
...बारिश पसंद है मुझे। बहुत पसंद है। जाने कितनी स्मृतियाँ एकदम से सर उठायें चली आयी हैं...."जाओ, कमबख्तों मैं अभी ड्यूटी पर हूँ"। बारिश पसंद है, लेकिन छुट्टियों में। तापमान बिल्कुल गिर कर शून्य को छूने की होड़ में है। लगातार चौथा दिन...बारिश है कि थमने का नाम नहीं ले रही। दूर उस चोटी से सरकती हुई बर्फ़ की चादर मेरे बहक {पहाड़ों पर बनी गरेड़ियों की झोंपड़ी}की छत पे पहले से ही बिछी पतली बर्फिली चादर पर इक और परत बिछाने को उतावली है।
...और ऐसे मौसम में ज्यादा चौकस रहने की जरूरत...तो बाहर निकलता हूँ बहक की थोड़ी-सी कम सर्द घिराव से "सब ठीक-ठाक है?" देखने की नियत लिये घाटी की कंपकपाती सर्दी में। नीचे सर्पिली घुमावदार पतली सी सड़क....मेड-इन-जर्मनी का टैग लिये ये पावर दूरबीन बड़ी जबरदस्त है। चुस्त-सतर्क आँखें दूरबीन के लैंस के जरिये उस पतली सड़क की सुरक्षा में खड़े अपने जवानों की मुस्तैदी को परखती हैं... धान सिंह, सूबे, लक्षमण, मोहन चंद, प्रमोद, होशियार सिंह, तरसैम, ---एक-एक पर फिसलती आँखें। सही स्टांस। मजबूत पकड़ एके-47 के कुंदे पर। ---महिपाल, दूसरा वाला धान सिंह, दानू, तारा चंद---दूरबीन घूमती हुई---श्रीराम, भूप सिंह, लालाराम, पूरन चंद....पूरन चंद...चौंक कर फिर से वापस दूरबीन घूम कर ठिठकती है। पूरन चंद। लांस नायक पूरन चंद।... कमबख्त कैसे खड़ा है। लौंग स्लींग के सहारे एके गले से कंधे पे होते हुये उपेक्षित-सा लटका हुआ बांयी ओर।
पेड़ के सहारे दांये कंधे का टेक लिये। दोनों हाथ ट्राउजर के जेब में। ...ब्लडी इडियट!!! दूरबीन ज़ूम होती है...चेहरे का भाव...एक मधुर स्मीत सी मुस्कान पूरन के मुख पर।
पूरनssssssssssssssssssssssss....
इतनी दूर से मेरी आवाज उस तक कैसे पहुँचेगी भला।
दूरबीन का लैंस ज़ूम होकर पूरन के चेहरे को और करीब ले आता है...कैसी अजीब-सी मुस्कान। नशे में डूबी-सी मानो। सपनीली।...परसों ही तो छुट्टी से आया है वो। उसे तो अभी पूर्ण रिचारज्ड बैटरी की तरह अन्य की अपेक्षा और चाक-चौबंद मुस्तैद होना चाहिये।..मगर देख लो नालायक को !!!
"राधे--ओय राधे, जीप निकाल !"
"जी साब..."
ठंढ़ में सिकुड़ी-सी जीप भी खांस-खांस कर स्टार्ट होती है। रास्ते में राधे बताता है कि पूरन अभी-अभी शादी करके आया है।...और भक्क से ज़ूम हुए लैंस में चेहरे की उस अजीब मुस्कान का रहस्य खुलता है।...कमबख्त ख्वाब में है अपनी नयी-नवेली दुल्हन के। सोचता हूँ, कितनी क्रूरता होगी ये...उसे उसके ख्वाब से जगाना।
किंतु ये क्रूरता तो करनी पड़ेगी। महज ड्यूटी या कर्तव्यपरायणता के ख्याल से नहीं...उस नयी-नवेली दुल्हन के सुरक्षित भविष्य के लिये भी...
जीप झटके से रूकती है।
"कैसे हो पूरन?"
"जय हिंद, साब! ठीक हूँ साब!!"
एक कड़क सैल्यूट। एके पर उसकी पकड़ मजबूत हो जाती है।
"...तू ने अपनी शादी की मिठाई तो खिलाई ही नहीं...."
ड्यूटी का एक और बारिश भरा दिन सही-सलामत निकल जाता है।