31 July 2013

ब्लोगिंग के पाँच साल और इक ज़िद्दी-सा ठिठका लम्हा...

हुश्श्श्श्श...घूमता पहिया समय का और देखते-ही-देखते पाँच साल हो गये ब्लोगिंग  करते हुये...यू हू हू sss !!! तो "पाल ले इक रोग नादां..." की इस पाँचवीं सालगिरह पर सुनिये एक ग़ज़ल :-

इक ज़िद्दी-सा ठिठका लम्हा यादों के चौबारे में
अक्सर शोर मचाता है मन के सूने गलियारे में

आता-जाता हर कोई अब देखे मुझको मुड़-मुड़ कर
सूरत तेरी दिखने लगी क्या, तेरे इस बेचारे में ?

बारिश की इक बूँद गिरी जो टप से आकर माथे पर
ऐसा लगा तुम सोच रही हो शायद मेरे बारे में

हौले-हौले लहराता था, उड़ता था दीवाना मैं
रूठ गई हो जब से तो इक सुई चुभी ग़ुब्बारे में

यूँ तो लौट गई थी उस दिन तुम घर के चौखट से ही
ख़ुश्बू एक  अभी तक बिखरी है आँगन-ओसारे में

ज़िक्र करे या फ़िक्र करे ये, या फिर तुमको याद करे
कितना मुश्किल हो जाता है दिल को इस बँटवारे में

सुर तो छेड़ा हर धुन पर, हर साज पे गाकर देख लिया
राग मगर अपना पाया बस तेरे ही इकतारे में
{वर्तमान साहित्य के जुलाई 2013 अंक में प्रकाशित }



26 comments:

  1. "ज़िक्र करे या फ़िक्र करे ये, या फिर तुमको याद करे
    कितना मुश्किल हो जाता है दिल को इस बँटवारे में"

    वाह!

    "पाल ले इक रोग नादां..." की पाँचवीं सालगिरह मुबारक!

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  2. चकाचक है जी।
    ब्लॉग के पांच साल पूरे होने की बधाई।
    आगे के लिये शुभकामनायें।

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  3. संयोग से यह सौवीं पोस्ट भी है। सैकड़ा मुबारक।

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  4. हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (01-08-2013) को "ब्लॉग प्रसारण- 72" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

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  5. सागर में हिचकोले खाती,लहरों से टकराती कश्ती
    प्रेम की एक पतवार से देखो आकर लगी किनारे में....

    रोग के पांच बरस....
    मुबारक :-)

    अनु

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  6. गजल के सारे ही शेर बेहतरीन, पांच साल पूर्ण होने की हार्दिक शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  7. all the best and your creativity is very good

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  8. बहुत बहुत शुभकामनायें, अपने लेखन से ऐसे ही लाभान्वित कराते रहिये।

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  9. यह इकतारा ऐसे ही बजता रहे। शुभकामनाएं।

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  10. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन होरी को हीरो बनाने वाले रचनाकार को ब्लॉग बुलेटिन का नमन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  11. क्या बात है गौतम भाई ... जय हो ... एक साथ डबल मुबारकबाद कुबूल कीजिये ... ओह सोर्री ... डबल नहीं ट्रिपल ...
    पहली विजय दिवस की ;
    दूसरी ब्लॉग जगत मे 5 साल पूरे करने की ;
    और
    तीसरी 100 वीं पोस्ट की !
    डटे रहिए इस मोर्चे पर भी ... फतेह आप की ही होनी है !

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  12. यूँ तो लौट गई थी उस दिन तुम घर के चौखट से ही
    ख़ुश्बू एक अभी तक बिखरी है आँगन-ओसारे में

    ज़िक्र करे या फ़िक्र करे ये, या फिर तुमको याद करे
    कितना मुश्किल हो जाता है दिल को इस बँटवारे में --
    बहुत उम्दा ग़ज़ल !
    latest post,नेताजी कहीन है।
    latest postअनुभूति : वर्षा ऋतु

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  13. .
    .
    .
    प्रिय गौतम,

    पाँच साल और सौ पोस्टों की बधाई... गज़ल बेहतरीन है...


    ...

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  14. पांच साल ..गिनने के बाद लगता है जैसे लंबा असरा गुजर चुका है...गिने नहीं तो लगता है कि अभी कुछ महीने पहले ही तो शुरु की है ब्लॉगिंग

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  15. सभी शेर उम्दा

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  16. यूँ तो लौट गई थी उस दिन तुम घर के चौखट से ही
    ख़ुश्बू एक अभी तक बिखरी है आँगन-ओसारे में

    ज़िक्र करे या फ़िक्र करे ये, या फिर तुमको याद करे
    कितना मुश्किल हो जाता है दिल को इस बँटवारे में

    बहुत सुंदर गज़ल ।
    इश्क ही इश्क रहे आपके गजल के गलियारे में ।

    हाँ,ब्लॉग के पांच साल पूरे होने पर हार्दिक बधाई ।

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  17. सुंदर गजल। शतकवीर बनाने और प्रथम पंचवर्षीय योजना की पूर्णता के लिए बधाई। भविष्य की योजनाओं के लिए हार्दिक शुभकामनायें!

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  18. राग मगर अपना पाया बस तेरे ही इकतारे में..

    बहुत सुंदर ..आभार आपका !

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  19. http://kuchmerinazarse.blogspot.in/2013/08/7.html

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  20. यूँ तो लौट गई थी उस दिन तुम घर के चौखट से ही
    ख़ुश्बू एक अभी तक बिखरी है आँगन-ओसारे में
    bahut sundar.

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  21. सालगिरह मुबारक... अनेकानेक शुभकामनाएं
    यह सफ़र युहीं जारी रहे
    उम्दा ग़ज़ल !

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