22 June 2017

(अ)सैनिक-व्यथा

उदासियों के बेतरतीब से मैट्रिक्स को तरतीब देती व्यथाओं का कोई पैटर्न नहीं होता...और जो हो भी, तो कौन जोहमत उठाये बुनने की ! कोई ठहराव आख़िरी कहाँ होता है ? हर ठहराव में भी एक चलना नहीं (अ)व्यक्त होता रहता है क्या हर लम्हा ?  और ये सारे सवाल भी आख़िर किससे...ठहराव से या चलते रहने से ? 

कि मेरे विराम में भी चलना निहित था
और तुम देखते रहे
बस ठहराव मेरा

कि उन क्षणों का आर्तनाद
जिन्हें तुम स्वप्न में भी
नहीं चाहोगे सुनना
और जिन्हें भोगना था मेरी नियति
भोगने की चीख़ नहीं सुनी तुमने
नियति की किलकारियाँ सुनी

कि प्रतिबद्धताओं की नई परिभाषायें
लिखने में टूटी उँगलियों से
लिखा नहीं जाता जवाब
तुम्हारे सवालों में छुपे आरोपों का

कि सच तो ये है
कोई मायने नहीं रखता
ये देखना
ये सुनना
ये सवाल उठाना...

...जब पिता की विलुप्त होती स्मृतियों में भी
नहीं रहता शेष
मेरा समर्पण या मेरा शौर्य

किंतु बचा रह जाता है
मेरी वाजिब अनुपस्थितियों का
ग़ैरवाजिब निकम्मापन

29 May 2017

तेरे ही आने वाले महफ़ूज ‘कल’ की ख़ातिर

( कथादेश के अप्रैल अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का दूसरा पन्ना )

दिन उदास है तनिक कि आज नहाना है | नहीं, हफ्ते का कोई एक दिन तय नहीं होता है...जिस रोज़ धूप मेहरबान होती है उसी रोज़ बस | उसी रोज़ ठंढ से ऐंठे पड़े इस जिस्म की सफाई के लिए बर्फ़ को उबाल कर भरी गई पानी की एक बाल्टी हाँफती हुयी पहुँचती हैं बंकर के कोने में बने एक सूराख भर जैसे स्नान-गृह में और फिर देर तक अपनी चढ़ आई साँसों का गुस्सा साबुन के झागों पर निकालती है | उस सूराख भर के स्नान-गृह में समस्त कपड़े उतारने और बदन पर पहला मग पानी उड़ेलने तक का वक्फ़ा इच्छा-शक्ति की तमाम हदबंदियों को परख लेता है | हाँफती हुयी बाल्टी का आक्रोश पहले तो साबुन को झाग निकालने से वंचित रखता है और एक बार जो गलती से झाग निकल आते हैं तो कमबख़्त कुछ इस कदर ज़िद्दी हो जाते हैं कि बदन से उतरने का नाम ही नहीं लेते...जैसे हाँफती हुई बाल्टी के उमड़ते आक्रोश पर अपना भी मुलम्मा चढ़ाने की कोशिश में हो साबुन के ये झाग | जैसे-तैसे मना-रिझा कर बदन से उन झागों के चिपचिपेपन को उतार लेने के बाद ताजा-ताजा महसूस करते हुये ठिठुरते दिन के पास अब एक बाल्टी पानी का कोटा शेष रहता है बस | उपलब्ध सामग्रियों के सुनियोजित प्रबंधन की शिक्षा इस तेरह हजार फुट ऊँचे बर्फीले पहाड़ों से बेहतर और कोई नहीं दे सकता पूरे विश्व भर में...

...उधर धुले हुये भारी-भरकम यूनिफॉर्म में लिपटा तारो-ताजा हुआ बदन बाहर खिली हुई धूप का लुत्फ़ नहीं लेने देने पर आमादा बर्फ़ उड़ाती हुई तेज हवा को सहस्त्रों शापों से नवाजता है पहले तो और फिर झक मार कर बंकर में अब तक सुलग कर लाल हो आये किरासन तेल वाली बुखारी से चिपक बैठ जाता है और सोचता है कि जनाब मोहसिन नक़वी साब के विख्यात शेर "तेज़ हवा ने मुझसे पूछा / रेत पे क्या लिखते रहते हो" में 'रेत' की जगह 'बर्फ़' भी आसानी से निभ सकता है कि ग़ज़ल की बहर के हिसाब से 'रेत' और 'बर्फ़' दोनों का वज़्न एक ही है | गुनगुना कर देखता भी गुलाम अली वाली धुन पर...हाँ, एकदम दुरुस्त..."बर्फ़ पे क्या लिखते रहते हो" | फोन की घंटी बजती है तभी...न ! न !! ये इंटरकॉम वाला फोन होता है...ऑफिस वाला, जिसका बजना खुशी नहीं कोफ़्त को आमंत्रित करता है हर बार | नियंत्रण-रेखा का निरीक्षण करने के लिए तड़के सुबह गया हुआ गश्ती-दल वापस आ गया है और सब सही-सलामत की रपट देता हुआ फोन और रपट मिलते ही चाय की तलब एकदम से सर उठाती है...जैसे नामुराद तलब को भी इसी रपट की प्रतीक्षा हो | दिन की ग्यारहवीं चाय | तेरह हजार फुट की इस ऊँचाई पर बोरोसिल के चमचमाते ग्लास में पी जा रही चाय बरिश्ता या कैफे कॉफी डे के स्वादिष्ट गर्म पेय पदार्थों से किसी भी वक़्त दो-दो हाथ कर सकती है...

...चाय की तीसरी या चौथी घूंट ही होगी कि बर्फ़ीली हवाओं ने अपना रुख बदला दक्षिण दिशा में और उपेक्षित सा पड़ा मोबाइल यक-ब-यक सबसे महत्वपूर्ण वस्तु बन जाता है...हवा का दक्षिण दिशा को मुड़ना और मोबाइल में सिग्नल आना | मोबाइल में सिग्नल आना कि व्हाट्स एप का क्रियान्वित हो उठना | व्हाट्स एप का क्रियान्वित होना कि दोस्तों और परिजनों का इस तेरह हजार फिट की बर्फ़ीली ऊँचाई पर भी इर्द-गिर्द आ जाना...
...उदास सा दिन मुस्करा उठता है | मुस्कुराते हुए दिन को याद आती है एकदम से बीती हुई रात की मुस्कान !

कार्ट-व्हील और समर-सॉल्ट करती हुयी रातों की धड़कनों का कोई पैमाना नहीं है | दुनिया की सर्वश्रेष्ट ईसीजी मशीनें भी शायद समर्पण कर दे जो कभी मापने आये इन धड़कनों को | कल रात जब बर्फ़ की सफ़ेद चादर पर उतराती हुई गहरी धुंध ने बस थोड़ी देर के लिए अपना परदा उठाया था और छलांगे लगाता हुआ हिरणप्रजाति का मझौले कद वाला वो शावक खौफ़ और आतंक की नई परिभाषा लिखता हुआ आ छुपा था एक बंकर में, रात की ये बेलगाम धड़कनें अपने सबसे विकराल रूप में उसकी सहमी आँखों में नृत्य कर रही थीं | तेंदुये का चार सदस्यों वाला छोटा सा परिवार उस शावक को अपना आहार बनाने के लिए सरहद पर लगे कँटीले बाड़ों के दुश्मन वाले पार से हौले-हौले गुर्रा रहा था और उलझन में था कि अपने आहार पर हक़ जमाने के लिये राइफल लिये खड़े सरहद-प्रहरियों से भिड़ना ठीक होगा कि नहीं | उस जानिब प्रहरियों द्वारा बर्फ़ के उलीचे गए चंद गोलों ने तत्काल ही तेंदुये परिवार की तमाम उलझनों को दरकिनार कर दिया और वापस लौट गए वो चारों नीचे दुश्मन की तरफ़ वाले जंगल में | बंकर के कोने में सिमटा हुआ शावक अपनी धौंकनी की तरह चढ़ती-उतरती साँसों पर काबू पाते हुये मानो दुनिया भर की निरीहता अपनी बड़ी-बड़ी आँखों में समेट लाया था | लेकिन उसे कहाँ ख़बर थी कि उनके रक्षक बने सरहद-प्रहरी, विगत तीन महीनों से भयानक बर्फबारी की वजह से बंद हो आए सारे रास्तों की बदौलत बस बंध-गोभी और मटर खा-खा कर तंग हो आयी अपनी जिह्वा पर नए स्वाद का लेप चढ़ाने के लिए उसे भूखी निगाहों से घूर रहे थे | छोटे से रेडियो-सेट पर प्रहरियों की तरफ़ से संदेशा भेजा गया मेरे बंकर में...अनुमति के लिए | मेरा वाला बंकर बड़ी देर तक उलझन में रहा था...रात की समर-सॉल्ट करती हुयी धड़कनें अचानक से बैक-फ्लिप करने लगी थीं | उधर दूर उस दूजे बंकर में शावक की आश्वस्त होती साँसों के साथ बर्फ़ीली चुप्पी पसरी हुई थी सरदार की अनुमति की प्रतीक्षा में  और फिर उसी पसरी हुई चुप्पी को चौंकाती सी आवाज़ उभरी रेडियो-सेट पर सरदार की सख़्त ताकीद के साथ कि उस शावक को छोड़ दिया जाये | सरदार का बड़ा ही सपाट सा तर्क था कि जो तुम्हारी शरण में ख़ुद अपनी प्राण-रक्षा के लिए आया हो, उसी का भक्षण कैसे कर सकते हो | भिन्नाये से प्रहरियों को आदेश ना मानने जैसा कोई विकल्प दिया ही नहीं था उनकी वर्दी ने | अब तक शांत और निश्चिंत हो आए शावक को पहले तो बंध-गोभी के ख़ूब सारे पत्ते खिलाये गए और फिर उसे बड़े स्नेह और लाड़ के साथ सरहद के अपनी तरफ वाले जंगल में छोड़ दिया गया |



सरहद पर की ये बर्फ़ीली रात अब मुसकुराती हुयी सुबह को आवाज़ दे रही थी गुनगुनाते हुए...

तेरे ही आने वाले महफ़ूज ‘कल’ की ख़ातिर

मैंने तो हाय अपना ये ‘आज’ दे दिया है

22 May 2017

चौराहे पर सीढ़ियाँ

कहानी के पहले या दूसरे ड्राफ्ट के साथ सिंफनी बुनते झींगुरों का गान सुनना हो... बढ़ती हुई उम्र के साथ बढ़ती हुयी और इक रोज़ दीवारों से बाँहें छुड़ाकर खुले रास्ते पर भटक जाने वाली सीढ़ियों से मिलना हो...गली के छोर पर अंधेरे में डूबी एक खिड़की, जिस से कुंवारी लड़कियों की चुन्नी से आने वाली ख़ुशबू फूटा करती है, को देखना हो...मीठे बताशों का सूखा पानी चखना हो...हाशिये से भी कम चौड़ी सड़कों पर आवारागर्दी करने का हौसला हो...या फिर रेत के समंदर में बेनिशां मंज़िलों के सफ़र पर निकलना हो...तो किशोर चौधरी की कहानियों की किताब चौराहे पर सीढ़ियाँपढ़िये | किशोर की कहानियाँ ? या मेस्मराइज़ करते शब्दों का सम्मोहन-मंत्र ? या...या कि सर चढ़ कर बोलते मायावी जुमलों का वशीकरण-जाप ?...उफ़्फ़ !

अपने मूल रूप में किशोर निगाहों की हदबंदियों से परे वाले उदास इश्क़ के नगमें बुनते हैं और उन नगमों में कोई अफ़साना यूँ ही सर उठाए चला आता है तो वो उस पर नज़रे-इनायत करने से परहेज नहीं करते | “चौराहे पर सीढ़ियाँअपने मुकम्मल अवतार में इसी नज़रे-इनायत की परिणति है | कुल जमा चौदह कहानियों को तकरीबन डेढ़ सौ पन्नों में समेटे हुये ये किताब ठहर-ठहर कर, रुक-रुक कर साँस लेते हुये पढे जाने की शर्त रखती है | किताब का फ्लैप हिन्दी-साहित्य की प्रचलित परम्पराओं के बरखिलाफ़ आपको लेखक के बारे में कुछ नहीं बताता, सिवाय कॉफी पीते पतले फ्रेम वाले चश्मे में एक युवक की श्वेत-श्याम तस्वीर और चंद नज़्म-नुमा मिसरों के | ये एक मिस्टिक सा जो मूड तैयार होता है किताब के कवर से तो वो मूड फिर पहली कहानी से लेकर आख़िरी कहानी तक बरक़रार रहता है |

किताब की पहली कहानी अंजलि तुम्हारी डायरी से बयान मेल नहीं खातेअपनी दिलचस्प बुनावट से कथाकार के शिल्प के प्रति एक आदर का भाव जगाती है...अन्य किरदारों के मुख्तलिफ़ बयानों के विपरीत अंजलि की डायरी के पन्ने जब धीरे-धीरे सबका राज़ खोलते हैं और कहानी अपने अंज़ाम तक पहुँचती है तो अंजलि का दर्द पाठक का दर्द बन जाता है | जहाँ दूसरी कहानी एक अरसे सेके नायक का एकालाप एकदम से पढ़नेवालों के वजूद का एकालाप बनने को उतावला हो उठता है, वहीं तीसरी कहानी चौराहे पर सीढ़ियाँका अजीब-सा कथानक इसे फिर-फिर से पढ़े जाने को विवश करता है | महज सीढ़ियों को बिम्ब बनाकर उकेरा गया ये क़िस्सा लापता होते रिश्तों की इतनी तल्ख़ शिनाख़्त देता है कि पढ़कर क़िस्सागो से तुरत बतियाने को जी चाहे...सीढ़ियाँ और मुहब्बत पददलित होने के सिवा जो दूसरा काम कर सकती हैं, वह है बावड़ियों में डूबकर आत्महत्या करना” , कहानी के आख़िर में एक किरदार का ये डायलॉग एकदम से राजस्थान की अनगिन बावड़ियों को ले चला चलता है आपको जहाँ पानी में उतरती सीढ़ियाँ वाकई ख़ुदकुशी करती हुयी प्रतीत होती हैं और उन्हीं में से जाने कितनी बावड़ियों का असफल प्रेमियों के लिए फेवरिट सुसाइड स्पॉट में परिवर्तित होने की अख़बारों में छपी ख़बरों की याद भी दिलाता है | ये किशोर का अपना खास अंदाज़ है, जिसके बूते पर कहानी में चित्रित हर दूसरी चीज एक किरदार के तौर पर उभर कर सामने आती है |

संग्रह का चौथा पायदान परमिंदर के इंतज़ार में ठहरा हुआ समयमेरा पर्सनल फेवरिट है | कथाकार का विट इस कहानी में अपने पूरे उफ़ान पर है और पाठक महसूस करता है कि नहीं, किशोर चौधरी सिर्फ उदासी ही नहीं हास्य भी उलीचता है | टीन-एज इश्क़ की कुलबुलाती-सी बेचैनियाँ किस कदर तो साकार होकर पढ़ने वालों को दसवीं-ग्यारहवीं वाले दिनों में लिए जाती हैं, जब दिन के चौबीस घंटे प्रेयर की पहली घंटी से लेकर रिसेस के खिंचाव तक सिमट आते थे | “उदास रात में झींगुरों का करूण गानकहानी कुछ-कुछ पिछली कहानी का एक्सटेंशन प्रतीत होती है जो बाद के ट्रीटमेंट में वयस्क ज़िंदगी की इश्क़िया जद्दोजहद को थोड़ा ज़्यादा विस्तार देती है | किताब की छठी कहानी ख़ुशबू बारिश की नहीं मिट्टी कीफाइनल मुहर लगाती है कि किशोर का पुरुष क़िस्सागो स्त्री किरदार को केंद्र में रखकर अजब-गजब चमत्कार कर सकता है |
किताब की सातवीं कहानी रेगिस्तानी मकड़ी के जालेजहाँ रिश्तों के ऊपर वाले कृत्रिम सुगंध के नीचे दुर्गंध मारती बदबुओं का विलाप है, वहीं आठवीं कहानी सड़क जो हाशिये से कम चौड़ी थीएक आम परिवार की हर रोज़ युद्धरत होने की आम-सी दास्तान है, जिसे किशोर की लेखनी बहुत दिलचस्प बना देती है | अगली दो कहानियाँ संग्रह की कमज़ोर कहानियाँ हैं...गीली चॉकऔर लोहे के घोड़े”...वही पुराना सब कुछ...गीली चॉकउलझे इश्क़ को सुलझाने की ट्रेजेडी है तो लोहे के घोड़ेमुफ़लिसी में भी जीवित बचे मोह की दास्तान...पुराना प्लॉट है दोनों का, कुछ भी नया है तो वो बस किशोर की क़िस्सागोई और उनका भाषा-सौंदर्य | किताब की ग्यारहवीं कहानी गली के छोर पर अँधेरे में डूबी एक खिड़कीमुहब्बत का एक देखा-सा, सुना-सा मगर थोड़ा सस्पेंस जगाता हुआ चैप्टर खोलती है | कहानी का अंत पढ़ के आपको थोड़ी-सी झुंझलाहट होती है और नायक की तरह आप भी अपने कंधे पर एक सवाल की लाश लिए बैठ जाते हैं कि कौन था उस रात रेशम की खिड़की पर |

अगली कहानी एक फ़ासले के दरम्यान खिले हुये चमेली के फूल” (कहानी का शीर्षक ना हुआ शेर का मिसरा हो गया, मानो) फिर से एक स्त्री किरदार से मिलवाती है और किशोर का अपने अद्भुत बिंबों के जरिये फीमेल सायकॉलजी की चंद और किरचों को शार्पेन करने के हुनर से रूबरू करवाती है | सरदार तेजिंदर सिंह का करेक्टर बेहद दिलचस्प बन कर उभरा है | तेरहवीं कहानी रात की नीम अँधेरी बाँहेंसंग्रह की इकलौती कहानी है जिसमें नरेटर अपने फर्स्ट परसन वाले फॉर्म में अवतरित हुआ है | इस कहानी में किशोर ने शायद खुद अपने ही शिल्प पर एक्सपेरिमेंट करने की कोशिश की है, लेकिन प्लॉट के परखनलियों में कुछ सोल्यूशन्स सही अनुपात में नहीं डाल पाये | लेकिन इस कहानी की प्रत्यक्ष कमियों की भरपायी आख़िरी कहानी बताशे का सूखा पानीके मास्टर और सिमली मिलकर कर देते हैं |

जैसा कि ऊपर लिखा है मैंने, ये कहानियाँ ठहर-ठहर कर पढ़ने की शर्त रखती हैं | किशोर की क़िस्सागोई का पूरा वजूद अपने नरेटर के कंधों पर विराजमान रहता है | पात्रों के दरम्यान संवाद-अदायगी के जरिये कहानी को खोलने में कम विश्वास रखते हैं किशोर और उनके इसी नरेटर के मार्फत हम रूबरू होते हैं उनकी आकर्षक भाषा से और मंत्र-मुग्ध करते उनके जुमलों और बिंबों से | लेकिन कई बार यही नरेटर किशोर की कमजोरी भी बनता प्रतीत होता है, जब एकदम से नरेशन कथ्य पर हावी होने लगता है | किशोर के लिए अपने इस नरेटर को काबू में रखना नितांत जरूरी है उनके लेखन के अगले पड़ाव के लिये | लेकिन महज अपने भाषा-सौंदर्य की नींव पर ही किशोर चौधरी इधर के कई समकालीन कथा-लेखकों से बीस ठहरते हैं |

चार साल पहले जब ये किताब हिन्द-युग्म से प्रकाशित होकर पाठकों के हाथ में आई थी...तब जब कि एक बड़े बैनर वाला प्रकाशक एक साधारण-सी लेखिका (जिसकी कहानियों में शब्दों से भी ज्यादा डॉट्स भरे रहते हैं) की एक बहुत ही साधारण-सी किताब के बेस्ट-सेलर होने की मुनादी कर रहा था, किशोर चौधरी की चौराहे पर सीढ़ियाँख़ामोशी से ऑन लाइन खरीदे जाने के तमाम कीर्तिमान कायम कर रही थी | इन चार सालों में किताब का तीसरा संस्करण भी बाज़ार में समाप्त होने को है और नए संस्करण के प्रिंट के लिए किताब फिर से प्रेस में जा चुकी है | हिन्द-युग्म जिस तरह से अपने लेखकों और उनकी किताबों को प्रोमोट करता है, वो क़ाबिले-तारीफ़ है | हाल-फिलहाल की अपनी कुछ किताबों से, जिसमें चौराहे पर सीढ़ियाँभी शामिल है, इस प्रकाशन ने कम-से-कम इस मिथ को तो तोड़ा ही है कि हिन्दी किताबें बिकती नहीं हैं |


पाठकों द्वारा हाथों-हाथ ली जाने वाली ये किताब चौराहे पर सीढ़ियाँआश्चर्यजनक रूप से साहित्यिक पत्रिकाओं में और चर्चाओं में अपनी जगह नहीं बना पायी है अभी तक, जो इस बात पर एक बार फिर से ठप्पा लगाती है कि हिन्दी-साहित्य के अकिंचन संपादक, आलोचक और समीक्षक अब तलक जुगाड़ की राजनीति से उबर नहीं पाये हैं |



किताब ख़रीदी जा सकती है इस जानिब से 

15 May 2017

डोलते कलेंडर की ऐ ! उदास तारीख़ों...

उम्मीद को उमीद बाँधने वाले शायर से कहा इक रोज़ उसने... सुनो आधे काटे हुए '' की भरपाई किसी शेर में उदासी को उद्दासी बना कर कर दो कि उदासी का वज़्न उम्मीद से ज़्यादा रहना चाहिए हर वक़्त, हर लम्हा ।
शायर नाराज़ है उस रोज़ से...उस से !
( तेरी उमीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को )

छू लिया जो उसने तो सनसनी उठी जैसे
धुन गिटार की नस-नस में अभी-अभी जैसे

डोलते कलेंडर की ऐ ! उदास तारीख़ों
रौनकें मेरे कमरे की हैं तुम से ही जैसे


पागलों सा हँस पड़ता हूँ मैं यक-ब-यक यूँ ही
करती रहती है उसकी याद  गुदगुदी जैसे

जैसे-तैसे गुज़रा दिन, रात की न पूछो कुछ
शाम से ही आ धमकी, सुब्ह तक रही जैसे

तुम चले गये हो तो वुसअतें सिमट आयीं
ये बदन समन्दर था अब हुआ नदी जैसे

सुब्ह-सुब्ह को उसका ख़्वाब इस क़दर आया
केतली से उट्ठी हो ख़ुश्बू चाय की जैसे

राख़ है, धुआँ है, इक स्वाद है कसैला सा
इश्क़ ये तेरा है सिगरेट अधफुकी जैसे

धूप, चाँदनी, बारिश और ये हवा मद्धम
करते उसकी फ़ुरकत पर लेप मरहमी जैसे

23 April 2017

अधूरे सच का बरगद

(कथादेश के मार्च 2017 अंक में प्रकाशित फ़ौजी की डायरी का पहला पन्ना) 

देर रात गए दूर कहीं पटाखों के फूटने की आवाज़ें आती हैं और किसी अनिष्ट की आशंका से नींद खुलती है चौंक कर | हड़बड़ायी-सी नींद को बड़ा समय लगता है फिर आश्वस्त करने में कि ये कश्मीर नहीं है...गाँव है अपना, तू छुट्टी पे है, ड्यूटी पर नहीं...यहाँ  तू बेफ़िक्र हो सुकून के आगोश में ख़्वाबों से गुफ़्तगू करती रह सकती है | उचटी हुई नींद का अफ़साना, लेकिन, जाने किस धुन पे बजता रहता है रात भर | सुकून का आगोश फिर कहाँ कर पाता है ख़्वाबों से गुफ़्तगू | किसी असहनीय निष्क्रियता का अहसास जैसे उस आगोश में काँटे पिरो जाता हो...उफ़्फ़ ! अधकहे से मिसरे...अधबुने से जुमले रतजगों की तासीर लिखते रहते हैं करवटों के मुख्तलिफ़ रंग से बिस्तर की सिलवटों पर | गाँव में की इन बेफ़िक्र रातों के रतजगे कितने अलग से हैं ना कश्मीर घाटी की उन आशंकित रातों से ! लेकिन क्या सचमुच ? कहाँ सहज हो पाती हैं रातें यहाँ छुट्टी में आकर भी ! रसोई में बर्तन गिरने की झंकार तक पर हृदय की धड़कनें उसी कदर कुलांचें भरने लगती हैं, जैसे वहाँ सरहद पर उन बंकरों में जब-तब भरा करती हैं |  छत पर उत्पात मचाती बंदरों की टोली हर बार, बार-बार उसी तरह से सशंकित कर जाती हैं जैसे उधर कश्मीर में छोटे-से-छोटा शोर कर जाया करती है |

     यहाँ भी तो सारे के सारे ख़्वाब रात की सतहों पर जैसे डूबने लगते हैं | उथली रातों में डूबते-उतराते ख़्वाबों को कोई तिनका तक नहीं मिलता शब्दों का, पार लगने के लिए | मर्मांतक-सी पीड़ा कोई ! चीख़ने का सऊर आया कहाँ है अभी तक इन ख़्वाबों को ? ...और आ भी जाये तो सुनेगा कौन इन ख़्वाबों की चीख़ ? छटपटाने की नियति ओढ़े हुये ये ख़्वाब, सारे ख़्वाब...कभी देवदारों की ऊँची फुनगियों पर चुकमुक बैठ बर्फ़ की उजली चादर पर खिंची सरहद वाली लकीर को देखना चाहते हैं किसी उदास शायर की आँखों से...तो कभी झेलम की नीरवता में छिपी आहों को यमुना तक पहुँचाना चाहते हैं...और कभी सदियों से ठिठके उन बूढ़े पहाड़ों को डल झील की तलहट्टियों में धकेल कर नहलाना  चाहते हैं | कितनी अटपटी-सी ख़्वाहिशें इन डूबते-उतराते ख़्वाबों की...!!!
    
उथली रातों के छिछले किनारों पर अटपटी-सी ख़्वाहिशों की एक लंबी फ़ेहरिश्त जाने कब से धँसी पड़ी है इन ख़्वाबों के रेत में | कश्यप था ना कोई ऋषि वो...हाँ, कश्यप ही तो था | सुनते हैं, देवताओं के संग आया था उड़नखटोले पर और सोने की
बड़ी मूठ वाली एक जादुई छड़ी घूमा कर जल-मग्न धरती के इस हिस्से को किया था तब्दील पृथ्वी के स्वर्ग में और नाम दिया था कश्मीर...”गर फ़िरदौस बर रूए ज़मीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त | अटपटी ख़्वाहिशों की ये फ़ेहरिश्त तभी से बननी शुरू हुई थी शायद | लेकिन ये बात शायद इन डूबते-उतराते ख़्वाबों को नहीं मालूम | उथली रातों ने वैसे तो कई बार बताना चाहा...लेकिन पार लगने की उत्कंठा या डूब जाने की आशंका इन ख़्वाबों को बस अपनी ख़्वाहिशों की फ़ेहरिश्त बनाने में मशगूल रखती है | हार कर ये उथली रातें बिनने लगती हैं इन ख़्वाबों की अटपटी ख़्वाहिशों को | ख़्वाहिशें...पहाड़ी नालों में बेतरतीब तैरती बत्तखों की टोली में शामिल होकर उन्हें तरतीब देने की ख़्वाहिश | ख़्वाहिशें...चिनारों के पत्तों को सर्दी के मौसम में टहनियों पर वापस चिपका देने की ख़्वाहिश | ख़्वाहिशें...सिकुड़ते हुये वूलर झील को खींच कर विस्तार देने की ख़्वाहिश | ख़्वाहिशें...इस पार उस पार में बाँटती सरफ़िरी सरहदी लकीर को अनदेखा करने की ख़्वाहिश | ख़्वाहिशें...सारे ‘हनुमंथप्पाओं’ को फिर से हँसते-गुनगुनाते देखने की ख़्वाहिश...

...वो एक कोई हनुमंथप्पा ही तो था जो अठारह साल पहले कश्मीर की पहली पोस्टिंग पर हौले से फुसफुसा गया था कानों में “जस्ट बिवेयर सर ! कश्मीर ग्रोज इन टू योअर नर्वस !!” लेकिन बिवेयर होने का मौका देती कहाँ है कश्मीर घाटी ? हाँ...छ दिन तक उस बर्फ़ीले कब्र में दबे रह कर भी हनुमंथप्पा वापस तो आ जाते हैं, लेकिन डॉक्टर बचा कहाँ पाते उसे ! वो जगह, जहाँ ये सब के सब ‘हनुंन्थप्पा’ मुस्तैद रहते हैं, वहाँ नब्ज़ दूनी रफ्तार से दौड़ती है...डर से कि गति धीमी हुई तो जम ही न जाय | वहाँ हृदय की धड़कनें धक-धक कर चलती नहीं, बाकायदा कार्ट-व्हील और समर-साल्ट करती हैं...खौफ़ से कि आहिस्ता हुई तो थम ही जायेंगी | वहाँ...हाँ, वहीं पर हनुमंथप्पाओंको फ्री राशन और फ्री एक्सट्रीम विंटर क्लोदिंग के साथ और भी ढ़ेर सारी चीजें फ्री में उपलब्ध हैं...अंतहीन गहराइयों वाले क्रिवास, हर पल निगलने को आतुर एवलांच, तयशुदा टेन्योर के बाद पके हुये बाल, कम होती श्रवण शक्ति, पस्त पाचन-तंत्र, हड्डी के जोड़ों में आकर बस जाने वाली जीवनपर्यंत टीस... | उस बादलों से भी ऊपर वाली बर्फ़ीली चोटी पर ड्यूटी देने जाने से पहले, तीन स्टेज वाला एक्लेम्टाइजेशन करते वक़्त इन हनुमंथप्पाओंको वहाँ जाने पर फ्री में हासिल होने वाली इन तमाम सुविधाओं की विस्तृत जानकारी दी जाती है | वे फिर भी जाते हैं और अपनी ड्यूटी अपनी क्षमता के आख़िरी औंस तक निभाते हैं...न ! न !! किसी देश, मुल्क, राष्ट्र के नाम पर नहीं...बल्कि अपने सेक्शन, अपनी प्लाटून, अपनी कंपनी और अपने रेजीमेंट के उस बैज के लिए जो उनकी टोपियों और उनके काँधों पर जगमगाता है |

एक्लेम्टाइजेशन के तीसरे स्टेज में इन हनुमंथप्पाओंको सिखाया जाता है कि एवलांच आने पर किस तरह उन्हें अपनी आँखें, नाकों और मुख को दोनों हाथों और घुटने के बीच छुपा कर बर्फ़ के सैलाब में दबे रहना है...और भरोसा रखना है कि उनके अन्य साथी आयेंगे उन्हें बचाने के लिए | बड़ी पतली सी डोर होती है उस भरोसे को और इच्छा-शक्ति को टूटने से बचाने वाली...और हनुमंथप्पानिकल आते हैं तीस फुट बर्फ़ के नीचे छ दिन तक दबे होकर भी | नहीं, ये चमत्कार नहीं | ये बस वो भरोसा है अपने रेजीमेंट के नाम-नमक-निशान पर...अपने साथियों पर...अपने कमान्डिंग ऑफिसर पर, वो कमान्डिंग ऑफिसर जो पूरी पलटन द्वारा नौ साथियों की मौत को स्वीकार कर लेने के बावजूद एवलांच वाली जगह पर ख़ुद जाकर बैठ जाता है छोटे से तम्बू में...कि उसे तीस फुट नीचे से भी इन हनुमंथप्पाओंकी कार्ट-व्हील करती धड़कनों की थपक सुनाई देती है उसे |

इन हनुमंथप्पाओंका वहाँ होना शौर्य और वीरता और जिजीविषा को अक्षरश: उच्चरित करना है...और इनकी कुर्बानियाँ बस एक विनम्र सा गुहार हैं कि हम सब इस मुल्क को एक मजबूत मुल्क बनाए रखने के लिए अपनी-अपनी काबिलियत के हिसाब से एक जिम्मेदार नागरिक बनें |

इधर माँ है कि गाँव में कहती रहती है सबसे अक्सर...गोली खाकर भी सही-सलामत आ गया बेटा कश्मीर से...दूसरा जनम हुआ है | सत्यनारायण का पाठ करवाती है, बगैर जाने-समझे कि पाठ में बैठा हुआ बेटा तो भगवान जी को कोस रहा है, ताने दे रहा कि इतने बड़े बचाने वाले हो तो क्यों नहीं बचाते उन सारे हनुमंथप्पाओंको | माँ पंडित जी से फुसफुसा कर कहती है...”दूसरा जनम हुआ है इसका...अबके नहीं जाने दूंगी इसको वापस कश्मीर” | मेरे कानों तक पहुँचती ये फुसफुसाहट गोली के उस ज़ख्म में जाने कैसी तो सिहरन पैदा कर देती है | कौन था वो शायर जो कह गया :-

“अधूरे सच का बरगद हूँ, किसी को ज्ञान क्या दूँगा
मगर मुद्दत से इक गौतम मेरे साये में बैठा है”


---x---