07 August 2017

कितने हाथों में यहाँ हैं कितने पत्थर, गौर कर...

{कथादेश के जून 2017 अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का चौथा पन्ना}

इन दिनों दुष्यंत का एक शेर अपने पूरे उफ़ान पर है नीचे वादी में आजादी के नारों के साथ...”कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो” | ख़ूब-ख़ूब उछाले जा रहे हैं पत्थर | वादी में पत्थरों पर बरस रही इनायत इन दिनों ख़ुदा की जानिब उछाली गयी दुआओं पर भी भारी पड़ रही है | शिद्दत से उछाले जा रहे हैं पत्थर...तबीयत से उछाले जा रहे हैं पत्थर | लेकिन कमबख्त सूराख नहीं हो रहा आकाश में । वर्दियों के सर फूट रहे हैं, कंधे चटख रहे हैं, घुटने खिसक रहे हैं...लेकिन आसमान में छेद नहीं हो रहा और हो भी कैसे ! जब दुष्यंत तबीयत से पत्थर उछालने का आह्‍वान कर गये थे तो उसमें सच्चाई की ताकत वाली बात छुपी हुई थी | यहाँ बहके हुए, भटके हुए किसी छद्म सपने के आगोश में लिपटे हुये पत्थर भले ही कितनी ही तबियत से उछाले जा रहे हों, उनकी पहुँच सर-कंधों-घुटनों तक ही सीमित रहने वाली है...आसमान में छेद करने की बिसात नहीं है इनकी | पत्थरों की ये बारिश हम तक भी नहीं पहुँच रही इन ऊँचे तुंग पहाड़ों पर |

 नीचे गाँव से हमारे राशन और अन्य सामान लाने वाले कश्मीरी पोर्टरों को कल लंगर में अपने जवानों के साथ बैठ कर खाना खाते देख कर रोक ना पाया ख़ुद को | शामिल हो गया उनकी पंगत में और जब पूछा उनसे कि उधर नीचे वादी के अपने भाई-बंधुओं की तरह तुमलोग भी क्यों नहीं पत्थर उठाते इस जानिब...इक्कीस वर्षीय उस्मान छेती के जवाब ने सुड़पते मटन की सरसराहट के मध्य एक जबरदस्त सम्मिलित ठहाकों की ऐसी गूँज उठायी कि मैं घबड़ा ही गया कहीं एवलांच ना आ जाए !  उस्मान ने हौले से आदाब करते हुए अपनी छितरी-छितरी दाढ़ी में छुपे होठों पर एक दिलकश मुस्कान बिखेरते हुए कहा कि “ऐसा है ना साब, नीचे वादी में दुआ के लिए सजदे में झुकी कमर पर भी आजादी लिख दी गयी है | जैसे भूत की कहानी सुन-सुन कर बड़े हुए बच्चे जानते हैं कि भूत नहीं होता, फिर भी भूतों की कहानियाँ सुनते हैं...सुनाते हैं...कुछ वैसा ही हाल नीचे वादी के लड़कों का है | आजादी क्या है, नहीं है...कुछ नहीं मालूम उन लड़कों को...लेकिन बचपन से सुनते आये हैं तो आजादी कह रहे हैं, आजादी बोल रहे हैं और साथ में मस्ती के लिए पत्थर फ़ेंक रहे हैं !”

इधर इन बरसते पत्थरों से मन उतना विचलित नहीं होता, जितना झेलम की उदासीनता से | जी करता है, इस मौन-शांत प्रवाह में रमी झेलम को झिंझोड़ कर कहूँ कि तू इतनी निर्विकार कैसे रह सकती है जब तेरे किनारे खेलने-कूदने वाले बच्चे राह भटक रहे हैं चंद सरफ़िरों के इशारे पर | इन "भारतीय कुत्तों वापस जाओ" के नारों से मन उतना खिन्न नहीं होता जितना चिनारों के बदस्तूर खिलखिलाने से | मन करता है वादी के एक-एक चिनार को झकझोड़ कर पूछूँ कि तुम इतना खिलखिला कैसे सकते हो जब तुम्हारी छाया में पले-बढ़े नौनिहाल तुम्हारे अपने ही मुल्क को गंदी गालियाँ निकाल रहे हों | इन आजादी की बेतुकी माँगों से मन उतना उदास नहीं होता जितना बगीचों में ललियाते रस लुटाते सेबों को देखकर होता है। दिल करता है इस सेबों को कुतर-कुतर कर कहूं कि किस काम का तुम्हारे मीठे स्वाद जब तुम्हें चख कर बड़े हुए लड़के ऐसे कड़वे नारे बुलंद कर रहे हों ! 

जी करता है...मन करता है...दिल करता है...बस यूँ ही करता रहता है ! कर कुछ नहीं पाता हक़ीकत में ! ऐसे में निराश मन जब अखबारों, चैनलों और सोशल मीडिया पर नजर दौड़ाता है तो वहाँ से भी उसे दुत्कार मिलती ही दिखती है | हर तरफ...हर ओर | निष्पक्ष मिडिया, ईमानदार बंधुगण कश्मीर के जख्मी लोगों की तस्वीर तो दिखाते हैं लेकिन उनके कैमरे के लैंस, उनकी कलम की स्याही जाने कैसे फूटे सर वाले पुलिसकर्मी, टूटे कंधों वाले सीआरपीएफ़ के जवान और लंगड़ाते सुरक्षाबलों की टुकड़ी को नजरंदाज कर जाते हैं | इन टूटे-फूटे सुरक्षाकर्मियों की तस्वीर टीआरपी रेटिंग जो नहीं बढ़ाती...इन लंगड़ाते-कराहते पुलिसवालों का जिक्र फेसबुक पर बहस जो नहीं बढ़ाता !

कैसे-कैसे क़िस्से आ रहे हैं नीचे वादी से...तहसीलदार के कार्यालय को जलाने में लिप्त चंद सरफ़िरे युवाओं में से कुछ की मौत उसी कार्यालय में उन्हीं के द्वारा लगायी आग से फटे गैस के सिलेंडर से होती है और इल्जाम वर्दीवालों पर जाता है | कई दिनों से अस्पताल में भर्ती एक बीमार बुजूर्ग दम तोड़ते हैं और जब उनका जनाजा घर आता है तो अफवाह उड़ायी जाती है गली-कूचों में कि पुलिस के डंडों से मर गये हैं और पत्थरों की बारिश कहर बन कर टूटती है सुरक्षाकर्मियों पर | एक आठ साल का बच्चा दौड़ते हुये गिर पड़ता है और उसके तमाम भाई-बंधु उसे अकेला छोड़ कर भाग जाते हैं तो सुरक्षाबलों की टुकड़ी में हरियाणा के एक जवान को उस गिरे बच्चे को देखकर दूर गाँव में अपने बेटे की याद आती है, वो उसे अपनी गोद में उठाकर पानी पिलाता है, अपनी गाड़ी में अस्पताल छोड़ कर आता है और जब उस बच्चे की मौत हो जाती है अस्पताल में तो उसी बच्चे को बर्बरतापूर्वक कत्ल कर देने का इल्जाम भी अपने सर पर लेता है | अपने ही मुख पर “भारतीय कुत्तों” के विशेषण को सुनकर संयम बरतना बड़ा ही जिगर वाला काम है | ऐसे में सीआरपीएफ के जवानों द्वारा नीचे वादी में दर्शाया जा रहा संयम पूरी दुनिया के लिए मिसाल है | एक सरफ़िरा नौजवान एक वर्दीवाले के पास आकर उसके युनिफार्म का कालर पकड़ उसके चेहरे पर चिल्ला कर कहता है बकायदा अँग्रेजी झाड़ते हुये "यू ब्लडी इंडियन डॉग गो बैक" और बदले में वो वर्दीवाला मुस्कुराता है और सरफ़िरे नौजवान को भींच कर गले से लगा लेता...पूरी भीड़ हक्की-बक्की रह जाती है और वो वर्दीवाला अपने संयम को मन-ही-मन हजारों गालियाँ देता हुआ आगे बढ़ जाता है | एक इलाके के एसपी साब का सर बड़े पत्थर से फूट चुका है...वर्दी पूरी तरह रक्त-रंजित हो चुकी है, किंतु वो महज एक हैंडीप्लास्ट लगाकर भीड़ के सामने खड़े रहते हैं अपने मातहतों को सख्त आदेश देते हुये कि कोई भी भीड़ पर चार्ज नहीं करेगा | दूसरे दिन चिकित्सकों की टोली सर पर लगे चोट की वजह से उनके एक कान को निष्क्रिय घोषित कर देती है |

...कितने ही क़िस्से आ रहे हैं रोज़ नीचे से ऐसे-ऐसे | सुन कर अपनी और अपने जवानों की खुशकिस्मती पर रश्क होता है कि शुक्र है हम इन बर्फ़ीले पहाड़ों पर सरहद की निगरानी में हैं और उधर नीचे वादी में तैनाती नहीं है हमारी ! अगर होती तो क्या ऐसा संयम बरत पाते हम...!



24 July 2017

हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज ~ 2

वर्ष दो हजार दस का उतरार्ध था वो । जून के महीने ने अपने आगमन की किलकारी भरी ही थी । चोटियों से पिघलती बर्फ़ की आमद वादी की सतह को वो फिचफिचाती कीचड़ वाली बनाने में बड़ी शिद्दत से जुटी हुई थी । श्रीनगर से लेह को जाने वाले फ़ौजी गाड़ियों के दैनिक लंबे काफ़िले ने अभी-अभी उसकी चौकी की जिम्मेदारी वाली सड़क के लगभग पचीस किलोमीटर वाले फैलाव को पार कर पड़ोस वाले सैन्य चौकी के इलाके में प्रवेश कर लिया था । वायरलेस सेट पर इस ख़बर की पुष्टि होते ही उस नाॅट-सो-टाॅल, लेकिन निश्चित रूप से डार्क और हैंडसम कैप्टेन ने चैन की गहरी साँस भरी । पचीस किलोमीटर के फैलाव में मुस्तैदी से तैनात अपने जवानों को एलर्ट रहने की ताकीद कर वो लौट ही रहा था अपनी चौकी की तरफ कि वायरलेस पर आ रहा उत्तेजित सा संदेश उसके पूरे वजूद के संग-संग इर्द-गिर्द की हवा को भी जैसे हजार वाट का करेंट दे गया ।

"चार्ली पिकेट फाॅर टाइगर... जल्दी आओ वरना केहर सिंह मार डालेगा इस औरत को...ओवर !"

वायरलेस आॅपरेटर की आवाज़ में छुपी हुई व्याकुलता कैप्टेन के कानों से उतरती हुई रगों में दौड़ने लगी थी, जब उसने अपने ड्राइवर को जिप्सी वापस मोड़ने का हुकुम दिया चार्ली पिकेट की जानिब । बमुश्किल दस मिनट आगे ही था वो चार्ली पिकेट और इस दस मिनट में कैप्टेन साब ने हवलदार केहर सिंह का पूरा बायोडाटा अपने स्मृति-पटल पर दसियों बार दौड़ा लिया । सीधा-सादा, एकदम डिसिप्लीन्ड, दो बच्चों का पिता, तनिक वज़नदार लेकिन शारीरिक रूप से बिलकुल फिट केहर...क्या समस्या खड़ी कर सकता है वो ? जिप्सी की रफ़्तार के साथ जैसे कैप्टेन की बेचैनी रेस लगा रही थी उस सर्पिल सी टेढी-मेढी सड़क पर ।

अच्छा-खासा मजमा जमा हुआ था वहाँ, जब कैप्टेन पहुँचा । पिकेट से सटी हुई बस्ती के स्थानीय कश्मीरियों की भीड़ में घिरे पिकेट के चार जवान दूर से ही दिख रहे थे कैप्टेन को जिप्सी की विंड स्क्रीन के पार । किसी अनिष्ट की आशंका के लिये ख़ुद को तैयार करता हुआ कैप्टेन जब जिप्सी से उतरा तो बस्ती के तमाम लोग हँसते-ठिठयाते दिखे उसे और हवलदार केहर सिंह एक लगभग दस वर्षीया कश्मीरी गुड़िया को गोद में बिठाये अपने पैक्ड लंच से पूरियाँ खिला रहा था । कहानी यूँ खुली कि अनिष्ट की आशंका से डसा हुआ कैप्टेन अपने बुलंद अट्टहास को रोक ना पाया...

... उस कश्मीरी गुड़िया की माँ जाने किस आवेश में अपनी बेटी की बेतरह पिटाई कर रही थी और उस छुटकी का रुदन दूर कुमाऊँ के पहाड़ों में बैठी अपनी बेटी की याद दिला रहा था हवलदार केहर को, जो उस वक़्त अपनी ड्यूटी पर वहीं निकट खड़ा था । औरत को तीन-चार बार गुहार लगाया उसने छुटकी को छोड़ देने के लिये, मगर जब वो नहीं मानी तो फिर केहर सिंह के रौद्रावतार ने पहले तो ज़ोर का धक्का दिया औरत को और छुटकी को गोद में उठा लिया । माँ जब उग्रचंडिका बनी हुई केहर पर झपटी तो फिर सब कुछ केहर सिंह की बर्दाश्तीय क्षमता से परे हो गया था । कैप्टेन को बस्ती वालों ने बताया कि कैसे छुटकी को गोद में उठाये थप्प्ड़ों की मूसलाधार वृष्टि ले आया थे हविलदार साहिब ! छुटकी के पिताश्री समस्त बस्ती वालों के समूह में सबसे अग्रणी थे केहर के समर्थन में ये कहते हुये कि ठीक किया हविलदार साहिब ने इस बदतमीज़ औरत के साथ... ऐसे ही करती है ये बच्चों के साथ हर रोज़...अब अक़ल ठिकाने रहेगी ।

वापस लौटते हुये मुस्कुराते कैप्टेन साब के पास शाम के लिये अपनी शरीक़े-हयात को मोबाइल पर सुनाने के लिये एक दिलचस्प क़िस्सा था !







हाथ थे मिले कि ज़ुल्फ़ चाँद की संवार दूँ
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूँ ... 


( तस्वीर गूगल से साभार और आख़िर की पंक्तियाँ नीरज के एक विख्यात गीत से )

18 July 2017

इश्क़ उचक कर देख रहा है, हुस्न छुपा है ज़रा-ज़रा...

एक अरसा ही तो बीत गया जैसे ब्लौग पर कोई ग़ज़ल लगाए...तो इस 'एक अरसे' का अंत यहीं एकदम तुरत ही और एक ताज़ा ग़ज़ल:- 

आधी बातें, आधे गपशप, क़िस्सा आधा-आधा है
इसका, उसका, तुम बिन सबका चर्चा आधा-आधा है

जागी-जागी आँखों में हैं ख़्वाब अधूरे कितने ही
आधी-आधी रातों का अफ़साना आधा-आधा है

तुमसे ही थी शह्र की गलियाँ, रस्ते पूरे तुमसे थे
तुम जो नहीं तो, गलियाँ सूनी, रस्ता आधा-आधा है

इश्क़ उचक कर देख रहा है, हुस्न छुपा है ज़रा-ज़रा
खिड़की आधी खुली हुई है, पर्दा आधा-आधा है

उन आँखों से इन आँखों के बीच है आधी-आधी प्यास
झील अधूरी, ताल अधूरा, दरिया आधा-आधा है

ग़ुस्से में तो फाड़ दिया था, लेकिन अब भी अलबम में
जत्न से रक्खा फोटो का वो टुकड़ा आधा-आधा है

बाद तुम्हारे जाने के ये भेद हुआ हम पर ज़ाहिर
रोना तो पूरा ही ठहरा, हँसना आधा-आधा है


[ jankipul.com में प्रकाशित ] 

10 July 2017

इक ज़ख़्म मैं मुरीद तो इक ज़ख़्म पीर मैं...

{कथादेश के मई अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का तीसरा पन्ना}

जी ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत...कि रात-दिन बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किये हुए...ढेर-ढेर सारी फ़ुरसतें...दोस्तों-से-झूठी-मूटी-दूसरों-का-नाम-लेकर-वो-तेरी-बातें-करना-वाली फ़ुरसतें कि इन लम्बी-लम्बी रातों के अफ़साने गढ़ सकूँ इन फ़ुरसतों में | सरहद पर रातें लंबी होती हैं...अक्सर तो उम्र से भी लंबी...बेचैन, आशंकित, चौकस रतजगों में लिपटी हुईं | इन रतजगों के जाने कितने अफ़साने हैं जो लिखे नहीं जा सकते...जो सुनाये नहीं जा सकते...और सुनाये जाने पर भी इनके आम समझ से ऊपर निकल जाने का भय रहता है | युद्धइन तमाम अफ़सानों का केन्द्रीय किरदार होता | कश्मीर की दुर्गम, बर्फ़ में दबी-ढँकी ठिठुरती-सिहरती हुई सरहदों पर हर रोज़ ही तो एक युद्ध होता है | कौन देख पाता है इन अंतहीन रोज़-रोज़ के युद्धों को, सिवाय इन प्रहरियों के !

वैसे युद्ध बस सरहद पर ही नहीं लड़े जाते ! कई बार सैनिकों के लिए भी...युद्ध बस सरहद पर नहीं लड़े जाते सामने पत्थर-फेंक दूरी पर खड़ा आँखों से आँखें मिलाता हुआ दुश्मन या फिर ज़मीनी बनावट और ख़राब मौसमों का फायदा उठाकर कथित जेहाद के नाम पर अंदर घुस आने को उतावले आतंकवादियों का दस्ता...ये सब मिलकर या अलग-अलग विगत तीन-साढ़े तीन दशकों से लगातार युद्द जैसी स्थित ही तो उत्पन्न करते रहे हैं | कहने को  बेशक इसे लो इंटेसिटी कंफ्लिक्टकह कर नकारने की कोशिश करते रहें हम, हर तीसरे दिन की शहादत कुछ और कहानी कहती है...कहानी, जो सौ साल पहले के उस महान प्रथम विश्व-युद्ध के बनिस्पत एक लघु-कथा से ज्यादा और कुछ नहीं, किन्तु यही लघु-कथा रात-दिन इन ठिठुरती-सिहरती सरहदों पर निगरानी में खड़े एक भारतीय सैनिक के लिए किसी महाकाव्य से कम का विस्तार नहीं देती है | पूरे मुल्क की सोचों, निगाहों में अलग-थलग कर दिया ये अकेला भारतीय सैनिक इसी अनकही कहानी के पार्श्व में एक सवाल उठाता है कि क्या वजह है कि सौ साल पहले के उस महायुद्ध के पश्चात जब सम्पूर्ण यूरोप, अमेरिका या फिर जर्मनी भी एक मजबूत ताकत के रूप में, एक व्यवस्थित विकसित मुल्क के रूप में उभर कर आए और अपना ये मुल्क स्वतंत्रता-प्राप्ति के उपरांत पाँच-पाँच युद्ध देख चुकने के बाद भी एक चरमरायी सी, असहाय विवश व्यवस्था की छवि प्रस्तुत करता है पूरे विश्व के समक्ष ?

युद्ध कभी भी वांछित जैसी चीज नहीं हो सकती है...और खास कर एक सैनिक के लिए तो बिलकुल ही नहीं | किसी भी युद्ध के दौरान एक सैनिक को मौत या दर्द या ज़ख्म से ज्यादा डर उसको अपने वर्दी की और अपने रेजीमेंट की इज्जत खोने का होता है और कोई भी युद्ध वो इन्हीं दो चीजों के लिए लड़ता है...बस ! अपनी हरी वर्दी के लिए और अपने रेजिमेंट के नाम-नमक-निशान के लिए ! ऐसी हर लड़ाई के बाद वो अपने मुल्क और इसके लोगों की तरफ बस इतनी-सी इच्छा लिए देखता है कि उसके इस जज़्बे को पहचान मिले...उसकी इस क़ुरबानी को सम्मान मिले | प्रथम विश्व-युद्ध के पश्चात उसमें शामिल हर मुल्क में सैनिकों को उसी स्नेह और सम्मान से देखा गया (देखा जा रहा है) जिसकी ज़रा सी भी अपेक्षा वहाँ के सैनिकों के मन में थी | किन्तु यहाँ इस मुल्क में अपेक्षा के विपरीत उपेक्षा का दंश लगातार झेलते रहने के बावजूद भारतीय सैनिक फिर भी हर बार हर दफ़ा जरूरत पड़ने पर यहाँ सरहद के लिये जान की बाज़ी लगाता है | वो देखता है असहाय अवाक-सा कि कैसे कुछ मुट्ठी भर उसके भाई-बंधुओं द्वारा चलती ट्रेन में की गई बदतमीजी को उसके पूरे कुनबे पर थोप दिया जाता है...कि कैसे चंद गिने-चुने उसके साथियों के हाथों उत्तर-पूर्व राज्यों या कश्मीर के इलाकों में हुई ज्यादातियों के सामने उसके पूरे युग भर की प्रतिबद्धता को नकार दिया जाता है एक सिरे से...वो तिलमिलाता है, तड़पता है, फिर भी ड्यूटी दिये जाता है | सरहद पर चीड़ और देवदार के पेड़ों से उसे ज्यादा स्नेह मिलता है, बनिस्पत अपने मुल्क के बाशिंदों से | सामने वाले दुश्मन की छुद्रता, गुपचुप वार करने वाले आतंकवादियों की धृष्ठता, मौसम की हिंसक मार, मुश्किल ज़मीनी बनावट का बर्ताव जैसे हर रोज़ के छोटे-छोटे युद्धों से लड़ता वो अपने मुल्क के इस सौतेले व्यवहार से भी एक युद्ध लड़ता है...युद्ध बस सरहद पर नहीं लड़े जाते !

इधर अप्रैल का महीना तो आधा से ज़्यादा गुज़र चुका है, लेकिन ये वाला साल है कि पुराने साल की ठिठुरन को अब तलक अपने बदन पर लपेटे हुये है | बंकर से बाहर निकलने के लिए बर्फ ने जो सीढ़ियाँ तैयार कर रखी है, वो घटती मालूम ही नहीं पड़ रहीं | अभी तक उतुंग सी बेहया की तरह सर उठाये खड़ी हुयी हैं | सब कुछ जैसे गीला-गीला सा...पूरे का पूरा वजूद तक....वजूद की अनंत तलहट्टियाँ तक | प्रचंड सूर्य की प्रखर धूप के लिए बेचैन विकल मन समूचे सूर्य को ही उतार लाना चाहता है बंकर की छत पर मानो ! धूप की जलती सी रस्सी जो होती एक काश, जिस पर पूरे बदन को निचोड़ कर सूखने के लिए टांग देता कोई !

रातें उम्र से भी लंबी हैं और दिन उस लंबी उम्र का फकत एक लम्हा जैसे !

...और रात लिये रहती है याद-सी कोई याद तुम्हारीड्यूटी की तमाम बंदिशों में भी और रात भर बजता रहता है ये बगल में रखा छोटा-सा मोटोरोला का रेडियो-सेट, निकट दूर खड़े तमाम प्रहरियों से मेरे बंकर को जोड़ता हुआ...अल्फा ऑस्कर किलो ओवर” (ऑल ओके ! ओवर !!) करता हुआ | जानती हो, तुम्हारी याद दिलाता है ये कमबख़्त छोटा सा रेडियो सेट...हर बार, बार-बार...घड़ी-घड़ी ऑल ओके ओवरकी रिपोर्ट देता हुआ !

हाँ ! सच में !! तुम सा ही पतला-दुबला, तुम सा ही सलोना और भरोसेमंद भी...और जब भी बोलना होता है इसमें कुछ, लाना पड़ता है इसे होठों के बिलकुल पास...ठीक तुम-सा ही तो !

हँसोगी ना तुम जो कभी इस डायरी को पढ़ोगी ?

काश कि दूर इन बर्फीले पहाड़ों से इसी के जरिये कर पाता मैं...तुम संग भी ओके ओवर...कभी-कभार मिस यू ओवर...और थोड़ा-सा लव यू ओवरभी !

...और जो यूँ होता तो क्या तब भी ये रातें उम्र सी ही लंबी होतीं ?

हा हा...ये लम्बी ठहरी हुई पसरी-पसरी रातें और तो कुछ करें ना करें, मेरे अच्छे-भले सोल्जर को कहीं पोएट ना बना डालें ! फ़रहत एहसास का शेर याद आता है:-


मुझ तक है मेरे दुख के तसव्वुफ़ का सिलसिला
इक ज़ख़्म मैं मुरीद तो इक ज़ख़्म पीर मैं

01 July 2017

हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज ~ 1

साल 92 का अक्टूबर महीना था वो... हिमाचल की पहाड़ियाँ ठंढ से कुनमुनाने लगी थीं । उन्हीं पहाड़ियों पर बसे परवानू के ख्यात रिसौर्ट टिम्बर ट्रेल की केबल कार दो परिवारों के ग्यारह सदस्यों को लेकर बीच रस्ते में अटक गई, सवार लोगों की साँसें भी जस की तस अटकाती हुयी । एक सदस्य के नीचे घाटी में गिर जाने के बाद उस केबल कार में पसरा हुआ भय जाने कितना कम हुआ दूर से सेना के हेलिकाॅप्टर को आते देखकर, ये शोध का विषय हो सकता है ! सेना का हैलिकाॅप्टर आया रेसक्यू आॅपरेशन के लिये और साथ लेकर आया डेयर डेविल मेजर इवान क्रैस्टो को । उसके बाद की कहानी शौर्य व धीरता की मिसाल ही तो बन गई है !

हेलिकाॅप्टर के तेज़ गति से घूमते पंखों से हिलता हुआ केबल पूरे रेसक्यू
आॅपरेशन को दुश्वार कर रहा था और सर्द रात को ज़िद पड़ी थी एकदम से आने की । फैल रहे अँधेरे ने विवश कर दिया हेलिकाॅप्टर को वापस जाने के लिये । अभी तक बस पाँच लोग ही सकुशन निकाले गये थे । बचे हुये पाँच लोगों की मानसिक स्थिति की कल्पना ही की जा सकती है कि उस लटके हुये केबल कार में पूरी रात गुज़ारना और हेलिकाॅप्टर के वापस आने का सुबह तक इंतज़ार करना...स्वंय सृष्टि निर्माता भी साक्षात प्रगट होते तो उन पाँचों को ढाढस के दो बोल ना कह पाते !

किंतु मेजर ने आश्वस्ति के शब्दों को उकेरने के बजाय उन पाँचों के साथ उसी केबल कार में रात गुज़ारने का फैसला किया । मेजर का लाॅजिक बड़ा ही क्रिस्प और प्रिसाइज था कि ख़ुद दो बच्चों का पिता होकर उस केबल कार में फँसे लोगों के साथ रात गुज़ारने से बड़ा संबल और क्या हो सकता उनके लिये !

रात भारी थी । डरे लोगों की उल्टियाँ और अन्य विसर्जित अवशेषों की ख़ुश्बू केबल कार के नीेचे गिर जाने की सोच से कहीं ज़्यादा भयंकर थी । सुबह की पहली किरण जब हेलिकाॅप्टर लेकर आयी थी, ये जानना दिलचस्प होगा कि मौत के भय से आतंकित उन पाँच लोगों की ख़ुशी ज़्यादा बड़ी थी या नैसर्गिक ख़ुश्बू से मेजर को निजात पाने का सकून ज़्यादा बड़ा था । फेंकी हुई रस्सी से एक-एक कर उन पाँच लोगों को बाँध कर वापस हेलिकाॅप्टर में भेजने के बाद जब मेजर सबसे आख़िर में सवार हुआ, रात भर हनुमान चालीसा का जाप करने वाली प्रौढा ने मेजर को देर तक भींचे रखा हेलीकाॅप्टर में कि जैसे घनघोर तपस्या के बाद उनका बजरंग बली ही साकार रूप लेकर आ गया हो सेना की वर्दी में !

[ जो पढे आँखें मेरी मुझको वो दीवाना कहे / तू भी तो इनको कभी फ़ुरसत से पढ कर, ग़ौर कर ]

22 June 2017

(अ)सैनिक-व्यथा

उदासियों के बेतरतीब से मैट्रिक्स को तरतीब देती व्यथाओं का कोई पैटर्न नहीं होता...और जो हो भी, तो कौन जोहमत उठाये बुनने की ! कोई ठहराव आख़िरी कहाँ होता है ? हर ठहराव में भी एक चलना नहीं (अ)व्यक्त होता रहता है क्या हर लम्हा ?  और ये सारे सवाल भी आख़िर किससे...ठहराव से या चलते रहने से ? 

कि मेरे विराम में भी चलना निहित था
और तुम देखते रहे
बस ठहराव मेरा

कि उन क्षणों का आर्तनाद
जिन्हें तुम स्वप्न में भी
नहीं चाहोगे सुनना
और जिन्हें भोगना था मेरी नियति
भोगने की चीख़ नहीं सुनी तुमने
नियति की किलकारियाँ सुनी

कि प्रतिबद्धताओं की नई परिभाषायें
लिखने में टूटी उँगलियों से
लिखा नहीं जाता जवाब
तुम्हारे सवालों में छुपे आरोपों का

कि सच तो ये है
कोई मायने नहीं रखता
ये देखना
ये सुनना
ये सवाल उठाना...

...जब पिता की विलुप्त होती स्मृतियों में भी
नहीं रहता शेष
मेरा समर्पण या मेरा शौर्य

किंतु बचा रह जाता है
मेरी वाजिब अनुपस्थितियों का
ग़ैरवाजिब निकम्मापन

29 May 2017

तेरे ही आने वाले महफ़ूज ‘कल’ की ख़ातिर

( कथादेश के अप्रैल अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का दूसरा पन्ना )

दिन उदास है तनिक कि आज नहाना है | नहीं, हफ्ते का कोई एक दिन तय नहीं होता है...जिस रोज़ धूप मेहरबान होती है उसी रोज़ बस | उसी रोज़ ठंढ से ऐंठे पड़े इस जिस्म की सफाई के लिए बर्फ़ को उबाल कर भरी गई पानी की एक बाल्टी हाँफती हुयी पहुँचती हैं बंकर के कोने में बने एक सूराख भर जैसे स्नान-गृह में और फिर देर तक अपनी चढ़ आई साँसों का गुस्सा साबुन के झागों पर निकालती है | उस सूराख भर के स्नान-गृह में समस्त कपड़े उतारने और बदन पर पहला मग पानी उड़ेलने तक का वक्फ़ा इच्छा-शक्ति की तमाम हदबंदियों को परख लेता है | हाँफती हुयी बाल्टी का आक्रोश पहले तो साबुन को झाग निकालने से वंचित रखता है और एक बार जो गलती से झाग निकल आते हैं तो कमबख़्त कुछ इस कदर ज़िद्दी हो जाते हैं कि बदन से उतरने का नाम ही नहीं लेते...जैसे हाँफती हुई बाल्टी के उमड़ते आक्रोश पर अपना भी मुलम्मा चढ़ाने की कोशिश में हो साबुन के ये झाग | जैसे-तैसे मना-रिझा कर बदन से उन झागों के चिपचिपेपन को उतार लेने के बाद ताजा-ताजा महसूस करते हुये ठिठुरते दिन के पास अब एक बाल्टी पानी का कोटा शेष रहता है बस | उपलब्ध सामग्रियों के सुनियोजित प्रबंधन की शिक्षा इस तेरह हजार फुट ऊँचे बर्फीले पहाड़ों से बेहतर और कोई नहीं दे सकता पूरे विश्व भर में...

...उधर धुले हुये भारी-भरकम यूनिफॉर्म में लिपटा तारो-ताजा हुआ बदन बाहर खिली हुई धूप का लुत्फ़ नहीं लेने देने पर आमादा बर्फ़ उड़ाती हुई तेज हवा को सहस्त्रों शापों से नवाजता है पहले तो और फिर झक मार कर बंकर में अब तक सुलग कर लाल हो आये किरासन तेल वाली बुखारी से चिपक बैठ जाता है और सोचता है कि जनाब मोहसिन नक़वी साब के विख्यात शेर "तेज़ हवा ने मुझसे पूछा / रेत पे क्या लिखते रहते हो" में 'रेत' की जगह 'बर्फ़' भी आसानी से निभ सकता है कि ग़ज़ल की बहर के हिसाब से 'रेत' और 'बर्फ़' दोनों का वज़्न एक ही है | गुनगुना कर देखता भी गुलाम अली वाली धुन पर...हाँ, एकदम दुरुस्त..."बर्फ़ पे क्या लिखते रहते हो" | फोन की घंटी बजती है तभी...न ! न !! ये इंटरकॉम वाला फोन होता है...ऑफिस वाला, जिसका बजना खुशी नहीं कोफ़्त को आमंत्रित करता है हर बार | नियंत्रण-रेखा का निरीक्षण करने के लिए तड़के सुबह गया हुआ गश्ती-दल वापस आ गया है और सब सही-सलामत की रपट देता हुआ फोन और रपट मिलते ही चाय की तलब एकदम से सर उठाती है...जैसे नामुराद तलब को भी इसी रपट की प्रतीक्षा हो | दिन की ग्यारहवीं चाय | तेरह हजार फुट की इस ऊँचाई पर बोरोसिल के चमचमाते ग्लास में पी जा रही चाय बरिश्ता या कैफे कॉफी डे के स्वादिष्ट गर्म पेय पदार्थों से किसी भी वक़्त दो-दो हाथ कर सकती है...

...चाय की तीसरी या चौथी घूंट ही होगी कि बर्फ़ीली हवाओं ने अपना रुख बदला दक्षिण दिशा में और उपेक्षित सा पड़ा मोबाइल यक-ब-यक सबसे महत्वपूर्ण वस्तु बन जाता है...हवा का दक्षिण दिशा को मुड़ना और मोबाइल में सिग्नल आना | मोबाइल में सिग्नल आना कि व्हाट्स एप का क्रियान्वित हो उठना | व्हाट्स एप का क्रियान्वित होना कि दोस्तों और परिजनों का इस तेरह हजार फिट की बर्फ़ीली ऊँचाई पर भी इर्द-गिर्द आ जाना...
...उदास सा दिन मुस्करा उठता है | मुस्कुराते हुए दिन को याद आती है एकदम से बीती हुई रात की मुस्कान !

कार्ट-व्हील और समर-सॉल्ट करती हुयी रातों की धड़कनों का कोई पैमाना नहीं है | दुनिया की सर्वश्रेष्ट ईसीजी मशीनें भी शायद समर्पण कर दे जो कभी मापने आये इन धड़कनों को | कल रात जब बर्फ़ की सफ़ेद चादर पर उतराती हुई गहरी धुंध ने बस थोड़ी देर के लिए अपना परदा उठाया था और छलांगे लगाता हुआ हिरणप्रजाति का मझौले कद वाला वो शावक खौफ़ और आतंक की नई परिभाषा लिखता हुआ आ छुपा था एक बंकर में, रात की ये बेलगाम धड़कनें अपने सबसे विकराल रूप में उसकी सहमी आँखों में नृत्य कर रही थीं | तेंदुये का चार सदस्यों वाला छोटा सा परिवार उस शावक को अपना आहार बनाने के लिए सरहद पर लगे कँटीले बाड़ों के दुश्मन वाले पार से हौले-हौले गुर्रा रहा था और उलझन में था कि अपने आहार पर हक़ जमाने के लिये राइफल लिये खड़े सरहद-प्रहरियों से भिड़ना ठीक होगा कि नहीं | उस जानिब प्रहरियों द्वारा बर्फ़ के उलीचे गए चंद गोलों ने तत्काल ही तेंदुये परिवार की तमाम उलझनों को दरकिनार कर दिया और वापस लौट गए वो चारों नीचे दुश्मन की तरफ़ वाले जंगल में | बंकर के कोने में सिमटा हुआ शावक अपनी धौंकनी की तरह चढ़ती-उतरती साँसों पर काबू पाते हुये मानो दुनिया भर की निरीहता अपनी बड़ी-बड़ी आँखों में समेट लाया था | लेकिन उसे कहाँ ख़बर थी कि उनके रक्षक बने सरहद-प्रहरी, विगत तीन महीनों से भयानक बर्फबारी की वजह से बंद हो आए सारे रास्तों की बदौलत बस बंध-गोभी और मटर खा-खा कर तंग हो आयी अपनी जिह्वा पर नए स्वाद का लेप चढ़ाने के लिए उसे भूखी निगाहों से घूर रहे थे | छोटे से रेडियो-सेट पर प्रहरियों की तरफ़ से संदेशा भेजा गया मेरे बंकर में...अनुमति के लिए | मेरा वाला बंकर बड़ी देर तक उलझन में रहा था...रात की समर-सॉल्ट करती हुयी धड़कनें अचानक से बैक-फ्लिप करने लगी थीं | उधर दूर उस दूजे बंकर में शावक की आश्वस्त होती साँसों के साथ बर्फ़ीली चुप्पी पसरी हुई थी सरदार की अनुमति की प्रतीक्षा में  और फिर उसी पसरी हुई चुप्पी को चौंकाती सी आवाज़ उभरी रेडियो-सेट पर सरदार की सख़्त ताकीद के साथ कि उस शावक को छोड़ दिया जाये | सरदार का बड़ा ही सपाट सा तर्क था कि जो तुम्हारी शरण में ख़ुद अपनी प्राण-रक्षा के लिए आया हो, उसी का भक्षण कैसे कर सकते हो | भिन्नाये से प्रहरियों को आदेश ना मानने जैसा कोई विकल्प दिया ही नहीं था उनकी वर्दी ने | अब तक शांत और निश्चिंत हो आए शावक को पहले तो बंध-गोभी के ख़ूब सारे पत्ते खिलाये गए और फिर उसे बड़े स्नेह और लाड़ के साथ सरहद के अपनी तरफ वाले जंगल में छोड़ दिया गया |



सरहद पर की ये बर्फ़ीली रात अब मुसकुराती हुयी सुबह को आवाज़ दे रही थी गुनगुनाते हुए...

तेरे ही आने वाले महफ़ूज ‘कल’ की ख़ातिर

मैंने तो हाय अपना ये ‘आज’ दे दिया है

22 May 2017

चौराहे पर सीढ़ियाँ

कहानी के पहले या दूसरे ड्राफ्ट के साथ सिंफनी बुनते झींगुरों का गान सुनना हो... बढ़ती हुई उम्र के साथ बढ़ती हुयी और इक रोज़ दीवारों से बाँहें छुड़ाकर खुले रास्ते पर भटक जाने वाली सीढ़ियों से मिलना हो...गली के छोर पर अंधेरे में डूबी एक खिड़की, जिस से कुंवारी लड़कियों की चुन्नी से आने वाली ख़ुशबू फूटा करती है, को देखना हो...मीठे बताशों का सूखा पानी चखना हो...हाशिये से भी कम चौड़ी सड़कों पर आवारागर्दी करने का हौसला हो...या फिर रेत के समंदर में बेनिशां मंज़िलों के सफ़र पर निकलना हो...तो किशोर चौधरी की कहानियों की किताब चौराहे पर सीढ़ियाँपढ़िये | किशोर की कहानियाँ ? या मेस्मराइज़ करते शब्दों का सम्मोहन-मंत्र ? या...या कि सर चढ़ कर बोलते मायावी जुमलों का वशीकरण-जाप ?...उफ़्फ़ !

अपने मूल रूप में किशोर निगाहों की हदबंदियों से परे वाले उदास इश्क़ के नगमें बुनते हैं और उन नगमों में कोई अफ़साना यूँ ही सर उठाए चला आता है तो वो उस पर नज़रे-इनायत करने से परहेज नहीं करते | “चौराहे पर सीढ़ियाँअपने मुकम्मल अवतार में इसी नज़रे-इनायत की परिणति है | कुल जमा चौदह कहानियों को तकरीबन डेढ़ सौ पन्नों में समेटे हुये ये किताब ठहर-ठहर कर, रुक-रुक कर साँस लेते हुये पढे जाने की शर्त रखती है | किताब का फ्लैप हिन्दी-साहित्य की प्रचलित परम्पराओं के बरखिलाफ़ आपको लेखक के बारे में कुछ नहीं बताता, सिवाय कॉफी पीते पतले फ्रेम वाले चश्मे में एक युवक की श्वेत-श्याम तस्वीर और चंद नज़्म-नुमा मिसरों के | ये एक मिस्टिक सा जो मूड तैयार होता है किताब के कवर से तो वो मूड फिर पहली कहानी से लेकर आख़िरी कहानी तक बरक़रार रहता है |

किताब की पहली कहानी अंजलि तुम्हारी डायरी से बयान मेल नहीं खातेअपनी दिलचस्प बुनावट से कथाकार के शिल्प के प्रति एक आदर का भाव जगाती है...अन्य किरदारों के मुख्तलिफ़ बयानों के विपरीत अंजलि की डायरी के पन्ने जब धीरे-धीरे सबका राज़ खोलते हैं और कहानी अपने अंज़ाम तक पहुँचती है तो अंजलि का दर्द पाठक का दर्द बन जाता है | जहाँ दूसरी कहानी एक अरसे सेके नायक का एकालाप एकदम से पढ़नेवालों के वजूद का एकालाप बनने को उतावला हो उठता है, वहीं तीसरी कहानी चौराहे पर सीढ़ियाँका अजीब-सा कथानक इसे फिर-फिर से पढ़े जाने को विवश करता है | महज सीढ़ियों को बिम्ब बनाकर उकेरा गया ये क़िस्सा लापता होते रिश्तों की इतनी तल्ख़ शिनाख़्त देता है कि पढ़कर क़िस्सागो से तुरत बतियाने को जी चाहे...सीढ़ियाँ और मुहब्बत पददलित होने के सिवा जो दूसरा काम कर सकती हैं, वह है बावड़ियों में डूबकर आत्महत्या करना” , कहानी के आख़िर में एक किरदार का ये डायलॉग एकदम से राजस्थान की अनगिन बावड़ियों को ले चला चलता है आपको जहाँ पानी में उतरती सीढ़ियाँ वाकई ख़ुदकुशी करती हुयी प्रतीत होती हैं और उन्हीं में से जाने कितनी बावड़ियों का असफल प्रेमियों के लिए फेवरिट सुसाइड स्पॉट में परिवर्तित होने की अख़बारों में छपी ख़बरों की याद भी दिलाता है | ये किशोर का अपना खास अंदाज़ है, जिसके बूते पर कहानी में चित्रित हर दूसरी चीज एक किरदार के तौर पर उभर कर सामने आती है |

संग्रह का चौथा पायदान परमिंदर के इंतज़ार में ठहरा हुआ समयमेरा पर्सनल फेवरिट है | कथाकार का विट इस कहानी में अपने पूरे उफ़ान पर है और पाठक महसूस करता है कि नहीं, किशोर चौधरी सिर्फ उदासी ही नहीं हास्य भी उलीचता है | टीन-एज इश्क़ की कुलबुलाती-सी बेचैनियाँ किस कदर तो साकार होकर पढ़ने वालों को दसवीं-ग्यारहवीं वाले दिनों में लिए जाती हैं, जब दिन के चौबीस घंटे प्रेयर की पहली घंटी से लेकर रिसेस के खिंचाव तक सिमट आते थे | “उदास रात में झींगुरों का करूण गानकहानी कुछ-कुछ पिछली कहानी का एक्सटेंशन प्रतीत होती है जो बाद के ट्रीटमेंट में वयस्क ज़िंदगी की इश्क़िया जद्दोजहद को थोड़ा ज़्यादा विस्तार देती है | किताब की छठी कहानी ख़ुशबू बारिश की नहीं मिट्टी कीफाइनल मुहर लगाती है कि किशोर का पुरुष क़िस्सागो स्त्री किरदार को केंद्र में रखकर अजब-गजब चमत्कार कर सकता है |
किताब की सातवीं कहानी रेगिस्तानी मकड़ी के जालेजहाँ रिश्तों के ऊपर वाले कृत्रिम सुगंध के नीचे दुर्गंध मारती बदबुओं का विलाप है, वहीं आठवीं कहानी सड़क जो हाशिये से कम चौड़ी थीएक आम परिवार की हर रोज़ युद्धरत होने की आम-सी दास्तान है, जिसे किशोर की लेखनी बहुत दिलचस्प बना देती है | अगली दो कहानियाँ संग्रह की कमज़ोर कहानियाँ हैं...गीली चॉकऔर लोहे के घोड़े”...वही पुराना सब कुछ...गीली चॉकउलझे इश्क़ को सुलझाने की ट्रेजेडी है तो लोहे के घोड़ेमुफ़लिसी में भी जीवित बचे मोह की दास्तान...पुराना प्लॉट है दोनों का, कुछ भी नया है तो वो बस किशोर की क़िस्सागोई और उनका भाषा-सौंदर्य | किताब की ग्यारहवीं कहानी गली के छोर पर अँधेरे में डूबी एक खिड़कीमुहब्बत का एक देखा-सा, सुना-सा मगर थोड़ा सस्पेंस जगाता हुआ चैप्टर खोलती है | कहानी का अंत पढ़ के आपको थोड़ी-सी झुंझलाहट होती है और नायक की तरह आप भी अपने कंधे पर एक सवाल की लाश लिए बैठ जाते हैं कि कौन था उस रात रेशम की खिड़की पर |

अगली कहानी एक फ़ासले के दरम्यान खिले हुये चमेली के फूल” (कहानी का शीर्षक ना हुआ शेर का मिसरा हो गया, मानो) फिर से एक स्त्री किरदार से मिलवाती है और किशोर का अपने अद्भुत बिंबों के जरिये फीमेल सायकॉलजी की चंद और किरचों को शार्पेन करने के हुनर से रूबरू करवाती है | सरदार तेजिंदर सिंह का करेक्टर बेहद दिलचस्प बन कर उभरा है | तेरहवीं कहानी रात की नीम अँधेरी बाँहेंसंग्रह की इकलौती कहानी है जिसमें नरेटर अपने फर्स्ट परसन वाले फॉर्म में अवतरित हुआ है | इस कहानी में किशोर ने शायद खुद अपने ही शिल्प पर एक्सपेरिमेंट करने की कोशिश की है, लेकिन प्लॉट के परखनलियों में कुछ सोल्यूशन्स सही अनुपात में नहीं डाल पाये | लेकिन इस कहानी की प्रत्यक्ष कमियों की भरपायी आख़िरी कहानी बताशे का सूखा पानीके मास्टर और सिमली मिलकर कर देते हैं |

जैसा कि ऊपर लिखा है मैंने, ये कहानियाँ ठहर-ठहर कर पढ़ने की शर्त रखती हैं | किशोर की क़िस्सागोई का पूरा वजूद अपने नरेटर के कंधों पर विराजमान रहता है | पात्रों के दरम्यान संवाद-अदायगी के जरिये कहानी को खोलने में कम विश्वास रखते हैं किशोर और उनके इसी नरेटर के मार्फत हम रूबरू होते हैं उनकी आकर्षक भाषा से और मंत्र-मुग्ध करते उनके जुमलों और बिंबों से | लेकिन कई बार यही नरेटर किशोर की कमजोरी भी बनता प्रतीत होता है, जब एकदम से नरेशन कथ्य पर हावी होने लगता है | किशोर के लिए अपने इस नरेटर को काबू में रखना नितांत जरूरी है उनके लेखन के अगले पड़ाव के लिये | लेकिन महज अपने भाषा-सौंदर्य की नींव पर ही किशोर चौधरी इधर के कई समकालीन कथा-लेखकों से बीस ठहरते हैं |

चार साल पहले जब ये किताब हिन्द-युग्म से प्रकाशित होकर पाठकों के हाथ में आई थी...तब जब कि एक बड़े बैनर वाला प्रकाशक एक साधारण-सी लेखिका (जिसकी कहानियों में शब्दों से भी ज्यादा डॉट्स भरे रहते हैं) की एक बहुत ही साधारण-सी किताब के बेस्ट-सेलर होने की मुनादी कर रहा था, किशोर चौधरी की चौराहे पर सीढ़ियाँख़ामोशी से ऑन लाइन खरीदे जाने के तमाम कीर्तिमान कायम कर रही थी | इन चार सालों में किताब का तीसरा संस्करण भी बाज़ार में समाप्त होने को है और नए संस्करण के प्रिंट के लिए किताब फिर से प्रेस में जा चुकी है | हिन्द-युग्म जिस तरह से अपने लेखकों और उनकी किताबों को प्रोमोट करता है, वो क़ाबिले-तारीफ़ है | हाल-फिलहाल की अपनी कुछ किताबों से, जिसमें चौराहे पर सीढ़ियाँभी शामिल है, इस प्रकाशन ने कम-से-कम इस मिथ को तो तोड़ा ही है कि हिन्दी किताबें बिकती नहीं हैं |


पाठकों द्वारा हाथों-हाथ ली जाने वाली ये किताब चौराहे पर सीढ़ियाँआश्चर्यजनक रूप से साहित्यिक पत्रिकाओं में और चर्चाओं में अपनी जगह नहीं बना पायी है अभी तक, जो इस बात पर एक बार फिर से ठप्पा लगाती है कि हिन्दी-साहित्य के अकिंचन संपादक, आलोचक और समीक्षक अब तलक जुगाड़ की राजनीति से उबर नहीं पाये हैं |



किताब ख़रीदी जा सकती है इस जानिब से