वो इकतीस का होता आज। अभी उस 22 सितम्बर की सुबह तक तो हमने आज के इस शाम की बातें की थी...एक खास डांस-स्टेप की बात, जो उसे सिखना था...जो मुझे सिखाना था। मिलेट्री हास्पिटल के इस बेड पर लेटा अब सोच रहा हूँ कि जब मैं ठीक हो जाऊँगा तो क्या अपना वो सिगनेचर स्टेप फिर कभी कहीं डांस करते हुये कर पाऊँगा...? सोच तो ये भी रहा हूँ कि क्या सहज हो कर डांस भी कर पाऊँगा अब मैं कभी...??
मार्च की वो कोई शुरूआती तारीख थी। देहरादून की एक अलसायी दोपहर। एक दिन पहले ही मेरा पोस्टिंग-आर्डर आया था इधर कश्मीर वादी के लिये। मेरा मोबाईल बजा। एक अनजाना-सा नंबर स्क्रीन पर फ्लैश हो रहा था। मेरे हैलो कहते ही उधर से एक गर्मजोशी भरी आवाज आयी थी-" हाय सर! मेजर सुरेश सूरी दिस साइड..." और लगभग आधे घंटे की बातचीत के बाद मुझे इस अनदेखे यंगस्टर के प्रति एक त्वरित लगाव पैदा हो गया था। फिर अपने नये प्लेस आफ ड्यूटी पे रिपोर्ट करने तक सुरेश हर रोज मुझसे रिलिजियसली बात करता रहा और 25 मार्च को हम पहली बार मिले जब वो मुझे रिसिव करने के लिये आया था।
कितनी बातें, कितनी यादें इन विगत छः महीनों की... उसकी हँसी, वो हरेक बात पे उसका "बढ़िया है, सरssss" कहना और कहते हुये "सर" को लंबा खिंचना, उसकी गज़ब की सिंसियेरिटि, उसके वो हैरान कर देने वाले जुगाड़, वो जलन पैदा करने वाला डिवोशन, हर शुक्रवार को रखा जाने वाला उसका व्रत और इस व्रत को लेकर कितनी दफ़ा मेरे द्वारा उड़ाया गया उसका मजाक, वो साथ-साथ लंच करते हुये सैकड़ों बार चंद हैदराबादी रेसिपिज का उसका विस्तृत वर्णन, पार्टियों के दौरान उसके बनाये गये मौकटेल्स और कौकटेल्स, मेरी छुट्टी के दौरान हर रोज उसका वो फोन करके मुझे वैली का अपडेट्स देना और अभी-अभी तो आया था वो खुद ही एक महीने की छुट्टी से वापस पल्लवी को साथ लेकर...
...और इन सबके दरम्यान जाने कहाँ से आ टपकी ये तारीख बाइस सितम्बर वाली। ईद के ठीक बाद वाली तारीख। फिर उसकी तमाम स्मृतियों को भुलाती हुई उसकी वो आखिरी पलों वाली जिद याद आती है अब। बस वो जिद। सोचता हूँ, उन आखिरी क्षणों में उसने जो वो जिद न की होती तो क्या मैं ये पोस्ट लिख रहा होता...? सब कुछ तो प्लान के मुताबिक ही चला था। सब कुछ...??? हमारी ट्रेनिंग के दौरान राइफल की नली से निकलने वाली बुलेट की रफ़्तार, उसका प्रति मिनट कितने चक्कर लगाना, उसकी ट्रेजेक्टरी, उसका इमपैक्ट, उसका इफैक्ट ये सब तो विस्तार से बताया-सिखाया-पढ़ाया जाता है...किंतु प्रारब्ध की रफ़्तार और इसकी ट्रेजेक्टरी के बारे में तो कोई नहीं बताता, कोई नहीं सिखाता है। उसकी सिखलाई OJT होती है- on the job training...उसे वो सर्वशक्तिमान खुद अपने अंदाज़ में सिखाता है।
...बहुत कुछ सुना था, पढ़ा था जिंदगी के आखिरी क्षणों के बारे में कि ये होता है, वो होता है। कोई दिव्य-ग्यान जैसा कुछ होता है। सच कहूँ तो सितम्बर की इस बाइस तारीख को सीखा मैंने कि जिंदगी का कोई क्षण आखिरी नहीं होता। प्रारब्ध जब किसी के होने के लिये किसी और का न होना तय करता है, तो सारी जिंदगी बेमानी नजर आने लगती है...फिर क्या अव्वल, क्या दरम्यां और क्या आखिरी??? बस शेष रह जाते हैं कुछ पल्लवियों के आँसु और शेष रह जाती हैं चंद तस्वीरें :-
I salute you BOY for everything you were...!!!
पुनःश्च :-
आप सब के स्नेह, चिंता, दुआओं, शुभकामनाओं से अभिभूत हूँ। फिलहाल एक सुदूर मिलेट्री हास्पिटल के सफेद-नीले लिबास में लिपटा आप सब के असीम प्यार में डूबा अपनी कर्म-भूमि में वापस लौट जाने के दिन गिन रहा हूँ। जल्द ही ठीक हो जाऊँगा। कभी सोचा भी नहीं था कि अपने इस अभासी दुनिया के रिश्तों से इतना प्यार और स्नेह मिलेगा। ’शुक्रिया’ जैसे किसी शब्द से इसका अपमान नहीं कर सकता...
