25 February 2009

मैं सिपाही-सा डटा हूँ मोरचे पर, गौर कर...

एक गज़ल पेश है। कई दिनों से उलझी-पुलझी पड़ी सी थी कोने में। "मुफ़लिस" जी की नजर पड़ी तो साफ-सुथरी हो कहने लायक बन पड़ी है।

बहर है--> बहरे रमल मुसमन महजूफ़
वजन है--> २१२२-२१२२-२१२२-२१२ {३ X फ़ायलातुन + १ X फ़ायलुन}

कितने हाथों में यहाँ हैं कितने पत्थर, गौर कर
फिर भी उठ-उठ आ गये हैं कितने ही सर, गौर कर

आसमां तक जा चढ़ा संसेक्स अपने देश का
चीथड़े हैं फिर भी बचपन के बदन पर, गौर कर

जो भी पढ़ ले आँखें मेरी, मुझको दीवाना कहे
तू भी तो इनको कभी फुर्सत से पढ़ कर गौर कर

शहर में बढती इमारत पर इमारत देख कर
मेरी बस्ती का वो बूढा कांपता 'बर', गौर कर

यार जब-तब घूम आते हैं विदेशों में, मगर
अपनी तो बस है कवायद घर से दफ्तर, गौर कर

उनके ही हाथों से देखो बिक रहा हिन्दोस्तां
है जिन्होंने डाल रक्खा तन पे खद्दर, गौर कर

इक तेरे 'ना' कहने से अब कुछ बदल सकता नहीं
मैं सिपाही-सा डटा हूँ मोरचे पर, गौर कर

....आभारी हूँ आप सब के सतत स्नेह और शुभकामनाओं के लिये। त्रुटियों से अवगत करा कर अनुग्रहित करें।

(जोधपुर से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका "शेष" के जुलाई-सितंबर 09 अंक में प्रकाशित)

44 comments:

  1. हर शेर उम्दा गौतम।

    यार जब तब घूम आते हैं विदेशों में मगर
    अपनी तो बस है कवायद घर से दफ़्तर ग़ौर कर
    :-)

    चीथड़े हैं फिर भी बचपन के बदन पर, ग़ौर कर...क्या बात है।

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  2. गुजरी है 'मुफलिस' की नज़रों से जो 'गौतम' की ग़ज़ल ,
    वज़्न-ओ-बहरें छोड़ दे बस तू कथन पर, गौर कर.
    जब मुफलिस जी की गलियों से होकर आई है तो बेशक बेखटका ग़ज़ल ही है.........
    ख्याल आपके दुनिया जहां से अलग होते ही हैं......जिनसे हम लोग बेहद अपनेपन के साथ जुड़ जाते हैं..हर शेर में नया बयान.....नयी चिंगारी....मतले से लेकर आखिर तक उम्दा ख्यालों की रवानी ......सुबह सुबह लाजवाब तोहफा मेरे लिए.....

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  3. ... बहुत-ही प्रभावशाली व प्रसंशनीय गजल है,कुछ पंक्तियाँ तो बेजोड हैं।

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  4. यार जब तब घूम आते हैं विदेशों में मगर
    अपनी तो बस है कवायद घर से दफ़्तर ग़ौर कर
    umdaa sher hai.

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  5. बहुत अच्छे गौतम भाई,बहुत अच्छे।दिल को छू गई आपकी गज़ल्।

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  6. जो भी पढ़ ले आँखे मेरी मुझको दीवाना कहे
    तू भी कभी इनको कभी फुर्सत से पढ़ कर गौर कर

    बहुत खूब हर एक शेर ..यह बहुत पसंद आया शुक्रिया

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  7. राग रागनियों से नाबकिफ ,केवल शब्द और अर्थ तक ही सीमित हूँ /(१) दरवाजों के शीशे न बदल बाइए नजमी ,लोगों ने अभी हाथ के पत्थर नहीं फैंके /(२) इनके पैबंद लगे कपडे ये गवाही देते ,इनके आदर्शों में पैवंद नहीं ;होते है /(३) मुमकिन है कल ,जुबानों कलम पर हो बंदिशें ,आँखों को गुफ्तगू का सलीका सिखाइए /(४) कांपता बर से मेरी समझ में "बरगद "का ब्रक्ष आरहा है संभवत आपका कोई और अर्थ हो /देश अहित के लिए अब तो किसी पोषक विशेष को दोषी नहीं ठहराया जा सकता /मोर्चे पर डट जाने के बाद अब कुछ नहीं बदल सकता इसी दृढ निश्चय की आज अत्यंत आवश्यकता है

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  8. उनके ही हाथों से देखो बिक रहा हिन्दोस्तां
    है जिन्होंने डाल रक्खा तन पे खद्दर, गौर कर
    " bhut sundr or shi abivykti..."

    Regards

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  9. बहुत लाजवाब गौतम जी. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  10. गज़ल तो बढिया है ही.
    बहर और वज़न के बारे में विस्तार से सिखाने वाले लेख ज़रूर लिखियेगा - ऐसी लेखमाला की बहुत दरकार है - ऐसा कंटेंट उपलब्ध नहीं है.
    क्या बिना उर्दू सीखे [यानी लिपि सीखे बिना] बहर और वज़न की समझ पाई जा सकती है?

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  11. बहुत ख़ूब ज़िन्दगी पिरो दी अल्फ़ाज़ में

    ---
    गुलाबी कोंपलें

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  12. उनके ही हाथों से देखो बिक रहा हिन्दोस्तां
    है जिन्होंने डाल रक्खा तन पे खद्दर, गौर कर
    बहुत ही सुंदर लगी आप की यह कविता, खास कर एक फ़ोजी के हाथो लिखी कविता, ओर आप ने सच उडेल दिया, अपनी इस कविता मै.
    धन्यवाद

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  13. उनके हाथों से देखो बिक रहा हिंदुस्तान...
    है जिन्होंने दल रखा तन पे खद्दर, गौर कर...
    बहुत सुंदर...
    अंतिम पंक्तियाँ बहुत असरदर हैं...
    तुम्हारे भाई जैसा
    मीत

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  14. उनके ही हाथों से देखो बिक रहा हिन्दोस्तां
    है जिन्होंने डाल रक्खा तन पे खद्दर, गौर कर

    वाह वाह गौतम जी
    शान दार ग़ज़ल, हर शेर में कुछ नयापन है, सची बात कहता हुवा है हर अल्फाज़ आपका. रही त्रुटी की बात........मैं तो मानता हूँ नया ख्याल, नयी चीज, नए विचार में कोई त्रुटी हो ही नहीं सकती, और आप तो माहिर हैं इस फन के. बेहतरीन अल्फाज़ है इस ग़ज़ल के, बहुत बहुत बधाई इस के लिए. आपसे मुलाक़ात याद आ गयी.

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  15. aap likhte hain bahut hi khoobsurat gaur kar,
    humko aise ainon ki
    hai zaroorat gaur kar

    ek se badh kar ek umda.

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  16. गौतम जी देर से आया माफ़ी चाहूँगा ,अब तक इतनी बेहतरीन ग़ज़ल से महरूम रहा जुल्म है जैसे पाप किया हो.हर शे'र जैसे खुद में एक ग़ज़ल हो .. किस शे'र पे क्या दाद हूँ समझ नहीं आरहा है मुझे तो... हर शे'र मुकम्मल जनाब ... बस ढेरो बधाई कुबूल करें.....


    अर्श

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  17. उनके ही हाथों से देखो बिक रहा हिन्दोस्तां
    है जिन्होंने डाल रक्खा तन पे खद्दर, गौर कर

    satya vachan

    आपका venus kesari

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  18. बहुत अच्छी ग़ज़ल है गौतम जी। 'रमल' मेरी भी मनपसंद बहर है। बड़े आला और निराले ख़यालों से सजी ग़ज़ल
    पढ़ने में आनंद गया।

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  19. त्रुटिया है या नहीं है ये देखना उनका काम होता है जिन्हें ग़ज़ल का रस नहीं लेना है, बस चीरफाड़ करनी होती है. मुझे तो गौतमजी रस लेना है. आनंद लेना है, ..फिर आपकी ही पंक्ति है.
    "एक तेरे 'ना' कहने से अब कुछ बदल सकता नहीं..." जो लिख दिया सो लिख दिया ..
    जो लिखा है वो लाज़वाब है..मज़ा आगया ग़ज़ल का रसपान करने में.

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  20. उनके ही हाथों से देखो बिक रहा हिन्दोस्तां
    है जिन्होंने डाल रक्खा तन पे खद्दर, गौर कर

    इक तेरे 'ना' कहने से अब कुछ बदल सकता नहीं
    मैं सिपाही-सा डटा हूँ मोरचे पर, गौर कर
    .....aaina rakh diya desh ke aage vartmaan ka......bahut jabardast

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  21. गौतम भाए कमाल की ग़ज़ल कही है। बहुत ही बढिया तेवर नज़र आए हैं। लगता है इन दिनो पूरी फॉर्म में है अच्छी रचना के लिए बधाई।

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  22. आसमां तक जा चढा सेंसेक्स अपने देश का
    चीथड़े हैं फिर भी बचपन के बदन पर गौर कर.

    गौतम भाई...ऐसा शेर कहने के लिए बरसों की तपस्या चाहिए...क्या कमाल किया है आपने...वाह भाई वा...ग़ज़ल पढने जरा देर से पहुंचा लेकिन सच कहूँ मजा आ गया...बधाई मुफलिस साहेब को जिनकी रहनुमाई में आप इतनी खूबसूरत ग़ज़ल कह पाए...
    नीरज

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  23. Great rhythm and makta is simply amazing! Congrats!

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  24. PRAKAASH JI,
    INHE MAT KAHIYE KE IN DINO POORI FORM ME HAIN....IN KI FORM ALAG HI HOTI HAI.....PATAA LAGE KI PADOSI MULK KI SARHAD PAR JAAAKER ......
    HA..HA...HA...HA..

    PATAAA NAHIN BAAROOD SE KHELNE WAALE ITNAA KAISE SOCH LETE HAIN...

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  25. हर शेर बेहद उम्दा लगा.
    ग़ज़ल की तारीफ में यही कहुन्फी आप को पढना सुखकर लगा.
    ख्यालों में ताजगी और रवानगी खूब है!बधाई

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  26. हर शेर उम्दा है. आख़िरी शेर दृढ मनोबल का परिचायक है.साधुवाद.

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  27. बेहतरीन ग़ज़ल है भाई गौतम जी.... इस बार तो हो जाये कुछ..

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  28. kai ghazals to aapki pehle hi padh li thi par aaj fursat se poora blog padha......,abhi har post main tipyana shuru kar raha hoon....

    .....maza aa gaya.....

    meri fitrat kya rahi ab kya kahein kya na kahein?
    per ke hi naap si buni thi chadar,gaur kar.

    kashtiyon main jaana kabhi seekha nahi galib magar ,
    kaise jayein ishq-e-dariya mein tere ter kar,gaur kar.


    tiri nazmo ki 'gautam' ye nacheez kya misaal de?
    har sher khud hi keh raha hai,gaur kar,gaur kar.

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  29. पहली बार आपके ब्लॉग पर आई हूं बहुत ही खूबसूरत गज़ल पढ़वाई आपने। धन्यवाद

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  30. पहली बार आपके ब्लॉग पर आई हूं बहुत ही खूबसूरत गज़ल पढ़वाई आपने। धन्यवाद

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  31. पहली बार आपके ब्लॉग पर आई

    बेहतरीन अल्फाज़ है ...
    उनके ही हाथों से देखो बिक रहा हिन्दोस्तां
    है जिन्होंने डाल रक्खा तन पे खद्दर, गौर कर
    ....
    चीथड़े हैं फिर भी बचपन के बदन पर, ग़ौर कर...क्या बात है।

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  32. यार जब तब घूम आते हैं विदेशों में मगर
    अपनी तो बस है कवायद घर से दफ़्तर ग़ौर कर

    -क्या कहने..बहुत खूब!!

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  33. Gautam ji ,
    bahut achchhee gajlen likhte hain.ye gajal bhee achchhee banee hai.badhai.

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  34. रोज ही लारा लप्पा देना, हमको नहीं कबूल,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,मुबारक,,,,
    १३ मार्च
    aaj anaam tippanni kaa mood ban gayaa,,

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  35. जो भी पढ़ले आँख मेरी मुझको दीवाना कहे,
    तू भी तो इन को कभी फुरसत से पढ़ कर गौर कर

    क्या बात है...!
    कुछ देर हो गई..! क्षमा,,!

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  36. जो भी पढ़ ले आँखें मेरी,मुझको दीवाना कहे
    तू इनको कभी फुर्सत से पढ़ कर गौर कर

    वाह वाह ...गौतम जी इस शेर को पढ़ कर तो एक गीत याद आ गया...आँखें ही मिलाती हैं जमाने में दिलों को
    अन्जान हैं हम तुम अगर अनजान हैं आँखें ....

    इक तेरे न कहने से अब कुछ बदल सकता नहीं
    मैं सिपाही सा डटा हूँ मोर्चे पर गौर कर ...ये हुई न फौजियों वाली बात ....बहोत खूब....!!


    वाह वाह जी

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  37. नमस्कार गौतम जी,
    उम्दा ग़ज़ल है.................
    कुछ शेर मुझे बहुत बहुत अच्छे अलगे जैसे...............
    "जो भी पढ़ ले.....", "..........मैं सिपाही सा. .." और सेंसेक्स वाला...............

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  38. waah !
    bahut hi achha lehjaa...aapka
    bahut hi umdaa andaaz...aapka
    bahut hi steek khyaal...aapka
    bahut hi murassa lafz...aapke
    ek bahut achhi gazal....aapki

    meri jaanib se to bs dheroN duaaeiN
    aur khaaaas badhaaaaaeeeee...!

    ---MUFLIS---

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  39. बहुत सुंदर! देर से पढ़ा पर आनंद इतना आया कि पूछिये मत। हर शेर लाजवाब!

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  40. I am new here, glad to join you.

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  41. बहुत जानकारीपूर्ण पोस्ट . समय लेने के लिए हमें के साथ अपने विचार साझा करने के लिए धन्यवाद .

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