16 October 2017

हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज ~ 4

"कैसे हो, गुरनाम सिंह ?"

"कुछ तो बोलो गुरनाम !"

"तुम्हारी बीवी मिलने आई है तुमसे गुरनाम !"

...मिलेट्री हॉस्पिटल का वो आईसीयू का चैम्बर विगत कुछ दिनों से लगभग इन्हीं पुकारों से लगातार गूंजायमान हो रखा था । आतंकवादियों के साथ एक मुठभेड़ के दौरान सिपाही गुरनाम सिंह के बुलेटप्रूफ पटके को किनारे से छूती हुई एक गोली उसके मस्तिष्क में प्रवेश कर अटक गई थी । एक अंतहीन-सी प्रतीत हो रही सर्जरी के बाद डाक्टरों ने मस्तिष्क के रहस्यमयी गलियारों में गुमशुदा उस गोली को तो निकाल लिया था...लेकिन सर्जरी के तुरंत बाद ही गुरनाम कोमा में चला गया था ।

अभी कुछ दिन पहले ही होश आया उसे, किंतु अभी ना तो वो किसी को पहचान पा रहा था और ना ही कोई बात कर पा रहा था । उस घातक मुठभेड़ के पश्चात गुरनाम का जहाँ जीवित बचा रह जाना ही अपने-आप में किसी चमत्कार से कम नहीं था...वहीं अभी-अभी आये कमबख़्त होश को जैसे ज़िद पड़ी थी कि उसे भी एक चमत्कार चाहिये ।

पंजाब के सुदूर गाँव से आये उसके माता-पिता और नवेली दुल्हन उस मिलेट्री हॉस्पिटल की भव्यता और डाक्टरों-नर्सों के चमकते यूनीफ़ॉर्म के मिले-जुले रौब के साये में सकुचाये से ज़ियादा कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे । पतली-सी, दुबली-सी नई दुल्हन सिर पर दुपट्टा ओढ़े बस चुपचाप बैठी रहती गुरनाम के बेड के साथ...मुँह झुकाये टपटप आँसुओं की बारिश करते हुये ।

उधर दो दिन पहले एक और मुठभेड़ में आतंकवादियों की गोलियों से घायल हुये और इसी आईसीयू में भर्ती हुये, गुरनाम के बगल वाले बेड पर लेटे हुये लेफ्टिनेंट कर्नल साब इस बात से आशंकित थे कि दुश्मन की गोलियों से तो बच गये...लेकिन इस पतली-सी, दुबली-सी दुल्हन की आँखों से बरसता आँसुओं का ये सैलाब ज़रूर इस आईसीयू चैंबर में लेटे सारे फ़ौजियों को डूबो कर मारेगा ।

गुरनाम को कोमा से बाहर आये और उसकी गुमी हुई याददाश्त की उम्र अपने पाँचवें रोज़ पर थी, जब जम्मू से लेफ्टिनेंट कर्नल साब के बाल-सखा, एक कोई खन्ना जी, आये थे मिलने । नाटे से खन्ना जी को अपने बुलंद कहकहों और पंजाबी कल्चर पर बड़ा ही गुमान था । आम हिंदुस्तानी की तरह खन्ना जी को भी बेड पर घायल दोस्त से ज़ियादा पड़ोसियों की कहानी में दिलचस्पी थी । गुरनाम का पूरा ब्यौरा मिलते ही, जाने तो किस रौ में उठे खन्ना जी और शुरू हो गये अपनी ठेठ पंजाबी में...

"होर भारा, तेरा नाम की है ?"

चंद छोटे-छोटे कहकहों के साथ खन्ना जी ज़ारी रहे...

"ओय गुरनामsss किद्दा हो ?" हह हह हह ...यार तू कुछ बोलदा क्यों नहीं...कुछ तो बोल तुस्सी  हह हह हह !”

...और अचानक जैसे देववाणी-सी उतरी कोई स्वर्ग से । बेड पर लेटे गुरनाम के होंठों में जुम्बिश हुई...

"मेरा नाम सिपाही गुरनाम सिंह है, ते तुस्सी कौन हो...होर किथों आये हो ?"

आईसीयू के उस आठ बेड वाले चैम्बर में जैसे ख़ुशी ख़ुद ही साक्षात उतर कर कार्ट-व्हील और समर-साल्ट करने लगी थी उस वक़्त । गुरनाम को तुरत-फुरत घेर लिये डाक्टरों की टोली बस इसी निष्कर्ष पर पहुँची कि चमत्कार की प्रतिक्षा में अटकी पड़ी वो ज़िद्दी नीम-सी होशी को दरअसल गुरनाम के मातृभाषा वाले करेंट की दरकार थी ।

...उधर बगल के बेड पर लेटे लेफ्टिनेंट कर्नल साब का वो सैलाब में डूब मरने का भय एकदम से अपने चरम पर पहुँच गया था कि उस पतली-सी, दुबली-सी नवेली दुल्हन की हिचकियाँ अब तो अरसे से भरे पड़े बादलों की तरह आँसुओं की मूसलाधार बारिश करवा रही थीं ।


[photo curtsey menxp.com]


"वैसे तो इक आँसू ही बहा कर मुझे ले जाए
ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता" 

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3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (17-10-2017) को भावानुवाद (पाब्लो नेरुदा की नोबल प्राइज प्राप्त कविता); चर्चा मंच 2760 पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. उफ ! सिर्फ एक टीस है जो कलेजे में उतर जाती है और आँखों की नमी....शब्द गुम हो जाते हैं ऐसे वाकयों को पढ़कर....सिर्फ एक सलाम के अलावा और क्या दे पाते हैं हम लोग आपको !!!

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  3. खास पंक्तियाँ...

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