07 January 2019

यह विदाई है या स्वागत...?


एक और नया साल...उफ़्फ़ ! इस कमबख़्त वक्त को भी जाने कैसी तो जल्दी मची रहती है | अभी-अभी तो यहीं था खड़ा ये दो हज़ार अठारह अपने पूरे विराट स्वरूप में...यहीं पहलू में तो था ये खड़ा ! अचानक से जैसे पलकें झपकते ही अब दो हज़ार उन्नीस आ खड़ा हुआ है अपना विशाल सा मुख फाड़े | इतना विशाल मुख की जैसे अभी के अभी पूरे वजूद को निगल जाएगा ! सोच कर सिहरता हुआ बंकर के लूप-होल से बाहर देखता हूँ तो बर्फ़ की परतें और-और मोटी हुईं नज़र आती हैं...जैसे इन्हें भी होड़ लगी हो नए साल के विराट स्वरूप से | बादलों के ऊपर मुंडी उठाए बर्फ़ की इन मोटी परतों वाली सफ़ेद चादर लपेटे इस समाधिस्थ पहाड़ को जैसे कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता नए सालों के आते-जाते रहने से |

कहाँ से हासिल होगी इन बर्फ़ीले पहाड़ों सी समाधिस्थ मुद्रा ? एक सम्पूर्ण सैनिक को भी क्या ठीक इसी तरह बीतते वक़्त से एकदम बेपरवाह समाधिस्थ होने की हद तक प्रशिक्षित नहीं होना चाहिए ? इन बर्फ़ीले पहाड़ों के नीचे एक पूरा का पूरा फैला हुआ महबूब मुल्क अपना समस्त भरोसा, अपनी तमाम निश्चिंतता हम सैनिकों के हवाले कर ही तो तल्लीन नए साल की आमद में हर्षो-उल्लास में लिप्त है | सरहद पर मुस्तैद हर सैनिक का समर्पण, सच कहूँ डियर डायरी, तो इन्हीं उतुंग पहाड़ों की तरह अडिग, अविचल और मौसम की दुश्वारियों से बेफ़िक्र होना चाहिए...तभी तो इस महबूब मुल्क की संप्रभुता अक्षुण्ण रहेगी अनंत काल तक ले लिए |

मुल्क बदल रहा है | मुल्क के लोग बदल रहे हैं | कल ही एक संदेशा आया मोबाइल पर | एक दोस्त का संदेशा जो एक साथी की शहादत के बाद उसकी अंत्येष्टि में शामिल हुआ था...सुनो डायरी मेरी कि क्या कहता है ये संदेशा, जो उसी अंत्येष्टि से भेजा गया है...

मैं उलझन में हूँ ! यह विदाई है या स्वागत ?
यह एक उदास समापन होना चाहिए या खुशनुमा शुरूआत ?
सजे हुये खूबसूरत बैनर्स हैं हर ओर मुसकुराते सैनिकों की तस्वीरें लिए...
सड़कें रंगोलियों और फूलों से सजी हुयी हैं...
पाँच हज़ार से ऊपर लोग, हज़ार किलोग्राम से ज़्यादा के पुष्प, चमकदार वर्दी में सैकड़ों पुलिस और सेना के जवान और एक मृत शरीर...
यह विदाई है या स्वागत है ? मैं उलझन में हूँ !
सजी हुई सेना की गाड़ी पहुँचती है | तिरंगे में लिपटा हुआ ताबूत गाड़ी से उठ कर हरी वर्दी वालों के मजबूत कंधों पर आ टिकता है...एक सहज उत्कृष्ठता से |
वहाँ मौजूद मानव-समुद्र की हर लहर उस ताबूत को छूना चाहती है, कंधे देना चाहती है...लेकिन सबके सौभाग्य में नहीं वो स्पर्श |
हरी वर्दी वाले मजबूत कंधे क़दमों से कदम मिलाये धीमे चाल में आगे बढ़ते हैं...ताबूत भारी है, संवेदनाएं भारीतर |
भीड़ उमड़ती जा रही है | कई सारे लोग ऊंची पानी टंकी पर चढ़े हुये हैं, कितने ही छतों पर और कुछ पेड़ पर भी |
ऐसा दृश्य अब तक तो बस किसी क्रिकेट मैच के लिए या फिर किसी फिल्म की शूटिंग के दौरान ही द्रष्टव्य था |
लेकिन यहाँ तो ये दोनों ही बात नहीं...मैं उलझन में हूँ !
कितने ही कैमरे...यत्र-तत्र-सर्वत्र...सबको किसी बेहतर कोण की तलाश | वहीं पास में स्तब्ध से खड़े कुछ परिजन | यह ब्रेकिंग न्यूज़ है या एक टूटा परिवार !
मैं उलझन में हूँ !
शहीद की पत्नी पुष्पार्पण करती हैं और ताबूत को थामे रहती है देर तक...जैसे किसी माँ ने नवजात को पकड़ रखा हो...नन्ही बिटिया आकर सैल्यूट करती है...एकदम कडक सैल्यूट !
मेरी अब तक रुकी हुयी आँखों में सैलाब उमड़ आता है |
उस सैलाब के साथ-साथ वहाँ खड़ीं सैकड़ों जोड़ी जवान आँखों में सेना में शामिल होने का संकल्प कौंध उठता है | सैकड़ों माँएँ अपनी मौन सहमति देती हैं |
एक शेर की मौत हुई है या सैकड़ों शावकों का जन्म ?
मैं उलझन में हूँ !
निकटतम मित्रों का टोली चिता की अग्नि के साथ खड़ी है तस्वीर के लिए...यह मातम है या उत्सव ?
मैं उलझन में हूँ !
धीरे-धीरे हर कोई विदा ले रहा है अब | रात का अंधेरा उतर आया है | सर्द हवा बह रही है | मैं चिता की अग्नि के पास अकेला खड़ा हूँ |
यह उगते सूरज का उजास है या डूबते सूरज का निश्छल सन्नाटा ?
मैं उलझन में हूँ !
यह शायद अजीब बात है, लेकिन मन शांत है पूरी तरह अब | मुझे अपने दोस्तों पर प्यार उमड़ रहा है | मुझे लोगों से मुहब्बत हो रही है | मुझे अपने मुल्क से इश्क़ हो रहा है | फिर से...फिर-फिर से !
यह विदाई थी या स्वागत था ?
कहो ना दोस्त, यह समापन था कि थी शुरुआत ?

पढ़ता हूँ संदेशा बार-बार....कितनी ही बार और लगता है जैसे दोस्त की आँखों से छूट गया सैलाब इधर बादलों से भी ऊपर मुंडी उठाए इस समाधिस्थ पहाड़ के इस बंकर के लूप-होल से बाहर झाँकती इस एक जोड़ी आँखों में उमड़ आया है |

नया साल मुबारक हो तुम्हें ओ मेरे महबूब मुल्क !      


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8 comments:

  1. उफ़ ये उलझन ,, नया साल आपको भी मुबारक मेरे लकते जिगर

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  2. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' ०७ जनवरी २०१९ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।



    आवश्यक सूचना : रचनाएं लिंक करने का उद्देश्य रचनाकार की मौलिकता का हनन करना कदापि नहीं हैं बल्कि उसके ब्लॉग तक साहित्य प्रेमियों को निर्बाध पहुँचाना है ताकि उक्त लेखक और उसकी रचनाधर्मिता से पाठक स्वयं परिचित हो सके, यही हमारा प्रयास है। यह कोई व्यवसायिक कार्य नहीं है बल्कि साहित्य के प्रति हमारा समर्पण है। सादर 'एकलव्य'

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ये उन दिनों की बात है : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  4. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ११ जनवरी २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  5. एक शेर की मौत हुई है या सैकड़ों शावकों का जन्म ?
    कहो ना दोस्त, यह समापन था कि थी शुरुआत ?
    हर सवाल पर आखे नम हुई ,समझ नहीं आया कि ये ख़ुशी और गर्व से हुआ या बिझड़नें के दुःख से हुआ ,सलाम है देश के वीरो और उनके परिवार जनो को ,जय जवान -जय भारत

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  6. बहुत की कमाल की उलझन....सटीक... सार्थक... लाजवाब...।समापन ही शुरुआत है...बन्दे मातरम ।

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  7. हृदय स्पर्शी संवेदनाओं को सहलाती कुदेरती रचना प्रश्न आंखों को नमी देता ।
    अप्रतिम अद्भुत।

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  8. और कहो न दोस्त, यह समापन था कि थी शुरुआत !!!
    नमन!!!

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