ईद का दिन है गले आज तो मिल ले ज़ालिम
रस्मे-दुनिया भी है, मौका भी है, दस्तूर भी है
मुगलिया सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के इस शेर को ईद के पावन मौके पर सुनाने से रोक नहीं पाता खुद को- विशेष कर अपनी चंद महिला-मित्रों को। फिलहाल चलिये एक ग़ज़ल सुनाता हूँ अपनी। ज़मीन अता की सुख़नवरी के पितामह मीर ने। "दिखाई दिये यूँ कि बेखुद किया, हमें आपसे ही जुदा कर चले" - इस एक ग़ज़ल के लिये शायद अब तक की सबसे महानतम जुगलबंदी हुई है। देखिये ना, अब जिस ग़ज़ल को लिखा हो मीर ने, संगीत पे ढ़ाला हो खय्याम ने और स्वर दिया हो लता जी ने...ऐसी बंदिश पे तो कुछ भी कहना हिमाकत ही होगी। ...और इस ग़ज़ल का ये शेर "परस्तिश की याँ तक कि ऐ बुत तुझे / नजर में सभू की खुदा कर चले" मुझे एक जमाने से पसंद रहा है। इसी शेर का मिस्रा दिया गया था तरही के लिये आज की ग़ज़ल पे एक बेमिसाल मुशायरे के लिये। तो पेश है मेरी ये ग़ज़ल:-
हुई राह मुश्किल तो क्या कर चले
कदम-दर-कदम हौसला कर चले
उबरते रहे हादसों से सदा
गिरे, फिर उठे, मुस्कुरा कर चले
लिखा जिंदगी पर फ़साना कभी
कभी मौत पर गुनगुना कर चले
वो आये जो महफ़िल में मेरी, मुझे
नजर में सभी की खुदा कर चले
बनाया, सजाया, सँवारा जिन्हें
वही लोग हमको मिटा कर चले
खड़ा हूँ हमेशा से बन के रदीफ़
वो खुद को मगर काफ़िया कर चले
उन्हें रूठने की है आदत पड़ी
हमारी भी जिद है, मना कर चले
जो कमबख्त होता था अपना कभी
उसी दिल को हम आपका कर चले
{भोपाल से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका "सुख़नवर" के जुलाई-अगस्त 10 वाले अंक में प्रकाशित}
...इस ज़मीन से परे लेकिन इसी बहर पे एक ग़ज़ल जो याद आती है वो बशीर बद्र साब की लिखी और चंदन दास की गायी "न जी भर के देखा न कुछ बात की / बड़ी आरजू थी मुलाकात की" तो आप सब ने सुनी ही होगी। अरे हाँ, प्रिंस फिल्म में जब शम्मी कपूर महफ़िल में बैजन्ती माला को देखकर एक खास लटक-झटक के साथ गाते हैं बदन पे सितारे लपेटे हुए..., तो इसी बहर पे गाते हैं।
इधर ब्लौग-जगत अपना फिर से व्यर्थ के विवादों में पड़ा है। विवादों से परे हटकर जरा लता दी की "दिखाई दिये यूं..." को रफ़ी साब की मस्ती में "बदन पे सितारे..." की धुन पे गाईये, या उल्टा! बड़ा मजा आयेगा...!
चलते-चलते, मनु जी का ये बेमिसाल शेर सुन लीजिये इसी मुशायरे से:-
खुदाया रहेगी कि जायेगी जां
कसम मेरी जां की वो खा कर चले
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21 September 2009
18 May 2009
कातिलों का सरगना तो हाय मेरा यार है...
...जमीन अता की है शहरयार साब ने, जिसे आसमान की बुलंदी तक ले जाने में मशहूर संगीतकार खैय्याम साब और स्वर-साम्राग्यी आशा भोंसले की अहम भूमिका रही। ये क्या जगह है दोस्तों ये कौन सा दयार है। इसी जमीन पर अपनी एक गज़ल पेश है
खबर मिली है जब से ये कि उनको हमसे प्यार है
नशे में तब से चाँद है, सितारों में खुमार है
मैं रोऊँ अपने कत्ल पर, या इस खबर पे रोऊँ मैं
कि कातिलों का सरगना तो हाय मेरा यार है
ये जादू है लबों का तेरे या सरूर इश्क का
कि तू कहे है झूठ और हमको ऐतबार है
सुलगती ख्वाहिशों की धूनी चल कहीं जलायें और
कुरेदना यहाँ पे क्या, ये दिल तो जार-जार है
ले मुट्ठियों में पेशगी महीने भर मजूरी की
वो उलझनों में है खड़ा कि किसका क्या उधार है
बनावटी ये तितलियाँ, ये रंगों की निशानियाँ
न भाये अब मिज़ाज को कि उम्र का उतार है
भरी-भरी निगाह से वो देखना तेरा हमें
नसों में जलतरंग जैसा बज उठा सितार है
...और आखिरी में चचा ग़ालिब से क्षमा-याचना सहित*
तेरे वो तीरे-नीमकश में बात कुछ रही न अब
खलिश तो दे है तीर, जो जिगर के आर-पार है
( त्रैमासिक पत्रिका "नयी ग़ज़ल" के अक्टूबर-दिसंबर 09 वाले अंक में प्रकाशित)
* कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरे-नीमकश को
वो खलिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता
* कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरे-नीमकश को
वो खलिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता
हलफ़नामा-
ग़ज़ल,
तरही मुशायरा,
त्रैमासिक नयी ग़ज़ल,
बहरे हज़ज मुसमन मकबूज़,
शहरयार
09 April 2009
हुआ अब इश्क ये आसान बस इतना समझ लीजे...
उस दिन सतपाल ख्याल जी के आज की ग़ज़ल पर नसीम भरतपु्री साब की एक ग़ज़ल के मिस्रे पर तरही मुशायरे का आयोजन हुआ था और लगभग पच्चीस शायरों ने हिस्सा लिया। मिस्रा था "कभी इन्का़र चुटकी मे कभी इक़रार चुटकी मे"। तमाम शायरों को पढ़कर इतनी हैरानी हुई कि कैसे महज एक मिस्रे पे और करीबन मिले-जुले काफ़ियों पर कितने जुदा-जुदा खयाल निकल कर सामने आये...तो उसी मुशायरे में इस अदने को भी अपनी ग़ज़ल को शामिल करने का अवसर दिया गया था। पेश है वो ग़ज़ल:-
निगाहों से जरा-सा वो करे यूँ वार चुटकी में
हिले ये सल्तनत सारी, गिरे सरकार चुटकी में
न मंदिर की ही घंटी से, न मस्जिद की अज़ानों से
करे जो इश्क, वो समझे जगत का सार चुटकी में
कहो सीखे कहाँ से हो अदाएँ मौसमी तुम ये
कभी इन्कार चुटकी मे,कभी इक़रार चुटकी मे
झटककर ज़ुल्फ़ को अपनी, कभी कर के नज़र नीची
सरे-रस्ता करे वो हुस्न का व्योपार चुटकी में
नहीं दरकार है मुझको, करूँ क्यों सैर दुनिया की
तेरे पहलु में देखूँ जब, दिशाएँ चार चुटकी में
कई रातें जो जागूँ मैं तो मिसरा एक जुड़ता है
उधर झपके पलक उनकी, बने अशआर चुटकी में
हुआ अब इश्क ये आसान बस इतना समझ लीजे
कोई हो आग का दरिया, वो होवे पार चुटकी में
{ये शेर चचा ग़ालिब से क्षमा-याचना सहित}
उसी मुशायरे से कुछ अन्य शेर जो मुझे बहुत भाये, वो भी सुन लीजिये:-
मुफ़लिस जी
बहुत मग़रूर कर देता है शोहरत का नशा अक्सर
फिसलते देखे हैं हमने कई किरदार चुटकी में
खयालो-सोच की ज़द में तेरा इक नाम क्या आया
मुकम्मिल हो गये मेरे कई अश`आर चुटकी में
द्विज जी
डरा देगा तुम्हें गहराइयों का ज़िक्र भी उनकी
जो दरिया तैर कर हमने किए हैं पार चुटकी में
मनु जी
वजूद अपना बहुत बिखरा हुआ था अब तलक लेकिन
वो आकर दे गया मुझको नया आकार चुटकी में
पूर्णिमा वर्मन जी
ख़ुदाया कौन-से बाटों से मुझको तौलता है तू
कभी तोला, कभी माशा, कभी संसार चुटकी में
नवनीत शर्मा जी
सुनो, जागो, उठो, देखो कि बरसों बाद मौका है
अभी तुमको गिराने हैं कई सरदार चुटकी में
सतपाल जी
हमारा ज़िक्र जब छेड़ा किसी ने उसकी महफ़िल में
हुए हैं सुर्ख़ तब उसके लबो-रुख़सार चुटकी में
दिगम्बर नासवा जी
ये घर का राज़ है तुम दफ़्न सीने मे करो इसको
नहीं तो टूट जायेंगे दरो-दीवार चुटकी में
मुनीर अरमान नसीमी जी
तुम्हारी इक निगाहे नाज़ के सदक़े मैं ऐ जानाँ !
हुए हैं *ख़म न जाने कितने ही सरदार चुटकी में
दर्पण शाह जी
लगे है सरहदें 'दर्शन', घरों के बीच की दूरी,
मिला तू हाथ हाथों से, गिरा दीवार चुटकी में
....ये तो बस कुछ झलकियाँ हैं। पूरा मुशायरा सुनना हो तो यहाँ और यहाँ क्लीक कर देखें।
निगाहों से जरा-सा वो करे यूँ वार चुटकी में
हिले ये सल्तनत सारी, गिरे सरकार चुटकी में
न मंदिर की ही घंटी से, न मस्जिद की अज़ानों से
करे जो इश्क, वो समझे जगत का सार चुटकी में
कहो सीखे कहाँ से हो अदाएँ मौसमी तुम ये
कभी इन्कार चुटकी मे,कभी इक़रार चुटकी मे
झटककर ज़ुल्फ़ को अपनी, कभी कर के नज़र नीची
सरे-रस्ता करे वो हुस्न का व्योपार चुटकी में
नहीं दरकार है मुझको, करूँ क्यों सैर दुनिया की
तेरे पहलु में देखूँ जब, दिशाएँ चार चुटकी में
कई रातें जो जागूँ मैं तो मिसरा एक जुड़ता है
उधर झपके पलक उनकी, बने अशआर चुटकी में
हुआ अब इश्क ये आसान बस इतना समझ लीजे
कोई हो आग का दरिया, वो होवे पार चुटकी में
{ये शेर चचा ग़ालिब से क्षमा-याचना सहित}
उसी मुशायरे से कुछ अन्य शेर जो मुझे बहुत भाये, वो भी सुन लीजिये:-
मुफ़लिस जी
बहुत मग़रूर कर देता है शोहरत का नशा अक्सर
फिसलते देखे हैं हमने कई किरदार चुटकी में
खयालो-सोच की ज़द में तेरा इक नाम क्या आया
मुकम्मिल हो गये मेरे कई अश`आर चुटकी में
द्विज जी
डरा देगा तुम्हें गहराइयों का ज़िक्र भी उनकी
जो दरिया तैर कर हमने किए हैं पार चुटकी में
मनु जी
वजूद अपना बहुत बिखरा हुआ था अब तलक लेकिन
वो आकर दे गया मुझको नया आकार चुटकी में
पूर्णिमा वर्मन जी
ख़ुदाया कौन-से बाटों से मुझको तौलता है तू
कभी तोला, कभी माशा, कभी संसार चुटकी में
नवनीत शर्मा जी
सुनो, जागो, उठो, देखो कि बरसों बाद मौका है
अभी तुमको गिराने हैं कई सरदार चुटकी में
सतपाल जी
हमारा ज़िक्र जब छेड़ा किसी ने उसकी महफ़िल में
हुए हैं सुर्ख़ तब उसके लबो-रुख़सार चुटकी में
दिगम्बर नासवा जी
ये घर का राज़ है तुम दफ़्न सीने मे करो इसको
नहीं तो टूट जायेंगे दरो-दीवार चुटकी में
मुनीर अरमान नसीमी जी
तुम्हारी इक निगाहे नाज़ के सदक़े मैं ऐ जानाँ !
हुए हैं *ख़म न जाने कितने ही सरदार चुटकी में
दर्पण शाह जी
लगे है सरहदें 'दर्शन', घरों के बीच की दूरी,
मिला तू हाथ हाथों से, गिरा दीवार चुटकी में
....ये तो बस कुछ झलकियाँ हैं। पूरा मुशायरा सुनना हो तो यहाँ और यहाँ क्लीक कर देखें।
हलफ़नामा-
ग़ज़ल,
तरही मुशायरा,
नसीम भरतपुरी,
बहरे हज़ज
10 February 2009
हरी है ये जमीं हमसे कि हम तो इश्क बोते हैं
बशीर बद्र साब का एक शेर जो मेरे पसंदीदा शेरों में से रहा है:-
यही अंदाज़ है मेरा समन्दर फत्ह करने का
मेरी क़ाग़ज की कश्ती में कई जुगनू भी होते हैं
और बद्र साब के इसी गज़ल का एक मिस्रा है "मुहब्बत करने वाले खूबसूरत लोग होते हैं"। इस मिस्रे पे एक तरही मुशायरे का आयोजन करवाया था गुरू जी ने। तो पेश है बद्र साब की इस जमीन पर मेरा प्रयास।
बहर है-->बहरे हज़ज मुसमन सालिम
वजन है-->१२२२-१२२२-१२२२-१२२२ {4 X मुफ़ाईलुन}
हरी है ये जमीं हमसे कि हम तो इश्क बोते हैं
हमीं से है हँसी सारी, हमीं पलकें भिगोते हैं
धरा सजती मुहब्बत से, गगन सजता मुहब्बत से
मुहब्बत करने वाले खूबसूरत लोग होते हैं
करें परवाह क्या वो मौसमों के रुख बदलने की
परिंदे जो यहाँ परवाज़ पर तूफ़ान ढ़ोते हैं
अज़ब से कुछ भुलैंयों के बने हैं रास्ते उनके
पलट के फिर कहाँ आये, जो इन गलियों में खोते हैं
जगी हैं रात भर पलकें, ठहर ऐ सुब्ह थोड़ा तो
मेरी इन जागी पलकों में अभी कुछ ख्वाब सोते हैं
मिली धरती को सूरज की तपिश से ये खरोंचे जो
सितारे रात में आकर उन्हें शबनम से धोते हैं
लकीरें अपने हाथों की बनाना हमको आता है
वो कोई और होंगे अपनी किस्मत पे जो रोते हैं
(भोपाल से निकलने वाली द्विमासिक पत्रिका "सुख़नवर" के जनवरी-फरवरी १० अंक में प्रकाशित)
यही अंदाज़ है मेरा समन्दर फत्ह करने का
मेरी क़ाग़ज की कश्ती में कई जुगनू भी होते हैं
और बद्र साब के इसी गज़ल का एक मिस्रा है "मुहब्बत करने वाले खूबसूरत लोग होते हैं"। इस मिस्रे पे एक तरही मुशायरे का आयोजन करवाया था गुरू जी ने। तो पेश है बद्र साब की इस जमीन पर मेरा प्रयास।
बहर है-->बहरे हज़ज मुसमन सालिम
वजन है-->१२२२-१२२२-१२२२-१२२२ {4 X मुफ़ाईलुन}
हरी है ये जमीं हमसे कि हम तो इश्क बोते हैं
हमीं से है हँसी सारी, हमीं पलकें भिगोते हैं
धरा सजती मुहब्बत से, गगन सजता मुहब्बत से
मुहब्बत करने वाले खूबसूरत लोग होते हैं
करें परवाह क्या वो मौसमों के रुख बदलने की
परिंदे जो यहाँ परवाज़ पर तूफ़ान ढ़ोते हैं
अज़ब से कुछ भुलैंयों के बने हैं रास्ते उनके
पलट के फिर कहाँ आये, जो इन गलियों में खोते हैं
जगी हैं रात भर पलकें, ठहर ऐ सुब्ह थोड़ा तो
मेरी इन जागी पलकों में अभी कुछ ख्वाब सोते हैं
मिली धरती को सूरज की तपिश से ये खरोंचे जो
सितारे रात में आकर उन्हें शबनम से धोते हैं
लकीरें अपने हाथों की बनाना हमको आता है
वो कोई और होंगे अपनी किस्मत पे जो रोते हैं
(भोपाल से निकलने वाली द्विमासिक पत्रिका "सुख़नवर" के जनवरी-फरवरी १० अंक में प्रकाशित)
हलफ़नामा-
ग़ज़ल,
तरही मुशायरा,
त्रैमासिक सुखनवर,
बशीर बद्र,
बहरे हज़ज
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