संदेशा आये कितना वक्त बीत चुका था उसे कुछ पता नहीं। संदेशे को पढ़ते ही वो तो विचलित मन लिये घर से बाहर निकल गया था पापा का क्लासिक लेम्बरेटा स्कूटर उठाये। लाजिमी ही था...उन आँसुओं को छिपाने के वास्ते।...और अब शहर की तमाम सड़कें-गलियां लेम्बरेटा से नाप लेने के बाद वो बैठा हुआ था उस नन्ही परी के घर वाली गली में पान की दुकान पर सिगरेट के कश पर कश लगाता हुआ। उसे अपने-आप पर हैरानी हो रही थी कि कैसे उसने पिछले बीस-एक दिनों से सिगरेट पीना छोड़ा हुआ था। उसकी वो नन्हीं परी तो वहाँ से हजारों किलोमीटर दूर अपने ससुराल में थी। इधर इस शहर में संध्या का धुंधलका गहराता हुआ...वो लेम्बरेटा की सीट पर उँकड़ू-सा बैठा उस नन्ही परी की तस्वीर हाथ में लिये कई साल पीछे जा चुका था।
नहीं, गणित में कभी कमजोर नहीं रहा वो। लेकिन इस दिनों, महीनों और सालों के हिसाब से अभी फिलहाल बचना चाहता था। वर्षों पहले की कहानी की वो नन्हीं परी अभी कुछ दिनों पहले अपने पँख फैलाये आयी थी उसकी जिंदगी में और ले गयी थी उसे चाँद-सितारों की दुनिया में। अभी भी याद आता है वो स्कूल के दिनों वाले दिन...उस परी का नीले रंग वाला स्मार्ट-सा स्कूल-यूनिफार्म और पूरे रस्ते उसका सर झुका कर चलते जाना। बार-बार बजती साइकिल की घंटी क्या सचमुच वो नहीं सुनती थी? सुनती तो थी, ये अब जाकर पता चला है। अब...इतने सालों बाद, जब उस नन्हीं परी को शादी किये हुये बारह साल बीत गये हैं।
विगत तीन महीने से वो सितारों की ही दुनिया में तो था उसी परी के साथ। हाँ, अभी इन तीन महीने के सारे दिन, हफ़्ते, घंटे वो अभी के अभी ऊँगलियों पे गिन सकता है। गणित में कभी कमजोर था कहाँ वो। इतने बरस बीते, लेकिन वो अब भी वैसी की वैसी है- नन्ही सी। बस उस नीले स्कूल यूनिफार्म को पहनाने की जरूरत है। आठवीं कक्षा की बात होगी, जब पहली बार देखा था उसे। नहीं, देखने से पहले तो सुना था उसके बारे में। माँ जिक्र कर रही थी किसी से। उसने अपना नाम उस नन्हीं परी के नाम के साथ जुड़ते सुना...सुना कि माँ चाहती थी कि जब वो बड़ा होगा तो उसकी शादी उस नन्हीं परी से कर दी जायेगी। पापा के दोस्त की बेटी थी वो। कितनी उम्र रही होगी उसकी अपनी उस वक्त? शायद बारह साल। नहीं, तेरह का था वो। टीन-एज के उस रहस्यमयी दरवाजे के अंदर आया ही तो था वो उस साल। वो साल उसकी जिंदगी के लिये सबसे अहम साल साबित हुआ। उस साल उसकी दोस्ती फैंटम, मैंड्रेक, पराग, सुमन-सौरभ और राजन-इकबाल से इतर शरतचंद, आरके नारायण, धर्मवीर भारती, अमृता प्रितम और प्रेमचंद से हुई...उस साल उसे रोजी के लिये राजु गाइड का पागलपन भाया और उसी साल उसे पारो के लिये देवदास की दीवानगी अपनी-सी लगी...उस साल उसने मैथ्स में पूरे स्कूल में टाप किया...उसी साल उसने सिगरेट पीना शुरू किया...उसी साल उसने अपनी पहली कविता लिखी और उसी साल उसे इश्क
हुआ। वो साल- उसकी वो आठवीं कक्षा वाला साल एक क्रांतिकारी साल था उसकी आनेवाली जिंदगी के लिये। तेरह कोई उम्र होती है इश्क करने की? सोचता हुआ वो उन विषाद के क्षणों में भी बरबस मुस्कुरा उठता है। वो साल उसकी जिंदगी में उस नन्हीं परी को लेकर आया था, जो फिर सदा के लिये उसकी जिंदगी में रह गयी।
कितनी यादें! कितने किस्से!! नन्हीं परी की उस ब्लैक-एन-व्हाइट तस्वीर में डूबा सिगरेट के धुँयें के गिर्द। अभी-अभी हासिल हुई वो श्वेत-श्याम तस्वीर। नन्हीं परी ने मानो तरस खाकर घर के पुराने अलबम से निकाल कर दिया था उसे अभी कुछ दिनों पहले ही तो। उसकी वो नन्हीं परी अब इसी समाज की एक प्रतिष्ठित महिला थी, एक खूब प्यार करने वाले पति की आदर्श पत्नि थी और दो फूल से बेटे-बेटी की प्यारी-सी मम्मी थी। ...थी?...या है? एक दिन छम से अचानक आयी वो अपने पंख फैलाये और उसे दोस्ती की बाँहों में उठाये ले गयी चाँद-तारों के पार। सब कुछ कितना स्वप्न समान था! या सपना ही था उसका ये सब??..और अचानक उसे याद आया कि कैसे जब वो ग्यारहवीं कक्षा में था तो उसके दोस्तों ने मिलकर मुहल्ले में सरस्वती-पूजा का आयोजन किया था। पूरा आयोजन बस इसलिये था कि विगत तीन सालों से उस नन्हीं परी से कुछ भी कहने की हिम्मत न कर सकने वाला उनका ये दोस्त इसी बहाने इस आयोजन में निमंत्रण देने के लिये नन्हीं परी को निमंत्रण-कार्ड देगा और दो बातें करेगा। लेम्बरेटा को घेरे वो विषाद के क्षण एक बार फिर से मुस्कुरा उठते हैं बचपन के उन बेढ़ंगे रोमांटिक प्रयासों को सोचकर।...और जब सचमुच में सरस्वती-पूजा के लिये निमंत्रण-कार्ड देने का अवसर आया, तो उसका वो हड़बड़ा कर उस नन्हीं परी के सामने साइकिल से उतरना, घबड़ा कर उसकी तरफ देखना, आँखों में एकदम से उतरता हुआ वो स्मार्ट-सा नीला यूनिफार्म...और कार्ड देते हुये कुछ बुदबुदाना। he was such a dumb ! कितनी फटकार पड़ी थी दोस्तों से उस शाम। he was declared "beyond any help" on that particular day ...कहाँ हैं वो सब-के-सब कमबख्त दोस्त? आज जरूरत है उसे तो कोई नहीं मिल रहा। एक वो भी दिन थे, जब दोस्तों को बस कहने भर की जरूरत होती कि "यार जहन्नुम चलना है" और जवाब आता तुरत कि "एक मिनट ठहर, कपड़े बदल कर आते हैं"। कोई उनमें से यकीन करेगा इस कहानी पर कि उसने अपनी नन्हीं परी से बात की और खूब बातें की और कि उनका ये चुप्पा दोस्त और वो नन्हीं परी अब एक अच्छे दोस्त हैं। दोस्त हैं?...नहीं, थे। उसी दोस्ती के खात्मे का फरमान लेकर तो आया था वो संदेशा।
...अभी तीन महीने पहले वो नन्हीं परी उसे यूं ही मिल गयी थी व्क दिन अचानक से कहीं राहों में। इतने सालों बाद---एक युग ही तो बीत गया इस बीच। वो अपनी दुनिया में बस चुका था इस बीते चुके युग के दौरान। नन्हीं परी दिल से उतरी नहीं लेकिन कभी। ..और जब एक छोटी-सी परी उसकी गोद में आयी उसकी बेटी बनकर तो उसे कोई दूसरा नाम सूझा भी नहीं था अपनी बेटी के लिये। उसी नन्हीं परी का नाम उसकी बेटी का नाम बन गया। इधर उस अचानक की मुलाकात से शुरू हुआ फोनों का सिलसिला और शुरू हुई एक रूहानी दोस्ती । सब कुछ अब स्वप्न समान लग रहा था उसे उस 70 की दशक वाली पापा के लेम्बरेटा पर बैठे हुये। पापा की तरह उसे भी पुरानी चीजों को संभाल कर रखने का शौक विरासत में मिला था। पापा की इस क्लासिक लेम्बरेटा को उसी ने बड़े अहतियाना रख-रखाव से बचाये हुये था अब तलक।...ठीक अपने पहले इश्क की तरह, उस नन्हीं परी की यादों की तरह!!!
...और आज का ये संदेशा? उसके पूरे वजूद को हिलाता हुआ। नन्हीं परी ने सीधे-सपाट शब्दों में लिख दिया था कि ये दोस्ती उसके लिये ठीक नहीं। उसकी प्रतिष्ठा, उसकी जज्बातों के लिये ठीक नहीं!! she just can't take it...good-bye!!!
दूसरे पैकेट की आखिरी सिगरेट खत्म हो चुकी थी।
वो मोबाइल हाथ में लिये मैसेज-बाक्स में टेनिसन की पंक्तियाँ बार-बार टाइप कर और मिटा रहा था- "o' tell HER, brief is life...but love is long!"।
संदेशा भेज देने को व्याकुल मन बार-बार इस उम्मीद में रूक जाता कि अभी शायद एक और संदेशा आयेगा और सब ठीक हो जायेगा।
पूरे शहर में रात उतर चुकी थी, लेकिन शाम का एक टुकड़ा उस गली में उस क्लासिक लेम्बरेटा के इर्द-गिर्द अभी भी ठिठका खड़ा था उसके मोबाइल के स्क्रीन में झांकता हुआ...इंतजार में एक संदेशे के...
पंकज चतुर्वेदी की पाँच कविताएँ
1 day ago




35 टिप्पणियाँ:
हूं! कहनी शुरू से आखिर तक रहस्य के आवरण में लिपटी हुई है और इसे सच मानने का मन होता है। बड़े भाई, आप गद्य पद्य दोनों में कमाल का लिखते हैं। सुंदर कहानी/हकीकत है।
वो मोबाइल हाथ में लिये मैसेज-बाक्स में टेनिसन की पंक्तियाँ बार-बार टाइप कर और मिटा रहा था- "o' tell HER, life is short...but love is long!"
love indeed is everlasting....
..Forever !!
कहानी की यह "गौतमी" शैली कमाल की है -यह पाठक को एक आत्मसंस्मरणात्मक अभिव्यक्ति का भान करती है -झूंठ या सच यह तो कहानीकार ही जाने ! कहानी बहुत प्रभावशाली है -जज्बाती प्यार की त्रासद परिणति /नियति और असहायता की पीडा भरी अनुभूति को संप्रेषित करती ! पढ़कर शायद हर पाठक विछोह के विस्मृत पलों को याद कर असहज सा हो जायेगा -यह तो बड़ी ज्यादती है !
घर से बाहर निकल गया था पापा का क्लासिक लेम्बरेटा स्कूटर उठाये। लाजिमी ही था...उन आँसुओं को छिपाने के वास्ते।
लेम्बरेटा को घेरे वो विषाद के क्षण एक बार फिर से मुस्कुरा उठते हैं
सब कुछ अब स्वप्न समान लग रहा था उसे उस 70 की दशक वाली पापा के लेम्बरेटा पर बैठे हुये।
शाम का एक टुकड़ा उस गली में उस क्लासिक लेम्बरेटा के इर्द-गिर्द अभी भी ठिठका खड़ा था.
रिश्तों को संभाल कर रखने या फिर एक रूमानियत को अहसासों का पोषण देता हुआ चरित्र स्थापित करता है आपका स्कूटर. कथा को आपने बहुत कम्प्रेस किया है वजह क्या है आप जानते होंगे पर पिछली कहानी की ही तरह कुछ सूत्रों को पकड़ने के लिए कई चक्कर लगाने पड़ते हैं. कहानी वही है जिसको सब शक की निगाह से देखे कि ये सच तो नहीं ? मुझे नहीं लगता कि गौतम जी इस बार भी ऐसे सवालों से बचने वाले हैं. मेरे से कहीं ज्यादा तो तिलिस्म आपके यहाँ बिखरा होता है जैसे उस नन्ही परी का नाम अपनी बेटी का नाम बन गया कहते हुए आप, आधारभूत तथ्यों को कथा साबित करने का प्रयास करते हैं, है न तिलिस्म.... मैं तो आपके जाल में फंस ही गया हूँ. नायिका मुझे मिलती तो कहता यार एक बार गले से लगा कि ज़िन्दगी भर के लिए उस नीली स्कूल यूनीफोर्म की गर्मी बनी रहे दिल के भीतर.
वैसे इस पर आप सलाम कुबूल कीजिए कि हर फ़न के उस्ताद हैं आप !!
कहानी में कुछ क्लासिक चीजे बड़ी खूबसूरती से शुमार की गयी है.. जैसे लेम्ब्रेटा, सुमन सौरभ, फेंटम, देवदास, राजू गाइड,
ये कहानी के बैकग्राउंड एक मजबूती देती है... कमाल का फ्लो है कहानी में..
आप कुछ भी नही छुपा पाते हैं वीर जी....! देखो ना सभी शक की निगाह से देख रहे हैं। :) :) सोचती हूँ कि ये शख्स अगर फौज में रह कर दुनिया के सब से क्रूर सच से रोज रू-ब-रू ना हो रहा होता तो कैसा होता....!
और फिर ये भी सोचती हूं कि उस नन्ही परी का क्या हुआ होगा जो कहानी भी नही लिख पा रही, जो घंटी सुन कर उठने वाली अपनी धड़कनों को सीने में जज़्ब किये सिर झुकाये ऐसे चली जा रही है जैसे उसने कुछ सुना ही नही। कोई उससे पूँछे कि सायकिल की घंटी की आवाज़ का शोर कैसे उसे रात भर सोने नही देता होगा। वो जिसने कल भी किसी की प्रतिष्ठा के लिये अपने जज़बातों को कत्ल कर दिया था और आज भी....!
खुबसूरत कहानी....!।
पता नही क्या है?गद्य है पद्य है,कहानी है या आत्मसंसमरण है?सच है झूठ है?साहित्य है या सिर्फ़ पोस्ट है?जो भी है,मगर है लाजवाब है।जियो गौतम भाई जियो।लेखन को जीने की कला आपसे सीखनी चाहिये।
दिल खुदगर्ज है...थोडा सा बेईमान भी.....सब कुछ ठीक चलती ज़िन्दगीमे भी कभी कभी यूँ ही उचककर पुरानी गली में झाँकने लगता है ...की कैसा होगा वो अतीत .....लाजिमी है ऐसा होना .. पर १३ का प्यार अचानक सामने आ जाये तो ...?जिंदगी ऐसी ही है ...इत्तेफाक के मोड़ पर टिकी.....कहानी पर क्या कहूँ ...तुम्हे पढना कभी निराश नहीं करता ....कभी लिखा था .आज तुम्हे नजर कर रहा हूँ
"ये भी क्या कम इत्तेफाक हुआ है मेरा साथ
हर शै मिल जाती है इत्तेफकान वो नहीं मिलता ."
गौतम जी .................आप जो भी लिखते हैं वो दिल को choo जाता है......... कितनी बार आपका chehraa याद aa जाता है....... सच में लिखना तो कोई आप से seekhe ........... इतनी लाजवाब और rahasy may रचना बस padhte जाओ........ और मन ही मन daad दिए जाओ...........
अरे वाह आपकी तो कहानी कहने की विधा में भी पकड़ उतनी ही मजबूत है जितनी की शायरी की विधा में...लेम्ब्रेटा स्कूटर... तेरह साल की उम्र...एक परी....आपने तो हमें सालों पीछे धकेल दिया...फरक सिर्फ इतना है की हमारी कहानी में स्कूटर की जगह एटलस साईकिल थी और हाँ...एक फरक और हमने उस परी को कहीं और नहीं जाने दिया...अभी वो हमारे साथ है...
बहुत अच्छा और कमाल का लेखन...बधाई...
नीरज
एक और संदेशा और सब ठीक ......... आस बनी रहती है
मैं तो कहानी में कहीं खो गया ...और ना जाने कब मैंने खुद को कहानी के नायक से जोड़ लिया ....बेहतरीन ...बेहतरीन
kahani bahut achhi bani hai.
"nanhi padi ki kahani"... per kahani ladke ke ird gird ghoomti hai. Aaj jo bhi mein likhoongi,wo hogi us nanhi padi ki taraf se. " Nanhi padi " kitna achha naam diya hai aapne ."Nanhi Padi" jise us ladke ne itna pyaar kiya aur phir chhor diya , ho jane di uski saadi kahin aur? Aapni maa se suna tha pahli baar ki wo saadi karengi bete ki us nanhi padi se. Per jab sadi ka wakt aaya to kisi ko yaad hi nayi aayi us padi ki. Pari karti bhi to kya...? Kiska karti intejar...?
Phir uski saadi hui.Kho gayi thi wo apne is nayi jindagi mein.Poorane baaton ko to wo bilkul bhool chuki thi.Ki achanak ek din kahan se woh phir aaya uski jindagi mein. Nanhi padi phir beh gayi uski baaton mein...uski bhavanao mein... bahut sametne ki koshish ki usne aapne aapko per sab...bekar. Kuchh dino baad bhram toota uska.Dhyan aaya ki wah kya kar rahi thi? Usne dabaya apni bhavanaon ko . Ye aasan nahi tha uske liye per shayad yahi sahi bhi tha dono ke liye. Nanhi padi aisi hi thi hamesha se . Uske liye uski bhawanayen kam mahatwa rakhti thi. Wah ab bhi utni hi achhi dost hai. Utna hi pasand karti hai apne dost ko ,per apne dost ke sath udd nahi sakti. Pari chahati hai ki uska dost kabhi roye na kyonki wo royega to pari royegi ...wo jalega(dhuen se )to wo jalegi ...
Pari ab nanhi nahi rahi . Nanhe bachon ki ma hai wo. Kisi ki patni hai... adarsh patni hai wo. Aur wo bhi to hai ... ek aadarsh pati... ek aadarsh pita...
To ye ho gayi kahani us nanhi peri ki taraf se. Meri hindi achhi nahi , aapke padhne layak to bilkul bhi nahi. Per aapki post padhte padhte baatein banana jaroor seekh gayi hoon. Mujhse raha nahi gaya. Kisi ko to khara hona hi tha us peri ki taraf se... ek sirf kanchan ji ne hi to sanjha use. Aap bahut... achha likhte hain...
NAINA.
गौतम जी परी तो होती ही ख्वाब लेने के लिये है मगर शैली और शिल्प ने बान्धे रखा कल्पनाओं के पर ना होते हुये भी कितनी ऊँची उडान भर लेती हैं और भावुक मन से ऐसे शब्द बिखरते हैं कि ऐसी अद्भुत रचना का जन्म होता है बहुत ही भावमय रचना आपकी बहुयायामी प्रतिभा को नमन आभार्
गौतम जी परी तो होती ही ख्वाब लेने के लिये है मगर शैली और शिल्प ने बान्धे रखा कल्पनाओं के पर ना होते हुये भी कितनी ऊँची उडान भर लेती हैं और भावुक मन से ऐसे शब्द बिखरते हैं कि ऐसी अद्भुत रचना का जन्म होता है बहुत ही भावमय रचना आपकी बहुयायामी प्रतिभा को नमन आभार्
गौतम जी परी तो होती ही ख्वाब लेने के लिये है मगर शैली और शिल्प ने बान्धे रखा कल्पनाओं के पर ना होते हुये भी कितनी ऊँची उडान भर लेती हैं और भावुक मन से ऐसे शब्द बिखरते हैं कि ऐसी अद्भुत रचना का जन्म होता है बहुत ही भावमय रचना आपकी बहुयायामी प्रतिभा को नमन आभार्
गौतम जी परी तो होती ही ख्वाब लेने के लिये है मगर शैली और शिल्प ने बान्धे रखा कल्पनाओं के पर ना होते हुये भी कितनी ऊँची उडान भर लेती हैं और भावुक मन से ऐसे शब्द बिखरते हैं कि ऐसी अद्भुत रचना का जन्म होता है बहुत ही भावमय रचना आपकी बहुयायामी प्रतिभा को नमन आभार्
यह कहानी है या आप की diary के पन्ने!बहुत मुश्किल है इनमें अंतर कर पाना..या जो आप कथानक में जीते हुए लिखते हैं या कथानक से गुजरे हुए हैं..
कुछ भी है ...कहानी अंत तक बांधे रखती है...
कहानी बडी मार्मिकता से अपने साथ साथ बहाये ले जाती है. ये शायर और कहानीकार का अद्भुत मिलन है. किसी की रचना पढते हुये ही यह भ्रम होने लगता है कि ये आपबीती होगी..पर मेरी समझ से ये ज्यादती होगी लेखक से. ..बस काहानीकार की रचना का आनंद लिया जाना चाहिये. शुभकामनाएं.
रामराम.
भाई मैंने आपकी दो कहानियां पढीं हालांकि पहली कहानी मेज़र वाली ज़्यादा पसन्द आयी थी लेकिन इन दोनों कहानियों से एक बात तो बहुत स्पष्ट है कि अपनी शैली विकसित करने में जहां कहानीकारों को सालों लग जाते हैं वो आपके पास अभी से है. ढेरों शुभमनायें
नन्हीं परी के बहाने आपके कथाकार रूप से परिचय हुआ और एक भावुक कहानी पढने को मिली.
shayad ye aapka pehla prayas hai??
yaa phir kahaniya pehle bhi likh chuke hai?? jo bhi ho.. wakai lajawab hai.. kahani padhte padhte man me jo uske ant ke prati jigyasa utpanna hoti hai wahi use aur interesting banati hai..
must say.. it is really beautiful.. :)
प्रिय गौतम जी खुश रहो |अभी अभी मै पढ़ रहा था की पिछले दिनों दिल्ली में श्री दर्पण शाह के घर पर हुई गोष्ठी में आपने तरन्नुम में ग़ज़ल गाकर अन्य शायरों को आनंदित किया |मुझे पढ़ कर बेहद खुशी हुई |मैंने पहले भी निवेदन किया था की आपकी गजल आपकी आवाज़ में मैं सुन नहीं पा रहा हूँ जाने कहाँ गलती हो रही है की सुनते समय ऐसी आवाज़ आती है जैसे कोई बहुत जल्दी जल्दी कुछ कह रहा हो (बहुत फास्ट )
बेहतरीन! काश नन्ही परी के भी कुछ बयान सुन पाते!
गौतम अच्छी कहानी है संवेदनाओं से भरी हुई किन्तु ये कहानी नहीं है ऐसा क्यों लग रहा है । कहानी लिखते समय अपने को कहानी से दूर रखना सबसे कठिन काम है, किन्तु उसे करना ही होता है । कहीं से मिल पाये तो मेरी एक पुरानी कहानी मुट्ठी भर उजास और अतीत के पन्ने पढ़ना । इसलिये क्योंकि ये दोनों ही कहानियां तुम्हारी इस कहानी के आस पास हैं ।
हर प्रेम कहानी अपनी सी क्यों लगती है? शब्दों से ऐसे बाँधा कि जब आखिए शब्द आया तो पता चला कि ये तो आखिर शब्द है। सच आपकी लेखनी का जवाब नही। सच कहा आपने। life is short...but love is long!" पढकर बहुत अच्छा लगा।
'गौतमी शैली' कहकर आपके रचनाकर्म को अरविन्द मिश्राजी ने सही परिभाषित किया है..पूरी कहानी एक सांस में पढ़ गया.क्या लिखा कैसा लिखा के फेर में तो मैं पड़ता नहीं पर मुझे पढ़कर मजा आगया.कहीं कहीं मासूम कल्पनाए और छोटे छोटे सच मिलकर मन में रूमानियत को इस कदर पसरा देते है कि उससे बाहर आने का जी नहीं चाहता.
बहुत अच्छी...!
प्रकाश पाखी
आपकी इस रचना ने दिल से आह... और वाह... दोनों को एक साथ निकला है...
मीत
आपकी कहानी और नैना जी की टिपण्णी मिलकर वस्तुतः एक पूरी कहानी बनी है......
किशोर वय के मासूम कोमल स्नेह आकर्षण और दशकों बाद पुनः संपर्क से मन में उठे भावों को आपने जिस सजीवता से अपनी इस कथा में उकेरा है.........बस क्या कहूँ.....
बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर !!!!
कोमलता से मनोभूमि को स्पर्श करने और विभोर करने में सक्षम इस कथा के लिए आपको ढेरो बधाईयां ....
phle pyar ki dhkan sanso me bsaye ,
jeevan ki phli cheejo ko antr me bhigaye bhut sundar kahani hai .aur ye bhi utna hi sach hai agar ye sab kuch sath rhta to andar tk judta kya?
rochakta se bharpur sahityik drshti se bhi mhtvpurn khani.
badhai .
shubhkamnaye
Main is blog pe kaise pahuchi nahin pata...par bahut khush hoon ki aa paayi.
itna achcha vivaran bachpan teenage k dinon ka......suman saurabh, phantom, rajan iqbal, amrita pritam :)
Samay beet jaata hai yaadein nahin......bahut hi khoobsurat rachna!
namskaar gautam bhaiyaa,
kya kahoon aur kya likhoon.
bas padte rahoon yahi man kar raha hai.
@ Anonymous said...
shukriya aapkaa naina ji,
gautam ke saath saath hamein bhi samjhaa diyaa aapne....!!!!!
raju duide aur raajen-ikbaal ke saath jaane kahaan kahaan kho gaye the ham...
ye comment box aaj hi dekhaa hai..kahaani pahle padh li thi...
kyaa karein ,,,dil hi nahi thaa koi comment dene kaa...
बहुत सुन्दर!
gautam bhai , bahut dino baad aapke dwaar aaya , maafi chahunga ... aap to bhai katha bhi badi jordaar likhte hai .. kahani padhkar kisi ki yaad aa gayi ji ..
badhai
regards
vijay
please read my new poem " झील" on www.poemsofvijay.blogspot.com
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