26 December 2018

कितनी तुम कि मैं न रहूँ...


कितनी दूरी ! दूरी...कितनी दूर ! कितना दर्द कि बस उफ़ अब ! कितना शोर कि बहरी हों आवाज़ें और कितनी चुप्पी कि बोल उठे सन्नाटा ! कितनी थकन कि नींद को भी नींद ना आए...आह, कितनी नींद कि सारी थकन कोई भूल जाए ! 

कितनी उदासी कि खुशियाँ तरस जायें अपने वजूद को...कितनी खुशियाँ कि उदासी लापता ! कितनी नफ़रत...उफ़, कितनी नफ़रत कि मुहब्बत का नाम तक लेना दुश्वार...कितनी मुहब्बत कि नफ़रतों के होने पर हैरानी ! 

कितनी मुश्किलें कि सब कुछ आसान हो जैसे...कितनी आसानी कि मुश्किलों का तूफ़ान ही हो सामने ! कितनी सिहरन कि समूचा सूर्य आगोश में लिया जा सके...कितनी तपिश कि हिमालय तक कम पड़ जाये !

टीस सी कोई टीस...जाने कितनी टीस इन तपते तलवों में कि लंबी गश्त के बाद इन भारी जूतों को उतारते ही आभास भी न हो कि तलवें हैं या नहीं...कि उतर गए संग ही घंटों से भीगी-गीली जुराबों के ! कितना अनकहा सा कुछ कि कहने का कोई औचित्य ही नहीं...कितना कहा जा चुका कि जैसे कुछ भी अनकहा शेष नहीं अब !

कितनी बन्दूकों से निकलीं कितनी गोलियाँ कि एक मुल्क की रूह तक छलनी हुई जाती...कितनी भटकी रूहें कि विश्व भर की बन्दूकों की गोलियाँ ख़त्म ! 

कितनी शहादतें कि अब ज़मीन कम पड़ने लगी चिताओं के लिए...कितनी खाली पसरी हुई ज़मीनें कि शहादत की भूख मिटती ही नहीं ! कितने ताबूत कि लपेटने को तिरंगा न मिले अब...कितने ही बुने जाते तिरंगे कि ताबूतों का आना थमता ही नहीं !

कितना शौर्य कि भय का नामो-निशान तक नहीं...कितना भय कि कैसा शौर्य !

सामने के बंकर से किसी ने आवाज़ दी...सरहद पार से...“सो गए क्या जनाब”...इस जानिब से उपहास उठा...“चुप बे कमीनों ! बांग्लादेश से भी हार गए, चले हैं क्रिकेट खेलने” और उठे फिर ज़ोर के ठहाके | उधर की ख़ामोशी की खिसियाहट सर्द हवाओं में अजब सी गर्माहट भरने लगी |

कितने शब्द...अहा, कितने ही सारे शब्द कि क़िस्सों का लुत्फ़ ही लुत्फ़...कितने क़िस्से कि शब्द ढूंढें न मिलें ! कितने...कितने ही ठहाकों की गूँज कि आँसुओं के रिसने की कोई ध्वनि ही नहीं और कितने आँसू कि डूबती जाती है सब ठहाकों की गूँज ! 

कितनी सृष्टि में कितना प्रेम
कि कहना न पड़े
मुझे प्रेम है तुमसे !

कितना प्रेम
कि करने को पूरी उम्र
भी कम हो जैसे !

कितना मैं
कि तुम आओ
कितनी तुम
कि मैं न रहूँ !”

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18 December 2018

हाशिये का राग

विगत डेढ़-दो महीने से लगातार मुखड़े से लेकर आख़िरी अंतरे तक “हाशिये का राग” के साथ मैं संगत मिला रहा हूँ | सुर-ताल की ज्यादा समझ नहीं मुझे, लेकिन हँसी की थपकियों से लेकर गहरी-गहरी सोच वाली गुनगुनाहट के साथ सुशील सिद्धार्थ के इस छेड़े हुए राग के साथ आलाप लेते हुये मैं एक बेहतर समझ वाले पाठक के तौर पर विकसित हुआ हूँ या कथेतर हिन्दी-साहित्य में व्यंग्य-विधा के लिए नयी मुहब्बत पाले हुए आशिक़ का अवतार धारण कर चुका हूँ या फिर दोनों ही...ये जानना मेरे लिए ख़ुद ही बहुत दिलचस्प है | बेहतर-समझ-वाले-पाठक वाली बात इसलिए की मैंने कि किताब में शामिल व्यंग्य से गुज़रते हुए जाने कितनी जगहों पर यूँ लगा कि ये तो मैं भी करता हूँ और ये कटाक्ष दरअसल मुझ पर भी(ही) तो है | अमूमन पाँच से छ दिन में एक किताब पढ़ लेने वाला मेरा ‘मैं’ इस किताब को जाने क्यों सहेज-सहेज कर थम-थम कर पढ़ता रहा...एक दिन में बस एक चैप्टर की ज़िद लिए कि एक का स्वाद दूजे में मिक्स ना हो और कोई ख़तरनाक कॉकटेल ना तैयार हो जाए !
व्यंग्य में लिपटे चुभते-गुदगुदाते-चिकोटी काटते चौवालीस आलेखों (जिसमें एक दर्जन लघु आलेख अलग से गिनती माँगते हैं) के बोझ से जहाँ इस किताब को उठाये न उठना चाहिए, वहीं उलटा, पढ़ते हुए यह किताब अपने पाठक को इतना हल्का कर देती है...कुछ इतना हल्का कि लेखक के हर चुटीले वार के बाद आह-उफ़ करते हुए एकदम से तारो-ताज़ा हो अपने शेष बचे कार्यों को पूरा करने के लिए एक तरह से रिचार्ज्ड हो जाते हैं आप |
ऐसे-ऐसे नुकीले जुमले की जिनकी नोक मोटी-सी-मोटी चर्बी वाली संवेदनाओं को भी बेधने से बाज़ ना आये...ऐसे-ऐसे तीखे फ़िक़रे कि अरसे से बंद पड़ी स्वाद-ग्रंथियाँ भी अपनी ज़ंग लगी पोरों को स्वत: खोल बैठें...ऐसी-ऐसी रंगीन टिप्पणियाँ कि सात-के-सातों रंग अपने रंगीले होने पर गुमान करना भूल जायें ! मज़े की बात ये कि लेखक ये सारा चमत्कार बिलकुल ही अनजान तरीके से करते हैं और ये बात आपको किताब पढ़ते हुए ख़ुद ही आभास होता है कि जैसे ऐसा लिखा जाना कुछ एकदम नेचुरल-सा है लेखक के लिए...उनके पर्सोना का ही एक अदृश्य सा हिस्सा जो लिखने के बाद दृष्टिगोचर होता है |
सुशील सिद्धार्थ दरअसल अपने लिक्खे से...अपने लगातार लिक्खे से और उस लगातार लिक्खे में भी कहीं दोहराव ना आने देने से...हम पाठकों को मेस्मराइज्ड करते रहे हैं | सूर्यबाला जी के कहे को उधार लूँ तो, जो इस किताब के फ्लैप पर भी उद्धृत है...”जाने कैसे इतना लिखने के बाद भी रिपीटीशन के पॉपुलर ट्रेंड से बचे रहे हैं अब तलक सुशील और एक तरह से वर्तमान में अपना ब्रांड बनाए रखने में कामयाब रहे हैं” |
व्यंग्य का ये अनूठा संकलन किताबघर प्रकाशन से आया है और महज डेढ़ सौ रुपये में आपकी किताबों वाले सिरहाने पर रखे जाने की ज़िद करता है |


15 November 2018

एक ब्रह्मा का अवसान



"सुनो पीटर, हमारी मुहब्बत सलामत तो रहेगी ना ? उन्होंने ही तो संभाले रखा था अब तक, जब भी बिखरने को हुई ये !" परसों रात सुबकते हुये मेरी जेन ने पूछा था...
लगभग सत्तावन साल पहले एक नये 'यूनिवर्स' का अस्तित्व जब सामने आया था तो पूरी धरती पर हर्ष और हैरत से भरे कोलाहल का शोर जाने कितने ही उल्कापिंडों के अकस्मात् टूटने का कारण बना । शोर थमा तो इस नये 'यूनिवर्स' के सृजनकर्ता को दुनिया ने सीने से लगा लिया । उम्र के उन्चालीसवें पायदान पर खड़े स्टैन ली ने शायद उस वक़्त सोचा भी न होगा कि मार्वल कॉमिक्स में जिन किरदारों को वो बुन रहे हैं, ये सब मिलकर एक दिन एक ऐसे पैरेलल यूनिवर्स को खड़ा कर देंगे कि हम जैसे दीवाने पीढ़ी दर पीढ़ी पूरी तरह सम्मोहित हो वहीं बस जाने की सोचा करेंगे ।
नहीं, ऐसा तो नहीं था कि स्टैन ली द्वारा इस मार्वल यूनिवर्स के सृजन से पहले ऐसे किसी और यूनिवर्स का वजूद नहीं था । जव वो सत्रह साल के थे तो डीसी यूनिवर्स अपना जलवा कायम कर रहा था । मेट्रोपॉलिस के सुपरमैन और गॉथम के बैटमैन का जादू सर चढ़ कर बोल रहा था । लेकिन डीसी यूनिवर्स के शहर काल्पनिक थे और इसके सुपरहीरोज़ या तो बहुत ज़्यादा 'आइडियलिस्टिक' थे या फिर कुछ ज़्यादा ही 'ट्विस्टेड' । मेट्रोपॉलिस जहाँ एक 'मॉडल' शहर था, वहीं गॉथम एकदम 'डार्क' । सुपरमैन, बैटमैन, फ्लैश वगैरह की शक्तियाँ असीमित थीं । वे सब के सब 'लार्जर दैन लाइफ' की परिकल्पना के द्योतक थे ।
स्टैन ली ने अपने मार्वल यूनिवर्स की बुनियाद न्यूयॉर्क जैसे चिर-परिचित शहर में रखी, उसकी तमाम अच्छाइयों और बुराइयों के साथ । उनके सुपरहीरोज़ हमसब के अपने पड़़ोसियों जैसे देखे-से, भाले-से हैं । स्पाइडरमैन जैसे हीरो के पास अक्सर पेप्सी पीने तक के पैसे नहीं होते...शहर का सबसे ज़्यादा बिकने वाला अख़बार उसे ट्रौल करता है...अपनी तमाम शक्तियों के बावजूद वो अपनी प्रेमिका को ख़ुश नहीं रख पाता । स्टैन ली के यूनिवर्स वाले सुपरहीरोज़ अपनी तमाम ख़ूबियों के साथ उतने ही 'वल्नरेबल' दिखते हैं और यही बात स्टैन ली को इस विधा में सबसे दमकते सिंहासन पर बिठाती है । उनका जाना यक़ीनन एक अनूठे और हैरान करने वाले क़िस्सागो का जाना है ।
विगत सोलह सालों से लगातार मार्वल यूनिवर्स की चार कॉमिक्स को सब्सक्राइब करता आ रहा मेरा 'मैं' आज पहली बार अपने सब्सक्रिप्शन को बंद करने की सोच रहा है । कहाँ बिखेर पायेगा ये महबूब यूनिवर्स मेरा अब वैसा ही जादू अपने जादूगर के बिना !
...और अपने आँसू पोछते हुये पीटर पार्कर ने सुबकती मेरी जेन को बाँहों में भर कर कहा "विद ग्रेट पावर, कम्स ग्रेटर रिस्पॉन्सिबिलिटी । उनकी रूह हमारी मुहब्बत के साथ है, मेरी ।"


[ जाइये स्टैन ली सर कि इन दिनों उस परमपिता परमेश्वर को भी चंद सुपरहीरोज़ चाहिये स्वर्ग में ! सलाम !! ]

05 November 2018

भय को देखना हो नतमस्तक...


[ कथादेश के सितम्बर 2018 के अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का अठारहवाँ पन्ना ]

अभी कुछ दिन पहले डायरी के किसी बेतरतीब पन्ने से उलझे हुये एक पाठक का बहुत ही तरतीब सा कॉल आया था | बहुत देर बात हुई उनसे और डायरी के तमाम पन्नों से जुड़े उनके सवालों की फ़ेहरिश्त इतनी लम्बी थी कि आख़िर में उनसे कहना पड़ा कि आपके सारे सवालों का जवाब देना इस ऊँचे बर्फ़ीले पहाड़ की खड़ी चढ़ाई चढ़ना जैसा है | मोबाईल के उस पार उनकी छितरी-छितरी हँसी एक सुकून दे रही थी कि इस डायरी के ये बेतरतीब से पन्ने कमोबेश अपनी बात सही तरीक़े से कह पा रहे हैं | एक सवाल था जो देर तक मचलता रहा ज़ेहन में उनके फोन कट जाने के बाद और ये सवाल अमूमन हर दोस्त रिश्तेदार भी करते हैं |  सवाल जो कैसी-कैसी स्मृतियों का सैलाब लेकर आ गया है इस छोटे से बंकर में !

     कैसा लगता है किसी ख़तरनाक मिशन पर एक तयशुदा मृत्यु की तरफ़ जाते हुये सैनिकों को ?

     सच कहूँ, डायरी मेरी, तो कोई उचित शब्द नहीं हैं मेरे पास जिनसे सलीके का एक कोई वाक्य बुन सकूँ जवाब में ! उन्नीस साल पहले का वो युद्ध याद आता है | एक मिशन...जिस पर जाने से पहले बटालियन के कमान्डिंग ऑफिसर ने मिशन पर जाने वाली टीम के हम समस्त सदस्यों से एक-एक छोटा सा ख़त लिखवा कर रख लिया था अपने-अपने घरवालों के नाम कि अगर वापस सही-सलामत नहीं आयें तो... ! ये और बात है कि वो ख़त कभी प्रेषित नहीं हुये...पूरी टीम ही आधे रास्ते से वापस बुला ली गई थी कि युद्ध समाप्ति का ऐलान हो गया |

     लेकिन ऐसे अनगिनत ख़त मुल्क के जाने कितने घरों में पहुँचे भी...रोते-बिलखते परिवार के लोगों के पास | इनमें से कई ख़त तो शहीद सैनिक के पार्थिव शरीर के साथ-साथ ही पहुँचे घर | दरअसल युद्ध के दौरान किसी भी ख़तरनाक मिशन पर जाने से पहले, सैनिकों से उनके परिजनों के नाम की चिट्ठी लिखवा कर रख लिए जाने की एक पुरानी परिपाटी रही है |

     ...तो कैसा लगता है एक तयशुदा मृत्यु की तरफ़ बढ़ते हुये ?

     आओ डियर डायरी, आज तुम्हें एक बहादुर सैनिक का आख़िरी ख़त सुनाता हूँ इस सवाल के जवाब में | उन्नीस साल पहले अगर वो युद्ध नहीं हुआ होता कारगिल की उन बर्फ़ीली चोटियों पर तो उस उन्नीस साल पहले वाले जुलाई को निम्बु साब पचीस के होते | निम्बु साब....राजपूताना राइफल्स के कैप्टेन निकेजकौउ कैंगेरो, जिन्हें बाद में मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया...दुश्मनों के कब्ज़े से अपनी चोटी को छुड़ाने के लिए रॉकेट-लॉंचर लेकर बिना जूते के सोलह हज़ार फुट की ऊँचाई पर चढ़ जाने वाले निम्बु साब अपनी नियत मृत्यु से अच्छी तरह वाकिफ़ थे | उस आख़िरी मिशन पर जाने से पहले निम्बु साब का लिखा ख़त, जिसका निकटतम हिन्दी अनुवाद नीचे है, शुष्क से शुष्कतर संवेदनाओं को नम कर देने की क़ाबिलियत रखता है...

“मेरे प्यारे मम्मी-पापा,                   20 जून 1999 

कभी सोचा भी नहीं था कि मुझे ऐसी कोई चिट्ठी लिखने की आवश्यकता पड़ेगी | लेकिन आज यह ज़रूरी लग रहा है कि अपना आख़िरी संदेश आपलोगों के साथ साझा करूँ |

पाकिस्तानियों ने घुसपैठ करके हमारे कुछ इलाक़े पर कब्ज़ा कर लिया था, इसलिए हमें इधर कश्मीर के द्रास और बटालिक सेक्टर में आना पड़ा है | मुझे पता है कि ईश्वर मेरे साथ है और वो मेरी रक्षा करेगा...लेकिन यदि ईश्वर की यही इच्छा है कि मैं अपने जीवन की क़ुरबानी दूँ, तो फिर मुझे दुबारा मौक़ा नहीं मिलेगा आपलोगों से मुख़ातिब होने का

मन बहुत उदास है | मैं आपलोगों को अब कभी नहीं देख पाऊँगा, सोचकर ही बहुत दुखता है | लेकिन ईश्वर की इच्छा यही है तो मैं शिकायत भी कैसे कर सकता हूँ |

अगर मैं वापस नहीं आया तो मैं चाहता हूँ कि आपलोग मेरे कुछ शब्द याद रखें | मेरे प्यारे मम्मी-पापा, मैं आपलोगों से बहुत प्यार करता हूँ | आपलोगों का ख़्याल रखने के लिए मैंने हमेशा अपना सब कुछ देने की कोशिश की है और हमेशा यही चाहा है कि आपलोग ख़ुश रहें | लेकिन शायद मैं अपने इस छोटे से जीवन काल में सफल नहीं हो पाया ऐसा करने में |

 मैं जानता हूँ कि मैंने कई बार आपलोगों को शर्मिंदा किया है और बहुत परेशान किया है | कृपया मुझे मेरी ग़लतियों के लिए माफ़ कर दीजिएगा | आपदोनों ने मुझे इतना प्यार दिया है और इतना कुछ सिखाया है कि मैं जीवन के आखिर क्षणों तक एक अच्छा लीडर बना रहा हूँ | मैं कृतज्ञ हूँ | बहुत-बहुत शुक्रिया आपदोनों का |

मेरे प्यारे पापा, अभी रोना आ रहा है छोटे भाई और बहनों के बारे में सोचकर | आप उनको अच्छे से गाइड करना बेहतर मनुष्य बनने के लिए | उनसे कहिएगा कि मैं उनसे बहुत प्यार करता था | दादा जी और दादी माँ से भी कहिएगा कि मैं उन्हें प्यार करता था | सारे रिश्तेदारों और दोस्तों को मेरा प्रणाम कहिएगा और कहिएगा कि मुझे माफ़ कर दें जो कभी मैंने उनका दिल दुखाया हो |

मैं अगर ये बोलूँ भी कि जब मैं नहीं रहूँ तो आप मत रोना, लेकिन आप इतना प्यार करते हैं मुझसे कि मैं जानता हूँ आप रोएँगे | लेकिन ख़ुश रहिएगा यह सोच कर कि मैं आपसब की स्मृतियों में तो रहूँगा | मेरे सारे दोस्तों को लिख दीजिएगा ख़त, जिनके पते मेरे डायरी में हैं

पापा-मम्मी, आपदोनों से एक बहुत ही व्यक्तिगत बात बतानी थी | मेरी एक गर्लफ्रेंड है...उसका नाम कैर्मीला है | आप जानते भी हैं उसको | आपदोनों शायद उसको पसंद ना करें | लेकिन मैं उससे प्यार करता हूँ और वो भी मुझसे बहुत प्यार करती है | इस बार जब मैं छुट्टियों में आया था मई महीने में, मैंने उसका हाथ मांगा था और वो तैयार थी मुझसे शादी करने के लिए | अगर मैं वापस ना आऊँ तो कृपया उसका भी ख़्याल रखिएगा | वो एक सच्ची दोस्त है मेरी | हमदोनों एक-दूसरे से अपनी सारी समस्याएँ साझा करते थे | मैं जानता हूँ, वो मुझसे सच्चा प्यार करती है | मैं यदि वापस नहीं आ पाता हूँ तो उसके लिए कुछ कीजिएगा | यह मेरा आप दोनों से विनम्र निवेदन है |

आपदोनों पर ईश्वर का आशीर्वाद हमेशा बना रहे और आपदोनों के अच्छे स्वास्थ्य और शांति की कामना करता हूँ |

आपका प्यारा बेटा 
नीबू ”

     ...तो कैसा लगता है तयशुदा मौत की तरफ़ बढ़ते हुये ? नहीं, कोई जवाब नहीं है मेरे पास | डर...विछोह...अपने प्रियजनों को दुबारा ना देख पाने का नतमस्तक भय...और इन सबके बीच कहीं दबा-सा, छुपा-सा एक गिल्ट भी कि जैसे पर्याप्त नहीं कर पाये ज़िंदगी के लिए...अपनों के लिए ! कैसा लगता है...कि जैसे सब कुछ छूटा जा रहा ! नील कमल की एक कविता का अंश याद आता है...
“भय को देखना हो
नतमस्तक, करबद्ध
तो देखो उस आदमी की आँखों में
जिसे मालूम है
ज़िन्दगी की उलटी गिनती”



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24 October 2018

कंचन सिंह चौहान की कहानी 'ईज़’ को पढ़ते हुये...

केमिस्ट्री दोनों किरदारों के बीच शुरू के ही संवाद से शुरू हो जाती है...एक अजब सी कशिश और कसमसाहट भरी केमिस्ट्री, जो पाठकों को थोड़ी सी तिलमिलाती हुई छोड़ देती है आख़िर में कि कुछ तो हुआ ही नहीं | लेकिन हंस के अक्टूबर अंक में प्रकाशित कंचन चौहान की कहानी ‘ईज़’ कोई प्रेम-कहानी तो है नहीं कि इसमें नायक और नायिका के बीच किसी केमिस्ट्री की गुंज़ाइश हो ! फिर भी गौर से देखने पर वो केमिस्ट्री दिखती है, एक विलक्षण केमिस्ट्री, जो बेशक प्रेम को ना स्पर्श करती हो...मगर अपने अनूठे से विमर्श को उठाती हुई ये अद्भुत कहानी अपने पार्श्व में एक छुपे से प्रेम का ट्रेलर भर दिखाती ज़रूर है | अब ये लेखिका का सायास प्रयास है या अनायास ही होता है ऐसा, ये कहना मुश्किल है |

‘ईज़’ कहानी का फ़लक अपने चुस्त और कसे हुए शिल्प में एक ‘सेक्स वर्कर’ और एक ‘बूचर’ के प्रोफेशन की तलहटियों में झाँकते हुए बगैर किसी स्पौन्सर्ड चेष्टा के “गंदा है पर धंधा है ये” की फिलॉस्फ़ी को हौले से...बस हौले से छूता है | बगैर जजमेंटल हुए ! लेखिका को पहले तो इस दुर्लभ थीम पर बधाई देने का मन करता है और फिर इस थीम को इतनी सहजता से ट्रीट करने के लिए फिर-फिर बधाई देने का मन करता है | दुनिया के दो सबसे प्राचीन व्यवसाय आधुनिक शब्दावली का चोगा पहन कर किस तरह एक अलग ही रुतबा जैसा कुछ अपने लिए तैयार करते हैं, ये समझना जितना दिलचस्प है उतना ही ह्रदयस्पर्शी भी | एक जानिब ‘ब्रोदेल’ से ‘एस्कोर्ट सर्विस’ तक का रूपांतरण और दूजी तरफ़ ‘ढ़ाबे’ से ‘रेस्टोरेंट’ ...या फिर 'प्रॉस्टीच्यूट' से 'कॉल-गर्ल' और 'एस्कोर्ट' तक की यात्रा...और कसाई से ‘बूचर’ या ‘नॉनवेज रेस्टोरेंट ओनर’ तक का कायांतरण...एक तरह से जस्टिफाय करने जैसा कुछ | ...और इस तमाम जस्टिफिकेशन या स्वीकृत होने की क़वायद को कहानी जिस खूबसूरती से दोनों प्रोटगोनिस्ट के संवाद के ज़रिये उभार कर लाती है, वो कुछ तिलिस्मी सा है |
इसके अलावा एक छोटे से पैरेलल में एक और अदद किरदार है, जो इस अजब से विमर्श वाली कहानी को तनिक स्त्री-विमर्श का भी पुट देते हुए अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है...कसाई की बीवी | इस तीसरे किरदार के आने से जाने क्यों और कैसे कहानी में डूब चुके मेरे पाठक को एक त्रिकोण सा बनता नज़र आता है...कुछ-कुछ विख्यात हॉलीवुड फिल्म-श्रृंखला “द ट्वाईलाईट सागा” के प्रेम-त्रिकोण की तरह | वेम्पायर, वियरवुल्फ और ह्यूमेन वाला त्रिकोण | यहीं से कहानी के और विस्तृत होने का विकल्प खुलता है | लेकिन जाहिर है कि ये मेरे अतृप्त पाठक मन का अनर्गल सा प्रलाप है, लेखिका की मंशा कुछ और ही थी कहानी बुनते वक़्त |
कहानी की सधी हुई बुनावट, उसका क्रिस्प शिल्प और उसका मारक कथानक...सब मिलजुल कर कंचन चौहान के क़िस्सागो को परिपक्व हो जाने का ऐलान करते हैं | अभी तक सात कहानी - यदि साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होने को मानक रखा जाए - लिख चुकी इस लेखिका की पहली प्रकाशित कहानी से एक पाठक के रूप में जुड़ा होना और उसकी क़िस्सागोई को ग्रो करते देखना, एक विलक्षण अनुभव है अपने में | हम पाठकों को एक बेहतरीन कहानी देने के लिए कंचन चौहान को ढेरम-ढेर धन्यवाद और साथ ही ये भी कि इस कहानी से उनके पाठकों की उम्मीदें अब और बढ़ गयी हैं |
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