15 December 2008

जरा-सा मुस्कुरा कर जब मेरी बेटी मुझे देखे...

अभी उसी दिन तोरूपम जी ने अपने ब्लौग पर एक बड़ी ही प्यारी गज़लनुमा कविता सुनायी थी अपनी नन्हीं बेटी की बाल-कारगुजारियों पर.पढ़ कर एक अपना शेर याद आया.सुनाना चाहता हूँ.लेकिन साथ में शेष गज़ल भी सुननी होगी.

बहर है:- बहरे हज़ज मुसमन सालिम
वजन है:- १२२२-१२२२-१२२२-१२२२

उठेंगी चिलमनें अब तो यहाँ तू देख किस-किस की
चलो खोलो किवाड़ें,दब न जाये कोई भी सिसकी

जलूँ जब मैं, जलाऊँ संग अपने लौ मशालों की
जलाये दीप जैसे जब जले इक तीली माचिस की

सितारे उसके भी,हाँ,गर्दिशों में रेंगते देखा
कभी थी सुर्खियों में हर अदा की बात ही जिस की

उसी के नाम का दावा यहाँ हाकिम की गद्‍दी पर
फ़सादें जो सदा बोता रहा है, यार चहुँ दिस की

हवाओं के परों पर उड़ने की यूँ तो तमन्ना थी
पड़ा जब सामने तूफां,जमीं पैरों तले खिसकी

अगर जाना ही है तुमको,चले जाओ,मगर सुन लो
तुम्हीं से है दीये की रौशनी औ’ हुस्न मजलिस की

...और अंत में मेरी बेटी तनया{मेरी इकलौती मुकम्मल गज़ल} के लिये

जरा-सा मुस्कुरा कर जब मेरी बेटी मुझे देखे
थकन सारी मैं भूलूँ यक-ब-यक दिन भर के आफिस की


{मासिक पत्रिका "आजकल" के जून 2010 वाले अंक में प्रकाशित}

23 comments:

  1. पुत्री के प्रति भाव बहुत सुन्दर है ! शेष , गोतम जी हम इस हुनर के बारे मे बिल्कुल अनाडी हैं ! आपकी गजल कहने की भावना से ही हमको तो ये लाजवाब लगी बाकी फ़ैसला तो गुरुजी के हाथ ही है !

    राम राम !

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  2. इस सुंदर गजल के लिये आप का धन्यवाद

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  3. BACHCHE KI MUSKURAHAT SE DIL DIMAG KO SUKUN OR NAI URJA MILTI HAI. KASH ! WO HANSE RAHEN BAS. NARAYAN NARAYAN

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  4. आख़िरी शेर सबसे सुंदर :-)वज़न-बहर सब दुरुस्त मेरे अपने ख़्याल से।

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  5. बहुत ज़्यादा समझ तो नही है,मगर आपकी रचना बहुत अच्छी है।

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  6. behad khoobsoorat. khas taur se aakhiri sher.

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  7. गौतम जी /दब न जाए कोई भी सिसकी बिल्कुल आज की जरूरत है /अब तो सभी को मसालें जलानी होंगी /अदा भी आखिर कब तक सुर्खियों में रहेगी खोटे काम होंगे तो सितारे गर्दिश में होंगे ही ""जैसे करनी वैसी भरनी ""/वाकई ऐसा ही हो रहा है वो ही जज और वही फरियादी भी/पैरों तले जमीन खिसके गी ही आखिर कब तक ऊँट पहाड़ के नीचे नहीं आएगा /जब शमा की रौशनी उनसे है तो भला क्यों जायेंगे / बिल्कुल सही है तेरे पास आके मेरा वक्त गुजर जाता है दो घड़ी के लिय गम जाने किधर जाता है और फिर बिटिया हंस कर देख ले तो उस वक्त इन्द्रासन को भी ठोकर मारने को जी करे

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  8. बेटी वाले शेर के साथ दो लोगो की याद आई एक अपनी niece की दूसरी अपने बाबूजी की.....!

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  9. जबरदस्त ग़ज़ल है.. वाकई

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  10. सच में बहुत खूब......कभी मैंने भी अपने बेटे पर कुछ लिखा था....



    नन्हा शायर

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  11. वाह... गौतम जी, वाह.. बधाई और हां व्यस्तता लगभग खत्म हैं. आपका भेजा धनादेश व हिंदुस्तान दोनों मिल गये. कल परसों में कोरियर भेज रहा हूं.

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  12. She'r number 3, 4 and 6 are great!!

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  13. नमस्कार गौतम जी,
    बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल लिखी है आपने, हर शेर अपने हिस्से की कहानी कह रहा है मगर आखिरी शेर ने क़यामत ढा दी है.

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  14. वाह राजरिशी भाई वाह

    ज़रा सा मुस्कुरा कर मेरी बेटी मुझे देखे,
    थकन भूलूं मैं यक-ब-यक दिन भर के ऑफिस की।

    सारे शेर मुकम्मल हैं लेकिन आखिरी वाला कमाल

    बिटिया हमारी ख़ुश रहे।

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  15. आला ग़ज़ल है - शुरू से आखिर तक।
    एक दो जगह बहुत छोटी सी बातें हैं जिन्हें नज़रअन्दाज़ भी किया जा सकता है। फिर भी आपको ईमेल में भेज दूंगा।

    बिटिया को हमारी तरफ़ से ढेर सारा प्यार।

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  16. गौतम जी आप की पूरी ग़ज़ल बेहतरीन है...हर शेर लाजवाब...लेकिन हासिल-ऐ-ग़ज़ल शेर तो बेटी वाला ही है...इश्वर उसे हमेशा खुश रखे...
    नीरज

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  17. बहुत अच्छा लिखा है .और ऊपर से भावनाएं सोने में सुहागा का काम कर रही हैं ,
    बधाई .

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  18. huzoor ! ek bahot hi kaamraab ghazal pr mubarakbaad qubool farmaaeiN. itne mushkil, nayaab aur ghair.shaayrana qaafiye kis khoobsurti se nibhaye haiN aapne !
    Aur iss radeef "ki" ko anjaam dena
    to bs aap hi ka kamaal hai.
    Ye aapke liye...
    "khyaalo.lafz maanakhez haiN,
    parvaaz umdaa hai ,
    k 'gautam' tk pahunch jaae,
    yahi aawaaz 'muflis' ki "
    ---MUFLIS---

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  19. ज़रा सा मुस्कुरा कर मेरी बेटी मुझे देखे,
    थकन भूलूं मैं यक-ब-यक दिन भर के ऑफिस की।


    आपकी बेटी को ढेरों आशीष....!!

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  20. वैसे तो पूरी गजल ही सुंदर है पर बेटीवाला शेर तो लाजवाब है। इतने दिनों बाद आना हुआ पर आनंद आ गया।

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  21. भाई बहुत सुंदर,

    माचिस की तीली वाला शेर और बिटिया वाला शेर बहुत पसंद आया.

    आपको बढ़िया लिखने हेतु शुभकामनाएं और तनया को ढेर सारा स्नेह.

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