यूँ ही एक पुरानी कविता आज...या तुकबन्दी सा कुछ| कब से बस अनर्गल-सा कुछ लिखे जा रहा हूँ यहाँ, तो सोचा डायरी के पुराने पन्नों में कुछ टटोलूँ और अपनी कोई कविता निकालूँ....ये वाली भायी :-)
तुम जो नहीं होती तो फिर
कि तुम जो नहीं होती, तो फिर ...?
भोर लजाती ऐसे ही क्या थामे किरणों की घूँघट ? तब भी उठती क्या ऐसे ही साँझ ढ़ले की अकुलाहट ?
रातें होतीं रातों जैसी या दिन फिर दिन ही होता ? यूँ ही भाती बारिश मुझको चाँद लुभाता यूँ ही क्या ?
यूँ ही ठिठकता राहों में मैं चलता हुआ अचानक से, कि मीलों दूर छत पर बैठी तुमने पुकारा हो जैसे ?
तन्हाई, तन्हाई-सी ही होती या कुछ होती और ? मेरे सीने में धड़कन का होता क्या फिर कोई ठौर ?
आवारा कदमों को क्या फिर मिलती भी कोई मंज़िल ? बना-ठना सा यूँ ही रहता या फिर रहता मैं जाहिल ?
मेरे हँसने या रोने के होते क्या कुछ माने भी ? कैसा होता घर आना और टीस छोड कर जाने की ?
सच तो इतना-सा भर है कि होने को जो भी होता तुम जो तुम नहीं होती तो मैं भी कहाँ मैं ही होता
{त्रैमासिक अनंतिम में प्रकाशित }
....और इसी कविता को सुनना चाहें मेरी भद्दी-सी आवाज में, तो उसका भी विकल्प मौजूद है :-
नहीं मंजिलों में है दिलकशी...न, बिलकुल नहीं ! मोबाइल के उस पार दूर गाँव से माँ की हिचकियों में लिपटे आँसू भी कहाँ इस दिलकशी को कोई मोड दे पाते हैं| क्यों जा रहे हो फिर से? अभी तो आए हो?? सबको ढाई-तीन साल के बाद वापस जाना होता है, तुम्हें ही क्यों ये चार महीने बाद ही??? रोज उठते इन सवालों का जवाब दे पाना कश्मीर के उन सीधे-खड़े पहाड़ों पे दिन-दिन रात-रात ठिठुरते हुये गुजारने से कहीं ज्यादा मुश्किल जान पड़ता है|
... छुटकी तनया के जैसा ही जो सबको समझाना आसान होता कि पीटर तो अभी अपना दूर वाला ऑफिस जा रहा है| बस जल्दी आपस आ जायेगा| देर से आने वालों के लिये, तनया चार साल की हुई है और पीटर पार्कर उसका पापा है और वो अपने पापा की मे डे पार्कर :-) ....बाहर पोर्टिको में झाँकती बालकोनी के ऊपर अपनी मम्मी की गोद में बैठी आज समय से पहले जग कर वो अहले-सुबह अपने पीटर को बाय करती है और दिन ढ़ले फोन पर उसकी मम्मी सूचना देती है कि शाम को पार्क में झूला झूलने जाने से पहले वो दरियाफ़्त कर रही थी कि पीटर आज ऑफिस से अभी तक क्यों नहीं आया| समय कैसे बदल जाता हैं ना...मोबाइल के उस पार वाली माँ की हिचकियाँ पीटर को उतना तंग नहीं करतीं, जितना मे डे का ये मासूम सा सवाल और हर बार की तरह पीटर इस बार भी सचमुच का स्पाइडर मैन बन जाना चाहता है कि अपनी ऊंगालियों से निकलते स्पाइडर-वेब पे झूलता वो त्वरित गति से कभी मम्मी की हिचकियों को दिलासा दे सके तो कभी वक़्त पे ऑफिस से वापस आना दिखा सके मे डे को ...कि उसे प्रकाश सहित व्याख्या न देना पड़े खुल कर उसके अपने ही उसूल का:- विद ग्रेटर पावर, कम्स ग्रेटर रिस्पोन्सिबिलिटी
...सच तो! कितना मुश्किल है इस उसूल की व्याख्या और वो भी प्रकाश सहित इस दौर में, जब फेसबुक पे लहराते हुये स्टेटस ही शायद फलसफे बन गए हैं मायने जीये जाने के और जिसका छुटकी मे डे को जरा भी भान नहीं | आयेगी वो भी कुछ सालों बाद इसी फलसफे को नए मायने देने-शर्तिया| लेकिन क्या जान पाएगी वो कि ग्रीन गोबलिन या डा० आक्टोपस के करतूतों की फिक्र इन तमाम फेसबुकिये स्टेटसों को नहीं? क्या समझ पायेगी वो कि ऐसे तमाम गोबलिन और आक्टोपस के लिए कितने पीटरों को अपनी मे डे को छोड़ कर जाना ही पड़ता है? क्या समझ पायेगी वो कि ये तमाम संवेदनायें जो स्टेटस में शब्द-जाल उड़ेलते रहते हैं, वो महज चंद लाइक और कुछ कमेंट्स इकट्ठा करने के लिए होते हैं या फिर ग्रेटर पावर अर्जित करने की कामना में कथित ग्रेटर रिस्पोन्सिबिलिटी का चोगा भर होते हैं ...और कुछ नहीं| शायद समझे वो....शायद न भी! उसकी समझ या नासमझ वक़्त रहते खुद-ब-खुद आयेगी, लेकिन माँ की उमड़ती हिचकियों को कैसे समझाये पीटर कि उसका फिर से जाना उसके खुद के लिए जितना जरूरी है उतना ही जरूरी बड़ी होती मे डे के लिए भी है जो बाद-वक़्त अपने पीटर पे घमंड करते हुये फेसबुकीये स्टेटसों में सिमट आये जीने के मायने को अपना उसूल देगी|
है न मे? बस इसलिए तो ....मुझे फिर सफर की तलाश है :-)
कवियों की बेतरह बढ़ती भीड़ में कविता एकदम से जैसे लुप्तप्राय हो गई है...हर जगह से, हर ओर से| मैं कोई आलोचक नहीं, न ही कवि हूँ| हाँ, कविताओं का समर्पित पाठक हूँ और एक तरह का दंभ करता हूँ अपने इस पाठक होने पर| अच्छी-बुरी सारी कवितायें पढ़ता हूँ| कविताओं की किताबें खरीद कर पढ़ता हूँ| पढ़ता हूँ कि अच्छे-बुरे का भेद जान सकूँ| इसी पढ़ने में कई अच्छे कवियों की अच्छी "कविताओं" से मुलाक़ात हो जाती है| खूब पढ़ने का प्लस प्वाइंट :-) .... अशोक कुमार पांडेय की "लगभग अनामंत्रित" ऐसी ही एक किताब है-एक अच्छे कवि की अच्छी कविताओं का संकलन| करीब पचास कविताओं वाली ये किताब कहीं से भी कविताओं के भार से दबी नहीं मालूम पड़ती, उल्टा अपने लय-प्रवाह-शिल्प-बिम्ब के सहज प्रयोग से आश्वस्त सी करती है कि कविता का भविष्य उतना भी अंधकारमय नहीं है जितना कि आए दिन दर्शाया जा रहा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में| विगत तीन-एक सालों से अशोक कुमार पांडेय की कवितायें पढ़ता आ रहा हूँ...नेट पर और तमाम पत्रिकाओं में| स्मृतियों के गलियारे में फिरता हूँ तो जिस कविता ने सबसे पहले मेरा ध्यान आकृष्ट किया था इस कवि की ओर, वो थी एक सैनिक की मौत| शीर्षक ने ही स्वाभाविक रूप से खींचा था मेरा ध्यान और पढ़ा तो जैसे कि स्तब्ध-सा रहा गया था| यूँ वैचारिक रूप से इस कविता की कुछ बातों से मैं सहमत नहीं था, न ही कोई सच्चा सैनिक होगा...लेकिन पूरी रचना ने अपने समस्त कविताई अवतार में मेरे अन्तर्मन को अजब-गज़ब ढंग से छुआ| किताब में ये कविता चौथे क्रमांक पर शामिल है| किताब में शामिल कुल अड़तालीस कविताओं में कई सारी कवितायें पसंद हैं मुझे और सबका जिक्र करना संभव नहीं, लेकिन कहाँ होगी जगन की अम्मा , चाय अब्दुल और मोबाइल और माँ की डिग्रियाँ जो किताब में क्रमश: तीसरे, छठे और ग्यारहवें क्रमांक पर शामिल हैं, का उल्लेख किए बगैर रहा न जायेगा| जहाँ "कहाँ होगी जगन की अम्मा" अपने अद्भुत शिल्प और छुपे आवेश में बाजार और मीडिया का सलीके से पोशाक उतारती है और जिसे पढ़कर उदय प्रकाश जी कहते हैं "बहुत ही मार्मिक लेकिन अपने समय के यथार्थ की संभवत: सबसे प्रकट और सबसे भयावह विडंबना को सहज आख्यानात्मक रोचकता के साथ व्यक्त करती एक स्मरणीय कविता" ...वहीं दूसरी ओर "चाय, अब्दुल और मोबाइल" मध्यमवर्गीय (महत्व)आकांक्षाओं पर लिखा गया एक सटीक मर्सिया है| दोनों ही कवितायें बड़ी देर तक गुमसुम कर जाती हैं पढ़ लेने के बाद| "माँ की डिग्रियाँ" तो उफ़्फ़...एक विचित्र-सी सनसनी छोड़ जाती है हर मोड़ पर, हर ठहराव पर| इस कविता का शिल्प भी कुछ हटकर है, जहाँ कवि अपनी माँ के अफसाने को लेकर अपनी प्रेयसी से मुखातिब है| स्त्री-विमर्श नाम से जो कुछ भी चल रहा है साहित्यिक हलके में, उन तमाम "जो कुछों" में अशोक कुमार पाण्डेय की ये कविता शर्तिया रूप से कई नये आयाम लिये अलग-सी खड़ी दिखती है| "लगभग अनामंत्रित" की कई कवितायें हैं जिक्र के काबिल| एक और कविता "मैं धरती को एक नाम देना चाहता हूँ" बिलकुल ही अलग-सी विषय को छूती है| जहाँ तक मेरी जानकारी है तो दावे से कह सकता हूँ कि ये विषय शायद अछूता ही है अब तक कविताओं की दुनिया में| पिता का अपनी बेटी से किया हुआ संवाद...एक पिता जिसे बेटे की कोई चाह नहीं और जिसके पीछे सारा कुनबा पड़ा हुआ है कि वंश का क्या होगा...और कुनबे की तमाम उदासी से परे वो अपनी बेटी से कहता है "विश्वास करो मुझ पर खत्म नहीं होगा ये शजरा/वह तो शुरू होगा मेरे बाद/तुमसे"| इस कविता से मेरा खास लगाव इसलिए भी है कि खुद भुक्तभोगी हूँ और अगर मुझे कविता कहने का सऊर होता तो कुछ ऐसा ही कहता| अशोक कुमार पाण्डेय के पास अपना डिक्शन है एक खास, जो उन्हें अलग करता है हर सफे, हर वरक पर उभर रहे तथाकथित कवियों के मजमे से| अपने बिम्ब हैं उनके और उन बिंबों में एक सहजता है...जान-बूझ कर ओढ़ी हुई क्लिष्टता या भयावह आवरण नहीं है उनपर, जो हम जैसे कविता के पाठकों को आतंकित करे| उनके कई जुमले हठात चौंका जाते हैं अपनी कल्पनाशीलता से और शब्दों के चुनाव से| चंद जुमलों की बानगी .... -बुरे नहीं वे दिन भी/जब दोस्तों की चाय में/दूध की जगह मिलानी होती थी मजबूरियाँ (सबसे बुरे दिन) -अजीब खेल है/कि वजीरों की दोस्ती/प्यादों की लाशों पर पनपती है (एक सैनिक की मौत) -पहले कविता पाठ में उत्तेजित कवि-सा बतियाता अब्दुल (चाय, अब्दुल और मोबाइल) -जुलूस में होता हूँ/तो किसी पुराने दोस्त-सा/पीठ पर धौल जमा/निकल जाती है कविता (आजकल) -उदास कांधों पर जनाजे की तरह ढ़ोते साँसें/ये गुजरात के मुसलमान हैं/या लोकतंत्र के प्रेत (गुजरात 2007) दो-एक गिनी-चुनी कवितायें ऐसी भी हैं किताब में, जिन्हें संकलित करने से बचा जा सकता था, जो मेरे पाठक मन को थोड़ी कमजोर लगीं....विशेष कर "अंतिम इच्छा" और "तुम्हें प्रेम करते हुये अहर्निश"| "अंतिम इच्छा" को पढ़ते हुये लगता है जैसे कविता को कहना शुरू किया गया कुछ और सोच लिए और फिर इसे कई दिनों के अंतराल के बाद पूरा किया गया| विचार का तारतम्य टूटता दिखता है...सोच का प्रवाह जैसे बस औपचारिक सा है| वहीं "तुम्हें प्रेम करते हुये अहर्निश" में ऐसी झलक मिलती है कि कवि को 'अहर्निश' शब्द-भर से लगाव था जिसको लेकर बस एक कविता बुन दी गई| किताब का कलेवर बहुत ही खूबसूरत बन पड़ा है| महेश वर्मा द्वारा आवरण-चित्र सफेद पृष्ठभूमि में किताब के नाम के साथ खूब फब रहा है| शिल्पायन प्रकाशन की किताबें अच्छी सज्जा और बाइंडिंग में निकलती हैं हमेशा| यूँ व्यक्तिगत रूप से, किताब खरीदने और फिर उसे बड़े जतन से सहेज कर रखने वाला मेरा 'मैं" सफेद आवरण वाली किताबों से तनिक चिढ़ता है कि बार-बार पढ़ने और किताब पलटने के बाद ये हाथों के स्पर्श से मैली पड़ जाती हैं| किताब में चंद प्रूफ की गलतियाँ खटकती हैं....विशेष कर एक कविता "तौलिया, अर्शिया, कानपुर" की पहली पंक्ति ही तौलिया के 'टंगी' होने की वजह से स्वाद बेमजा कर देती है और विगत एक दशक से अनशन पर बैठीं मणीपूर की इरोम शर्मीला का नाम किताब में दो-दो बार गलती से इरमीला शिरोम छपा होना चुभता है आँखों को| उम्मीद है किताब के दूसरे संस्करण में इन्हें सुधार लिया जायेगा| किताब मँगवाने के लिए शिल्पायन के प्रकाशक श्री ललित जी से उनके मोबाइल 9810101036 या दूरभाष 011-22821174 या फिर उनके ई-मेल shilpayanbooks@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है| कविता की एक अच्छी किताब हम कविताशिकों को सौपने के लिए आशोक कुमार पाण्डेय का बहुत-बहुत शुक्रिया और करोड़ों बधाईयाँ...और साथ ही उन्हें समस्त दुआएं कि उनका कविता-कर्म यूँ ही सजग, चौकस और लिप्त रहे सर्वदा...सर्वदा ! ...और अंत में चलते-चलते इस किताब की मेरी सबसे पसंदीदा कविता| एक प्रेम-कविता... प्रेम की एक बिल्कुल अलग अनूठी सी कविताई प्रस्तुति, प्रेम को और-और शाश्वत...और-और विराट बनाती हुई| सुनिए:- मत करना विश्वास मत करना विश्वास/अगर रात के मायावी अंधकार में उत्तेजना से थरथराते होठों से/किसी जादुई भाषा में कहूँ सिर्फ तुम्हारा यूँ ही मैं मत करना विश्वास/अगर सफलता के श्रेष्ठतम पुरुस्कार को फूलों की तरह सजाता हुआ तुम्हारे जूड़े में उत्साह से लड़खड़ाती भाषा में कहूँ सब तुम्हारा ही तो है मत करना विश्वास/अगर लौटकर किसी लंबी यात्रा से बेतहाशा चूमते हुये तुम्हें/एक परिचित-सी भाषा में कहूँ सिर्फ तुम ही आती रही स्वप्न में हर रात हालाँकि सच है यह/ कि विश्वास ही तो था वह तिनका जिसके सहारे पार किए हमने/दुख और अभावों के अनंत महासागर लेकिन फिर भी पूछती रहना गाहे ब गाहे किसका फोन था कि मुस्कुरा रहे थे इस कदर? पलटती रहना यूँ ही कभी-कभार मेरी पासबुक करती रहना दाल में नमक जितना अविश्वास हँसो मत/जरूरी है यह विश्वास करो/तुम्हें खोना नहीं चाहता मैं...
...पाले हुये अनगिनत रोगों की फ़ेहरिश्त में किताबों ने होश की पहली दहलीज़ से ही शायद सबसे ऊपर वाला क्रमांक बनाए रखा है| वैसे कितनी दहलीजें होती हैं होश की ? बक़ौल वेद, उपनिषद आदि ...शायद आठ दहलीजें... राजकमल के मुक्ति-प्रसंग के आठ अनुच्छेदों की तरह| ... इधर लगातार उमड़ रहे अनर्गल अलापों की घटाटोप बारिश में अचानक से अपने इस सिरमौर रोग की शिकायती बिजलियों ने कौंध-कौंध कर किताब वाली आलमारी में पिछले साल की खरीदी किताबों की ओर इशारा किया...कुछ हमारी भी तो बातें करो कभी ! ...तो बातें किताबों की :-) खुद से किया हुआ बहुत पुराना वादा था कि साल के हर महीने तीन से चार किताबें खरीदनी ही खरीदनी है| चंद एक उपहार में भी मिल जाती हैं कदरदान शुभेच्छुओं से| शिकायती बिजलियों की कौंधती चमक ठसाठस भरी आलमारी में 43 किताबें दिखलाती हैं, पिछले साल की खरीदी हुई| शो टाइम :-
ज़ोर मारता शौक़ का दरिया कविताओं और ग़ज़लों के भँवर में ही डूबो ले जाता है खरीददारी को...प्रायः | पिछले साल भी वही हुआ तमाम सालों की तरह... ग़ज़लों में राहत इंदौरी की "चाँद पागल है", बशीर बद्र की "मैं बशीर", शहरयार की "कहीं कुछ कम है" , अदम गोंडवी की "समय से मुठभेड़" , मंसूर उसमानी की "अमानत" , शाज़ तमकनत की "आवाज़ चली आती है" , शाहिद माहुली की "शहर खामोश है" और विकास शर्मा की "बारिश खारे पानी की" ... ने पूरे साल देर रातों, भरी दुपहरियों, उदास शामों को अजब-गजब रंगों से सराबोर किया तो कविताओं-गीतों और नज़्मों में गुलज़ार की "पंद्रह पाँच पचहत्तर" , यश मालवीय की "एक चिड़िया अलगनी पर..." , लीलाधार मंडलोई की "घर-घर घूमा" , चन्द्रकान्त देवताले की "धनुष पर चिड़िया" , मलखान सिंह सीसोधिया की "कुछ कहा कुछ अनकहा" , बोधिसत्व की "खत्म नहीं होती बात" , शिरीष मौर्य की "पृथ्वी पर एक जगह" , गीत चतुर्वेदी की "आलाप में गिरह" , लाल्टू की "लोग ही चुनेंगे रंग" , वंदना मिश्र की 'कुछ सुनती ही नहीं लड़की" , रंजना जायसवाल की "ज़िंदगी के कागज पर" , अशोक कुमार पाण्डेय की "लगभग अनामंत्रित" , नीलोत्पल की "अनाज पकने का समय" और मनीष मिश्र की "शोर के पड़ोस में चुप सी नदी" ने उन अजब-गजब रंगों को तनिक और चटक किया| कविताओं से ही जुड़ी चंद अन्य किताबों में राजेश जोशी की "एक कवि की नोटबुक" , विजेंद्र की "कवि की अंतर्यात्रा" , लीलाधर मंडलोई द्वारा संपादित "कविता के सौ बरस" और विश्वरञ्जन द्वारा संकलित "फिर फिर नागार्जुन" ने कविताओं के मेरे सहमे पाठक-मन को ज़रा-ज़रा आश्वस्त किया| उपन्यासों में जहाँ कुणाल सिंह की "आदिग्राम उपाख्यान" , पंकज सुबीर की "ये वो सहर तो नहीं" और मनीषा कुलश्रेष्ठ की "शिगाफ़" ने लेखनी के अविश्वसनीय जादूगरी से रूबरू करवाया तो कहानियों में ज्ञानपीठ का संकलन "लोकरंगी प्रेम-कथाएँ" , अनुज की "कैरियर गर्ल-फ्रेंड और विद्रोह" , नीला प्रसाद की "सातवीं औरत का घर" , जयश्री राय की "अनकही" , सुभाष चंद्र कुशवाहा की "बूचड़खाना" , अखिलेश की "अँधेरा" और मनीषा कुलश्रेष्ठ की "कुछ भी तो रूमानी नहीं"... इसी जादूगरी को मंत्र-मुग्ध और सम्मोहन की चरम अवस्था में ले गईं| रवीन्द्र कालिया का अनूठा संस्मरण-संकलन "गालिब छूटी शराब" उस चरम अवस्था का अगला पायदान था| इनके अलावा इंगलिश की छ किताबें भी शामिल हैं... तेज़ एन धर द्वारा संकलित "डायरी ऑव एन अननोन कश्मीरी" , मोनिका अली की "ब्रिक लेन" , चेतन भगत की "टू स्टेट्स" , औकाय कॉलिन्स की "माय जिहाद" , अरुंधति रॉय द्वारा संकलित "अनटिल माय फ्रीडम हैज कम" और आन्द्रे अगासी की आत्म-कथा "ओपेन"...... शो टाइम फ्रौम डिफरेंट एंगल ........
कितनी किताबों के अफ़साने जाने ऐसे कितने ही आलमारियों में बंद पड़े होंगे...सोचा कि कुछ को आज़ाद करूँ, यूँ ही बैठे-ठाले| क्या करूँ, पुराने का मोह छूटता नहीं ना | जल्द ही इनमें से किसी किताब को लेकर लौटता हूँ... रोगों की फ़ेहरिश्त को तारो-ताजा करने...
हमेशा से...हमेशा ही से अटका रह जाता है "पुराना" साथ में...जेब में, आस्तीन में, गिरेबान में, स्मृति में, स्पर्श में, स्वाद में, आँखों में, यादों में...मन में|
ग़ालिब की छुटी शराब के मानिंद ही रोज़े-अब्रो-शबे-माहताब में इस "पुराने" का छोटा-बडा पैग बनता रहताहै...इत-उत...जब-तब|
बहुत भाता है पुराना कब से जाने
तब से ही तो...
तीन, तीस या तीन सौ...? लम्हे, दिन, महीने या साल ...?? कितनी पुरानी हो गई हो तुम...??? इतराती हो फिर भी है ना ? कि
रोज़ ही नयी-नयी सी लगती हो मुझे...
रफ़ी के उन सब गानों की तरह सुनता हूँ जिन्हें हर सुबह हर बार नए के जैसे
या
वही वेनिला फ्लेवर वाली आइस-क्रीम का ऑर्डर हर बार कि बटर-स्कॉच
या स्ट्रबेरी को ट्राय कर कोई रिस्क नहीं लेना...
लॉयेलिटी का भी कोई पैमाना होता है क्या? तुम्ही कहो...
तुम भी तो लगाती हो वही काजल रोज़-रोज़ अल-सुबह उसी पुरानी डिब्बी से तेरा वो देखना तो फिर भी नया ही रहता है हरदम
...और वो जो मरून टॉप है न तेरा जिद चले जो मेरी तो रोज ही पहने तू वही अभी चार साल ही तो हुए उसे खरीदे अच्छी लगती हो उसमें अब भी सच कहूँ, तो सबसे अच्छी
सुनो तो, ग़ालिब के शेरों से नया कोई शेर कहेगा क्या हर बार तो कमबख़्त नए मानी निकाल लाते हैं जब भी कहो जब भी पढ़ो
बहुत भाता है
बेशक पुराना मुझको अच्छा लगे है मगर तेरा ये
रोज़-रोज़ नया दिखना...
नए साल का छप्पर लगे दो हफ़्ते गुज़र गये, मगर बीता साल है कि अब भी टपक रहा है कई-कई जगहों से बारिश की बूंदों के जैसे| बीस-बारह{2012} की ये पहाड़-सी ऊँचाई शायद घिस-घिस कर कम लगने लगे इसी पुराने के टपकते रहने से| आमीन...!!!