पुरानी डायरी के पुराने पन्नों को पलटना एच० जी० वेल्स के टाइम-मशीन सा ही चमत्कार दिखाता है...पीछे छूट गयी दुनिया में ले जाते हुये। कहीं रेनोल्ड, तो कहीं एड जेल, तो कहीं फाउंटेन पेन की बेतरतीब अटपटी लेखनी में तन्हा रातों को उकेरे गये शब्द कभी खुद को चमत्कृत करते हैं और कभी एक झेंप-सी पैदा करते हैं। ऐसे ही एक दिन किसी पुरानी डायरी के एक अटपटे-से झेंपे पन्ने को उठा कर शरद कोकास जी को भेज दिया एक सकुचाये हुये प्रश्न के साथ कि ये डायरी है या कविता(?)। कविता- उनका जवाब आया। ...तो उनके जवाब से संबल लेते हुये आपलोगों के समक्ष प्रस्तुत है डायरी का वही अटपटा-सा झेंपा हुआ पन्ना :-
नहीं देखा है मैंने कभी
फूल अमलतास का
जो कभी दिख भी जाये
तो शायद पहचानूँ ना,
जिक्र करता हूँ इसका फिर भी
अपनी कविता में-
तुम्हारे लिये
गौर नहीं किया कभी सुबह-सुबह
शबनम की बूँदों पर
झूलती रहती हैं जो दूब की नोक संग,
बुनता हूं लेकिन कविता इनसे-
तुम्हें सुनाने के लिये
सच कहूं तो
ये चाँद भी
तुम्हारी याद नहीं दिलाता
फुरसत ही कहाँ जो देखूँ इसे,
सजता है ये मगर मेरी कविता में अक्सर-
तुम्हारी खिलखिलाहट के लिये
ये अमलताश के फूल
ये शबनम की बूँदें
ये चाँद की चमक
और
तुम
प्रेम की अपनी त्रासदी है
और कविता की अपनी...
डायरी पर खुदा हुआ वर्ष और पन्ने पर छपी हुई तारीख ले जाती है तकरीबन तेरह साल पहले पुणे, खड़गवासला की घाटियों में किसी कार्पा डोंगर और राला रासी नामक पहाड़ियों पर। लथ-पथ पसीने में डूबा जिस्म, टूटते कंधों और चुभते तलवों के साथ खत्म होता हुआ दिन लेकर आता है चाँद अपने संग और उपजती है ये अटपटी पंक्तियाँ लगभग पंद्रह सौ किलोमीटर दूर बैठी एक बड़े-से शहर की एक छोटी-सी लड़की के लिये। कितना अद्भुत टाइम-मशीन है ये सच...! जिन कार्पा डोंगर और राला रासी की चढ़ाईयाँ चढ़ने में कभी पिट्ठु और राइफल लिये कंधे टूट जाते थे, तलवे छिल जाते थे...ये मशीन मुझे एक झटके में वहाँ ले जाता है अब। बस एक पन्ना ही तो पलटना होता है- झेंपा हुआ अटपटा-सा पन्ना :-)
15 March 2010
10 March 2010
यक़ीं कीजे, ये मैं ही हूँ, जरा फोटो पुरानी है
छुट्टियाँ कब बीत जाती हैं, पता भी नहीं चलता। ड्युटी पर आये हुये ये चौथा दिन और फिर से वही अहसास कि जैसे यहीं हूँ सदियों से। सतरह सालों बाद इस बार उपस्थित हो पाया था होली पर अपने गाँव में और क्या खूब होली जमी। अबके इधर कश्मीर में खूब-खूब बर्फ गिरी है...ग्लोबल वार्मिंग की तमाम धमकियों को धता बताते हुये। एक तरफ झेलम की हँसी छुपाये नहीं छुप रही तो दूसरी तरफ चिनारों के अट्टहास गुंजायमान हैं वादी के कोने-कोने में। यूं चंद सिरफिरों की उन्मादी हरकतें खलल डालती हैं बीच-बीच में वादी के इस हर्षोल्लास में, किंतु मुस्तैद हरी वर्दियाँ ज्यादा देर टिकने नहीं देती हैं इस खलल को।
...और इन समस्त व्यस्तताओं के मध्य मुझसे अपने प्रिय ब्लौगरों के कई पोस्ट छूट गये हैं। पकड़ता हूँ धीरे-धीरे सब "छूट गयों" को। फिलहाल आज की बात कि दिन खास है आज का। दिन बहुत खास है कि मेरे प्रिय शायर का जन्म-दिन है ये। कुमार विनोद का जन्म-दिन । वैसे पता तो ये भी चला है कि आज ही के दिन मैं भी पैदा हुआ था अहले सुबह करीब दस हजार साल पहले। लेकिन हम "पाल ले इक रोग नादां के..." के इस पन्ने पर मनायेंगे कुमार विनोद की सालगिरह उन्हीं की एक बेहतरीन ग़ज़ल गुनगुनाकर। आइये गुनगुनाते हैं उनकी लाजवाब बिम्बों और अनूठे अंदाज वाले शेरों से सजी इस ग़ज़ल को:-
कभी लिखता नहीं दरिया, फ़क़त कहता ज़बानी है
कि दूजा नाम जीवन का रवानी है, रवानी है
बड़ी हैरत में डूबी आजकल बच्चों की नानी है
कहानी की किताबों में न राजा है, न रानी है
कहीं जब आस्माँ से रात चुपके से उतर आये
परिंदा घर को चल देता, समझ लेता निशानी है
कहाँ जायें, किधर जायें, समझ में कुछ नहीं आता
कि ऐसे मोड़ पर लाती हमें क्यों जिंदगानी है
बहुत सुंदर से इस एक्वेरियम को गौर से देखो
जो इसमें कैद है मछली,क्या वो भी जल की रानी है
घनेरे बाल, मूँछें और चेहरे पर चमक थोड़ी
यक़ीं कीजे, ये मैं ही हूँ, जरा फोटो पुरानी है
...अपने गाँव से पटना की ट्रेन यात्रा के दौरान "शुक्रवार" पत्रिका के नये अंक को पलट कर देख रहा था तो नजर पड़ी कुमार विनोद की ग़ज़ल-संग्रह "बेरंग हैं सब तितलियाँ" {जिसकी चर्चा मैं कुछ दिनों पहले यहाँ कर चुका था} की समीक्षा पर। अच्छा लगा देखकर...बहुत अच्छा लगा देखकर कि ग़ज़लों की बात हो रही है अच्छी पत्र-पत्रिकाओं में। कुमार विनोद जैसे शायर हों अपने आस-पास तो ग़ज़ल का भविष्य वैसे भी सुरक्षित दिखता है।
...और इन समस्त व्यस्तताओं के मध्य मुझसे अपने प्रिय ब्लौगरों के कई पोस्ट छूट गये हैं। पकड़ता हूँ धीरे-धीरे सब "छूट गयों" को। फिलहाल आज की बात कि दिन खास है आज का। दिन बहुत खास है कि मेरे प्रिय शायर का जन्म-दिन है ये। कुमार विनोद का जन्म-दिन । वैसे पता तो ये भी चला है कि आज ही के दिन मैं भी पैदा हुआ था अहले सुबह करीब दस हजार साल पहले। लेकिन हम "पाल ले इक रोग नादां के..." के इस पन्ने पर मनायेंगे कुमार विनोद की सालगिरह उन्हीं की एक बेहतरीन ग़ज़ल गुनगुनाकर। आइये गुनगुनाते हैं उनकी लाजवाब बिम्बों और अनूठे अंदाज वाले शेरों से सजी इस ग़ज़ल को:-
कभी लिखता नहीं दरिया, फ़क़त कहता ज़बानी है
कि दूजा नाम जीवन का रवानी है, रवानी है
बड़ी हैरत में डूबी आजकल बच्चों की नानी है
कहानी की किताबों में न राजा है, न रानी है
कहीं जब आस्माँ से रात चुपके से उतर आये
परिंदा घर को चल देता, समझ लेता निशानी है
कहाँ जायें, किधर जायें, समझ में कुछ नहीं आता
कि ऐसे मोड़ पर लाती हमें क्यों जिंदगानी है
बहुत सुंदर से इस एक्वेरियम को गौर से देखो
जो इसमें कैद है मछली,क्या वो भी जल की रानी है
घनेरे बाल, मूँछें और चेहरे पर चमक थोड़ी
यक़ीं कीजे, ये मैं ही हूँ, जरा फोटो पुरानी है
...अपने गाँव से पटना की ट्रेन यात्रा के दौरान "शुक्रवार" पत्रिका के नये अंक को पलट कर देख रहा था तो नजर पड़ी कुमार विनोद की ग़ज़ल-संग्रह "बेरंग हैं सब तितलियाँ" {जिसकी चर्चा मैं कुछ दिनों पहले यहाँ कर चुका था} की समीक्षा पर। अच्छा लगा देखकर...बहुत अच्छा लगा देखकर कि ग़ज़लों की बात हो रही है अच्छी पत्र-पत्रिकाओं में। कुमार विनोद जैसे शायर हों अपने आस-पास तो ग़ज़ल का भविष्य वैसे भी सुरक्षित दिखता है।
हलफ़नामा-
कुमार विनोद,
ग़ज़ल,
बहरे हज़ज
02 March 2010
कुछ रंग अनदेखे-से...
होली की खुमारी चेहरे पे लगे रंगों के गीलेपन के साथ ही धीरे-धीरे सूखती हुई...उतरती हुई। रंगों की ये धमाचौकड़ी पूरे मौसम को ताजगी देती हुई-सी, जिसकी आगे आने वाले पतझड़ के वास्ते डटे रहने के लिये दरकार है। हर रंग अपनी कहानी कहता हुआ...और ऐसे में अचानक से मुझे कुछ ऐसे रंगों की याद आती है जिन्हें सिर्फ कविताओं में, ग़ज़ल के शेरों में, कहानियों में , गीतों में...अपने प्रिय साहित्यकारों द्वारा बिम्बों, प्रतिकों के तौर पे इस्तेमाल करते हुये पढ़ा जाता है। ये रंग जिन्हें हम सिर्फ पढ़ते हैं शब्दों में, देख कभी नहीं पाते हैं हकीकतन। कम-से-कम मैं तो नहीं ही देख पाया हूँ अब तलक। किंतु इन रंगों की खुमारी कम नहीं है कहीं से भी, अभी-अभी चेहरे पे पुते इन गीले रंगों के मुकाबले। आइये देखते हैं शब्दों वाले ये अजीब नशीले रंग जो आपलोगों की निगाहों के समक्ष से भी गुजरते होंगे यदा-कदा :-
कत्थई आँखें
हरी तबीयत
पीली बारिश
बैंगनी अँधेरा
सब्ज़ रूहें
इंद्रधनुषी सपने
मटमैले हर्फ
सुर्ख हवा
चितकबरी यादें
रंगों का ये नशा हमपे, आपसब पे सर्वदा-सर्वदा छाया रहे...!
नीला चाँद
कत्थई आँखें
हरी तबीयत
पीली बारिश
बैंगनी अँधेरा
सब्ज़ रूहें
इंद्रधनुषी सपने
मटमैले हर्फ
लाल प्रश्न
सुर्ख हवा
चितकबरी यादें
रंगों का ये नशा हमपे, आपसब पे सर्वदा-सर्वदा छाया रहे...!
हलफ़नामा-
एक ब्लौगर की डायरी से...
22 February 2010
सितारों ने की दर्ज है ये शिकायत...
अब ग़ज़ल की बारी है। विगत कुछ प्रविष्टियों में इधर-उधर की सुनाने के बाद अब एक ग़ज़ल। पुरानी है, मेरे चंद साथियों के लिये जो श्री पंकज सुबीर जी के ब्लौग के नियमित पाठक हैं| पुरानी ग़ज़ल नये लिबास में कि मतले में बदलाव है और चंद अशआर नये जोड़े हैं। जानता हूँ कि मेरे कुछ कवि-मित्र और कुछ एक बुद्धिजीवी साथी नाक-भौं सिकोड़ेंगे इन सस्ते रूमानी शेरों पर। जानता हूँ...फिर भी खास उन्हीं बंधुओं को समर्पित ये ग़ज़ल कि प्रेम-चतुर्दशी का फ्लेवर उतरा नहीं है...कि प्रेम से ज्यादा शाश्वत और प्रेम से ज्यादा सामयिक कुछ भी नहीं है...कि भटकी सामाजिकता और छिछली राजनीति में डगमगाते मानवीय-संतुलन के लिये ये सस्ते रुमानी हुस्नो-इश्क वाली ग़ज़ल भी बीच-बीच में सही बटखरे लेकर आती है...कि तल्ख और तीखे तेवरों के मध्य तनिक जायका बदलने के लिये इन शेरों की उपस्थिति आवश्यक है।...तो इन तमाम "कि" की खातिर पेश है ये ग़ज़ल:-
ये बाजार सारा कहीं थम न जाये
न गुजरा करो चौक से सर झुकाये
कोई बंदगी है कि दीवानगी ये
मैं बुत बन के देखूँ, वो जब मुस्कुराये
समंदर जो मचले किनारे की खातिर
लहर-दर-लहर क्यों उसे आजमाये
सितारों ने की दर्ज है ये शिकायत
कि कंगन तेरा, नींद उनकी उड़ाये
मचे खलबली, एक तूफान उट्ठे
झटक के जरा जुल्फ़ जब तू हटाये
हवा जब शरारत करे बादलों से
तो बारिश की बंसी ये मौसम सुनाये
हवा छेड़ जाये जो तेरा दुपट्टा
जमाने की साँसों में साँसें न आये
हैं मगरूर वो गर, तो हम हैं मिजाजी
भला ऐसे में कौन किसको मनाये
उफनता हो ज्वालामुखी जैसे कोई
तेरा हुस्न जब धूप में तमतमाये
...और ग़ज़ल के बाद हमेशा की तरह इस बहरो-वजन पर आधारित कुछ प्रसिद्ध फिल्मी गीतों का जिक्र। इस बहरो-वजन(मुतकारिब की चार रुक्नी बहर) पर ढ़ेरों फिल्मी गीत याद आते हैं। महेन्द्र कपूर का गाया मेरा सर्वकालीन पसंदीदा गाना "मेरा प्यार वो है कि मरकर भी तुमको"...फिल्म मासूम का "हुजूर इस कदर भी न इतरा के चलिये"...किशोर कुमार का गाया "हमें और जीने की चाहत न होती"....और रफ़ी साब के उस प्रसिद्ध युगल-गीत "वो जब याद आये बहुत याद आये " का मुखड़ा(सिर्फ मुखड़ा, अंतरे किसी और बहर में हैं)। अरे हाँ, जगजीत सिंह की गायी वो जबरदस्त हिट नज़्म "वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी " भी इसी बहरो-वजन पे तो है। किंतु इस बहरो-वजन का जिक्र फिल्म मुगले-आज़म के गीत "मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोये " के बगैर पूरा नहीं हो सकता है। ऊपर वर्णित तमाम गानों को "मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोये" की धुन पे गाकर देखिये एक बार- बस मजे के लिये। इस बहरो-वजन पर लिखी गयी किसी भी ग़ज़ल को आराम से इन धुनों पर गुनगुनाया जा सकता है।
इसी जमीन पर मशहूर शायर भभ्भड़ भौंचक्के जी की एक बेहतरीन ग़ज़ल और होली का मूड लाती एक जबरदस्त हज़ल के लिये यहाँ क्लीक करें। शायर का असली नाम जानने के लिये उस पोस्ट की टिप्पणियों को गौर से पढ़ें। फिलहाल इतना ही। होली की आपसब को अग्रिम रंगभरी शुभकामनायें!
ये बाजार सारा कहीं थम न जाये
न गुजरा करो चौक से सर झुकाये
कोई बंदगी है कि दीवानगी ये
मैं बुत बन के देखूँ, वो जब मुस्कुराये
समंदर जो मचले किनारे की खातिर
लहर-दर-लहर क्यों उसे आजमाये
सितारों ने की दर्ज है ये शिकायत
कि कंगन तेरा, नींद उनकी उड़ाये
मचे खलबली, एक तूफान उट्ठे
झटक के जरा जुल्फ़ जब तू हटाये
हवा जब शरारत करे बादलों से
तो बारिश की बंसी ये मौसम सुनाये
हवा छेड़ जाये जो तेरा दुपट्टा
जमाने की साँसों में साँसें न आये
हैं मगरूर वो गर, तो हम हैं मिजाजी
भला ऐसे में कौन किसको मनाये
उफनता हो ज्वालामुखी जैसे कोई
तेरा हुस्न जब धूप में तमतमाये
...और ग़ज़ल के बाद हमेशा की तरह इस बहरो-वजन पर आधारित कुछ प्रसिद्ध फिल्मी गीतों का जिक्र। इस बहरो-वजन(मुतकारिब की चार रुक्नी बहर) पर ढ़ेरों फिल्मी गीत याद आते हैं। महेन्द्र कपूर का गाया मेरा सर्वकालीन पसंदीदा गाना "मेरा प्यार वो है कि मरकर भी तुमको"...फिल्म मासूम का "हुजूर इस कदर भी न इतरा के चलिये"...किशोर कुमार का गाया "हमें और जीने की चाहत न होती"....और रफ़ी साब के उस प्रसिद्ध युगल-गीत "वो जब याद आये बहुत याद आये " का मुखड़ा(सिर्फ मुखड़ा, अंतरे किसी और बहर में हैं)। अरे हाँ, जगजीत सिंह की गायी वो जबरदस्त हिट नज़्म "वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी " भी इसी बहरो-वजन पे तो है। किंतु इस बहरो-वजन का जिक्र फिल्म मुगले-आज़म के गीत "मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोये " के बगैर पूरा नहीं हो सकता है। ऊपर वर्णित तमाम गानों को "मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोये" की धुन पे गाकर देखिये एक बार- बस मजे के लिये। इस बहरो-वजन पर लिखी गयी किसी भी ग़ज़ल को आराम से इन धुनों पर गुनगुनाया जा सकता है।
इसी जमीन पर मशहूर शायर भभ्भड़ भौंचक्के जी की एक बेहतरीन ग़ज़ल और होली का मूड लाती एक जबरदस्त हज़ल के लिये यहाँ क्लीक करें। शायर का असली नाम जानने के लिये उस पोस्ट की टिप्पणियों को गौर से पढ़ें। फिलहाल इतना ही। होली की आपसब को अग्रिम रंगभरी शुभकामनायें!
हलफ़नामा-
ग़ज़ल,
बहरे मुतकारिब
15 February 2010
प्रेम-चतुर्दशी पर अपनी कुछ प्रेमिकाओं की याद में
उम्र का ये पड़ाव बड़ा ही विचित्र-सा है। ये वो पड़ाव है जब "बड़प्पन" की तलाश में भटकती उम्र अचानक से अपने "लड़कपन" को बचाये रखने की मुहिम में बौखलायी फिरने लगती है। फिर भी ये पड़ाव इतना तो सुरक्षित है ही कि आज इस प्रेम-चतुर्दशी के इस उत्सव पर मैं ये घोषणा कर सकूँ कि डायना मेरा पहला प्यार थी।...थी??? ...या है??? नहीं, महज "पहला" कहकर चुप हो जाना अनुचित होगा, क्योंकि मामला तो अव्वलो आखिरश दरम्यां-दरम्यां वाला है। विगत एक हफ़्ते से विभिन्न दिनों को नये-नये नाम से मनाते हुये देखता है जब ये "लड़कपन", तो फिर कमबख्त "बड़प्पन" अपनी कुछ प्रेमिकाओं के नाम गुनगुनाने बैठ जाता है। एक लंबी-सी फ़ेहरिश्त बन जाती है उन नामों को गुनगुनाते...उन प्रेमिकाओं का नाम गुनगुनाते-गुनगुनाते। चलिये उम्र के इस पड़ाव पर खुद को अब बिल्कुल सुरक्षित मानते हुये मैं इस फ़ेहरिश्त को आप सब के संग साझा करता हूँ। फ़ेहरिश्त की क्रमवार सूचि में भले ही ढ़ेरों दुविधायें हों, किंतु पहले स्थान पर निर्विवाद रूप से डायना थी, है और रहेगी- अनंत काल तक।
नहीं, मैं प्रिंस चार्ल्स वाली ब्रिटेन के राजघराने वाली डायना की बात नहीं कर रहा यहाँ। मैं बात कर रहा हूँ डायना पामर । जी हाँ, फैंटम उर्फ वेताल उर्फ अपने चलते-फिरते प्रेत की प्रेयसी डायना की बात कर रहा हूँ। इक्कीसवाँ फैंटम जब पहली बार मिला था कांगो गणराज्य के अमेरिकी दूतावास में डायना से, तब से लेकर
अब तलक चल रही इस प्रेम-कहानी का सिलसिला उम्र-दर-उम्र नये अफ़साने गढ़ता चला जा रहा है। ये बिल्कुल ही पहली नजर के पहले प्यार वाला किस्सा था डायना के संग। उधर वेताल को हुआ, इधर मुझे भी। इंद्रजाल कामिक्स के उन पन्नों में मंडराती किसी स्वप्न-सुंदरी सदृश ही डायना एकदम से दिन का चैन और रातों की निंदिया उड़ा ले गयी थी उन दिनों। ये उन दिनों की बात है, जब अपने फैंटेसी की मनमोहक दुनिया बसाया हुआ बचपन सहर्ष ही किट और हेलोइश जैसे प्यारे-प्यारे जुड़वां बेटे-बेटी का पिता कहलाने को तैयार था। हवा-महल के उन सुहाने दिनों में, बौने बंडारों के जहर बुझे तीरों के सुरक्षा-घेरे में, खोपड़ीनुमा गुफा की उन ठंढ़ी तलहटियों में, शेरा और तूफान के संग वाली सैरों में और वेताल के साथ-साथ ही मंडराती चुनौतियों के खिलाफ़ छेड़ी हुई जंगों में...खिलखिलाती मचलती हुई डायना ...उफ़्फ़्फ़्फ़!!! ...और जब अपने मि० वाकर उर्फ चलते-फिरते प्रेत ने प्रणय-निवेदन किया था हमारी डायना से और फिर डायना का उस निवेदन को सहर्ष स्वीकारना...आहहा! कैसा माहौल था वो खुशनुमा!! मानो डायना ने हमारा प्रणय-निवेदन ही स्वीकारा हो प्रत्यक्षतः.... :-) शायद याद हो आपसब को कि शादी में सुदूर ज़नाडु से चलकर अपना प्यारा जादूगर खुद मैण्ड्रेक भी आया था समारोह में हिस्सा लेने।
...और मैण्ड्रेक के साथ ही याद आती है प्रिसेंज नारडा। नारडा के ही महल के बगीचे में मैण्ड्रेक का इजहार अपने प्यार का राजकुमारी नारडा के प्रति और फिर
नारडा का ज़नाडु में स्थानंतरित होना लोथार और मोटे बटलर का साथ देने, शायद इंद्रजाल कामिक्स की दुनिया का एक और शो-केस इवेंट था। इसी फ़ेहरिश्त में यूं तो बेला भी शामिल थी, लेकिन बीतते वक्त के साथ उसकी तस्वीर तनिक धुमिल हो गयी है। बेला...बहादुर की बेला। कहानी के प्लाट में तमाम विविधतायें होते हुये भी बेला का तनिक रफ और टफ व्यक्तित्व मुझे ज्यादा रास नहीं आता। कराटे में वैसे तो डायना भी ब्लैक-बेल्ट थी, लेकिन फिर भी उसकी नजाकत और उसके जिस्म का लोच एक अलग ही अफ़साना बयान करते थे।
फ़ेहरिश्त में आगे चंद और विदेशी नायिकाओं का आगमन होता है। यकीनन लुइस लेन मेरे लिये डायना के समक्ष ठहरती है। डेली प्लानेट के सौम्य और मृदुभाषी रिपोर्टर क्लार्क केंट की दोस्त और प्रेयसी जब क्लार्क केंट को सुपरमैन के ऊपर तरजीह देती है, एक झटके में मेरा दिल ले जाती है। बात उन दिनों की है जब
अचानक से इंद्रजाल कामिक्स का प्रकाशन बंद हो गया था और विदेश से आनेवाले मेरे एक रिश्तेदार मेरे कामिक्स-प्रेम को देखते हुये मेरे लिये चंद डीसी और मार्वल कामिक्स का पूरा सेट उपहार में लेकर आये थे। उन दिनों जब डायना दिखनी बंद हो गयी थी, लुइस लेन आयी थी एक बहुत ही मजबूत विकल्प बन कर। सुपरमैन की प्रेयसी किसी भी मामले में कहीं भी सुपरमैन से कम नही थी(है)...याद आता है मुझे क्लार्क कैंट और लुइस का विवाह और उन दिनों किसी कारणवश सुपरमैन अपनी सारी शक्तियाँ खो चुका था, तब तमाम विपदाओं से लड़ती हुई लुइस लेन ने अकेले ही क्लार्क कैंट को मुसिबतों से निकाला था।
...और इसी जारी प्रेम-प्रसंगों की एक सबसे प्रबल प्रतिभागी है मेरी जेन। जी हाँ, अपने नेक्स्ट डोर नेबर पीटर पार्कर उर्फ स्पाइडर मैन की मेरी जेन । दि बोल्ड एंड सेन्सुअस मेरी
जेन...उफ़्फ़्फ़! उन तमाम बनते-बिगड़ते रिश्तों की उलझनें, उन तमाम विलेनों के संग की उठा-पटक, उन तमाम रातों की चिंतित करवटें जब पीटर पार्कर अपने स्पाईडी अवतार में दुश्मनों की बैंड बजा रहा होता है...मैंने मेरी जेन का साथ निभाया है। इस लिहाज से मैं कई बार उलझन में भी पड़ जाता हूँ। उलझन में कि मेरी जेन या डायना पामर...?? डायना या मेरी...??? और इस उलझन में डायना का पलड़ा भारी करने हेतु मैं कभी इंटरनेट पे तो कभी कबाड़ियों और पुरानी दुकानों के गर्द पड़ चुके कोनों में फैंटम कामिक्सों को तलाशते रहता हूँ। इंद्रजाल कामिक्स के लुप्तप्राय हो जाने के बावजूद अब भी जुड़ा हुआ हूँ येन-केन-प्रकारेन फैंटम की दुनिया से...तो डायना का पलड़ा हमेशा भारी ही रहता है।
इसी फेहरिश्त में कहीं पर सेलिना भी है। सेलिना....कैट वोमेन...बैटमेन की प्रेमिका। वैसे शायद प्रेमिका कहना अनुचित होगा। क्योंकि सेलिना
का अपराधिक-चरित्र और बैटमैन का अपराध को समूल नाश करने का लिया गया वचन इस प्रसंग को आगे बढ़ने से रोकता है। किंतु अपने अल्टर-इगो में ब्रुस वेन कहीं-न-कहीं सेलिना के प्रति झुकाव तो महसूस करता ही है और उसी झुकाव की वजह से हम बैटमैन के चाहनेवाले भी दिलोजान से कामना करते रहते हैं कि ये खूबसूरत सेलिना छोड़ क्यों नहीं देती है चोरी-चकारी के धंधे।
फ़ेहरिश्त यहाँ तक तो बिल्कुल ही स्पष्ट थी, किंतु इसके बाद से तनिक गड्ड-मड्ड होने लगती है। सिलसिलेवार नहीं रह पाती। इसमें कहीं पर विलियम वर्ड्सवर्थ की लुसी शामिल हो जाती है तो कहीं गुलज़ार की सोनां। कहीं राजेन्द्र यादव की वो धोती में लिपटी हुई प्रभा का नाम आता है तो कहीं मन्नु भंडारी की वो प्रेम-त्रिकोण में उलझी हुई दीपा। कभी आर०के० नारायण की रोजी आ जाती है छम्म से तो कभी जैनेन्द्र की सुनिता। इसी फ़ेहरिश्त में जहाँ गैब्रियल मार्केज की फर्मिना डाज़ा भी शामिल है, वहीं सिडनी शेल्डन की ट्रेसी व्हीटनी भी...और सुरेन्द्र मोहन पाठक{?} की रेणु से लेकर वेदप्रकाश शर्मा{??} की सोनाली भी। मार्गरेट मिशेल की स्कारलेट ओ’हारा तो यकीनन है इस फ़ेहरिश्त में और एरिक सिगल की जेनिफर भी। कुछ और नाम स्मृति-अहाते पर आहट करते आते हैं...जैसे कि धर्मवीर भारती की सुधा, अमृता प्रीतम की मीता और सुरेन्द्र वर्मा की वर्षा वशिष्ठ। फ़ेहरिश्त तो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही और पोस्ट बहुत लंबी होती चली जा रही है। चलिये फिलहाल फ़ेहरिश्त को समेटता हूँ एक आखिरी नाम के साथ...अंजलि। अंजलि को नहीं पहचाना आप सब ने? अरे अपनी अंजलि जोशी...जिसकी पीली छतरी कई बार एक तितली बन कर उड़ जाती है...अपने उदय प्रकाश की अंजलि।
...तो फिलहाल इतना ही। प्रेमिकाओं की ये लंबी फ़ेहरि्श्त अभी खत्म नहीं हुई है। खत्म? अभी तो सच पूछिये आधे तक भी नहीं पहुँचे हैं हम। फिर कभी चर्चा करुंगा...और हाँ इस "प्रेमिका" शब्द से धोखा मत खाइये आप सब। ये सब-के-सब पूर्णतया एकतरफा प्यार के मामले हैं। वो चचा ग़ालिब ने कहा है ना:-
ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता
नहीं, मैं प्रिंस चार्ल्स वाली ब्रिटेन के राजघराने वाली डायना की बात नहीं कर रहा यहाँ। मैं बात कर रहा हूँ डायना पामर । जी हाँ, फैंटम उर्फ वेताल उर्फ अपने चलते-फिरते प्रेत की प्रेयसी डायना की बात कर रहा हूँ। इक्कीसवाँ फैंटम जब पहली बार मिला था कांगो गणराज्य के अमेरिकी दूतावास में डायना से, तब से लेकर
अब तलक चल रही इस प्रेम-कहानी का सिलसिला उम्र-दर-उम्र नये अफ़साने गढ़ता चला जा रहा है। ये बिल्कुल ही पहली नजर के पहले प्यार वाला किस्सा था डायना के संग। उधर वेताल को हुआ, इधर मुझे भी। इंद्रजाल कामिक्स के उन पन्नों में मंडराती किसी स्वप्न-सुंदरी सदृश ही डायना एकदम से दिन का चैन और रातों की निंदिया उड़ा ले गयी थी उन दिनों। ये उन दिनों की बात है, जब अपने फैंटेसी की मनमोहक दुनिया बसाया हुआ बचपन सहर्ष ही किट और हेलोइश जैसे प्यारे-प्यारे जुड़वां बेटे-बेटी का पिता कहलाने को तैयार था। हवा-महल के उन सुहाने दिनों में, बौने बंडारों के जहर बुझे तीरों के सुरक्षा-घेरे में, खोपड़ीनुमा गुफा की उन ठंढ़ी तलहटियों में, शेरा और तूफान के संग वाली सैरों में और वेताल के साथ-साथ ही मंडराती चुनौतियों के खिलाफ़ छेड़ी हुई जंगों में...खिलखिलाती मचलती हुई डायना ...उफ़्फ़्फ़्फ़!!! ...और जब अपने मि० वाकर उर्फ चलते-फिरते प्रेत ने प्रणय-निवेदन किया था हमारी डायना से और फिर डायना का उस निवेदन को सहर्ष स्वीकारना...आहहा! कैसा माहौल था वो खुशनुमा!! मानो डायना ने हमारा प्रणय-निवेदन ही स्वीकारा हो प्रत्यक्षतः.... :-) शायद याद हो आपसब को कि शादी में सुदूर ज़नाडु से चलकर अपना प्यारा जादूगर खुद मैण्ड्रेक भी आया था समारोह में हिस्सा लेने।...और मैण्ड्रेक के साथ ही याद आती है प्रिसेंज नारडा। नारडा के ही महल के बगीचे में मैण्ड्रेक का इजहार अपने प्यार का राजकुमारी नारडा के प्रति और फिर

नारडा का ज़नाडु में स्थानंतरित होना लोथार और मोटे बटलर का साथ देने, शायद इंद्रजाल कामिक्स की दुनिया का एक और शो-केस इवेंट था। इसी फ़ेहरिश्त में यूं तो बेला भी शामिल थी, लेकिन बीतते वक्त के साथ उसकी तस्वीर तनिक धुमिल हो गयी है। बेला...बहादुर की बेला। कहानी के प्लाट में तमाम विविधतायें होते हुये भी बेला का तनिक रफ और टफ व्यक्तित्व मुझे ज्यादा रास नहीं आता। कराटे में वैसे तो डायना भी ब्लैक-बेल्ट थी, लेकिन फिर भी उसकी नजाकत और उसके जिस्म का लोच एक अलग ही अफ़साना बयान करते थे।
फ़ेहरिश्त में आगे चंद और विदेशी नायिकाओं का आगमन होता है। यकीनन लुइस लेन मेरे लिये डायना के समक्ष ठहरती है। डेली प्लानेट के सौम्य और मृदुभाषी रिपोर्टर क्लार्क केंट की दोस्त और प्रेयसी जब क्लार्क केंट को सुपरमैन के ऊपर तरजीह देती है, एक झटके में मेरा दिल ले जाती है। बात उन दिनों की है जब
अचानक से इंद्रजाल कामिक्स का प्रकाशन बंद हो गया था और विदेश से आनेवाले मेरे एक रिश्तेदार मेरे कामिक्स-प्रेम को देखते हुये मेरे लिये चंद डीसी और मार्वल कामिक्स का पूरा सेट उपहार में लेकर आये थे। उन दिनों जब डायना दिखनी बंद हो गयी थी, लुइस लेन आयी थी एक बहुत ही मजबूत विकल्प बन कर। सुपरमैन की प्रेयसी किसी भी मामले में कहीं भी सुपरमैन से कम नही थी(है)...याद आता है मुझे क्लार्क कैंट और लुइस का विवाह और उन दिनों किसी कारणवश सुपरमैन अपनी सारी शक्तियाँ खो चुका था, तब तमाम विपदाओं से लड़ती हुई लुइस लेन ने अकेले ही क्लार्क कैंट को मुसिबतों से निकाला था। ...और इसी जारी प्रेम-प्रसंगों की एक सबसे प्रबल प्रतिभागी है मेरी जेन। जी हाँ, अपने नेक्स्ट डोर नेबर पीटर पार्कर उर्फ स्पाइडर मैन की मेरी जेन । दि बोल्ड एंड सेन्सुअस मेरी
जेन...उफ़्फ़्फ़! उन तमाम बनते-बिगड़ते रिश्तों की उलझनें, उन तमाम विलेनों के संग की उठा-पटक, उन तमाम रातों की चिंतित करवटें जब पीटर पार्कर अपने स्पाईडी अवतार में दुश्मनों की बैंड बजा रहा होता है...मैंने मेरी जेन का साथ निभाया है। इस लिहाज से मैं कई बार उलझन में भी पड़ जाता हूँ। उलझन में कि मेरी जेन या डायना पामर...?? डायना या मेरी...??? और इस उलझन में डायना का पलड़ा भारी करने हेतु मैं कभी इंटरनेट पे तो कभी कबाड़ियों और पुरानी दुकानों के गर्द पड़ चुके कोनों में फैंटम कामिक्सों को तलाशते रहता हूँ। इंद्रजाल कामिक्स के लुप्तप्राय हो जाने के बावजूद अब भी जुड़ा हुआ हूँ येन-केन-प्रकारेन फैंटम की दुनिया से...तो डायना का पलड़ा हमेशा भारी ही रहता है।इसी फेहरिश्त में कहीं पर सेलिना भी है। सेलिना....कैट वोमेन...बैटमेन की प्रेमिका। वैसे शायद प्रेमिका कहना अनुचित होगा। क्योंकि सेलिना
का अपराधिक-चरित्र और बैटमैन का अपराध को समूल नाश करने का लिया गया वचन इस प्रसंग को आगे बढ़ने से रोकता है। किंतु अपने अल्टर-इगो में ब्रुस वेन कहीं-न-कहीं सेलिना के प्रति झुकाव तो महसूस करता ही है और उसी झुकाव की वजह से हम बैटमैन के चाहनेवाले भी दिलोजान से कामना करते रहते हैं कि ये खूबसूरत सेलिना छोड़ क्यों नहीं देती है चोरी-चकारी के धंधे।फ़ेहरिश्त यहाँ तक तो बिल्कुल ही स्पष्ट थी, किंतु इसके बाद से तनिक गड्ड-मड्ड होने लगती है। सिलसिलेवार नहीं रह पाती। इसमें कहीं पर विलियम वर्ड्सवर्थ की लुसी शामिल हो जाती है तो कहीं गुलज़ार की सोनां। कहीं राजेन्द्र यादव की वो धोती में लिपटी हुई प्रभा का नाम आता है तो कहीं मन्नु भंडारी की वो प्रेम-त्रिकोण में उलझी हुई दीपा। कभी आर०के० नारायण की रोजी आ जाती है छम्म से तो कभी जैनेन्द्र की सुनिता। इसी फ़ेहरिश्त में जहाँ गैब्रियल मार्केज की फर्मिना डाज़ा भी शामिल है, वहीं सिडनी शेल्डन की ट्रेसी व्हीटनी भी...और सुरेन्द्र मोहन पाठक{?} की रेणु से लेकर वेदप्रकाश शर्मा{??} की सोनाली भी। मार्गरेट मिशेल की स्कारलेट ओ’हारा तो यकीनन है इस फ़ेहरिश्त में और एरिक सिगल की जेनिफर भी। कुछ और नाम स्मृति-अहाते पर आहट करते आते हैं...जैसे कि धर्मवीर भारती की सुधा, अमृता प्रीतम की मीता और सुरेन्द्र वर्मा की वर्षा वशिष्ठ। फ़ेहरिश्त तो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही और पोस्ट बहुत लंबी होती चली जा रही है। चलिये फिलहाल फ़ेहरिश्त को समेटता हूँ एक आखिरी नाम के साथ...अंजलि। अंजलि को नहीं पहचाना आप सब ने? अरे अपनी अंजलि जोशी...जिसकी पीली छतरी कई बार एक तितली बन कर उड़ जाती है...अपने उदय प्रकाश की अंजलि।
...तो फिलहाल इतना ही। प्रेमिकाओं की ये लंबी फ़ेहरि्श्त अभी खत्म नहीं हुई है। खत्म? अभी तो सच पूछिये आधे तक भी नहीं पहुँचे हैं हम। फिर कभी चर्चा करुंगा...और हाँ इस "प्रेमिका" शब्द से धोखा मत खाइये आप सब। ये सब-के-सब पूर्णतया एकतरफा प्यार के मामले हैं। वो चचा ग़ालिब ने कहा है ना:-
ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता
हलफ़नामा-
एक ब्लौगर की डायरी से...
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