14 January 2010

शार्दुला नोगजा- छंदबद्ध रचनाओं की एक सशक्त हस्ताक्षर

छंदबद्ध और छंदमुक्त...? बहस शायद अनंत-काल तक चलती रहे। पिछली दो पोस्टों के जरिये कुछ विज्ञजनों के अप्रतिम विचारों ने मेरे गिने-चुने ज्ञानतंतुओं को खूब हिलाया-डूलाया। आप सब का आभार। इन बहसों से परे आईये मिलते हैं छंद की एक सशक्त हस्ताक्षर से। अंतरजाल पर फैले कविता के अथाह समंदर में डूबकी लगाने वाले शार्दुला नोगजा के नाम से भली-भाँति परिचित होंगे। मुझे उन्हें दीदी कहने का सौभाग्य प्राप्त है...नहीं महज इसलिये नहीं कि वो भी मिथिलांचल से हैं, मैं भी "झा" हूँ और विवाह-पूर्व वो भी "झा" थीं। पिछले साल उस सितम्बर महीने में की मुझे वो गोली लगने वाली घटना यूँ तो दुर्भाग्यपूर्ण थी, किंतु उसी बहाने कुछ बेहद ही अज़ीज नये रिश्तों का आगाज हुआ। शार्दुला दी का वो चिंतित, परेशान इ-मेल और फिर ये "दीदी" और "प्यारेलाल" का
ये प्यारा-सा रिश्ता। जी हाँ, वो मुझे प्यारेलाल कह कर पुकारती हैं उधर उतनी दूर सात समंदर पार सिंगापुर से...। इसी क्रम में उनकी कविताओं और गीतों को पढ़ने का मौका मिला तो हैरत से मैं शब्दों के इस जादुई संगम में डूबता-उतराता उन्हें अपना ब्लौग बनाने की जिद करने लगा। किंतु वो नहीं मानीं...ब्लौग का माहौल, व्यर्थ के उभरते विवाद उन्हें रास नहीं आ रहे। फिर मैंने सोचा कि उनकी कवितायें "पाल ले इक रोग नादां..." के नियमित पाठकों और अपने मित्रों के हवाले करुँ और आप सब से अनुग्रह करुँ कि शार्दुला दी को ये बताया जाये कि ब्लौग का माहौल इतना भी दुषित नहीं हुआ है। चलिये, देखते हैं पहले उनकी एक सामयिक रचना...एक अनूठी कविता जो कुछ अद्‍भुत प्रतिकों के जरिये अभी हाल ही में संपन्न हुई विवादास्पद Copenhagen Summit पे क्या कुछ कह जाती है:-

एक सपना टूटता है

आज चुप्पी मूढ़ता है
एक सपना टूटता है
एक हरियाली मेरे जंगल से नोटों तक चली
सालों से बोरी में लिपटी शायरी अब पक चली
फल पका अब फूटता है
एक सपना टूटता है

भाग पातीं अब न गलियाँ, ट्रेफिकों ने पाँव छीने
एक ही मंज़र दिखातीं थक गयीं ये ट्रेड मशीनें* (*Treadmills)
कुछ न पीछे छूटता है
एक सपना टूटता है

क्रेन, पोतों, टेंकरों के बीच सूरज क्या करेगा
अब कहाँ पानी में जा कर आस्मां डुबकी भरेगा
क्षितिज पल-पल रूठता है
एक सपना टूटता है

अमन के हैं मायने क्या वो बताएँगे हमें अब
छत ज़मीनें जा लगीं और रास्ते छलनी हुए जब
शहर छाती कूटता है
एक सपना टूटता है

...और अब पढ़िये एक खूबसूरत प्रेम-कविता, चंद अनछुये बिम्बों से सजी-संवरी:-

सच कहूँ तेरे बिना

सच कहूँ तेरे बिना ठंडे तवे सी ज़िंदगानी
और मन भूखा सा बच्चा एक रोटी ढूँढता है
चाँद आधा, आधे नंबर पा के रोती एक बच्ची
और सूरज अनमने टीचर सा खुल के ऊंघता है !

आस जैसे सीढ़ियों पे बैठ जाए थक पुजारिन
और मंदिर में रहें ज्यों देव का श्रृंगार बासी
बिजलियाँ बन कर गिरें दुस्वप्न उस ही शाख पे बस
घोंसला जिस पे बना बैठी हो मेरी पीर प्यासी !

सच कहूँ तेरे बिना !

पूछती संभावना की बुढ़िया आपत योजनायें
कह गया था तीन दिन की, तीन युग अब बीतते हैं
नाम और तेरा पता जिस पर लिखा खोया वो पुर्जा
कोष मन के और तन के हाय छिन छिन रीतते हैं

सच कहूँ तेरे बिना मेरी नहीं कोई कहानी
गीत मेरे जैसे ऊंचे जा लगे हों आम कोई
तोड़ते हैं जिनको बच्चे पत्थरों की चोट दे कर
और फिर देना ना चाहे उनका सच्चा दाम कोई !

सच कहूँ तेरे बिना !

...उफ़्फ़्फ़! चाँद को आधे नंबर पा के रोती सी बच्ची और सूरज को ऊँघता-अनमना टीचर बनाने वाली इस विशिष्ट रचनाकार को उतनी ही दिलकश आवाज का भी देव-उपहार मिला हुआ है। उन्हीं की आवाज में सुनवाता हूँ उनकी अपनी ही एक रचना "हमको ऐसी मिली जिंदगी..." :-




उनकी कुछ रचनायें कविता-कोश पर भी उपलब्ध हैं जिसे यहाँ क्लीक करके पढ़ा जा सकता है। आपसब की हौसलाअफ़जाई शायद शार्दुला दी को ब्लौग-जगत तक खींच लाये, इसी उम्मीद के साथ अगली पोस्ट में मिलता हूँ अपनी एक ग़ज़ल के साथ।

72 comments:

  1. शार्दुला जी को पढ़ता आया हूँ. उन्हें पढ़ना हमेशा सुखकर रहा.आज सुनना भी हो गया आपके माध्यम से..बहुत स्नेह है आप पर प्यारेलाल बन...जानकर बहुत अच्छा लगा. बड़ो का आशीष मिलता रहे और क्या चाहिये जीवन में...तो आप सौभाग्यशाली हैं...

    अच्छी प्रस्तुति लगी. अनेक शुभकामनाएँ आपको!!!

    ReplyDelete
  2. pyarelal ji, avashya laiye inko blogging ki duniya men, hamen bhi inko padhne ka saubhagya prapt hoga, donon rachnayen behatareen, aabhaar.

    ReplyDelete
  3. आज क्या दिन है जी...??

    ReplyDelete
  4. गौतम ,
    तुम हो ही इतने प्यारे कि किसी भी बहन को तुमपर नाज़ होगा .
    तुम्हारे इस प्रस्तुति के लिए शुभकामनाएँ !! सच शार्दुला जी के छंद बहुत प्यारे हैं , उनकी रचनाओं को पहली बार सुनने और पढ़ने का मौका मिला . बहुत अच्छे लगे !!

    ReplyDelete
  5. एक हरियाली मेरे जंगल से नोटों तक चली HAI
    सालों से बोरी में लिपटी शायरी अब पक चली HAI
    फल पका अब फूटता है


    गौतम जी...
    पहले कमेन्ट के लिए माफ़ी....
    बस वार देख कर दे दिया था...

    और प्लीज आप शार्दूला जी की कवितायें एक एक करके ही डालें...बहुत अच्छा लग रहा है पढ़कर...
    ये जानकर और भी अच्छा लगा के ब्लॉग नहीं बनाना चाहतीं....
    कृपया मेरी इस बात का गलत अर्थ ना लिया जाए.....

    आपसे एक गुजारिश जरूर करूंगा....

    के समय समय पर उनकी एक कविता आप अपने ब्लॉग पे डाला कीजिये....
    ये चार फ़ायलातुन में तो मजा ही आ गया..

    ReplyDelete
  6. प्यारे तो हम भी कह देते हैं आपको...
    लेकिन प्यारे लाल कहने की हिम्मत अभी नहीं जुटा पा रहे हैं...

    ReplyDelete
  7. अगर आपने नहीं साधा है तो कह सकते हैं..
    कुदरती बह्र ...

    ReplyDelete
  8. शार्दुला नोगजा की कवितायें निःशब्द करती हैं -मैं तो इन पंक्तियों पर व्यामोहित और स्तब्ध सा भी हूँ -

    सच कहूँ तेरे बिना मेरी नहीं कोई कहानी
    गीत मेरे जैसे ऊंचे जा लगे हों आम कोई
    तोड़ते हैं जिनको बच्चे पत्थरों की चोट दे कर
    और फिर देना ना चाहे उनका सच्चा दाम कोई !

    ReplyDelete
  9. दीदी की कविताएं पढ़ना तुम्‍हारे ब्‍लाग पर अच्‍छा लगा । मेरे विचार में उनका ब्‍लाग नहीं बनाने का निर्णय बिल्‍कुल ठीक है । मुझे भी कभी कभी ऐसा लगता है कि ब्‍लागिंग के कारण बहुत सी वो ऊर्जा जो साहित्‍य सृजन में लगनी थी नहीं लग पाती । चाँद आधा, आधे नंबर पा के रोती एक बच्ची
    और सूरज अनमने टीचर सा खुल के ऊंघता है !
    गुलज़ार साहब को छूते हुए निकल गई हैं ये पंक्तियां । आवाज की क्‍या कहूं सुधा दीदी और शार्दूला दीदी इन दोनों की आवाज़ का रहस्‍य जानने को उत्‍सुक हूं कि क्‍या वास्‍तव में ही इन दोनों अग्रजाओं की आवाज़ इतनी मीठी है या कोई साफ्टवेयर डाला हुआ है इन्‍होंने मोबाइल में आवाज को मीठा करने वाला । गन्‍ने के रस में थोडा़ शहद और थोड़ी मिश्री मिलाई जाएं तो ऐसी आवाज़ बनती है । गौतम ये फोटो कहां से मिल गया दीदी का तुमको मेरे पास तो एक ही है उसे ही बार बार लगाना पड़ता है । गौतम तुम्‍हारी ''त्रासदी पुरानी डायरी के पन्नों की,चंद ब्लौगरी-संकल्प और एक कविताई शंका'' ये पोस्‍ट भी बहुत अच्‍छी थी किन्‍तु किसी कारण कमेंट नहीं कर पाया । उसे मैंने कई बार पढ़ा है ।

    ReplyDelete
  10. गौतम जी , ठीक सुबह-सुबह आपका आभारी हूँ....आदरणीया शार्दूला जी से मै परिचित नही था...आभारी हूँ कि अब यह लाईन कहीं और नही लिखनी पड़ेगी....!

    एक संजीदा प्रस्तुति..वो भी छंद मे....सुंदरतम...!

    ReplyDelete
  11. शार्दुला जी और उन के रचनाकर्म से पहला परिचय है। पर कह सकता हूँ। कि उन के रचनाकर्म में बहुत कुछ विशिष्ट है। रवानी है, दर्द और अभाव हैं और प्यार भी बेशुमार है।

    ReplyDelete
  12. ओह! तुम्हारी डायरी वाला पोस्ट अभी पढ़ा। बिल्कुल यही बात मैं भी कहती हूँ< गद्य को तोड़ कर पद्य बना कर लिख दें तो क्या कविता हो जायेगी? और ईकविता पर तो काफ़ी बवाल मचा, (मैंने ही मचाया :-) )

    ख़ैर, तुम्हारे विचार जानकर अच्छा लगा।

    ReplyDelete
  13. गौतम जी, आदाब
    'प्यारेलाल' और 'दी' के पवित्र रिश्ते जैसी
    रचनाएं पेश की हैं आपने....
    आपकी पसंद, परख, चयन, खोज की
    जितनी भी तारीफ की जाये, कम है
    कितनी गहराई पैदा की गई है, अदभुत, अद्वितीय
    और वह शब्द,
    जो श्रेष्ठतम रचनाओं के लिये प्रयोग होते हैं,
    सभी आप जोड़कर चलें, क्योंकि
    या तो हमारे पास हैं नहीं,
    या इन रचनाओं के लिये छोटे पड़ रहे हैं
    शार्दुला जी तो इस लेखन के लिये बधाई की पात्र हैं ही,
    हमारी ओर से प्रस्तुति के आपको मुबारकबाद
    मकर संक्रांति की शुभकामनाएं
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

    ReplyDelete
  14. bahut hi adbhut aur shandar rachnayein hain aur aisi shakhsiyat ka blog jagat se door rahna to bahut hi galat hai.........hum bhi padhna chahenge aisi beshkimti rachnayein.....swagat hai blogjagat mein unka.

    ReplyDelete
  15. गौतम भाई आप सही हैं... उन्हें ब्लॉग बनाना ही चाहिए...
    यार इतना खूबसूरत लिखा है... दिल खुश हो गया पढ़कर... बस कई बार, बार बार पढने को दिल करता है...
    कविता करने का अंदाज़ बेहद ही जबरदस्त है...
    "शार्दूला दी" कह सकता हूँ न? अरे गौतम जी भी तो मेरे भाई हैं...
    आप ब्लॉग बना ही लीजिये..
    मीत

    ReplyDelete
  16. भाग पातीं अब न गलियाँ, ट्रेफिकों ने पाँव छीने
    एक ही मंज़र दिखातीं थक गयीं ये ट्रेड मशीनें* (*Treadmills)
    कुछ न पीछे छूटता है
    एक सपना टूटता है

    वक़्त हर जगह एक सा बिहेव करता है आदमी के साथ !!!

    क्रेन, पोतों, टेंकरों के बीच सूरज क्या करेगा
    अब कहाँ पानी में जा कर आस्मां डुबकी भरेगा
    क्षितिज पल-पल रूठता है
    एक सपना टूटता है

    ओर इसे पढ़कर जावेद साहब का एक शेर याद आ गया ........

    "ऊँची इमारतो से मेरा मकां गिर गया
    कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज खा गए "

    यक़ीनन ...गर रोजमर्रा की जद्दोजेहद इस तरह कागजो पर उतरेगी तो बहुत से पढने वालो को सकूं मिलेगा .....उनसे कहियेगा के कुछ पढने वाले भी है यहाँ ....

    ReplyDelete
  17. सच कहा गुरु जी ने शार्दूला दी ऐसे ही अच्छी हैं। हम लोगो की दी बन कर...! कितनी प्यारी आवाज़ है उनकी कितनी मिठास..!

    दीदी बहुत साफ स्वच्छ व्यक्तित्व की है। प्रेम से परिपूर्ण और ये कविता...पहले डूबने से बचूँ तो तारीफ करूँ। हर बिंब कैसा अनूठा है। कितना अपना सा, मगर हम सब छू भी नही सकते ऐसा।

    अद्भुत...! अद्भुत...!

    और हाँ कितनी सुंदर भी तो....!!! आगे की बातों के लिये दी को पर्सनल मेल लिखना होगा।

    ReplyDelete
  18. इस गीत की भी इबारत लगाते तो और अच्छा होता

    ReplyDelete
  19. शार्दुला जी को पढ़ना और सुनना बहुत ही अच्छा लगा ......... एक कसक सी है उनकी रचनाओं और आवाज़ में भी ....... शुक्रिया आपका बहुत बहुत इस परिचय का .........

    ReplyDelete
  20. शार्दुला नोगजा जी कई कवित बहुत सुंदर लगी धन्यवाद

    ReplyDelete
  21. गौतम जी
    इन दिनों में नवगीत खूब लिखे जा रहे हैं, लेकिन शार्दुलाजी के ये नवगीत काबिले तारीफ हैं। एक-एक छंद वाह-वाह के लायक है। आपने एक श्रेष्‍ठ व्‍यक्तित्‍व से मिलाकर बहुत उपकार किया। कुछ लोग ब्‍लाग जगत पर नहीं आना चाहते, समय की बर्बादी मानते हैं। मैं भी मानती हूँ कि समय जाया होता है लेकिन यदि ब्‍लाग पर नहीं आते तो फिर आप से और शार्दुला जी से परिचय कैसे होता?

    ReplyDelete
  22. bahas ke baad ki itani sukhad thandi../ didi aour pyarelal ke sneh se nikali rasdharaa me ham sab ko aapne nahalaa diya. kyaa baat he../

    ReplyDelete
  23. बहुत बहुत शुक्रिया इन सुन्दर रचनाओं को पढवाने के लिए गौतम जी ..

    ReplyDelete
  24. Aapke ek ek shabd aur anurodh me main apna sur milati hun....

    Ahaha...jaisa mugdhkari lekhan hai,waisa hi komal swar...ekdam abodh balika ki bhanti...

    Mana ki blog jagat me gandgiyan bhi hain,par isi me kuchh kamal bhi hain aur aaj ki to param aawashykta hi yah hai..gandgi se naak bhoun sikodne se kaam na chalega,yah palayanwaad hoga....

    wo kahte hain na ki ek lakeer ko bina kaate chhota uske bagal me bada lakeer kheenchkar aasanee se kiya ja sakta hai...hame to bas milkar wahi karna hoga...aadarniya shardula di se namra nivedan karungi ki we antarjaal par hindi ko pratishthit karne me apna yogdaan awashy den...

    goutam ji,kripaya di ka mail id mujhe dijiye na....

    ReplyDelete
  25. सालों से बोरी में लिपटी शायरी अब पक चली

    भाग पातीं अब न गलियाँ...

    सूरज अनमने टीचर सा खुल के ऊंघता है !

    -------sab achchha hai...
    is parichayatmak charcha ke liye aabhaar...

    ReplyDelete
  26. बहुत सुन्दर कविताएं हैं शार्दुला जी को मैने इ कविता में भी बहुत पढ़ा हैं सौभाग्य से उनसे मिलना भी हुआ था, वो एक कुशल रचनाकार ही नही खूबसूरत व्यक्तित्व की धनी भी हैं, गौतम जी उनकी रचनाओं से एक बार फ़िर रूबरू करवाने के लिये आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।

    ReplyDelete
  27. शहर छाती कूटता है
    एक सपना टूटता है


    ==================

    चाँद आधा, आधे नंबर पा के रोती एक बच्ची
    और सूरज अनमने टीचर सा खुल के ऊंघता है

    ...शार्दुला नोगजा जी की कविओं में दिखने वाले ये प्रयोग वास्तव में अनोखे हैं.
    मेजर साहब हम आपके ब्लॉग में आकर खो गए कभी कविता/अकविता की बहस में तो कभी यहाँ..
    धन्यवाद.

    ReplyDelete
  28. "ईमानदार और बेबाक टिप्पणी दें."
    मेजर साहब, आपके उपरोक्त आदेश का हमेशा पालन होगा - सादर.

    शार्दुला नोगजा जी के बारे मैं जानकारी और रचनाएँ पढवाने तथा सुनवाने के लिए धन्यवाद्. मैंने भी अक्टूबर 2005 में (जब मेरी 5 रचनाएँ पहली बार अनुभूति में प्रकाशित हुई थीं) सोचा था कि ब्लॉग की दुनियां में कदम रखूं - असमंजस में ही रहा और लगभग ४ साल बाद आखिर आ ही गया - कहाँ तक जाता हूँ समय के गर्त में छुपा है. शार्दूला जी क्या चाहती हैं वो निर्णय करें? मुझे तो उनकी दोनों कवितायेँ बहुत अच्छी और उनको सुनना कर्णप्रिय लगा. आपसे अच्छा राश्ता उन्हें कोई नहीं दिखा सकता.

    ReplyDelete
  29. शार्दूला जी की रचनाएं पढ़ती रही हूँ वो इ कविता और कविताकोश दोनों पर ही पढने को मिल जाती है
    उनकी कलम की मैं भी बहुत बड़ी फेन हूँ
    हर शब्द दिल को गहराईयों से छूता हुआ
    प्रखर कल्पना शक्ति और चीज़ों को देखने का नजरिया सभी अद्भुत है
    गौतम जी आपने उनकी कवितायें पढवाई बहुत शुक्रिया
    कुछ रिश्ते दौलत के जैसे होते हैं आप किस्मत वाले है तो इतना स्नेह मिलता है

    ReplyDelete
  30. पॉडकास्टिंग अच्छी लगी! धन्यवाद।

    ReplyDelete
  31. श्रदुला दी की मीठी आवाज़ और ताल देती उनकी चुटकियाँ वाह
    गौतम भाई आपने कमाल ही कर दिया इस बेमिशाल आवाज़ से मिलाकर
    जानता और पढता तो पहले से ही हूँ इनको मगर आज आवाज़ से भी
    रूबरू होगया ... आभार आपका ... और दीदी को प्रणाम... बिहार की
    हैं यह सुन और अच्छा लगा ... और झा हैं... झा जी लोगों से पुराना
    रिश्ता रहा है .. बधाई ...

    अर्श

    ReplyDelete
  32. शार्दुला जी को सुनने का सौभाग्य मुझे भी सुलभ रहता है क्योंकि ईकविता समूह की वह एक वरिष्ठ सदस्या हैं। आज आपने बहुत रोचक ढंग से उन्हे यहाँ प्रस्तुत किया। देख कर अच्छा लगा। एतदर्थ धन्यवाद!

    ReplyDelete
  33. अर्कजेशJanuary 14, 2010 at 9:16 PM

    नए अंदाज में कही गईं कविताऍं बहुत अच्‍छी लगीं ।
    शार्दुला नोगजा जी की कविताओं से परिचय कराने का शुक्रिया ।

    ReplyDelete
  34. एक सपना टूटता है...मुझे इन सबमें सबसे बेहतरीन रचना लगी। उनकी काव्य शैली तो मन को सोहती ही है, बौद्धिक धरातल पर भी उनके विचार पुख्ता लगे। शार्दुला जी की रचनाओं को यहाँ प्रस्तुत करने का आभार।

    ReplyDelete
  35. कविता अच्छी है , यह अब अलग से कहने की बात नहीं है ...
    बेशक ब्लॉग जगत का माहौल अधिक संवेदनशील के लिए
    स्वस्थ नहीं है , पर संवेदनशील ही पल्ला झड़ने लगेंगे तो क्या होगा ..
    अतः एक अच्छे ब्लोगर को ब्लॉग जगत में लाना वैसे ही है
    जैसे , '' आस जैसे सीढ़ियों पे बैठ जाए थक पुजारिन '' वाली आस को
    लाना , आपको यह कार्य करना चाहिए ... आभार ,,,

    ReplyDelete
  36. आदरणीया शार्दूला जी से आप ने परिचय कराया.
    आभार.
    बहुत ही अच्छी कविताएँ हैं.
    'सच कहूँ तेरे बिना मेरी नहीं कोई कहानी
    गीत मेरे जैसे ऊंचे जा लगे हों आम कोई
    तोड़ते हैं जिनको बच्चे पत्थरों की चोट दे कर
    और फिर देना ना चाहे उनका सच्चा दाम कोई !'
    -ये पंक्तियाँ बेहद प्रभावी लगीं.
    -उनको सुनना भी मन भाया.

    ReplyDelete
  37. एक बेहतरीन रचना... एक सपना टूटता है ...

    ReplyDelete
  38. मेजर साब, एक ज़ोरदार सेल्यूट मारने को जी चाहता है. शार्दुला जी को पढ़वाकर जो एहसान किया है, उसे शब्दों में नहीं बाँध सकता. गीत, जाने कितने सुने-पढ़े,रचे और जाने कितने पढूंगा-सुनूंगा लेकिन अजब करिश्माई रचनाएं हैं शार्दुला जी की.
    कुछ लोग जन्मजात रचनाकार होते हैं और कुछ सीख कर हो जाते हैं. शार्दुला जी, मेरे ख्याल से जन्मजात हैं ही, अपने अनुभवों, दृष्टि और ज्ञान के सामंजस्य से उन्होंने साहित्य को जो बुलंदी प्रदान की है, उसकी प्रशंसा न की जाए तो अपना लिखना पढ़ना सब बेकार है.
    शार्दुला जी को पेश करके एहसान किया हम सभी पर और आईना भी दिखा दिया है. बहुत निचली पायदान पर खड़ा देख रहा हूँ खुद को.
    मैं तहे-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आपके एहसान का.

    ReplyDelete
  39. अपने इस पोस्ट में शार्दुला दीदी जी से परिचय करा आपने एक उत्तम कार्य किया है. एक सच्चे साहित्य सेवक की भूमिका आपने छोटे भाई की तरह निभाई है.

    दीदी की रचनाये विलक्षण है. संवेदनशील बिम्बों के साथ छंद पूरी कहानी बयां कर रहा है. बहुत सुखद लगा आज यहाँ पढ़कर.

    ReplyDelete
  40. प्रस्तुत की गयीं तीनो ही कविताएं मैंने इ-कविता के सौजन्य से पहले भी पढ़ी है. और उनका कविता पाठ भी सुना है. इ-कविता पर उन्हें प्रायः पढता रहता हूँ. बहुत ही सरस और प्रांजल भाषा का प्रयोग करती हैं. उनकी कविताएँ बिम्बों और उपमाओं से सजी रहती है. कविताओं में कथ्य की गहराई और शब्द-संयोजन सदैव मन मोहता है. श्रृंगार लिखने में तो वे बेजोड़ हैं. इस प्रस्तुति के लिए आपको धन्यवाद.

    ReplyDelete
  41. kisi bhi pratibha ki apni vaichariki hoti hai. unka swayam ka man nahi badale to un par dabav dalana ya imotional karana uchit nahi hai.
    Apka aur unka

    Abhar

    ReplyDelete
  42. ओफ आपकी इतनी पोस्ट आ गयी और मैं सोई ही रही
    कुछ दिन तो नेट से दूर रही मगर आने पर भी ब्लाग लिस्ट नहीं देखी। आज प्यारे लाल को देखा शर्दुला जी के साथ तो पता चला कि मैं बहुत कुछ पीछे छोड आयी हूँ बहुत अच्छा लगा उनके बारे मे पढ कर । आज अभी अभी एक ब्लाग पर आपको समर्पित कविता पढ कर आयी हूँ आप हैं ही इतने अच्छे कि हर किसी को आप पर नाज़ है तो फिर शर्दुला जी तो शायरी के हीरों की बहुत परख रखती हैं। उन्क़की शायरी के लिये मेरे पास शब्द नहीं हैं बस बधाई और शुभकामनायें

    ReplyDelete
  43. ये पोस्ट नहीं पढ़ता तो सच में एक अच्छी कवि से वंचित रह जाता।
    यह सच है कि छंद का सब मुझे आकर्षित नहीं करता। छंद में लिखा भी है पर हमेशा लगा कि बंधने-बांधने में बहुत कुछ छूट जाता है। पर जो लोग लिख रहे हैं उनमें यश भाई जैसे मस्तमौले भी हैं। शार्दूला जी को भी पढ़कर अच्छा लगा।

    आपका पाठक अद्भुत है!

    ReplyDelete
  44. क्रेन, पोतों, टेंकरों के बीच सूरज क्या करेगा
    अब कहाँ पानी में जा कर आस्मां डुबकी भरेगा
    क्षितिज पल-पल रूठता है
    एक सपना टूटता है

    कितनो का दर्द बयाँ कर गयीं ये पंक्तियाँ...

    आस जैसे सीढ़ियों पे बैठ जाए थक पुजारिन
    और मंदिर में रहें ज्यों देव का श्रृंगार बासी

    बहुत सुन्दर...शुक्रिया इतनी सुन्दर रचनाएं पढवाने के लिए....आप ही पढवाते रहें उनकी रचनाएं...ब्लॉग बनाना एक जिम्मेवारी का काम तो है, creativity पर असर पड़ता है, no doubt (ये मेरे अपने निजी विचार हैं)

    ReplyDelete
  45. शार्दूला जी की रचनाओं से वाकिफ कराने का शुक्रिया...इतनी बेहतरीन रचना और रचनाकार पर कोई टिप्पणी किया जाना मेरे क्षेत्राधिकार के बाहर है.वैसे सही ही कहा है कि ब्लॉग भी कोई उपयुक्त अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है है...
    अमन के हैं मायने क्या वो बताएँगे हमें अब
    छत ज़मीनें जा लगीं और रास्ते छलनी हुए जब
    शहर छाती कूटता है
    एक सपना टूटता है
    पूछती संभावना की बुढ़िया आपत योजनायें
    कह गया था तीन दिन की, तीन युग अब बीतते हैं
    नाम और तेरा पता जिस पर लिखा खोया वो पुर्जा
    कोष मन के और तन के हाय छिन छिन रीतते हैं
    ऊपर लिखी पंक्तियों ने बहुत प्रभावित किया..

    ReplyDelete
  46. शार्दूला जी को पढ़ा तो है लेकिन सुना आज आपके ब्लॉग पर...उनकी रचना पढ़ कर जो आनंद मिलता है उस से अधिक उन्हें सुन कर मिला...आनंद जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता...ऐसे ऐसे कमाल के बिम्ब हैं... विलक्षण...क्या कहूँ...वाह...बहुत देर से पहुंचा आपकी पोस्ट पर लेकिन इसका नुक्सान भी मुझे ही हुआ...ख़ुशी इतने दिनों बाद जो मिली...लेकिन जब मिली भरपूर मिली...आप उनका लिखा पढवाते रहें...
    नीरज

    ReplyDelete
  47. गौतम जी एक कमाल की शब्दों की थाप पर सुरीली सी पोस्ट लगा दी। वैसे हमारा इनसे पहले परिचय नही था पर इनके लेखन को पढने के बाद लगा कि अगर ये भी ब्लोग बनाकर पोस्ट करेगी तो हम बगैर पढे नही रह पाऐगे। अनुराग जी ने सही कहा।

    ReplyDelete
  48. गौतम जी,
    देर से आप के ब्लॉग पर आई, पर बहुत बड़ा सरप्राईज़ मिला.शार्दूला जी को मैं ईकविता और कविता कोष में पढ़ती हूँ,बहुत ही अच्छा लिखती हैं, हर रचना हृदय को छूकर निकलती है,
    इनके द्वारा दिए गए बिम्ब याद रहते हैं..
    पर इस रचना ने मेरी ही हालत बयाँ कर दी ...
    भाग पातीं अब न गलियाँ, ट्रेफिकों ने पाँव छीने
    एक ही मंज़र दिखातीं थक गयीं ये ट्रेड मशीनें* (*Treadmills)
    कुछ न पीछे छूटता है
    एक सपना टूटता है
    और
    सच कहूँ तेरे बिना ठंडे तवे सी ज़िंदगानी
    और मन भूखा सा बच्चा एक रोटी ढूँढता है
    चाँद आधा, आधे नंबर पा के रोती एक बच्ची
    और सूरज अनमने टीचर सा खुल के ऊंघता है !
    क्या बिम्ब दिए हैं-बधाई.

    ReplyDelete
  49. गौतम जी
    फिर एक बार आपने कमाल कर दिया........शार्दुला जी से जिस तरह आपने तार्रुफ़ कराया है वो काबिले दाद है.......शार्दुला जी ने खी बेहतरीन लिखा है दोस्त....!

    चाँद आधा, आधे नंबर पा के रोती एक बच्ची
    और सूरज अनमने टीचर सा खुल के ऊंघता है !

    वह क्या इमेजिनेसन है.....क्या पोर्टेट है कविता में.......
    बस यही कहूँगा यह कविता है कोई,or कविता का आभाष देता हुआ पोर्टेट.........
    आपका तो कायल हूँ मेजर साब.......नयी ग़ज़ल का बेसब्री से इन्तिज़ार है!

    ReplyDelete
  50. आवाज अभी ही सुन सके है हम......

    और अब और अधिक जोरदार शब्दों में कह सकते हैं.......

    के ये ब्लोगिंग में ना ही पड़ें तो ज्यादा सही रहेगा...
    भले ही समीर लाल जी कनाडा से इंडिया आकर हमारी वाट लगा दें...
    :)
    :))))

    ReplyDelete
  51. वाह .....!!

    तेरे छूने भर से चाँद खिल कर मुस्कुराने लगे
    अपनी इस अदा पे भी ले कर कबूल दाद मेरी...!!

    ReplyDelete
  52. क्या बोलूँ सर जी..कहाँ था यह खजाना आजतक..
    कविता का यह विस्फ़ोट..कल से पढ़ रहा हूँ और जेहन घायल पड़ा है..समझ नही आ रहा था कि क्या कहूँ..हद है यह!!
    बेतहाशा दौड़ते हुए वक्त के छिले हुए पाँवों का सच..
    आज चुप्पी मूढ़ता है
    एक सपना टूटता है

    दुनियादारी की भागम-भाग मे जहाँ भरी सड़कों पर कोई किसी के लिये रास्ता छोड़ने के लिये तैयार नही है..अपाहिज खयालों के पाँव बस कागज/कीबोर्ड की ट्रेडमिल्स पर ही चल पाते हैं..

    भाग पातीं अब न गलियाँ, ट्रेफिकों ने पाँव छीने
    एक ही मंज़र दिखातीं थक गयीं ये ट्रेड मशीनें

    और जब..

    शहर छाती कूटता है

    ..तब समझ नही आता कि शहर अपने हाल पर रो रहा है या हमारी हालत पर..

    नाउम्मीदी के गहराते अंधेरे के बीच जब हमारी बेचैन ख्वाहिशें हमारे ही खिलाफ़ षड़यंत्र रचती हैं..तब पते का वह खोया पुर्जा तिनके के सहारे सा याद आता है..

    पूछती संभावना की बुढ़िया आपत योजनायें
    कह गया था तीन दिन की, तीन युग अब बीतते हैं
    नाम और तेरा पता जिस पर लिखा खोया वो पुर्जा
    कोष मन के और तन के हाय छिन छिन रीतते हैं

    और ठंडे तवे सी जिंदगानी की बात पर इस जिंदगी पर नही वरन्‌ ठंडे तवे पर रोना आता है..जो भूखे बच्चे से मन को बातों से बहला भी नही सकता..
    कुँअर बेचैन साहब को भूल रहा हूँ मैं..
    अंतर्जाल पर कविता के समंदर मे अपनी तैराकी के कच्चेपन पर अफ़सोस कर रहा हूँ..
    ...खैर शार्दुला जी की और रचनाओं से मेरे जैसे तमाम पाठक वंचित न रहें उसकी जिम्मेदारी अब एक मेजर साहब की ही है :-)
    शुक्रिया प्यारेलाल जी :-)

    ReplyDelete
  53. अमन के हैं मायने क्या वो बताएँगे हमें अब
    छत ज़मीनें जा लगीं और रास्ते छलनी हुए जब
    शहर छाती कूटता है
    एक सपना टूटता है!
    Kewal ye rachna nahee poora aalekh tatha prem kavitabhi behtareen hai!
    Haath kangan ko aarsee kya..tippaniyonka ambaar sab kuchh kahta hai!

    ReplyDelete
  54. बहुत सुन्दर लगा यह पढना और शार्दूला जी को सुनना भी
    आपका आभार गौतम भाई और इसी तरह , " प्यारे भाई " बने रहियेगा :)
    स स्नेह,
    - लावण्या

    ReplyDelete
  55. शार्दूला जी की कविताओं और उनकी मधुर आवाज़ से परिचय करवाने के लिए आभार.परिचय इसलिए कि मेरे लिए उनका नाम नया था. और कवितायेँ तो एक अनूठे,पहली बार हुए अनुभव की सृष्टि करने वालीं थीं.

    ReplyDelete
  56. गौतम जी
    शार्दुला जी से परिचय करने के लिए धन्यवाद
    आपके द्वारा उनकी रचनाएँ पढने को मिलीं
    बहुत बहुत आभार

    ReplyDelete
  57. प्यारेलाल जी,

    शुक्रिया... छंदबद्ध बहुत दिनों बाद पढ़ा... और एक अलग ही मज़ा आया... खासकर इसे बोलकर पढना

    अमन के हैं मायने क्या वो बताएँगे हमें अब
    छत ज़मीनें जा लगीं और रास्ते छलनी हुए जब
    शहर छाती कूटता है
    एक सपना टूटता है

    शुक्रिया...

    ReplyDelete
  58. एक अनूठी कविता

    कविता में इक ऐसी सुंगंध है जिससे मन महक से भर गया.जब भी वक़त मिलता है २ दिन से इस कविता को पढ़ रही हूँ.इक अजीब सी कशिश है इस लाइन में .
    इक सपना टूटता है.

    सपने सुबह सुबह के टूटते है.रात के पहले पहर देखे सपने याद भी नहीं रहते तो टूटे कैसे?
    क्षितिज का रूठना अनूठा सा बिम्ब है.
    ज़िन्दगी के ठन्डे तवे पे मन को रोटी की आस जैसे मन हारना नहीं चाहता.

    रोपने का इक समय होता है,
    फल के पकने का भी और टूटने का भी समय होता है.
    पत्थर फैंक देने का भी इक समय होता है.

    कह गया था तीन दिन की, तीन युग अब बीतते हैं.इंतज़ार के लम्हे भी अजीब होते है.बजाय सीने के आँखों में दिल धडकता है.

    ReplyDelete
  59. shukriya aapka ek acchi rachnakar se parichay karaane ke liye..

    ReplyDelete
  60. ek achhi ghajal ka intazar hai aapke blog par... kab tak purane posts padh kar dil bahlayein..

    ReplyDelete
  61. ऐसे अदभुत, अनछुए बिम्ब और अलभ्य कल्पनाशीलता का दर्शन करा दिया आपने कि न पूछिये । हैरान हूँ ।
    ई-कविता से जुड़ा हूँ अभी-अभी ! अब सौभाग्य मिल सकेगा पढ़ने को यह अमूल्य कृतित्व ।

    मैं शार्दुला जी की लेखनी के उस अन्तस्तत्व का अनुमान कर रहा हूँ जिससे इन रचनाओं में एक नूतन-सी सजीवता, हृदय में एक अनिर्वचनीय चमत्कृति-सी, एक आत्मविभोरतास-सी सहज ही संचरित हो रही है ।

    आभार ।

    ReplyDelete
  62. आदरणीय आप सभी,
    आप सब के स्नेह और प्रोत्साहन के आगे नतमस्तक हूँ.
    पर ये बखूबी समझती हूँ कि इसमें मेरी कोई कारगुज़ारी नहीं; ये तो गौतम भैया के प्रति आप सब के प्रेम की रसधार है, जिसके कुछ छींटे आज मुझे भी भिगो गए हैं.
    सच्चे दिल से आप सबका धन्यवाद!
    सादर शार्दुला
    ------------
    प्यारेलाल, आपने ये तो बताया ही नहीं कि आपका ये नामकरण हुआ कैसे :)
    चूंकि गौतम भैया बहुत प्यारे हैं और भारत माता के सच्चे लाल हैं, सो वे हुए हमारे प्यारेलाल :)
    दीदी :)

    ReplyDelete
  63. सच कहूँ तेरे बिना मेरी नहीं कोई कहानी
    गीत मेरे जैसे ऊंचे जा लगे हों आम कोई
    तोड़ते हैं जिनको बच्चे पत्थरों की चोट दे कर
    और फिर देना ना चाहे उनका सच्चा दाम कोई !
    ________



    बढिया

    ReplyDelete
  64. अमन के हैं मायने क्या वो बताएँगे हमें अब
    छत ज़मीनें जा लगीं और रास्ते छलनी हुए जब
    शहर छाती कूटता है
    एक सपना टूटता है

    Good one !

    ReplyDelete
  65. सच कहूँ तेरे बिना ठंडे तवे सी ज़िंदगानी
    और मन भूखा सा बच्चा एक रोटी ढूँढता है

    नाम और तेरा पता जिस पर लिखा, खोया वो पुर्जा
    कोष मन के और तन के हाय छिन छिन रीतते हैं

    मुझे लगता था कि गीत आजकल सिर्फ फिल्‍मों के लिये लिखे जाते हैं।
    बधाई

    ReplyDelete
  66. शार्दूला दीदी को पढ़ना और सुनना दोनों ही विलक्षण अनुभव हैं। आवाज और रचना दोनों इतनी सुंदर हैं कि मेरे शरीर के अन्य सभी अंगों को मेरे कानों से ईर्ष्या हो रही है। ऐसी पोस्ट लगाते रहिये।

    ReplyDelete
  67. भाई साहब, क्या ज़बरदस्त पोस्ट लगाई है आपने. शर्दुलाजी की कविताएं मुझे भी बहुत अच्छी लगती हैं. उनका सरल शब्द संयोजन और अनूठा अंदाज़ किसे न भाता होगा.

    ReplyDelete
  68. मनु जी की टिपण्णी की रफ़्तार देख कर लग रहा है...अंगूर की बेटी सर पर ता थईया कर रही थी....हा हा हा
    शार्दूला जी से आपने परिचय करवाया..बहुत ख़ुशी हुई.....

    ReplyDelete
  69. शार्दूला दीदी के बारे में गुरु जी से सुना और अब यहाँ पे उनकी रचनाओ से परिचय हो गया है,
    उन्होंने अपनी कविताओं में हर लफ्ज़ इतना अच्छा निखारा है की उसकी खूबसूरती देखते ही बनती है, चाहे वो "एक सपना टूटा है.." में हो या फिर "सच कहूँ तेरे बिना. में.
    उनकी आवाज़ के बारे में सुन चुका हूँ जैसे की गुरु जी ने कहा है की दीदी आखिर कौन सी चोक्लेट खाती है या कोई साफ्टवेयर डाला हुआ है ये पता लगाना होगा.
    दीदी की ijazat से dono रचनाओ ko copy paste kar raha हूँ.

    ReplyDelete

ईमानदार और बेबाक टिप्पणी दें...शुक्रिया !