...बहुत पहले एक कविता-सा गीत या कुछ ऐसा ही लिखा था। शायद दसवीं कक्षा में था मैं उस वक्त और किसी मित्र ने उठाकर "कादम्बिनी" में भेज दिया जो संपादक की मेहरबानी से छप भी गया था । खूब इतराया था उन दिनों। आज सोचा फिर इतराऊँ....बस छंद वगैरह का अनुशासन ना दिखे तो ठीक-ठाक सी ही बन पड़ी थी। शेष तो सुधि पाठकगण हैं ही कमी-बेसी निकालने के लिये। तो पेश है...
दूर क्षितिज पे जमीं को
छूता हुआ नील गगन-
तुझ जैसा ही तो है वो
ओ मेरे एकाकी मन
क्यों इतना उदास है तू
क्यों बना है अकिंचन
डूबा है तू किस सोच में
किस बात का है चिंतन
प्राची से आती हुई
सूर्य की प्रथम किरण
तू ही तो है वों
ओ मेरे एकाकी मन
मुर्झाई है हर कली यहाँ
कि ये कैसा है उपवन
अजनबी बन गया है आज
क्यों तेरा वो अपनापन
भाव-पुष्प कर दूँ तुझपे
मैं सारा का सारा अर्पण
बस जरा सा हँस ले गा ले
ओ मेरे एकाकी मन
नियती बन गयी है आज
क्यों आज तेरी दुश्मन
खो गया है आज कहाँ
तेरा वो परिचय नूतन
इस जगत की व्यथा से
खंडित हुआ कोई दर्पण
तू युग-पावक युगद्रष्टा है
ओ मेरे एकाकी मन
.......तो ये थी वो मेरी करीब ग्यारह साल पहले की रचना।
05 September 2008
10 August 2008
हरा सूट और हरी वर्दी...

एक गीतनुमा कविता।किसी हरे सूट की याद में....कश्मिर की एक ठंढ़ी बर्फिली शाम कहीं सुदूर किसी छोटे से पहाड़ी टीले पर~~~कुछ तीन-चार वर्ष पहले।
हरे रंग का सूट तेरा वो और हरे रंग की मेरी वर्दी
एक तो तेरी याद सताये उसपे मौसम की सर्दी
सोया पल है सोया है क्षण
सोयी हुई है पूरी पलटन
इस पहर का प्रहरी मैं
हर आहट पे चौंके मन
मिलने तुझसे आ नहीं पाऊँ,उफ!ये ड्युटी की बेदर्दी
एक तो तेरी याद सताये उसपे मौसम की सर्दी
क्षुब्ध ह्रिदय है आँखें विकल
तेरे वियोग में बीते पल
यूँ तो जीवन-संगिनी तू
संग अभी किन्तु राईफल
इस असह्य दूरी ने हाय क्या हालत मेरी है कर दी
एक तो तेरी याद सताये उसपे मौसम की सर्दी
.....बस शब्दों का जोड़-तोड़ है और हरी वर्दी वालों का एक छोटा सच!!!
31 July 2008
मेरे शब्द
ब्लौग की शुरूआत...पहली कोशिश...उमड़ते-उफ़नते विचारों को शब्दों में बांध लेना आसान तो नहीं होता,फिर भी कोशिश करता रहता हूँ....कुछ ऐसा ही प्रयास ये.व्याकरण,बहर,छंद,शास्त्र और उस्ताद-विशारद शायद खारिज कर दें मेरे इस प्रयास को,जो मैं इन्हें गज़ल कहने की जुर्रत करूँ...तो ये जो कुछ भी है,जैसा भी है-मेरी बात है,मेरे कहने का अन्दाज है।
आइनों पे जमी है काई,लिख
झूठे सपनों की सच्चाई लिख
जलसे में तो सब खुश थे वैसे
फिर रोयी क्यों शहनाई,लिख
कभी रेत और कभी पानी पे
जो भी लिखे है पूरवाई,लिख
तेरी यादों में धुली-धुली-सी
अबके भिगी है तन्हाई,लिख
तारे शबनम के मोती फेंके
हुई चांद की मुँहदिखाई,लिख
क्या कहा रात ने जाते-जाते
क्यों सुबह खड़ी है शरमाई,लिख
कदम-कदम पे मुझको टोके है
कौन सांवली-सी परछाई,लिख
रुह में उतरे और बात करे
अब ऐसी भी इक रुबाई लिख
.....और इसी सिलसिले में एक ये भी कि:-
जबसे तुमने मुझको छुआ है
रात चांदनी दिन गेरुआ है
इक बीज पड़ा है इश्क का जबसे
उगा नसों में मानो महुआ है
तुम क्या गये कि ये मन अपना
अहसासों का खाली बटुआ है
अब टूटा है तो दर्द भी होगा
ये दिल तो शीशम न सखुआ है
तुम्हारे चेहरे की रंगत से
मेरा मौसम-मौसम फगुआ है
फेरो ना यूं अब नजरें हमसे
कि बहने लगी फिर से पछुआ है
....अपने अन्य प्रयासों के साथ जल्द ही लौटता हूँ...आप सब की हौसला अफ़जाई हिम्मत देगी अपनी इस ब्लौग-यात्रा को आगे बढ़ाने में...शुक्रिया~~~
हलफ़नामा-
ग़ज़ल
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