13 September 2020

अगर फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्त

 

उम्मीद के जाने कितने ही रंग सफ़ेद बर्फ़ के फ़ाहों, चिनार की हरी और भूरी पत्तियों और रसभरे सेबों की लालिमाओं से लिपट कर एक कोई और ही नया रंग ढूँढ निकालते हैं| सुहैल आया था मिलने…अपनी नयी महंगी बाइक को इस ऊँचे पहाड़ तक दौड़ाता हुआ मेरे अड्डे पर| जाने कितने अरसे बाद मिल रहे थे हम| तीन दिन डेरा जमा कर कूच किया, यह कह कर अगली बार जब आयेगा तो तीन सौ सत्तर का हटना कश्मीर के लिए पुरानी बात हो चुकी होगी और कश्मीर भूल चुका होगा कि इस नाम के किसी परिंदे का ये गोश्त भी खाया करता था| दोस्ती हमारी इस वादी में मेरे प्रथम आगमन से ही अपनी शिनाख्त का ऐलान करती है…यानी कि बीस साल तो हो ही गए| इसकी लड़के की कहानी भी ग़ज़ब की है| विरासत में ख़ूब सारी दौलत मिली है| वालिद के पास उनके वालिद का छोड़ा हुआ जाने कितने ही एकड़ों में पसरा हुआ सेब का बगान है और साथ ही डल झील की फैली हुई बाँहों में तैरते दसियों शिकारे और एक विशाल सीमेंट की फैक्ट्री| लेकिन सुहैल को गणित के फॉर्मुलों से कुछ इस क़दर इश्क़ हुआ कि उसने इंजीनियर बनने की ठानी और कूच कर गया रूस की ओर| परिवारवालों ने भी सहर्ष सहमती दे दी कि अच्छा ही है यहाँ वादी के बौराए युवाओं से दूर रहेगा| वहाँ रसियन इंजीनियरिन्ग कॉलेज में जनाब को मुहब्बत हो गयी वहीं की एक स्थानीय बाला से| यह ख़बर जेहादियों के अकस्मात जबरन आगमन की तरह ही डर और बेचैनी लिए टपकी सुहैल के घर में और आनन-फानन में सुहैल के चाचा को रूस भेजा गया और वापस लिवा लाया गया सुहैल को कश्मीर| अब तो खैर शादी भी हो गयी है कमबख्त़ की और दो बच्चे भी हैं…हाँ, ये अलग बात है कि वह रसियन बाला साल में एक बार ज़रूर आती है दिल्ली और ये जाता है यहाँ श्रीनगर से दिल्ली किसी न किसी बहाने उससे मिलने| 

6 फीट की लम्बाई को बस चंद सेंटीमीटर से चूकता हुआ सुहैल अपनी हल्की भूरी आँखों और मुस्कुराते चेहरे के साथ ख़ूब फ़बता है| धारा तीन सौ सत्तर की हंगामाखेज विदाई के महीने भर पश्चात, जब माहौल थोड़ा व्यवस्थित हुआ तो श्रीमान कुछ दिन महीने पहले ही ख़रीदी हुई हार्ले डेविडसन को उठाये श्रीनगर से कुपवाड़ा और फिर कुपवाड़ा से यहाँ मेरे पास तक की चढ़ाई पर डुग-डुग करता आ गया| शुक्र है कि बर्फ़बारी शुरू नहीं हुई है इन ऊँचे पहाड़ों पर अभी और बॉर्डर रोड ओर्गेनाईजेशन की टीम ने हमारी इन पतली सर्पीली सड़कों को तनिक सम्मानजनक बना दिया है…जिसकी बदौलत सुहैल अहमद वानी इस बादलचुम्बी सैन्य-चौकी पर बाइक लेकर आने वाले पहले भारतीय होने का ख़िताबधारी बन गया है| उससे कहा मैंने कि “तू इतिहास में दर्ज हो गया बे!” …तो ठहाके लगाकर कह रहा था “हम कश्मीरी इतिहास बनाने के शौक़ीन होते हैं”| तीन दिन तक रहा मेरे पास वो और ख़ूब बातें हुईं उससे| तीन सौ सत्तर की अकाल-मृत्यु के बाद से सरहद पार से बढ़ी हुई अवांछित हरकतों का नज़ारा भी लिया उसने और जम कर गालियाँ निकाली उसने…शुद्ध कश्मीरी गालियाँ…सामने वाले दुश्मन पोस्ट पर चिल्ला-चिल्ला कर| 

इतिहास वाली बात यूँ तो मज़ाक में कही थी उससे, लेकिन ये सत्य है कि सुहैल जैसे चंद युवा वर्तमान परिदृश्य में कश्मीर का नया इतिहास रचने जा रहे हैं| गवर्नर का बुलावा आया था इसको और इसके ही जैसे ढेर सारे युवा बिजनेसकर्ताओं को| एक विस्तृत रोड-मैप पर विमर्श हुआ इनके साथ और जिसके तुरत बाद ही गवर्नर साब द्वारा वो पचास हज़ार युवाओं को रोजगार देने वाली घोषणा हुई थी| कमाल की बात ये है कि इसी मुल्क में एक गुट-विशेष के लोगों द्वारा जिस तरह से तीन सौ सत्तर के प्रस्थानादेश का विरोध किया जा रहा है, वह जितना हास्यास्पद है…उतना ही दयनीय भी| सुहैल के ही शब्दों को उधार लूँ अगर मैं डियर डायरी मेरी…”जिस धारा को विरोध करने वाले एक पुल, एक लिंक के रूप में बता रहे हैं जो कश्मीर को शेष मुल्क से जोड़ता है तो इससे बड़ी आयरनी कुछ और हो ही नहीं सकती| ये विशेष-दर्जा वाला विशेषण ही तो समस्या की जड़ है| यह बदबू मारता विशेषण हटा है और अब सुनाई देगी कश्मीर के चिनारों की किलक भरी नयी खिलखिलाहट”| 

आधुनिक ज़िन्दगी की समस्त सुविधाओं का लुत्फ़ लेते हुए महज विरोध के नाम पर विरोध की दुदुम्भी बजाने वाले “की-बोर्ड रिवोल्यूशन” के क्रांतिकारियों की टोलियाँ अपने ड्राइंग-रूम में बैठ कर जोमैटो और स्विगी जैसे मोबाइल एप्प के जरिये ऑनलाइन पिज्जा और बर्गर ऑर्डर कर ख़ुद तो उदरस्थ करना चाहती हैं, लेकिन इन्हीं लुभावने और सहजप्राप्य सुविधाओं से धरती के इस कथित जन्नत के बाशिंदों को वंचित रखना चाहती हैं| श्रीनगर में डल झील को आलिंगनबद्ध करते उस ख़ूबसूरत बुलेवर्ड-रोड पर अभी कुछ साल पहले ही खुले ‘कैफ़े कॉफ़ी डे’ की रौनक और स्कूल-कॉलेज आवर के पश्चात उमड़ते लड़के-लड़कियों का ग्रुप इसी अशांत कश्मीर की कितनी दिलकश छवि प्रस्तुत करते हैं, यह तो इस दृश्य के प्रत्यक्षदर्शी ही बयान कर सकते हैं| सुहैल कह रहा था कि “यार देख, हमलोग दिल्ली जाते हैं…एप्प में मोबाइल स्क्रीन पर दौड़ते छोटे-छोटे ओला और उबेर की टैक्सियों को देखते हैं और उसी एप्प से उनको हुक्म देते हैं कि हम यहाँ खड़े हैं, आओ और हमें पिक करो…वो टैक्सी मिनटों में आती है और हमें बिठा कर ले जाती हैं जहाँ भी जाना चाहते हैं हम| हम बाइक चला कर आ गए तेरे पास इतनी दूर कि शौक है हमको…लेकिन किसी रोज़ हम एकदम आराम से आना चाहते हैं इन्हीं पहाड़ों पर अपने मोबाइल एप्प से बुक की गयी टैक्सी में बैठ कर| 

सुहैल की बातें सुनकर जाने कितने ही ख़्वाबों ने अपना सर उठा-उठा कर अपनी उपस्थिति का ऐलान करना शुरू कर दिया…जिसमें एक सबसे मचलता हुआ ख्व़ाब ये है कि एक रोज़, किसी रोज़ तो ऐसा होगा कि इन ऊँचे पहाड़ों की इन सुदूर सैन्य-चौकियों पर लंगर के खाने से ऊबी और पस्त जिह्वा मचल कर हाथों को हुक्म देगी…हाथ मोबाइल उठायेंगे और नीचे कुपवाड़ा में अवस्थित डोमिनोज़ या मैकडोनल्ड की होम-डिलीवरी से हॉट और स्पाइसी पिज्जा और बर्गर का यहाँ के समस्त बंकरों में बड़ाखाना आयोजित होगा| अहा…! अहा…!! 

वैसे डायरी डियर, मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि बादशाह जहाँगीर ने ऐसे ही किसी ख्व़ाब की ताबीर करते हुए कहा होगा कि…

 

गर फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्त

हमीं अस्त हमीं अस्त हमीं अस्त     

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07 January 2019

यह विदाई है या स्वागत...?


एक और नया साल...उफ़्फ़ ! इस कमबख़्त वक्त को भी जाने कैसी तो जल्दी मची रहती है | अभी-अभी तो यहीं था खड़ा ये दो हज़ार अठारह अपने पूरे विराट स्वरूप में...यहीं पहलू में तो था ये खड़ा ! अचानक से जैसे पलकें झपकते ही अब दो हज़ार उन्नीस आ खड़ा हुआ है अपना विशाल सा मुख फाड़े | इतना विशाल मुख की जैसे अभी के अभी पूरे वजूद को निगल जाएगा ! सोच कर सिहरता हुआ बंकर के लूप-होल से बाहर देखता हूँ तो बर्फ़ की परतें और-और मोटी हुईं नज़र आती हैं...जैसे इन्हें भी होड़ लगी हो नए साल के विराट स्वरूप से | बादलों के ऊपर मुंडी उठाए बर्फ़ की इन मोटी परतों वाली सफ़ेद चादर लपेटे इस समाधिस्थ पहाड़ को जैसे कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता नए सालों के आते-जाते रहने से |

कहाँ से हासिल होगी इन बर्फ़ीले पहाड़ों सी समाधिस्थ मुद्रा ? एक सम्पूर्ण सैनिक को भी क्या ठीक इसी तरह बीतते वक़्त से एकदम बेपरवाह समाधिस्थ होने की हद तक प्रशिक्षित नहीं होना चाहिए ? इन बर्फ़ीले पहाड़ों के नीचे एक पूरा का पूरा फैला हुआ महबूब मुल्क अपना समस्त भरोसा, अपनी तमाम निश्चिंतता हम सैनिकों के हवाले कर ही तो तल्लीन नए साल की आमद में हर्षो-उल्लास में लिप्त है | सरहद पर मुस्तैद हर सैनिक का समर्पण, सच कहूँ डियर डायरी, तो इन्हीं उतुंग पहाड़ों की तरह अडिग, अविचल और मौसम की दुश्वारियों से बेफ़िक्र होना चाहिए...तभी तो इस महबूब मुल्क की संप्रभुता अक्षुण्ण रहेगी अनंत काल तक ले लिए |

मुल्क बदल रहा है | मुल्क के लोग बदल रहे हैं | कल ही एक संदेशा आया मोबाइल पर | एक दोस्त का संदेशा जो एक साथी की शहादत के बाद उसकी अंत्येष्टि में शामिल हुआ था...सुनो डायरी मेरी कि क्या कहता है ये संदेशा, जो उसी अंत्येष्टि से भेजा गया है...

मैं उलझन में हूँ ! यह विदाई है या स्वागत ?
यह एक उदास समापन होना चाहिए या खुशनुमा शुरूआत ?
सजे हुये खूबसूरत बैनर्स हैं हर ओर मुसकुराते सैनिकों की तस्वीरें लिए...
सड़कें रंगोलियों और फूलों से सजी हुयी हैं...
पाँच हज़ार से ऊपर लोग, हज़ार किलोग्राम से ज़्यादा के पुष्प, चमकदार वर्दी में सैकड़ों पुलिस और सेना के जवान और एक मृत शरीर...
यह विदाई है या स्वागत है ? मैं उलझन में हूँ !
सजी हुई सेना की गाड़ी पहुँचती है | तिरंगे में लिपटा हुआ ताबूत गाड़ी से उठ कर हरी वर्दी वालों के मजबूत कंधों पर आ टिकता है...एक सहज उत्कृष्ठता से |
वहाँ मौजूद मानव-समुद्र की हर लहर उस ताबूत को छूना चाहती है, कंधे देना चाहती है...लेकिन सबके सौभाग्य में नहीं वो स्पर्श |
हरी वर्दी वाले मजबूत कंधे क़दमों से कदम मिलाये धीमे चाल में आगे बढ़ते हैं...ताबूत भारी है, संवेदनाएं भारीतर |
भीड़ उमड़ती जा रही है | कई सारे लोग ऊंची पानी टंकी पर चढ़े हुये हैं, कितने ही छतों पर और कुछ पेड़ पर भी |
ऐसा दृश्य अब तक तो बस किसी क्रिकेट मैच के लिए या फिर किसी फिल्म की शूटिंग के दौरान ही द्रष्टव्य था |
लेकिन यहाँ तो ये दोनों ही बात नहीं...मैं उलझन में हूँ !
कितने ही कैमरे...यत्र-तत्र-सर्वत्र...सबको किसी बेहतर कोण की तलाश | वहीं पास में स्तब्ध से खड़े कुछ परिजन | यह ब्रेकिंग न्यूज़ है या एक टूटा परिवार !
मैं उलझन में हूँ !
शहीद की पत्नी पुष्पार्पण करती हैं और ताबूत को थामे रहती है देर तक...जैसे किसी माँ ने नवजात को पकड़ रखा हो...नन्ही बिटिया आकर सैल्यूट करती है...एकदम कडक सैल्यूट !
मेरी अब तक रुकी हुयी आँखों में सैलाब उमड़ आता है |
उस सैलाब के साथ-साथ वहाँ खड़ीं सैकड़ों जोड़ी जवान आँखों में सेना में शामिल होने का संकल्प कौंध उठता है | सैकड़ों माँएँ अपनी मौन सहमति देती हैं |
एक शेर की मौत हुई है या सैकड़ों शावकों का जन्म ?
मैं उलझन में हूँ !
निकटतम मित्रों का टोली चिता की अग्नि के साथ खड़ी है तस्वीर के लिए...यह मातम है या उत्सव ?
मैं उलझन में हूँ !
धीरे-धीरे हर कोई विदा ले रहा है अब | रात का अंधेरा उतर आया है | सर्द हवा बह रही है | मैं चिता की अग्नि के पास अकेला खड़ा हूँ |
यह उगते सूरज का उजास है या डूबते सूरज का निश्छल सन्नाटा ?
मैं उलझन में हूँ !
यह शायद अजीब बात है, लेकिन मन शांत है पूरी तरह अब | मुझे अपने दोस्तों पर प्यार उमड़ रहा है | मुझे लोगों से मुहब्बत हो रही है | मुझे अपने मुल्क से इश्क़ हो रहा है | फिर से...फिर-फिर से !
यह विदाई थी या स्वागत था ?
कहो ना दोस्त, यह समापन था कि थी शुरुआत ?

पढ़ता हूँ संदेशा बार-बार....कितनी ही बार और लगता है जैसे दोस्त की आँखों से छूट गया सैलाब इधर बादलों से भी ऊपर मुंडी उठाए इस समाधिस्थ पहाड़ के इस बंकर के लूप-होल से बाहर झाँकती इस एक जोड़ी आँखों में उमड़ आया है |

नया साल मुबारक हो तुम्हें ओ मेरे महबूब मुल्क !      


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26 December 2018

कितनी तुम कि मैं न रहूँ...


कितनी दूरी ! दूरी...कितनी दूर ! कितना दर्द कि बस उफ़ अब ! कितना शोर कि बहरी हों आवाज़ें और कितनी चुप्पी कि बोल उठे सन्नाटा ! कितनी थकन कि नींद को भी नींद ना आए...आह, कितनी नींद कि सारी थकन कोई भूल जाए ! 

कितनी उदासी कि खुशियाँ तरस जायें अपने वजूद को...कितनी खुशियाँ कि उदासी लापता ! कितनी नफ़रत...उफ़, कितनी नफ़रत कि मुहब्बत का नाम तक लेना दुश्वार...कितनी मुहब्बत कि नफ़रतों के होने पर हैरानी ! 

कितनी मुश्किलें कि सब कुछ आसान हो जैसे...कितनी आसानी कि मुश्किलों का तूफ़ान ही हो सामने ! कितनी सिहरन कि समूचा सूर्य आगोश में लिया जा सके...कितनी तपिश कि हिमालय तक कम पड़ जाये !

टीस सी कोई टीस...जाने कितनी टीस इन तपते तलवों में कि लंबी गश्त के बाद इन भारी जूतों को उतारते ही आभास भी न हो कि तलवें हैं या नहीं...कि उतर गए संग ही घंटों से भीगी-गीली जुराबों के ! कितना अनकहा सा कुछ कि कहने का कोई औचित्य ही नहीं...कितना कहा जा चुका कि जैसे कुछ भी अनकहा शेष नहीं अब !

कितनी बन्दूकों से निकलीं कितनी गोलियाँ कि एक मुल्क की रूह तक छलनी हुई जाती...कितनी भटकी रूहें कि विश्व भर की बन्दूकों की गोलियाँ ख़त्म ! 

कितनी शहादतें कि अब ज़मीन कम पड़ने लगी चिताओं के लिए...कितनी खाली पसरी हुई ज़मीनें कि शहादत की भूख मिटती ही नहीं ! कितने ताबूत कि लपेटने को तिरंगा न मिले अब...कितने ही बुने जाते तिरंगे कि ताबूतों का आना थमता ही नहीं !

कितना शौर्य कि भय का नामो-निशान तक नहीं...कितना भय कि कैसा शौर्य !

सामने के बंकर से किसी ने आवाज़ दी...सरहद पार से...“सो गए क्या जनाब”...इस जानिब से उपहास उठा...“चुप बे कमीनों ! बांग्लादेश से भी हार गए, चले हैं क्रिकेट खेलने” और उठे फिर ज़ोर के ठहाके | उधर की ख़ामोशी की खिसियाहट सर्द हवाओं में अजब सी गर्माहट भरने लगी |

कितने शब्द...अहा, कितने ही सारे शब्द कि क़िस्सों का लुत्फ़ ही लुत्फ़...कितने क़िस्से कि शब्द ढूंढें न मिलें ! कितने...कितने ही ठहाकों की गूँज कि आँसुओं के रिसने की कोई ध्वनि ही नहीं और कितने आँसू कि डूबती जाती है सब ठहाकों की गूँज ! 

कितनी सृष्टि में कितना प्रेम
कि कहना न पड़े
मुझे प्रेम है तुमसे !

कितना प्रेम
कि करने को पूरी उम्र
भी कम हो जैसे !

कितना मैं
कि तुम आओ
कितनी तुम
कि मैं न रहूँ !”

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18 December 2018

हाशिये का राग

विगत डेढ़-दो महीने से लगातार मुखड़े से लेकर आख़िरी अंतरे तक “हाशिये का राग” के साथ मैं संगत मिला रहा हूँ | सुर-ताल की ज्यादा समझ नहीं मुझे, लेकिन हँसी की थपकियों से लेकर गहरी-गहरी सोच वाली गुनगुनाहट के साथ सुशील सिद्धार्थ के इस छेड़े हुए राग के साथ आलाप लेते हुये मैं एक बेहतर समझ वाले पाठक के तौर पर विकसित हुआ हूँ या कथेतर हिन्दी-साहित्य में व्यंग्य-विधा के लिए नयी मुहब्बत पाले हुए आशिक़ का अवतार धारण कर चुका हूँ या फिर दोनों ही...ये जानना मेरे लिए ख़ुद ही बहुत दिलचस्प है | बेहतर-समझ-वाले-पाठक वाली बात इसलिए की मैंने कि किताब में शामिल व्यंग्य से गुज़रते हुए जाने कितनी जगहों पर यूँ लगा कि ये तो मैं भी करता हूँ और ये कटाक्ष दरअसल मुझ पर भी(ही) तो है | अमूमन पाँच से छ दिन में एक किताब पढ़ लेने वाला मेरा ‘मैं’ इस किताब को जाने क्यों सहेज-सहेज कर थम-थम कर पढ़ता रहा...एक दिन में बस एक चैप्टर की ज़िद लिए कि एक का स्वाद दूजे में मिक्स ना हो और कोई ख़तरनाक कॉकटेल ना तैयार हो जाए !
व्यंग्य में लिपटे चुभते-गुदगुदाते-चिकोटी काटते चौवालीस आलेखों (जिसमें एक दर्जन लघु आलेख अलग से गिनती माँगते हैं) के बोझ से जहाँ इस किताब को उठाये न उठना चाहिए, वहीं उलटा, पढ़ते हुए यह किताब अपने पाठक को इतना हल्का कर देती है...कुछ इतना हल्का कि लेखक के हर चुटीले वार के बाद आह-उफ़ करते हुए एकदम से तारो-ताज़ा हो अपने शेष बचे कार्यों को पूरा करने के लिए एक तरह से रिचार्ज्ड हो जाते हैं आप |
ऐसे-ऐसे नुकीले जुमले की जिनकी नोक मोटी-सी-मोटी चर्बी वाली संवेदनाओं को भी बेधने से बाज़ ना आये...ऐसे-ऐसे तीखे फ़िक़रे कि अरसे से बंद पड़ी स्वाद-ग्रंथियाँ भी अपनी ज़ंग लगी पोरों को स्वत: खोल बैठें...ऐसी-ऐसी रंगीन टिप्पणियाँ कि सात-के-सातों रंग अपने रंगीले होने पर गुमान करना भूल जायें ! मज़े की बात ये कि लेखक ये सारा चमत्कार बिलकुल ही अनजान तरीके से करते हैं और ये बात आपको किताब पढ़ते हुए ख़ुद ही आभास होता है कि जैसे ऐसा लिखा जाना कुछ एकदम नेचुरल-सा है लेखक के लिए...उनके पर्सोना का ही एक अदृश्य सा हिस्सा जो लिखने के बाद दृष्टिगोचर होता है |
सुशील सिद्धार्थ दरअसल अपने लिक्खे से...अपने लगातार लिक्खे से और उस लगातार लिक्खे में भी कहीं दोहराव ना आने देने से...हम पाठकों को मेस्मराइज्ड करते रहे हैं | सूर्यबाला जी के कहे को उधार लूँ तो, जो इस किताब के फ्लैप पर भी उद्धृत है...”जाने कैसे इतना लिखने के बाद भी रिपीटीशन के पॉपुलर ट्रेंड से बचे रहे हैं अब तलक सुशील और एक तरह से वर्तमान में अपना ब्रांड बनाए रखने में कामयाब रहे हैं” |
व्यंग्य का ये अनूठा संकलन किताबघर प्रकाशन से आया है और महज डेढ़ सौ रुपये में आपकी किताबों वाले सिरहाने पर रखे जाने की ज़िद करता है |


15 November 2018

एक ब्रह्मा का अवसान



"सुनो पीटर, हमारी मुहब्बत सलामत तो रहेगी ना ? उन्होंने ही तो संभाले रखा था अब तक, जब भी बिखरने को हुई ये !" परसों रात सुबकते हुये मेरी जेन ने पूछा था...
लगभग सत्तावन साल पहले एक नये 'यूनिवर्स' का अस्तित्व जब सामने आया था तो पूरी धरती पर हर्ष और हैरत से भरे कोलाहल का शोर जाने कितने ही उल्कापिंडों के अकस्मात् टूटने का कारण बना । शोर थमा तो इस नये 'यूनिवर्स' के सृजनकर्ता को दुनिया ने सीने से लगा लिया । उम्र के उन्चालीसवें पायदान पर खड़े स्टैन ली ने शायद उस वक़्त सोचा भी न होगा कि मार्वल कॉमिक्स में जिन किरदारों को वो बुन रहे हैं, ये सब मिलकर एक दिन एक ऐसे पैरेलल यूनिवर्स को खड़ा कर देंगे कि हम जैसे दीवाने पीढ़ी दर पीढ़ी पूरी तरह सम्मोहित हो वहीं बस जाने की सोचा करेंगे ।
नहीं, ऐसा तो नहीं था कि स्टैन ली द्वारा इस मार्वल यूनिवर्स के सृजन से पहले ऐसे किसी और यूनिवर्स का वजूद नहीं था । जव वो सत्रह साल के थे तो डीसी यूनिवर्स अपना जलवा कायम कर रहा था । मेट्रोपॉलिस के सुपरमैन और गॉथम के बैटमैन का जादू सर चढ़ कर बोल रहा था । लेकिन डीसी यूनिवर्स के शहर काल्पनिक थे और इसके सुपरहीरोज़ या तो बहुत ज़्यादा 'आइडियलिस्टिक' थे या फिर कुछ ज़्यादा ही 'ट्विस्टेड' । मेट्रोपॉलिस जहाँ एक 'मॉडल' शहर था, वहीं गॉथम एकदम 'डार्क' । सुपरमैन, बैटमैन, फ्लैश वगैरह की शक्तियाँ असीमित थीं । वे सब के सब 'लार्जर दैन लाइफ' की परिकल्पना के द्योतक थे ।
स्टैन ली ने अपने मार्वल यूनिवर्स की बुनियाद न्यूयॉर्क जैसे चिर-परिचित शहर में रखी, उसकी तमाम अच्छाइयों और बुराइयों के साथ । उनके सुपरहीरोज़ हमसब के अपने पड़़ोसियों जैसे देखे-से, भाले-से हैं । स्पाइडरमैन जैसे हीरो के पास अक्सर पेप्सी पीने तक के पैसे नहीं होते...शहर का सबसे ज़्यादा बिकने वाला अख़बार उसे ट्रौल करता है...अपनी तमाम शक्तियों के बावजूद वो अपनी प्रेमिका को ख़ुश नहीं रख पाता । स्टैन ली के यूनिवर्स वाले सुपरहीरोज़ अपनी तमाम ख़ूबियों के साथ उतने ही 'वल्नरेबल' दिखते हैं और यही बात स्टैन ली को इस विधा में सबसे दमकते सिंहासन पर बिठाती है । उनका जाना यक़ीनन एक अनूठे और हैरान करने वाले क़िस्सागो का जाना है ।
विगत सोलह सालों से लगातार मार्वल यूनिवर्स की चार कॉमिक्स को सब्सक्राइब करता आ रहा मेरा 'मैं' आज पहली बार अपने सब्सक्रिप्शन को बंद करने की सोच रहा है । कहाँ बिखेर पायेगा ये महबूब यूनिवर्स मेरा अब वैसा ही जादू अपने जादूगर के बिना !
...और अपने आँसू पोछते हुये पीटर पार्कर ने सुबकती मेरी जेन को बाँहों में भर कर कहा "विद ग्रेट पावर, कम्स ग्रेटर रिस्पॉन्सिबिलिटी । उनकी रूह हमारी मुहब्बत के साथ है, मेरी ।"


[ जाइये स्टैन ली सर कि इन दिनों उस परमपिता परमेश्वर को भी चंद सुपरहीरोज़ चाहिये स्वर्ग में ! सलाम !! ]