, बहर का घुमाव, रदीफ़ का अलगाव...ये सब अलग-अलग और कई बार एक साथ मिलकर प्रदीप की कुछ ग़ज़लों को ग़ज़ल कहलवाने की अनुमति नहीं देता | दो-एक बार झुंझलाहट भी होती है कि क्यों किया कवि ने ऐसा | नहीं, ऐसा तो नहीं है कि उसे मालूम नहीं है...एक तरह की जल्दबाज़ी-सी दिखती है या फिर किसी दो-एक शेर के प्रति उभरा हुआ अतिरिक्त मोह दिखता है जो प्रदीप को किताब में नहीं रखने की हिम्मत नहीं दे पाता | व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि प्रदीप ने थोड़ी-सी शीघ्रता दिखाई है किताब प्रकाशित करने में |

बोधि प्रकाशन से निकली हुयी ये किताब अपनी छपाई और अपने आवरण और बाइंडिंग से मन मोह लेती है | वैसे इन दो-एक सालों में बोधि प्रकाशन ने एक तरह की क्रान्ति का आगाज़ किया है प्रकाशन की दुनिया में अपनी अच्छी छपाई के बावजूद किताब का दाम कम-से-कम रखकर | इस किताब का दाम भी महज चालीस रुपये है | पेपर-बैक में इतने अच्छे पन्नों और और इतनी शानदार प्रिंटिंग के साथ इतना कम दाम रखने लिये तमाम बोधि प्रकाशन की टीम को एक कड़क सैल्यूट |



प्रदीप कान्त को समस्त शुभकामनाओं के साथ उनको इस ख़ास शेर के लिये शुक्रिया :-

तमाम शहर की हँसी कम थी
एक बच्चा अगर उदास रहा

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30 January 2018

छबीला रंगबाज़ का शहर

इक शहर खुलता है अपने पूरे विस्तार में...पन्नों पर बिखरे काले हर्फ़ों से निकल कर अपने चंद अजब-ग़ज़ब से किरदारों को संभाले, जो कतई तौर पर उस शहर से संभाले नहीं संभल रहे होते,...और इन तमाम असंभाल ‘संभालों’ के दरम्यान हमें मिलता है एक युवा क़िस्सागो की करिश्माई क़िस्सागोई का निशान ! प्रवीण कुमार की किताब “छबीला रंगबाज़ का शहर” दो सौ बीस पन्ने में फैली हुई चार कहानियाँ सुनाती है हम पाठकों को...और किस अदा से सुनाती है, उफ़ !

इन कहानियों से गुज़रते हुए एक अपरिभाषित किस्म का सुकून हासिल होता है...एक तरह का आश्वासन जैसा कुछ कि लिखने वालों की हर रोज़ उमड़ती जा रही भीड़ में भी क़िस्सागोई की कला गुम नहीं हुई है...कि प्रवीण जैसे कुछ युवा भी हैं इस भीड़ में जो अपने हट-कर-के शिल्प, अपनी सम्मोहक शैली और अपने-बिलकुल ख़ास अपने- ‘विट’ से एक आम सी लगने वाली कहानी को भी कितना विशिष्ट बना देते हैं |

किताब की पहली कहानी, जो कि शीर्षक कहानी भी है, अपेक्षाकृत लम्बी है और अपने फैलाव में उपन्यास का विस्तार समेटे हुए है | कथ्य कुछ इस कदर से बुना है लेखक ने कि शहर का नाम कहीं ना आते हुए भी पाठक के ज़ेहन में वो मुल्क के नक़्शे वाला असली शहर आकर बैठ जाता है...चाहे वो जैन धर्म के अवशेषों की चर्चा मात्र से हो या फिर अमर सेनानी कुंवर साब के ज़िक्र से | यूँ कहानी बुने जाने के क्रम में पत्रकार अरूप का किरदार मुख्य किरदार से कहीं ज्यादा वृहत हो गया है....जाने ये लेखक का सायास प्रयास था या फिर उसकी विलक्षण क़िस्सागोई की ही असंख्य अदाओं में एक और अदा ! दूसरी कहानी “लादेन ओझा का संसार” तनिक प्रेडिक्टेबल होते हुए भी अपनी कसी हुई बुनावट और चंद अनूठे किरदारों के लिए याद रखी जाने वाली कहानी है | “नया ज़फरनामा” मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य पर सम्मोहक सटायर करते हुए जाने कैसी तो टीस उठाती है पढ़ते वक़्त सीने की अनंत गहराईयों में | किताब की चौथी और आख़िरी कहानी “चिल्लैक्स लीलाधारी” हास्य और करुण रस का ऐसा बेजोड़ कॉकटेल है कि पाठक-मन बस उह-आह करते रह जाता है लेखक की लेखकीय बाज़ीगरी पर |

“छबीला रंगबाज़ का शहर” अपने किताबी अवतार में मनमोहक है और क़िस्सागोई की लुप्त होती कला को एक अलग ही आयाम देती है | प्रवीण कुमार का क़िस्सागो बड़ी चतुराई से कथ्य में नयेपन की कमी का अपनी लेखनी के गुदगुदाते विट, अपनी भाषा की दमकती सुन्दरता और अपने शिल्प की चटकती ताज़गी से आभास तक नहीं होने देते | यही इस किताब की ख़ूबसूरती है | राजपाल की बाइंडिंग, प्रिंटिंग और पन्नों की क्वालिटी क़ाबिले-तारीफ़ है | कवर का डिजाइन, किताब के अंदर बने हुए स्केच और कहानियों के शीर्षक का आकर्षक फौंट में दिया जाना...सब मिलकर जुलकर जैसे लेखक के जुदा से शिल्प को कॉम्प्लीमेंट से करते नज़र आते हैं |

बस दो सौ पचीस रुपये की क़ीमत पर उपलब्ध ये किताब ख़रीदे जाने और ख़रीद कर अपनी आलमारी में संजोये जाने की ज़िद करती है | किताब के ऑन-लाइन ऑर्डर के लिए अमेजन के इस लिंक का इस्तेमाल किया जा सकता है :-

अमेजन 



...और अंत में प्रवीण कुमार को टोकरी भर-भर कर धन्यवाद इन लाजवाब कहानियों के लिए और समस्त शुभकामनाएँ उनके लम्बी लेखकीय पारी के लिए जिसकी शुरूआत ही इतनी धमाकेदार हुई है !

22 May 2017

चौराहे पर सीढ़ियाँ

कहानी के पहले या दूसरे ड्राफ्ट के साथ सिंफनी बुनते झींगुरों का गान सुनना हो... बढ़ती हुई उम्र के साथ बढ़ती हुयी और इक रोज़ दीवारों से बाँहें छुड़ाकर खुले रास्ते पर भटक जाने वाली सीढ़ियों से मिलना हो...गली के छोर पर अंधेरे में डूबी एक खिड़की, जिस से कुंवारी लड़कियों की चुन्नी से आने वाली ख़ुशबू फूटा करती है, को देखना हो...मीठे बताशों का सूखा पानी चखना हो...हाशिये से भी कम चौड़ी सड़कों पर आवारागर्दी करने का हौसला हो...या फिर रेत के समंदर में बेनिशां मंज़िलों के सफ़र पर निकलना हो...तो किशोर चौधरी की कहानियों की किताब चौराहे पर सीढ़ियाँपढ़िये | किशोर की कहानियाँ ? या मेस्मराइज़ करते शब्दों का सम्मोहन-मंत्र ? या...या कि सर चढ़ कर बोलते मायावी जुमलों का वशीकरण-जाप ?...उफ़्फ़ !

अपने मूल रूप में किशोर निगाहों की हदबंदियों से परे वाले उदास इश्क़ के नगमें बुनते हैं और उन नगमों में कोई अफ़साना यूँ ही सर उठाए चला आता है तो वो उस पर नज़रे-इनायत करने से परहेज नहीं करते | “चौराहे पर सीढ़ियाँअपने मुकम्मल अवतार में इसी नज़रे-इनायत की परिणति है | कुल जमा चौदह कहानियों को तकरीबन डेढ़ सौ पन्नों में समेटे हुये ये किताब ठहर-ठहर कर, रुक-रुक कर साँस लेते हुये पढे जाने की शर्त रखती है | किताब का फ्लैप हिन्दी-साहित्य की प्रचलित परम्पराओं के बरखिलाफ़ आपको लेखक के बारे में कुछ नहीं बताता, सिवाय कॉफी पीते पतले फ्रेम वाले चश्मे में एक युवक की श्वेत-श्याम तस्वीर और चंद नज़्म-नुमा मिसरों के | ये एक मिस्टिक सा जो मूड तैयार होता है किताब के कवर से तो वो मूड फिर पहली कहानी से लेकर आख़िरी कहानी तक बरक़रार रहता है |

किताब की पहली कहानी अंजलि तुम्हारी डायरी से बयान मेल नहीं खातेअपनी दिलचस्प बुनावट से कथाकार के शिल्प के प्रति एक आदर का भाव जगाती है...अन्य किरदारों के मुख्तलिफ़ बयानों के विपरीत अंजलि की डायरी के पन्ने जब धीरे-धीरे सबका राज़ खोलते हैं और कहानी अपने अंज़ाम तक पहुँचती है तो अंजलि का दर्द पाठक का दर्द बन जाता है | जहाँ दूसरी कहानी एक अरसे सेके नायक का एकालाप एकदम से पढ़नेवालों के वजूद का एकालाप बनने को उतावला हो उठता है, वहीं तीसरी कहानी चौराहे पर सीढ़ियाँका अजीब-सा कथानक इसे फिर-फिर से पढ़े जाने को विवश करता है | महज सीढ़ियों को बिम्ब बनाकर उकेरा गया ये क़िस्सा लापता होते रिश्तों की इतनी तल्ख़ शिनाख़्त देता है कि पढ़कर क़िस्सागो से तुरत बतियाने को जी चाहे...सीढ़ियाँ और मुहब्बत पददलित होने के सिवा जो दूसरा काम कर सकती हैं, वह है बावड़ियों में डूबकर आत्महत्या करना” , कहानी के आख़िर में एक किरदार का ये डायलॉग एकदम से राजस्थान की अनगिन बावड़ियों को ले चला चलता है आपको जहाँ पानी में उतरती सीढ़ियाँ वाकई ख़ुदकुशी करती हुयी प्रतीत होती हैं और उन्हीं में से जाने कितनी बावड़ियों का असफल प्रेमियों के लिए फेवरिट सुसाइड स्पॉट में परिवर्तित होने की अख़बारों में छपी ख़बरों की याद भी दिलाता है | ये किशोर का अपना खास अंदाज़ है, जिसके बूते पर कहानी में चित्रित हर दूसरी चीज एक किरदार के तौर पर उभर कर सामने आती है |

संग्रह का चौथा पायदान परमिंदर के इंतज़ार में ठहरा हुआ समयमेरा पर्सनल फेवरिट है | कथाकार का विट इस कहानी में अपने पूरे उफ़ान पर है और पाठक महसूस करता है कि नहीं, किशोर चौधरी सिर्फ उदासी ही नहीं हास्य भी उलीचता है | टीन-एज इश्क़ की कुलबुलाती-सी बेचैनियाँ किस कदर तो साकार होकर पढ़ने वालों को दसवीं-ग्यारहवीं वाले दिनों में लिए जाती हैं, जब दिन के चौबीस घंटे प्रेयर की पहली घंटी से लेकर रिसेस के खिंचाव तक सिमट आते थे | “उदास रात में झींगुरों का करूण गानकहानी कुछ-कुछ पिछली कहानी का एक्सटेंशन प्रतीत होती है जो बाद के ट्रीटमेंट में वयस्क ज़िंदगी की इश्क़िया जद्दोजहद को थोड़ा ज़्यादा विस्तार देती है | किताब की छठी कहानी ख़ुशबू बारिश की नहीं मिट्टी कीफाइनल मुहर लगाती है कि किशोर का पुरुष क़िस्सागो स्त्री किरदार को केंद्र में रखकर अजब-गजब चमत्कार कर सकता है |
किताब की सातवीं कहानी रेगिस्तानी मकड़ी के जालेजहाँ रिश्तों के ऊपर वाले कृत्रिम सुगंध के नीचे दुर्गंध मारती बदबुओं का विलाप है, वहीं आठवीं कहानी सड़क जो हाशिये से कम चौड़ी थीएक आम परिवार की हर रोज़ युद्धरत होने की आम-सी दास्तान है, जिसे किशोर की लेखनी बहुत दिलचस्प बना देती है | अगली दो कहानियाँ संग्रह की कमज़ोर कहानियाँ हैं...गीली चॉकऔर लोहे के घोड़े”...वही पुराना सब कुछ...गीली चॉकउलझे इश्क़ को सुलझाने की ट्रेजेडी है तो लोहे के घोड़ेमुफ़लिसी में भी जीवित बचे मोह की दास्तान...पुराना प्लॉट है दोनों का, कुछ भी नया है तो वो बस किशोर की क़िस्सागोई और उनका भाषा-सौंदर्य | किताब की ग्यारहवीं कहानी गली के छोर पर अँधेरे में डूबी एक खिड़कीमुहब्बत का एक देखा-सा, सुना-सा मगर थोड़ा सस्पेंस जगाता हुआ चैप्टर खोलती है | कहानी का अंत पढ़ के आपको थोड़ी-सी झुंझलाहट होती है और नायक की तरह आप भी अपने कंधे पर एक सवाल की लाश लिए बैठ जाते हैं कि कौन था उस रात रेशम की खिड़की पर |

अगली कहानी एक फ़ासले के दरम्यान खिले हुये चमेली के फूल” (कहानी का शीर्षक ना हुआ शेर का मिसरा हो गया, मानो) फिर से एक स्त्री किरदार से मिलवाती है और किशोर का अपने अद्भुत बिंबों के जरिये फीमेल सायकॉलजी की चंद और किरचों को शार्पेन करने के हुनर से रूबरू करवाती है | सरदार तेजिंदर सिंह का करेक्टर बेहद दिलचस्प बन कर उभरा है | तेरहवीं कहानी रात की नीम अँधेरी बाँहेंसंग्रह की इकलौती कहानी है जिसमें नरेटर अपने फर्स्ट परसन वाले फॉर्म में अवतरित हुआ है | इस कहानी में किशोर ने शायद खुद अपने ही शिल्प पर एक्सपेरिमेंट करने की कोशिश की है, लेकिन प्लॉट के परखनलियों में कुछ सोल्यूशन्स सही अनुपात में नहीं डाल पाये | लेकिन इस कहानी की प्रत्यक्ष कमियों की भरपायी आख़िरी कहानी बताशे का सूखा पानीके मास्टर और सिमली मिलकर कर देते हैं |

जैसा कि ऊपर लिखा है मैंने, ये कहानियाँ ठहर-ठहर कर पढ़ने की शर्त रखती हैं | किशोर की क़िस्सागोई का पूरा वजूद अपने नरेटर के कंधों पर विराजमान रहता है | पात्रों के दरम्यान संवाद-अदायगी के जरिये कहानी को खोलने में कम विश्वास रखते हैं किशोर और उनके इसी नरेटर के मार्फत हम रूबरू होते हैं उनकी आकर्षक भाषा से और मंत्र-मुग्ध करते उनके जुमलों और बिंबों से | लेकिन कई बार यही नरेटर किशोर की कमजोरी भी बनता प्रतीत होता है, जब एकदम से नरेशन कथ्य पर हावी होने लगता है | किशोर के लिए अपने इस नरेटर को काबू में रखना नितांत जरूरी है उनके लेखन के अगले पड़ाव के लिये | लेकिन महज अपने भाषा-सौंदर्य की नींव पर ही किशोर चौधरी इधर के कई समकालीन कथा-लेखकों से बीस ठहरते हैं |

चार साल पहले जब ये किताब हिन्द-युग्म से प्रकाशित होकर पाठकों के हाथ में आई थी...तब जब कि एक बड़े बैनर वाला प्रकाशक एक साधारण-सी लेखिका (जिसकी कहानियों में शब्दों से भी ज्यादा डॉट्स भरे रहते हैं) की एक बहुत ही साधारण-सी किताब के बेस्ट-सेलर होने की मुनादी कर रहा था, किशोर चौधरी की चौराहे पर सीढ़ियाँख़ामोशी से ऑन लाइन खरीदे जाने के तमाम कीर्तिमान कायम कर रही थी | इन चार सालों में किताब का तीसरा संस्करण भी बाज़ार में समाप्त होने को है और नए संस्करण के प्रिंट के लिए किताब फिर से प्रेस में जा चुकी है | हिन्द-युग्म जिस तरह से अपने लेखकों और उनकी किताबों को प्रोमोट करता है, वो क़ाबिले-तारीफ़ है | हाल-फिलहाल की अपनी कुछ किताबों से, जिसमें चौराहे पर सीढ़ियाँभी शामिल है, इस प्रकाशन ने कम-से-कम इस मिथ को तो तोड़ा ही है कि हिन्दी किताबें बिकती नहीं हैं |


पाठकों द्वारा हाथों-हाथ ली जाने वाली ये किताब चौराहे पर सीढ़ियाँआश्चर्यजनक रूप से साहित्यिक पत्रिकाओं में और चर्चाओं में अपनी जगह नहीं बना पायी है अभी तक, जो इस बात पर एक बार फिर से ठप्पा लगाती है कि हिन्दी-साहित्य के अकिंचन संपादक, आलोचक और समीक्षक अब तलक जुगाड़ की राजनीति से उबर नहीं पाये हैं |



किताब ख़रीदी जा सकती है इस जानिब से 

04 November 2016

कविता की कॉन्सपिरेसी थ्योरी

अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे
उठाने ही होंगे
तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब...

मुक्तिबोध की लिखी ये पंक्तियाँ, जो उनकी ख्यात कविता “अँधेरे में” का हिस्सा हैं,शायद सबसे ज़्यादा उद्धृत की जाने वाले काव्य-पंक्तियों में शुमार किए जाने का रौब गाँठती हैं अपने दुरूह शिल्प और अबूझ बिम्बों का ताना-बाना लिए लगभग चालीस पृष्ठों में फैली (या सिमटी) हुई ये कविता आख़िर किस वज़्ह से नई कविता के सिरमौर का रुतबा अख़्तियार कर लेती है, समझने के लिए मेरे अंदर का निरीह सा पाठक इसे पढ़ता है...बार-बार पढ़ता है, सैकड़ों बार पढ़ता है। सस्वर पढ़ने की कोशिश करता है, बुरी तरह से पराजित होता है। थम-थम कर ठहर-ठहर कर पढ़ता है, एकदम पस्त निढ़ाल हो जाता है। और फिर कविता में यत्र-तत्र बिखरे कुछ अद्भुत जुमलों को उठाता है,अपनी डायरी में नोट कर इसे अपनी पाठकीय सफलता मान लेता है और देर तक इतराता है।
  

असंख्य अनगिन विमर्शों के इस हाहाकारी दौर में हिन्दी-साहित्य के हम जैसे कितने ही समर्पित पाठक तनिक कनफ्यूज़ से बैठे हैं। प्रगतिशीलता के नाम पर महज़ चंद कथित रूप से स्थापित नाम एक किसी रचना-विशेष को आख़िर किस पैमाने पर तौलते हैं और उसे भारी-भरकम विशेषणों, यथा “उत्तर-आधुनिक काल का प्रस्थान बिन्दु” या फिर “भूमंडलीकरण के ख़तरे के विरुद्ध शंख-नाद”, से सुशोभित कर हमारी तरफ उछाल देते हैं कि लो पढ़ो! नहीं समझ में आने का ऐलान आपको मूर्खों, जाहिलों की पंगत में बिठा देता है और “अहा, क्या कविता है” जैसे कुछ उद्गार आपको अपने पाठक-मन के प्रति बेईमान बनाता है। कई सारे सवाल उमड़-घुमड़ कर बरसते हैं लगातार। क्या कारण है कि ठीक उसी समय की मणींद्र नारायण चौधरी उर्फ़ राजकमल द्वारा लिखी हुई कविता “मुक्तिप्रसंग” अपने शिल्प, अपनी वेदना, अपनी कसावट में मुक्तिबोध की “अँधेरे में” के बनिस्बत कई गुणा बेहतर होते हुए भी एकदम से नकार दी जाती है? या फिर ख़ुद मुक्तिबोध की ही दूसरी कविता “ब्रह्मराक्षस”, जो हिन्दी-साहित्य की समस्त लंबी कविताओं में अपनी इमेजरी और खूबसूरत छंद (गीतिका/मरुकनिका या उर्दू का बहरे-रमल) की एक मिसाल है, को ही क्यों नहीं “अँधेरे में” के जैसा रुतबा दिया जाता है?

मेरे अंदर के सजग पाठक को यह सब कुछ एक बड़ी...बहुत बड़ी कॉन्सपिरेसी का शातिर हिस्सा लगता है। जानता हूँ, इस अदने से पाठक के इस उद्गार पर कई भृकुटियाँ उठ खड़ी होंगी... लेकिन प्रत्युतर में मैं ख़ुद अपने प्रिय कवि की ओट में जा खड़ा होता हूँ कि “अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे”। एक बड़ी साजिश के तहत चतुराई से पॉलिटीकली करेक्ट रहने की कुशलता आधुनिक कविता में अवसाद को स्थायित्व और कविताई को गुमशुदगी प्रदान करती जा रही है। कमाल की बात ये है कि जो कविता सारे मठ और गढ़ को तोड़ने का डंके की चोट पर ऐलान करती है, उसी कविता को वापस अघोषित किन्तु स्पष्ट रूप से दुष्टिगोचर मठ/गढ़ के निर्माण की नींव के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। साठोतरी कवियों और आलोचकों की एक पूरी पीढ़ी जिस तरह से कलावादी और प्रतिक्रियावादी कविताओं के ज़िक्र पर नाक-भौं सिकोड़ती दिखती है, उसी पीढ़ी को “अँधेरे में” का प्रतिक्रियावाद नज़र नहीं आता। जैसा कि “चाँद का मुँह टेढ़ा है”, जिसमें यह कविता पहली बार संकलित हो कर सामने आई, के प्रथम संस्करण की भूमिका में ख़ुद शमशेर जैसे हिन्दी कविता के महारथी लिखते हैं कि नागपुर में अपने प्रवास के दौरान एम्प्रेस मिल के मज़दूरों पर जब गोली चली तो मुक्तिबोध रिपोर्टर की हैसियत से घटनास्थल पर मौजूद थे। “अँधेरे में” शीर्षक कविता उनके नागपुर जीवन के बहुत सारे संदर्भ समेटे हुए है। क्या अधिकांश कविताएँ किसी न किसी घटना-विशेष, स्थान-विशेष, सत्ता या साम्राज्य विशेष की प्रतिक्रिया में ही नहीं लिखी जाती? फिर कैसे कोई कविता प्रतिक्रियावादी का ठप्पा लगा कर ख़ारिज कर दी जाती है, और कोई कविता तमाम तरह के गहनों से लाद दी जाती है? जिस कविता को राजेश जोशी “एक विराट स्वप्न फैंटेसी” और मंगलेश डबराल “हमारे समय का इकलौता महाकाव्य” का मैडल देते हैं, क्या कारण है कि हिन्दी-साहित्य के गिन के तीन सौ पाठक भी नहीं मिलते, जिन्होंने इस कविता को पढ़ा तक हो?


ये प्रश्न विचलित करते हैं मुझ जैसे कविताशिक़ों को। लेकिन कविता के पाठकों का कविता से विचलित होना भी कोई मुद्दा है भला? जन की कविता जन का विषय उठाती है बस, लिखी तो प्रबुद्धों के लिए जाती है बस। एक बेहतरीन समकालीन कवि (जो की दोस्त भी है) ठसक के साथ ऐलान करता है कि वो क्लास के लिए लिखता है मास के लिए नहीं। लेकिन उसकी साफ़गोई एक कवि की ईमानदारी है और उस ईमानदारी का एक पाठक के रूप में सम्मान करता हूँ। इतनी ही साफ़गोई की अपेक्षा तमाम कवियों से करता हूँ। “अँधेरे में” की कविताई में क्रिएट किया हुआ विस्तृत लैंड-स्केप, दरअसल मुक्तिबोध के कवि की पनाहस्थली है, जहाँ वो छुप कर बैठ जाता है। उस पनाहस्थली में कवि एक नायक का निर्माण करता है...नायक जो इस्केपिस्ट है। पता नहीं क्यों लगता है कि मुक्तिबोध ज़िंदा होते तो निश्चित रूप से खीजते, क्योंकि अपने दोस्त-कवि वाली ईमानदारी मुक्तिबोध में दिखती (मुक्तिबोध की तरह ही लिखूँ तो दीखती) है मुझे...इतनी कल्पना तो कर ही सकता हूँ उनका एक घनघोर पाठक होने के नाते। कम-से-कम इस एक कविता को इतनी बुलंदी प्रदान किए जाने के तिरकम पर तो निश्चित रूप से झुँझलाते वो। वही प्रगतिशील मोर्चा जो तुक (rhyme) को एक सिरे से नकारता है, उसी मोर्चे को “अँधेरे में” के हास्यास्पद की हद तक बन आए तुकों से कोई परेशानी नहीं। हनु के साथ मनु, अकेले के साथ दुकेले, हायहाय-नुमा के साथ टॉलस्ताय-नुमा...लम्बी फ़ेहरिश्त बन जाएगी। मुक्तिबोध की ही पंक्तियों का फिर से सहारा ले कर कहना चाहूँगा इन समस्त दुदुंभी बजाते मोर्चों से-

“स्क्रीनिंग करो मिस्टर गुप्ता, क्रॉस एक्ज़ामिन हिम थोरोली !”


जितना सोचता हूँ, यह सारा कुछ उतना ही एक बड़ी कॉन्सपिरेसी का हिस्सा लगता है यूँ इस ताह एक किसी कविता को सिरमौर घोषित कर देना। कविता पर चल रही, उठ रही तमाम बहसों की धमा-चौकड़ी में हम कविताशिक़ों को ये हिन्दी कविता का एक भीषण “लीन-पैच” वाला दौर नज़र आता है। लीन-पैच दरअसल क्रिकेट से जुड़ा शब्द है और उस बल्लेबाज के लिए इस्तेमाल होता है जो लगातार मैच दर मैच विफल हो रहा हो, रन ना बटोर पा रहा हो। एक तरह का मोह है ये लीन-पैच अपनी ही लिखी कविताओं के लिए अधिकांश कवियों का। दूर होते पाठकों को मृग-मरीचिका मान कर तमाम तरह की बहसें। अभी दो साल पहले एक स्थापित पत्रिका (वागर्थ) ने एक पीढ़ी-विशेष के कवियों की खेमेबाजी कर शेष सब कवियों को ख़ारिज करने की कॉन्सपिरेसी रची थी... “लॉन्ग नाईन्टीज” का ठप्पा लगा कर। हम सब पढ़ने वालों को दरअसल वो “नर्वस नाईन्टीज” की थरथराहट नज़र आई उसमें। ...कि तब जब कविता हर सफ़ेहर वरक़ पर असहाय कराहती नज़र आ रही थीआत्म-मुग्ध कवियों की एक टीम बाकायदा बैंड-बाजे के साथ सामने आती है और एक दशक-विशेष पर चर्चा के बहाने अपने नामों और अपनी ही कविताओं का फिर-फिर से ढ़ोल बजाती है। बड़े सलीके से एक प्रश्नावली बुनी जाती है और फिर उतने ही सलीके से चयनीत नामों की एक फ़ेहरिश्त को वो प्रश्नावली भेजी जाती है... कभी सुना था कि नई-कहानी नामक तथा-कथित आंदोलन के पार्श्व में कहानिकारों की एक तिकड़ी ने सुनियोजित साजिश रच कर एक सिरे से हिन्दी-कहानी के तमाम शेषों-अशेषों-विशेषों को नकारने की ख़तरनाक सुपाड़ी उठाई थी। कुछ वैसा ही प्रयास हुआ इस “लॉन्ग नाईन्टीज” विमर्श के बजरीये। सलीके की बुनावट इस कदर कि कोई नाराज़ भी न होकोई विवाद भी ना उठे...लेकिन पाठकों द्वारा नकारी हुई अपनी कविताओं पर चर्चा भी हो जाये। काश कि इतना ही सलीका इन महाकवियों ने अपने शिल्प और कविता की कविताई पर भी दिखाया होता...!!! हम पाठकों के ठहाके तो तब और ज़ोर-ज़ोर से छूटने लगते हैं, जब टीम-चयन के दौरान पहले तो एक कवि-विशेष (स्वप्निल श्रीवास्तव) को पूर्व-पीढ़ी का अंतिम कवि कहते हुये खारिज कर दिया जाता है और फिर तुरत ही उस कवि-विशेष द्वारा एतराज जताने पर पत्रिका के अगले अंक में उन्हें अपनी पीढ़ी का प्रथम कवि मान लिया जाता है... हाय रेsss , इतनी उलझन तो भारतीय क्रिकेट-टीम के चयनकर्ताओं के दरम्यान भी नहीं हुई होगी टीम चुनते समय।


इस पूरे “लॉन्ग नाईन्टीज” विमर्श में कॉन्स्पिरेसी की तमाम कलई तब बिखरती नज़र आती है, जब पहले तो ये सफाई दी जाती है कि कविता या साहित्य में दशकवाद घातक है... किसी दौर की रचना पर दशक के अनुसार विमर्श उचित नहीं और फिर तुरत ही अपनी दुदुंभी बजाने की उत्कंठा में ऐलान किया जाता है कि किन्तु लॉन्ग नाईन्टीज समय का प्रस्थान बिन्दु है... और जिसे पढ़ कर कविताई-आतंक से खौफ़ खाये हम पाठक मुस्कुराने लगते हैं इस शातिरपने पर। कैसी कविताकहाँ की कविता कि जिसके सत्यापन के लिए एक पत्रिका के तीन से चार अंकों में जाने कितने पन्ने काले कर दिये गये। हम कविताशिक़ पाठक जो अधिकांशतया गद्य के अनुच्छेदों की ऊपर-नीचे कर दी गई पंक्तियों को इन महाकवियों द्वारा कविता कह दिये जाने पर आँख मूँद भरोसा कर लेते हैं और पढ़ते जाते हैं कि एक जुमले में ही सहीकहीं तो कविता का कवितापन दिख जाये...मगर हाय रे हतभाग! महाप्राण निराला के मुक्त-छंद” के आह्वान को कब चुपके-चुपके छंद-मुक्त” बना दिया गया और होने लगे तमाम तरह के विमर्श भी उस पर... कविता की कॉन्सपिरेसी थ्योरी में ये सबसे अव्वल नंबर पर आती है। उधर पश्चिम में, पोएट्री फ्री-वर्स” ही है अब तलक...उस जानिब किसी ने वर्स-फ्री” बनाने की हिमाकत नहीं की है। क्योंकि उस जानिब अभी भी कविता को कविता बनाए रखना ही सबसे बड़ा विमर्श है ना कि कथित आलोचकों का मुंह जोहना। लेकिन इस मुद्दे पर तो अब कुछ भी बोलना हाथी-चले-बाज़ार-कुत्ता-भूँके-हजार की तर्ज़ पर ही होता है अक्सर, जहाँ हाथी बिला शक वर्तमान कवियों की पूरी टोली के लिए आया है जो मदमस्त हो रौंदे चले जा रहे हैं अपने मासूम पाठकों को।


आइये, एक और थ्योरी का अवलोकन करते हैं आख़िर में। उदय प्रकाश इस दौर के महानतम कथाकार हैं और जिस पर शायद ही किसी को संदेह हो, जिनकी कहानियों का तिलिस्म हम सब पर सम्मोहन की तरह छाया हुआ है और हमारी पूरी पीढ़ी ख़ुद को ख़ुशक़िस्मत मानती है कि हमने उस दौर में जन्म लिया जिसमें उदय प्रकाश ने कहानियाँ लिखीं। वही उदय प्रकाश अक्सर ही अपने वक्तव्यों में, विभिन्न साक्षात्कारों में ख़ुद को कहानीकार मानने से इंकार करते हैं और ख़ुद को एक कवि मनवाने में ही व्यस्त रहते हैं। हम जैसे उनकी मुहब्बत में डूबे उनके भक्तों को ये उनकी विनम्रता लगती है... लेकिन अतिशय विनम्रता भी कई बार संदेह की जननी होती है। ऐसा कह कर या ऐसा घोषित कर के शायद वो कविता के उस सिंहासन पर स्वयमेव जा बैठे हैं,जहाँ से वो जिसे चाहे महान कवि होने का कवच-कुंडल प्रदान कर सकते हैं। अभी हाल का ही भारत भूषण अग्रवाल सम्मान का विवाद इसी ओर इशारा नहीं करता? उस सिंहासन से जारी हुआ फ़रमान जहाँ एक स्थापित विलक्षण कवियत्री, जिससे हम पाठक हिन्दी-कविता के लिए ढेर सारी उम्मीदें बाँधे हुए थे, की अति-साधारण सी(अमूमन हर पाठकों के लिए) कविता को एकदम से साल की श्रेष्ठ कविता बना देता है, वहीं पैरोडी नामक एक चीप-सी विधा को कविता के प्रांगण में दाख़िला करवा देता है। निकट ही इसी कॉन्सपिरेसी का साइड-इफेक्ट यूँ होता है कि दो-तीन प्रतिभाशाली युवा कवियों की टोली छ्दम स्त्री नाम से फेसबुक पर कविता का हाहाकार मचा देती है। सोशल मीडिया पर उठे तूफ़ान के पीछे ज़रा सा हम झाँक कर देखें तो यह छद्म कविताई हाहाकार एक तरह से विरोध है इन युवा-कवियों का जो सवाल उठाता है कि यदि पोएटरी मैनेजमेंट उनमें से किसी ने लिखा होता तो शायद किसी का ध्यान तक नहीं जाता इस कविता पर।  


सच कहूँ, तो यह सब सोच कर एक सिहरन सी होने लगती एकदम से...कुछ कुछ वैसी ही सिहरन जो गुमनामी बाबा के सुभाष चंद्र बोस होने और उनके उस हवाई दुर्घटना में ज़िंदा बच जाने की बातों को सुन कर उत्पन्न होती है या फिर चाँद पर नील आर्मस्ट्रोंग के न उतरे होने की बाबत सुन कर कि वीडियो में तो आर्मस्ट्रोंग के पीछे का अमेरिकन फ्लैग लहराता दिखता है जबकि चाँद पर तो हवा होती ही नहीं...


और कविता की इन तमाम कॉन्सपिरेसी थ्योरी से बौखलाया हुआ ये कविताशिक़,प्रार्थना करता हुआ कि ये सब सिर्फ और सिर्फ एक थ्योरी ही हो और कविता इनसे परे,इन सबसे हट कर अभी भी शायद पवित्र बची हुई हो, लौटता है मुक्तिबोध की ओर आश्रय के लिए पुन:  

उन्हीं के शब्दों में –

खोजता हूँ पठार...पहाड़...समुन्दर
जहाँ मिल सके मुझे
मेरी वह खोयी हुई
परम अभिव्यक्ति अनिवार
आत्म-संभवा !

10 May 2016

तीन रोज़ इश्क़

“चार दिन की ज़िंदगी, तीन रोज़ इश्क़”...गुलज़ार जब ऐसा कहते हैं तो जफ़र से कहीं बहुत आगे निकल आते हैं जिन्होंने कहा कि “उम्रे-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन, दो आरजू में कट गए दो इंतज़ार में” | बहुत-बहुत सारी ख़ुशी और बहुत-बहुत सारी उदासी के बीच कहीं डूबती-उतराती कहानियों के साथ पूजा उपाध्याय जब
अपनी किताब “तीन रोज़ इश्क़” लेकर आती हैं तो जफ़र से लेकर गुलज़ार के पड़ाव के बीच और फिर उस से आगे की...कहीं बहुत आगे की किसी गुमशुदा-सी यात्रा पर लिए चलती हैं हम पाठकों को | “तीन रोज़ इश्क़” को पढ़ना...यूँ कि जैसे अल्फ़ाज़ की खुदी हुई नींव पर कहानियों का नया प्लॉट खड़ा करना है...या कि जैसे क़िस्सागोई की किसी बुलंद इमारत पर चंद और  फ्लोर्स को उठाना...या...या कि जैसे आस-पास के लगते किरदारों के बीच कुछ एलिएन्स को आमंत्रित कर उन्हें अपने पड़ोस में बसा लेना |

तक़रीबन एक सौ सत्तर पृष्ठों में एक नहीं, दस नहीं...पूरी छियालीस कहानियों के ज़रिये लेखिका हमें इस डिजिटलाइज्ड हो चुकी दुनिया में रखते हुये भी क़िस्सागोई के पारम्परिक संसार में आव-भगत करती हैं और वो भी पूरे ढ़ोल-पिपही के साथ | कहने का मंतव्य ये कि समकालीन समय में लिखी जा रही अधिकांश कहानियाँ जब आस-पड़ोस की किसी न किसी घटना या फिर लेखक के अपने जीवन में घटित होने वाली बातों से प्रेरित रहती हैं, तीन रोज़ इश्क़” को पढ़ते हुये आप साफ़ महसूस करेंगे कि ये सारे क़िस्से लेखिका की कल्पनाशीलता...सिर्फ और सिर्फ कल्पनाशीलता की उपज हैं | पढ़ते हुये या पढ़ लेने के बाद इस अहसास के सिर उठाते ही आप लेखिका के प्रति एक अपरिभाषित से “आव”...एक...एक तारीफ़ भरे सम्मान या कुछ ऐसी ही मिली-जुली अनुभूतियों से भर उठते हैं |

किताब सुनाती है कहानी...एक नीली नदी के किनारे बसे ख़्वाब रंगते रंगरेजों और दुआएं बुनते जुलाहों की...मंटो से दोज़ख में हॉट-लाइन पर बात करती एक सरफ़िरी लड़की की...किसी गुमशुदा हॉस्पिटल के आदमख़ोर कमरों में क़ैद रूहों की बेआवाज़ क्रांतियों की...वायलिन की स्ट्रींग्स पर अपनी ऊँगलियों को लहूलुहान करती और भाई को याद करते हुये छुटकी पर लाड़ बरसाती इश्क़ियायी बहन की...रात के टीसते ज़ख़्मों पर सस्ती शराब छिड़क कर आग लगाते प्रेमियों की...सिगरेट की डिब्बी पर किसी लड़की के नाम के उर्वर अक्षरों को तलाशते एक लड़के की...अपनी मुहब्बत को अपने ही दोस्त पर क़ुरबान करते सुसाइडल आशिक़ के एकालाप की...रूठे सूरज की उदास नज़मों को सुनाने वाले एक पोस्टकार्ड की...कच्ची उम्र की पीठ पर शाबासी के लिए फेरे गए हाथों में छुपे घृणित वासनाओं की...लवर्स से बेस्ट फ्रेंड्स के दरम्यान के एक कनफ्यूज से टू एंड फ्रो जर्नी की...धड़कनों की डिसिप्लिन को तोड़ती किसी निगाहों में डूबी जाती चालीस साला स्त्री की...कुरियर के पार्सल में आये हुये किसी लम्स के फिंगरप्रिंट को समोए एक साबुन की...कलाई की नस काट कर खून की पिचकारी से बनाए गए किसी पेंटिंग की...कवि को लिखती हुई एक कविता की...और जिस्मों के काले जादू की |

कैसी तो कैसी कहानियाँ...टीस छेड़तीं...हुकहुकी उठातीं...अजब-गज़ब सी लड़कियों की कहानियाँ | कहानी...उस लड़की की जो कटी ऊँगली से रिसते ख़ून को व्हिस्की में डालकर कॉकटेल बनाती है | कहानी...उस लड़की की जिससे ख़ुद आसमान ही इश्क़ कर बैठा इक रोज़ | कहानी...उस लड़की की जो जब मुसकुराती है तो उसकी आँखों का काजल उसके प्रेमी की रातों में बह आता है | कहानी...उस लड़की की जो चाँद के संग अपने बाइक पर रेसिंग करती है | कहानी...नागफनी से आहिस्ता-आहिस्ता  टकीला बनती लड़की की | कहानी...वो एक नीली बोगनविलिया की टूटी पंखुरियाँ ढूँढने वाली लड़की की | कहानी...सुनहली रेत वाले देश के शहजादे को ऊसर मिट्टी की दास्तान सुनाने वाली लड़की की | कहानी...घोड़े पर शहर दर शहर दर घूम कर अनगिन पुरुषों से प्रेम करने वाली लड़की की | कैसी तो कैसी लड़कियाँ और उनकी कैसी तो कैसी कहानियाँ...कि इन कहानियों को पढ़ो तो उन लड़कियों को ढूंढ कर उनके इश्क़ में डूब जाने का जी करे |

ये कहानियाँ अपने मूल रूप में इश्क़ की कहानियाँ हैं | समस्त कहानियाँ आपस में जुदा होकर भी घुली-मिली सी...और कई बार एक-दूजे का एक्सटेंशन सी प्रतीत होती हैं | दरअसल पूजा उपाध्याय की ये कहानियाँ अपने-आप में क़िस्सागोई से परे कुछ अद्भुत किरदारों को बुनने की व्याकुलता है और इसी व्याकुलता के चरम पर कई बार कहानियाँ अपना कथ्य खोकर किरदार का एकालाप बन कर रह जाती हैं | लेकिन इस बारे में लेखिका कोई मुगालता भी नहीं रखतीं कि इस किताब का टैगलाइन ही है “गुम होती कहानियाँ” और किताब का बैक-कवर पहले ही ऐलान करता है कि “इन छोटी कहानियों में एक चोर दरवाज़ा है जिससे आप कहानी में दाख़िल होकर उसे जी सकते हैं” ...अब ये जिस चोर दरवाज़े का लेखिका ऐलान करती हैं, वो पाठक-दर-पाठक मुखतलिफ़ खुलता है | किसी पर कहानी की पहली पंक्ति के साथ ही तो किसी के साथ कहीं बीच में...एकदम भक्क से कि अरे ! ये क्या !! ...और इन सब पर तुर्रा ये कि भाषा-सौंदर्य की चौंध आपकी मिचमिचायी आँखों के सामने कब कोई नया दरवाज़ा खोल देगी, आपको पता ही नहीं चलेगा | ये कहानियाँ एक क़िस्म की ढीटाई सी करती हैं...पाठको को टीज़ करती हुई कि जैसे ही आप उस चोर दरवाज़े से अंदर दाख़िल हुए कि वो गुम हो गईं और ये ढिठाई जहाँ एक अजीब सा सस्पेंस देती है, वहीं क़िस्सागोई के शिल्प को एक नया आयाम भी |

ये छोटी-छोटी कहानियाँ बाज़ दफ़ा किरदारों की डायरियों के या उनके लिखे ख़तों का भान दिलाती हैं और कई-कई बार किसी क़िस्से के गुमशुदा पड़े विस्तृत प्लॉट की उपलब्धि का आभास भी कराती हैं | भगजोगनी याद होगा आप सब को...भगजोगनी...शिवपूजन सहाय की भगजोगनी...उनकी चर्चित कहानी “कहानी का प्लॉट” की भगजोगनी | तो ऐसी कई भगजोगनियाँ’, पूजा उपाध्याय अपनी इस किताब में हमारे लिए छोड़ गई हैं...कोई आए उठा ले इनको और बुन ले एक नई कहानी | इसे लेखिका का शायद ख़ुद का लिमिटेशन कहा जा सकता है, जो कि एक्सप्लोर किया जाना माँगता है...खुद उनके द्वारा ही | पूजा उपाध्याय की कहानी बुनने की कला जैसे कि मानो एक छुपा हुआ ब्लास्ट है, जिसकी तीव्रता अभी पाठकों तक पहुंचनी है | हम जैसे कुछ जो इस ब्लास्ट की रेडियस में आ चुके हैं, उनकी इस क़िस्सागोई के महत्तम तक जाना चाहते हैं अब | क्योंकि लेखिका के अंदर का छुपा हुआ कथाकार किताब की आख़िरी कहानी, जो इस किताब की शीर्षक कहानी है और जो इकलौती लंबी कहानी भी है, में हम पाठकों से मानो पूछता सा प्रतीत होता  है कि सुनो हम लम्बी कहानी भी सुना सकते हैं...वक़्त है तुम्हारे पास ना ?

किताब का आवरण टैगलाइन को सार्थक करता है, साथ ही पेंगुइन की छपाई और बाइंडिंग फील-गुड का अहसास देती है पढ़ते वक़्त | साल भर में अपने पहले संस्करण को सोल्ड आउट कर चुकी ये किताब इतनी घोषणा तो करती ही है कि इसे पाठकों द्वारा पसंद किया जा रहा है किताब ऑन-लाइन खरीदने के लिए इस लिंक पर जाया जा सकता है :-




अव्वलो आख़िरश दरम्याँ दरम्याँ...पूजा उपाध्याय को ढ़ेर दुआयें कुछ अद्भुत किरदारों से हमें मिलवाने के लिए और समस्त शुभकामनायें कि ये किताब और और पाठकों तक पहुँचें !