27/12/10

चिल्ले कलाँ और ग़ालिब

अपने सकुचाये सिमटे साहिलों के बीच में सिकुड़ी हुई झेलम एक अजीब तल्खी से अम्बर को निहारती पूछती है...चिल्ले कलाँ* तो शुरू हो गया, अब कब बरसाओगे बर्फ के फाहे? अम्बर का विस्तार उसकी रहस्यमयी खामोशी को तनिक और तिलिस्मी
बनाता है और पूरी वादी झुंझलायी-सी चिहुँक उठती है अम्बर के इस अकड़ी ऐंठ पर। अम्बर ऐंठा है कि कम्बख्त बादलों को तो फुरसत ही नहीं, फिर मुझे क्या पड़ी है। सूरज संग चुहलबाजी में उलझे बादलों की नजर न वादी की झुंझलाहट भरी चिहुँक पर है और न ही सिमटी झेलम की तल्खी पर। मसला अम्बर और बादलों के अंह-टकराव का है और दोष दिया जा रहा है जग भर में ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण-प्रदूषण के नाम इंसानों पर, इस साल-दर-साल वादी में विलंबित होती बर्फबारी का।

अल सुबह रोज एक युद्ध होता है स्व से। गर्म स्लिपिंग बैग से बाहर निकलने की जद्दोजहद किसी युद्ध से कम नहीं। जिलेट सेंसर का ब्लेड, मग भर खौलते पानी में डूबे रहने के बाद एकदम से इंकार कर देता है बाहर निकलने से और फिर मग की सकून भरी गर्माहट से जबरदस्ती निकाले जाने पर अपना आक्रोश, वो कमबख्त ठिठुरते गालों और कंपकपाती ठुड्ढ़ी पर बेरहमी से उतारता है। सीजीआई सीट के छप्पर पर रात भर ठाठ से पसरा हुआ पाला, बादलों की चुहलबाजी से निजात पाये सूरज की बेरहमी पर कुनमुनाता है और टपकता हुआ कमरे की बाहरी दीवारों और दरीचे के शीशों को अपने आगोश में ले लेता है।

दिन तनिक फुरसत वाले हैं और रातें थोड़ी चैन वाली कि सर्दी "उन" सरफिरों को भी तो लगती है ...और इन फुरसती दिनों, इन चैनी रातों में ब्लौग-भ्रमण के लिये कमप्यूटर के की-बोर्ड की तमाम गलियों, सारे मोड़ों की वैसे तो अभ्यस्त ऊँगलियाँ, दस्ताने में छुपी होने की बदौलत तनिक लड़खड़ाती चलती हैं इन गलियों और मो़ड़ों पर। ब्लौग-जगत में भी जैसे ये कश्मीर वाला चिल्ले कलाँ अपनी अपरिभाषित-सी मनहूसियत लिये पसरा हुआ है। इन्हीं किसी भ्रमण के दौरान कलम का एक सिपाही कहीं कोई सच्ची बात कहता नजर आता है और फिर नजर आती है पूरे ब्लौग-जगत की तिलमिलाहट। चलो, इसी तिलमिलाहट के बहाने ये पसरी हुई मनहूसियत थोड़ी खिलखिलाती दिखाई देती है...संग-संग दस्ताने में छुपी ऊँगलियों को भी हँसी आती है और हँसते हुये वो की-बोर्ड पर लड़खड़ा कर कुछ संभलती हुई, कलम के उस सिपाही को और उसकी सच कहने की जिद्दी-सी जिद को सैल्यूट करती हैं।

...अब इन अनर्गल से अलापों का अंत है कोई? है ना, अंत यूँ है कि मेरा ख़ुदा- मेरे जैसे कितने ही अल्हड़ उन्मादियों का ख़ुदा- जो आज जिंदा होता तो दो सौ तेरह साल का होता। तो सुख़नवरी के उस खु़दा को उसके जन्म-दिवस पर याद करते हुये इन अनर्गल अलापों को अवकाश देता हूँ:-

हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता


{*चिल्ले-कलाँ = दिसम्बर के उत्तरार्ध से लेकर जनवरी के आखिर तक चालिस दिनों का कश्मीर वादी के सबसे सर्द दिनों वाला मौसम}

58 टिप्पणियाँ:

इस्मत ज़ैदी said...

क्या बात है !
मंज़रकशी अगरी यूं की जाए तो उस का मज़ा ही अलग है,बेजान चीज़ों में जान डाल देने की कला हर किसी में नहीं होती
बहुत सुंदर !

प्रवीण पाण्डेय said...

इतनी ठंड में तो और भी बहुत चीजें काम करने से मना कर देती हैं।

सतीश सक्सेना said...

बापरे आपकी यह रचना पढ़कर और ठण्ड लगने लगी .....
हम तो आपको सिर्फ शुभकामनायें देकर दुबारा रजाई में घुस रहे हैं मेजर !

Himanshu Tandon said...

Couldn't have been a better description of the weather. Hats Off Sir.

प्रज्ञा पांडेय said...

इतनी ठंढ में ग़ालिब को याद करके अपने गुलाबी गरमी का चर्चा कर दिया .महान शायर को मेरा भी नमन
बधाई .

नीरज गोस्वामी said...

"सीजीआई सीट के छप्पर पर रात भर ठाठ से पसरा हुआ पाला, बादलों की चुहलबाजी से निजात पाये सूरज की बेरहमी पर कुनमुनाता है और टपकता हुआ कमरे की बाहरी दीवारों और दरीचे के शीशों को अपने आगोश में ले लेता है "

कौन कह सकता है ये पंक्तियाँ एक फौजी ने लिखी होंगीं...लेकिन एक फौजी ने ही लिखी हैं...ऐसे फौजी ने जिसके सीने में एक संवेदनशील दिल धडकता है...ये प्यारा फौजी इसीलिए तो हम सब का दुलारा है...हम सब को अपनी कलम के जादू से ख़ुश रखने वाले गौतम तुम हमेशा ख़ुश रहो....
दिल कर रहा है तुम्हारे सामने आकर तुम्हें एक जोरदार सेल्यूट दूं...मेरे जैसे सिविलियन का तुम्हारे इलाके में आकर ये सब कर पाना संभव है क्या ?? बताना..

नीरज

anshumala said...

ऊफ पोस्ट पढ़ कर तो यहाँ मुंबई में भी ठण्ड का एहसास होने लगा |

Kishore Choudhary said...

ब्लॉग-जगत का कश्मीर वाला चिल्ले कलाँ वस्तुतः सफ़र का अलसाया हुआ पड़ाव है... फिर कभी किसी सुनहरी बालों वाली दोशीज़ा का फोन आएगा तो कई कहानियों और ग़ज़लों के सोते फूट पड़ेंगे.

परमजीत सिँह बाली said...

चलो कुछ देर तक इस पोस्ट ने हमे भी रजाई से बाहर रखा....अब लगता है हिम्मत आ गई है ब्लोग जंगल मे घूमने की।आपकी पोस्ट पढ़ कर ही ऐसा हुआ लगता है।आभार।

कंचन सिंह चौहान said...

बिंबों का कितना बढ़िया प्रयोग किया है। वाक़ई मुझे भी लगा कि फौजी ने ही लिखा है क्या किसी इस पोस्ट को।

सच बोलने वाले हमेशा झक्की होते हैं। चीजों को अनदेखा करना समझदारी है हुज़ूर...! कहाँ सैल्यूट मार दिया ?

दो सौ तेरह साल के खुदा को याद रखने वाले मेरे भाई। आज चार साल की एक परी का भी जनमदिन है, आपकी वो गज़ल, जिस गज़ल का मिसरा आप ने बस लिख दिया और मेरी भौजाई बड़े प्यार से, बिना उसके भावों से छेड़ छाड़ किये बहर में लाने की कोशिश कर रही हैं। कभी काफिया बैठाती हैं और कभी रदीफ और इस बीच कही अगर गज़ल अनमनी लगने लगे तो छोड़ ही देती हैं कुछ दिनों को उसे उसी तरह....!!

ईश्वर उस गज़ल को लंबी उम्र दें...!

सागर said...

स्वागत !...
बहुत सुन्दर .... एकबारगी लगा बातें ऐसे बह रही है कहीं अज़दक का ब्लॉग तो नहीं खुल गया... बिम्ब भी गिरे से जा रहे हैं... लेकिन आक्रोश, जिलेट सेंसर, सरफिरे और वादी ने संभाला ... यह आमद खूब रही... लड़ रहे है अभी भी कुछ लोग सच के लिए ... लेकिन शर्त है ये कि ... जाने दें यह शर्त अपने आप दिखने लगता है ... खैर..

अभी तो रहना होगा ना ?

richa said...

वाह !! मेजर साहब शब्दों से क्या खूब पेंटिंग करी है आज तो... लग रहा है झेलम किनारे बैठी उसकी तल्ख़ी महसूस कर रही हूँ... और सोच में पड़ गई हूँ क्या मसला वाकई अहम के टकराव का है ?

अजेय said...

"अल सुबह रोज एक युद्ध होता है स्व से। गर्म स्लिपिंग बैग से बाहर निकलने की जद्दोजहद किसी युद्ध से कम नहीं। जिलेट सेंसर की ब्लेड, मग भर खौलते पानी में डूबे रहने के बाद एकदम से इंकार कर देती है बाहर निकलने से और फिर मग की सकून भरी गर्माहट से जबरदस्ती निकाले जाने पर अपना आक्रोश, वो कमबख्त ठिठुरते गालों और कंपकपाती ठुड्ढ़ी पर बेरहमी से उतारती है। ....."मैं समझ सकता हूँ इस युद्ध को. जमे रहो दोस्त! हमे अपने साथ समझो. अड़े रहो ! यह एक अंत हीन युद्ध है ..... नो सीज़ फायर !

वन्दना said...

इसी जज़्बे को तो सलाम है।

manu said...

मोबाइल पर सिर्फ शुरू की ३--४ लाइन ही पढ़ी जा रही थीं..इस शब्द ''चिल्ले-कलां'' ने इस क़दर परेशान किया कि कंप्यूटर पर टेम्परेरी इंटरनेट का जुगाड़ करना ही पडा....ग़ालिब को और ग़ज़ल को जन्मदिन मुबारक हो...


ठण्ड का ऐसा नजारा पेश किया है मेज़र साहिब ...सोरी (मगर ये मेज़र कहने की आदत भी जाते जाते जायेगी) कि जी चाहता है कि आपके सामने ओल्ड मोंक से भरे दर्जन भर ग्लास लेकर बैठ जाएँ.....और इन फुर्सत के पलों में बर्फ के फाहे गिरने का इंतज़ार करें आपके साथ.....

ग़ालिब अंकल तो आजकल ज़रा जमना-पार गए हुए हैं.....

बैठते हैं फिर आज शाम अकेले ही...


चीयर्स...............!!!

रंजना [रंजू भाटिया] said...

पूरा चित्र आँखों में सामने आ गया आपकी लफ़्ज़ों की कारीगिरी से ...और लगा फिर से वापस वही पहुँच गए है :)

rashmi ravija said...

"दिन तनिक फुरसत वाले हैं और रातें थोड़ी चैन वाली कि सर्दी "उन" सरफिरों को भी तो लगती है ."
उन सिरफिरों को बारहा सर्दी लगती रहे....आप दास्ताने पहने की-बोर्ड खटखटाते रहें

daanish said...

जेहलम ........
वो अलसाई-सी जेहलम
जो हर बार अपने जिस्म पर
हवा के हर झोंके का लम्स पा कर
इतरा भी जाती होगी,,तिलमिला भी जाती होगी,,
अम्बर...
उसके हर सवाल का
लुत्फ़ लेने की कारगर कोशिश करता
हर बार बादल के टुकड़ों की जानिब ही इशारा कर देता होगा ,,,
सूरज महाशय
तो बस ,,, नसीहत दे-दे कर
लिका छिपी में मशगूल रहते होंगे ,,,,
बर्फ के फाहे...
या
सुनहरी बालों की उलझनें...
(मालूम है)
दस्तानों में छिपी उँगलियों को छू लेने को
बेताब रहती ही होंगी ,,,
उन सब के साथ ही
मिल कर निकली कोई ऐसी सदा भी तो
रक्स करती होगी इन चिल्लेकलां की फिजाओं में ...

खबर मोरी ना लीन्ही रे...........!!

daanish said...

और हाँ !!
ग़ज़ल के लिए जनम दिन की
ढेरों ढेरों ढेरों
शुभकामनाएं और आशीर्वाद !!!


'दानिश' भारती

देवेन्द्र पाण्डेय said...

कमाल का लेखन।
..वाकई इस पोस्ट को पढ़कर विश्वास हो गया कि शायर कब्र में बैठकर भी गालिब को याद कर रहे होंगे।

कंचन सिंह चौहान said...

यूँ ऐसा कभी करती नही हूँ, मगर दानिश जी की नज़्म पर दाद देने से खुद को रोक नही पाई। शब्द कम हैं, नज़्म की प्रशंसा को... बार बार पढ़ी जायेगी, नई टिप्पणियों की खोज के साथ...!

sanjay vyas said...

कलम की स्याही का प्रवाह और उसका गुनगुनापन बना रहे.और आप अक्सार आते रहें हमारे सामने.

अभिषेक ओझा said...

यूँ तो वैसे ही समझ में नहीं आ रहा था क्या कहें. दानिशजी की टिपण्णी देख कर मामला और कूल हो गया.

shikha varshney said...

एक एक पंक्ति जैसे किसी कविता की हो.
क्या लिखा है ..कमाल..

दर्पण साह said...

http://www.youtube.com/watch?v=PNQNUQ6Spog



:)

V/S

http://www.youtube.com/watch?v=u4NKZqnKh5o

:(

&

http://www.youtube.com/watch?v=xbfSVLSR8O4

दर्पण साह said...

http://www.youtube.com/watch?v=NrqWsc4qsU8

...दिल्ली में रहें, खायेंग क्या?

इस्मत ज़ैदी said...

४ साल की उस परी को भी ढेर सारी शुभकामनाएं,आशीर्वाद और प्यार
धन्यवाद कंचन बताने के लिये
और
दानिेश साहब की नज़्म के लिये क्या कहा जाए !!
उस की खूबसूरती की तारीफ़ के लिये पहले अल्फ़ाज़
तो मिलें

शिवम् मिश्रा said...

चाचा ग़ालिब के जन्मदिन को याद करने वाले इस शायर दिल फौजी को सलाम !!

कमाल हो यार आप ... एक तरफ तो ... एक सच्चे शायर की तरह अपने खुदा को याद कर लिया ... दूसरी तरफ ... एक सच्चे फौजी की तरह अपनी निजी ज़िन्दगी की इतनी बड़ी ख़ुशी छुपा ली !!

अगर कंचन जी विकिलिंक्स की तरह का यह खुलासा नहीं करती तो हमें तो पता ही नहीं चलता बिटिया के जन्मदिन के बारे में !

हद करते हो मेजर ... कभी कभी !!

सुशीला पुरी said...

इस सादगी पे कौन न मर जाए अय खुदा ,
लड़तें हैं और हाथ में तलवार भी नहीं !

शिवम् मिश्रा said...

हमारी नन्ही परी तनया को ढेर सारा प्यार और बहुत बहुत आशीर्वाद !

हैप्पी बर्थडे टू यू , तनया बेटा !!

वीनस केशरी said...

कर्नल साहब इरादे स्पष्ट हैं :)

आपकी पोस्ट पढ़ने के बाद शाम से ४ पैग शायरी का नशा चढ़ा हुआ है १२ बज रहे हैं और खुमारी बढती जा रही है
सुबह जो हाल रहता है रिपोर्ट करूगा
बेजान चीजों में जान डाल देने की आपकी अदा
ज़िंदाबाद, ज़िंदाबाद

ग़ालिब साहब को हेप्पी बड्डे
ज़ी न्यूज़ में ग़ालिब साहब पर आधे घंटे की स्टोरी देखी
आज बहुत दिन बाद न्यूज़ चैनल में कोई बढ़िया प्रोग्राम देखने को मिला

वीनस केशरी said...

मैंने सोचा की देखा जाए की आपके लिखे में ऐसा क्या होता है की लेख से भी शाईरी का नशा हो जाता है
आपके लिखे शुरू के कुछ शब्द निचोड़े तो रजज के दो शेर पूछने लगे भई, क्यों परेशान कर रहे हो

पहले सोचा इन्हें आपके ब्लॉग से चुरा लूं और किसी पत्रिका में अपने नाम से भेज दूं फिर सर्वाधिकार सुरक्षित की बात पढ़ कर पूरी ईमानदारी से यहीं पर छोड़े जा रहा हूँ

सकुचाए सिमटे साहिलों, के बीच में सिकुड़ी हुई
झेलम अजब तल्खी से अम्बर को सुना बहती रही

चिल्ले कलां तो आ गया मिलाती नहीं फुर्सत इन्हें
सूरज करे अठखेलियाँ, वादी दिखे झुंझलाई सी

सादर
आपका वीनस

वीनस केशरी said...

और एक बात तो कहना भूल ही गया जो सबसे पहले कहनी थी
बिटिया को खूब सारा प्यार और जन्मदिन की ढेरों बधाई

गिरिजेश राव said...

@मसला अम्बर और बादलों के अंह-टकराव का है और दोष दिया जा रहा है जग भर में ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण-प्रदूषण के नाम इंसानों पर

क्या बात कह दी!

@ र वाला चिल्ले कलाँ अपनी अपरिभाषित-सी मनहूसियत लिये पसरा हुआ है। इन्हीं किसी भ्रमण के दौरान कलम का एक सिपाही कहीं कोई सच्ची बात कहता नजर आता है और फिर नजर आती है पूरे ब्लौग-जगत की तिलमिलाहट। चलो, इसी तिलमिलाहट के बहाने ये पसरी हुई मनहूसियत थोड़ी खिलखिलाती दिखाई देती है...संग-संग दस्ताने में छुपी ऊँगलियों को भी हँसी आती है और हँसते हुये वो की-बोर्ड पर लड़खड़ा कर कुछ संभलती हुई, कलम के उस सिपाही को और उसकी सच कहने की जिद्दी-सी जिद को सैल्यूट करती हैं।

सैल्यूट आप को भी सैनिक!
इस प्रात: अभी अभी लखनऊ की हसीन सड़कों पर ड्राइविंग कर के लौटा हूँ। स्टेशन से घर तक बिना ब्रेक लगाए बिना गेयर बदले 45-50 की स्पीड। विराने की खुशी आप की पोस्ट पढ़ने के बाद अपनी तासीर बदल चुकी है। साझा कर दूँ?

बिटिया को जन्मदिन पर बधाई।

सुलभ § Sulabh said...

एक लाइन में कहूँ तो - "सर्द में प्रेरणादायी पोस्ट"
जाने कैसे दिन चल रहे हैं आजकल. इस पोस्ट के दौरान आई हुई एक जॉब कन्सल्टेंट की काल को हाँ-ना के बीच में टाल दिया. आज की इंटरव्यू कैंसिल.
ये शायर लोग भी न दुसरे को सताते बहुत हैं.

सुलभ § Sulabh said...

बिटिया को जन्मदिन की बधाई भी देता चलूँ.
चलिए आज की तारीख कैद करलेता हूँ. २८-२९-३० दिसंबर मेरे लिए बच्चो को भेजी जानेवाली जन्मदिन में पहले से शुमार है.

neera said...

बिम्बों ने झेलम के पास बुला लिया और गालीब ने अतीत की देहरीयों पर बैठा दिया... यह न्यौता आता रहे यही दुआ भी है और इच्छा भी...

रंजना said...

कितना लम्बा पौज ले लिया आपने...

ख़तम हुआ कि नहीं आपका ट्रेनिंग ???

शब्दों से ऐसी स्केचिंग की है आपने कि क्या कहूँ...कलम को नजर न लगे किसी की...सलामत रहे...फले फूले खिले खिलखिलाए.....

शोभना चौरे said...

bahut khubsurt varnn .
shubhkamnaye

वन्दना अवस्थी दुबे said...

कमाल का खाका खींचा है आपने. कश्मीरी ठंड का अहसास इस मैदानी इलाके में भी हो गया. बहुत कठिन ज़िन्दगी जीते हैं आप लोग. hats off.

RC said...

A soft, soothing article that touches the heart. If the article is unchanges, i.e, almost same as it came out from the heart, which it feels is, then hats off to your writing skills!

RC

अपूर्व said...

और हमें तो जिलेट के बेचारे नाजुक से ब्लेड पर तरस आता है..मग के उबलते पानी मे अपनी लोहे की पीठ सुलगाता हुआ लुका-छिपा सा रहता होगा..डरता हुआ..कि अभी अगले ही पल सख्त सर्दी मे जबर्दस्ती पानी से निकाल कर जबरन सख्त ठुड्ढी पर बेरहमी और बेदर्दी से रगड़ा जाता होगा..बार-बार!..वो भी चेहरे को बहुत सहम-सहम के छूता होगा..कि अगर गालों ने जरा सा भी काट लिया उसे..तो ब्लेड का तो डर से खून ही निकल आये..फिर गया काम से.. ;-)

खैर शीत-निष्क्रियता से वापस आ कर सक्रिय होने के लिये शुक्रिया..और सनद रहे कि इसके बाद दोबारा लम्बी डुबकी अलाउड नही है!! :-)

और हाँ चिल्ले-कलां का थोड़ा जाड़ा इधर भी पार्सल कीजिये..यहां तो स्वेटर पहने भी जमाने हुए कम्बख्त!!:-)

खुशदीप सहगल said...

सुदूर खूबसूरत लालिमा ने आकाशगंगा को ढक लिया है,
यह हमारी आकाशगंगा है,
सारे सितारे हैरत से पूछ रहे हैं,
कहां से आ रही है आखिर यह खूबसूरत रोशनी,
आकाशगंगा में हर कोई पूछ रहा है,
किसने बिखरी ये रोशनी, कौन है वह,
मेरे मित्रो, मैं जानता हूं उसे,
आकाशगंगा के मेरे मित्रो, मैं सूर्य हूं,
मेरी परिधि में आठ ग्रह लगा रहे हैं चक्कर,
उनमें से एक है पृथ्वी,
जिसमें रहते हैं छह अरब मनुष्य सैकड़ों देशों में,
इन्हीं में एक है महान सभ्यता,
भारत 2020 की ओर बढ़ते हुए,
मना रहा है एक महान राष्ट्र के उदय का उत्सव,
भारत से आकाशगंगा तक पहुंच रहा है रोशनी का उत्सव,
एक ऐसा राष्ट्र, जिसमें नहीं होगा प्रदूषण,
नहीं होगी गरीबी, होगा समृद्धि का विस्तार,
शांति होगी, नहीं होगा युद्ध का कोई भय,
यही वह जगह है, जहां बरसेंगी खुशियां...
-डॉ एपीजे अब्दुल कलाम

नववर्ष आपको बहुत बहुत शुभ हो...

जय हिंद...

वन्दना said...

आपकी अति उत्तम रचना कल के साप्ताहिक चर्चा मंच पर सुशोभित हो रही है । कल (3-1-20211) के चर्चा मंच पर आकर अपने विचारों से अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.uchcharan.com

खबरों की दुनियाँ said...

अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । "खबरों की दुनियाँ"

ajit gupta said...

अग्रीगेटर की हड़ताल के कारण नायाब सी पोस्‍ट हमारी नजरों में आने से रह गयी। लेकिन अब हमने फोलोवर का टेग लगा लिया है, अब देखे कैसे एग्रीगेटर की लक्ष्‍मण रेखा हमें रोकेंगे? बहुत अच्‍छी पोस्‍ट है, बधाई। बहुत दिनों बाद आपको पढ़ने का अवसर मिला है।

फ़िरदौस ख़ान said...

बहुत ख़ूब...आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा...

Er. सत्यम शिवम said...

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाए...

*काव्य- कल्पना*:- दर्पण से परिचय

*गद्य-सर्जना*:-जीवन की परिभाषा…..( आत्मदर्शन)

निर्मला कपिला said...

इधर अपनी ही अँगुलियाँ जवाब दे देती हैं आप तो फिर भी बर्फ मे बैठे हो। वाकई जवानो की ज़िन्दगी बहुत संघर्षपूर्ण है और जज़्वा बेहिसाब। आपको प्र्मोशन और नये साल की हार्दिक शुभकामनायें। असल मे जिस दिन सुबीर जी की पोस्ट से पता चला था उस दिन के बाद 8-9 दिन बाद नेट पर आयी हूँ इस लिये जल्दी मुबारकवाद नही दे पाई। आप इसी तरह हर क्षेत्र मे आगे बढते रहें यही दुआ है आशीर्वाद है।

kshama said...

Aapne aankhon ke aage se manzar dar manzar ghuma diye!

ktheLeo said...

नववर्ष की मंगल कामना!

डिम्पल मल्होत्रा said...

हमारे यहाँ भी चिल्ले-कलाँ ही चल रहा है..... :)

अंकित "सफ़र" said...

आप की कलम में कोई जादुई स्याही होगी, जो हरवक्त कमाल ही करती है और मेरी दुआ है कि वो आगे भी कमाल करती रहे...........आमीन.

singhsdm said...

मेजर.....न न न न न ....सॉरी लेफ्टिनेंट कर्नल राजरिशी.....!!
क्या गज़ब की पोस्ट लिखी है.....चिल्ले कलां के बीच ग़ालिब चचा को जिस शिद्दत से याद फ़रमाया है वो बहुत ही उम्दा है.....लफ़्ज़ों की रवानगी के बीच कश्मीर के एक सिपाही के दस्तानों के बीच उँगलियों की दास्तान दिल को छू गयी.....! आपके इस दोस्त के बारे में एक पत्रिका ने एक लेख प्रकाशित किया है, लिंक दे रहा हूँ वक्त मिले तो नज़र अता कीजियेगा....!!!!!
http://www.bureaucracytoday.com/young_turks_jan_11.html

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

आपका जवाब नहीं सर जी।

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पति को वश में करने का उपाय।
मासिक धर्म और उससे जुड़ी अवधारणाएं।

शरद कोकास said...

अब तो चिल्ले कलाँ मध्यभारत तक पहुंच गया है । खूबसूरत वर्णन है ।

pallavi trivedi said...

हमारे यहाँ तो इतनी ठण्ड नहीं होती है...मगर चिल्ला जाड़ा कई बार महसूस किया है! खासकर आपकी सुबह की गर्म पानी का मग वाली बात से स्कूल के दिन याद आ गए! तब बहुत सर्दी हुआ करती थी और सुबह सुबह गर्म पानी से ब्रश करना ....तौबा तौबा! आपकी कलम से कश्मीर और भी खूबसूरत हो जाता है...

ZEAL said...

Nicely written , beautiful post !