विगत दस-एक सालों में, जब से ये हरी वर्दी शरीर का एक अंग बनी है, इन आँखों ने आँसु बहाने के कुछ अजब कायदे ढ़ूंढ़ निकाले हैं। किसी खूबसूरत कविता पे रो उठने वाली ये आँखें, कहानी-उपन्यासों में पलकें नम कर लेने वाली ये आँखें, किसी फिल्म के भावुक दृश्यों पे डबडबा जाने वाली ये आँखें, लता-रफ़ी-जगजीत-मेहदी-ब्रायन एडम्स की आवाजों पर धुंधला जाने वाली ये आँखें, हर छुट्टी से वापस ड्यूटी पर आते समय माँ के आँसुओं का मुँह फेर कर साथ निभाने वाली ये आँखें---- आश्चर्यजनक रूप से किसी मौत पर आँसु नहीं बहाती हैं। परसों भी नहीं रोयीं, जब अपना ये "यंगस्टर" सीने में तेरह गोलियाँ समोये अपने से ज्यादा फ़िक्र अपने गिरे हुये जवान की जान बचाने के लिये करता हुआ शहीद हो गया।
शौर्य ने एक नया नाम लिया खुद के लिये- ऋषिकेश रमानी । अपना छोटु था वो। उम्र के 25वें पायदान पर खड़ा आपके-हमारे पड़ोस के नुक्कड़ पर रहने वाला बिल्कुल एक आम नौजवान, फर्क बस इतना कि जहाँ उसके साथी आई.आई.टी., मेडिकल्स, कैट के लिये प्रयत्नशील थे, उसने अपने मुल्क के लिये हरी वर्दी पहनने की ठानी। ...और उसका ये मुल्क जब सात समन्दर पार खेल रही अपनी क्रिकेट-टीम की जीत पर जश्न मना रहा था, वो जाबांज बगैर किसी चियरिंग या चियर-लिडर्स के एक अनाम-सी लड़ाई लड़ रहा था। आनेवाले स्वतंत्रता-दिवस पर यही उसका ये मुल्क उसको एक तमगा पकड़ा देगा। आप तब तक बहादुर नहीं हैं, जब तक आप शहीद नहीं हो जाते । कई दिनों से ये "शहीद" शब्द मुझे जाने क्यों मुँह चिढ़ाता-सा नजर आ रहा है...!!! छः महीनों में तीन दोस्तों को खो चुका हूँ...पहले उन्नी, फिर मोहित और आज ऋषि ।
सोचा कुछ तस्वीरें दिखा दूँ आप सब को इस unsung hero की, शौर्य के इस नये चेहरे की:-



भारतीय सेना अपने आफिसर्स-कैडर्स पर गर्व करती है, जिन्होंने हमेशा से नेतृत्व का उदाहरण दिया है। स्वतंत्रता के बाद की लड़ी गयी हर लड़ाई का आँकड़ा इस बात की कहानी कहता है... चाहे वो 47 की लड़ाई हो, या 62 का युद्ध या 65 का संग्राम या 71का विजयघोष या फिर 99 का कारगिल और या फिर कश्मीर और उत्तर-पूर्व में आतंकवाद के खिलाफ़ चल रहा संघर्ष।
हैरान करती है ये बात कि देश के किसी समाचार-पत्र ने ऋषि के इस अद्भुत शौर्य को मुख-पृष्ठ के काबिल भी नहीं समझा...!!! सैनिकों के दर्द की एक छोटी-सी झलक देखिये प्रियंका जी की इस खूबसूरत कविता में।
i salute you, Rushikesh !
शौर्य ने एक नया नाम लिया खुद के लिये- ऋषिकेश रमानी । अपना छोटु था वो। उम्र के 25वें पायदान पर खड़ा आपके-हमारे पड़ोस के नुक्कड़ पर रहने वाला बिल्कुल एक आम नौजवान, फर्क बस इतना कि जहाँ उसके साथी आई.आई.टी., मेडिकल्स, कैट के लिये प्रयत्नशील थे, उसने अपने मुल्क के लिये हरी वर्दी पहनने की ठानी। ...और उसका ये मुल्क जब सात समन्दर पार खेल रही अपनी क्रिकेट-टीम की जीत पर जश्न मना रहा था, वो जाबांज बगैर किसी चियरिंग या चियर-लिडर्स के एक अनाम-सी लड़ाई लड़ रहा था। आनेवाले स्वतंत्रता-दिवस पर यही उसका ये मुल्क उसको एक तमगा पकड़ा देगा। आप तब तक बहादुर नहीं हैं, जब तक आप शहीद नहीं हो जाते । कई दिनों से ये "शहीद" शब्द मुझे जाने क्यों मुँह चिढ़ाता-सा नजर आ रहा है...!!! छः महीनों में तीन दोस्तों को खो चुका हूँ...पहले उन्नी, फिर मोहित और आज ऋषि ।
सोचा कुछ तस्वीरें दिखा दूँ आप सब को इस unsung hero की, शौर्य के इस नये चेहरे की:-



भारतीय सेना अपने आफिसर्स-कैडर्स पर गर्व करती है, जिन्होंने हमेशा से नेतृत्व का उदाहरण दिया है। स्वतंत्रता के बाद की लड़ी गयी हर लड़ाई का आँकड़ा इस बात की कहानी कहता है... चाहे वो 47 की लड़ाई हो, या 62 का युद्ध या 65 का संग्राम या 71का विजयघोष या फिर 99 का कारगिल और या फिर कश्मीर और उत्तर-पूर्व में आतंकवाद के खिलाफ़ चल रहा संघर्ष।
हैरान करती है ये बात कि देश के किसी समाचार-पत्र ने ऋषि के इस अद्भुत शौर्य को मुख-पृष्ठ के काबिल भी नहीं समझा...!!! सैनिकों के दर्द की एक छोटी-सी झलक देखिये प्रियंका जी की इस खूबसूरत कविता में।
i salute you, Rushikesh !
