05/12/11

इक रतजगे की तासीर और सिलवटों में उलझे चंद सवाल...

रात के ढाई बजे (रात के? या सुबह के??...) दूर कहीं पटाखों के फूटने की आवाज़ें आती हैं और किसी अनिष्ट की आशंका से नींद खुलती है चौंक कर| हड़बड़ायी-सी नींद को बड़ा समय लगता है फिर आश्वस्त करने में कि ये कश्मीर नहीं है...छुट्टी चल रही है...घर है, जहाँ तू बेफ़िक्र हो सुकून के आगोश में ख़्वाबों से गुफ़्तगू करती रह सकती है| उचटी हुई नींद का अफ़साना, लेकिन, जाने किस धुन पे बजता रहता है रात भर...वक़्त की उलझनों से परे, समय की दुविधाओं से अलग| सुकून का आगोश फिर कहाँ कर पाता है ख़्वाबों से गुफ़्तगू| किसी असहनीय निष्क्रियता का अहसास जैसे उस आगोश में काँटे पिरो जाता हो...उफ़्फ़ ! अधकहे से मिसरे...अधबुने से जुमले रतजगों की तासीर लिखते रहते हैं करवटों के मुखतलिफ़ रंग से बिस्तर की सिलवटों के बावस्ता...कोई तो कह गया था वर्षों पहले फुसफुसा कर "कश्मीर ग्रोज इन्टू योर नर्व्स"....ओ यस ! इट डज !! इट सर्टेनली डज !!!

सुना है,
छीनना चाहते हो वो हक़ सारे
कभी दीये थे जो तुमने
इस (छद्म) युद्ध को जीतने के लिये

अहा...! सच में?

छीन लो,
छीन ही लो फौरन
कि
सही नहीं जाती अब
झेलम की निरंतर कराहें
कि
देखा नहीं जाता अब और
चीनारों का सहमना

कहो कि जायें अपने घर को
हम भी अब...
खो चुके कई साथी
बहुत हुईं कुर्बानियाँ
और...कुर्बानियाँ भी किसलिये
कि
बचा रहे ज़ायका कहवे का ?
बुनीं जाती रहे रेशमी कालीनें ?
बनीं रहे लालिमायें सेबों की ?
या
बरकरार रहे फिरन के अंदर छुपे
कांगड़ियों के धुयें की गरमाहट...?

लेकिन ये जो एक सवाल है, उठता है बार-बार और पूछता है, पूछता ही रहता है कि...बाद में, बहुत बाद में वापस तो नहीं बुला लोगे जब देखोगे कि वो खास ज़ायका कहवे का तो गुम हुआ जा रहा है फिर से...जब पाओगे कि कालीनों के धागे तोड़े जा रहे हैं दोबारा...जब महसूस करोगे कि सेबों की लालिमा तो दिख ही नहीं रही और तार-तार हुये फिरन में छुपे कांगड़ियों का धुआँ तक नहीं रहा शेष| फिर से बुलाओगे तो नहीं ना वापस ऐसे में? तुम्हें नहीं मालूम कि मुश्किलें कितनी होंगी तब, सबकुछ शुरू से शुरू करने में...फिर से...

...रतजगे की तासीर मुकम्मल नहीं होती और सुबह आ जाती है तकिये पर थपकी देती हुई| नींद को मिलता है वापस सुकून भरा आगोश| सुना है, सुबह में देखे हुये ख़्वाब सच हो जाते हैं...!


36 टिप्पणियाँ:

रविकर said...

सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई स्वीकारें ||

chitrayepanne.blogspot.com

प्रवीण पाण्डेय said...

बाहर की तपिश धीरे धीरे खून में घुलने लगती है। हड़बड़ा कर उठना अन्दर का हिलोर दिखाता है।

रचना said...

गौतम
पढ़े हुए सच और महसूस किये हुए सच , का सच , इतनी बारीकी से उजागर कर दिया .
अब तो अपने उन फौजी भाइयों के ना रहने का सच इतनी टीस देता हैं जिसको शब्द नहीं दे सकती
वापस आ कर फिर जाना और फिर कभी वापस ना आना नियति लगता हैं नहीं बनाई जा रही हैं
सस्नेह
रचना

दर्पण साह said...

Monday ! The same 'Monday' as it use to be. :-)

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

दर्द है, असलियत है। लेकिन फिर भी, "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषुकदाचन..."

इस्मत ज़ैदी said...

हम भी अब...
खो चुके कई साथी
बहुत हुईं कुर्बानियाँ
और...कुर्बानियाँ भी किसलिये
कि
बचा रहे ज़ायका कहवे का ?
बुनीं जाती रहे रेशमी कालीनें ?
बनीं रहे लालिमायें सेबों की ?
या
बरकरार रहे फिरन के अंदर छुपे
कांगड़ियों के धुयें की गरमाहट...?

सच है गौतम तुम्हारे और तुम जैसे सभी जवानों के लिये ये सब कुछ कितना कष्टदायक है इसे हम समझ ही नहीं सकते क्योंकि हम तो तुम सब के कारण सुरक्षित और चैन की नींद सोते हैं ,,
वाक़ई ये इतनी क़ुर्बानियाँ किस लिये ?
मुझे तो बस यही शेर याद आता है कि --
"ग़ैर मुम्किन है कि हालात की गुत्थी सुलझे
अह्ल ए दानिश ने बहुत सोच के उल्झाई है"

देवेन्द्र पाण्डेय said...

दर्द को शब्द मिले
शब्द को पंख
उड़ते-उड़ते बैठ गई आ कर
मेरे लैपटॉप पर
मैने हौले से उसे छूना चाहा
फुर्र से उड़ गई
..धुत्त पागल!

कई बार हुआ है ऐसा
उसकी चहचहाटों को सुनकर
खुश हुआ हूँ
और महसूस किया है बाद में
वह चहक नहीं रही थी
प्यासी थी
पानी मांग रही थी।

दीपक बाबा said...

कश्मीर...

पता नहीं कितनी पीढियां सजा पाएंगी...

शिवम् मिश्रा said...

जय हिंद , मेजर !

अब क्या कहे ... सियासत का खेल चल रहा है ... किसी को क्या फर्क पड़ता है ... कश्मीर का जो हो सो हो ... उनका वोट बैंक बना रहे बस !
आपका दर्द समझ में आता है ... पर क्या करें कि हम में से किसी के पास भी इस दर्द की दवा नहीं है ... और जिन के पास दवा है उनको इस दर्द का अहेसास नहीं !

अभी थोडा समय लगेगा चैन से सोने में ... आदत बड़ी कुत्ती चीज़ होती है ... एक बार जैसी पड़ जाए ... फिर बदलने में समय तो लगता ही है !

अपना ख्याल रखना !

anshubhai said...

अब केवल आवश्यकता है हिम्मत की खुद्दारी की
दिल्ली केवल दो दिन की मोहलत दे दे तैय्यारी की
सेना को आदेश थमा दो घाटी ग़ैर नहीं होगी
जहाँ तिरंगा नहीं मिलेगा उनकी खैर नहीं होगी

सागर said...

आमीन... !

सागर said...

और हाँ... मंडे के मंडे... पक्का ? वादा ??
कोशिश कम से कम !

ana said...

pratyek shabd ek alag kahani bayaan kar rahi hai...adbhut

कौशलेन्द्र said...

एक लम्बे समय के बाद ही सही .....स्वागत है.
गौतम जी ! लगता है ढुल-मुल और दोमुही नीतियों से तंग आ चुके हो ....मामला आर-पार का हो जाना चाहिए ...सभी यही चाहते हैं....पर वे नहीं चाहते जिन्हें वास्तव में चाहने के लिए हमने उन्हें अधिकृत किया हुआ है .......शायद भारत की यही नियति है ......और फौजी की भी .......यूँ भी एक नादाँ सा रोग तो पाल ही चुके हो ......निभाना पड़ेगा ....कोई रोग ज़ल्दी पीछा कहाँ छोड़ता है ?
और हाँ ! यह अच्छी कही, वापस आ जाने के बाद दुबारा नहीं जाना पड़ेगा ...इसकी कोई गारंटी नहीं. कश्मीर का ऐसा भाग्य कहाँ ? ऐसा होता तो राजा हरी सिंह की नींद बहुत पहले ही खुल गयी होती ......वे जिस मुगालते में थे ...मुगालते की वही परम्परा आज भी कायम है ...उनकी रियाया में.

कंचन सिंह चौहान said...

बहुत दिन बाद सैनिक ने आँखें नम की....

ऊहुँ..खुली आँख के सपने सच नही होते....ये भ्रम है..... डर जिसे छोड़ आये हो....

और ईश्वर आपके इस सपने को कभी सच ना करें, जिसमें सुधरी चीजें बिगड़ जायें और बहुत सी बहने सुबह से शाम तक फोन ना आने से वैसे ही घबड़ा जायें जैसे सैनिक घबड़ा गया पटाखों की आवाज़ से। कोई अच्छा विचार आये ही ना, लाख लाने की कोशिश करो फिर भी। सारे दोस्तों, साथियों के फोन घनघना दिये जायें और वो सब बेचारे झूठ बोलते रहें, इण्टरनेट के सारे पेज सर्फ कर डाले जायें और टी०वी० पर समाचार से ज्यादा नीचे छोटे अक्षरों में लिखी छोटी छोटी न्यूज़ पर ज्यादा ध्यान दिया जाये, जो कहीं अपनी बहुत बड़ी न्यूज़ ना हो जाये इस आशंका के साथ........

तुम हज़ार साल जियो....

shikha varshney said...

२ बार पढ़ चुकी हूँ..पर शब्द नहीं मिल रहे कुछ कहने को.
बस दुआ है आपका सपना सच हो जाये.बनी रहे कहवे की गर्माहट,सेबों का रंग और फिरन का धुंआ..आमीन.

अनूप शुक्ल said...

चकाचक है! :)

रचना दीक्षित said...

गौतम कितना नज़दीक से महसूस किया है कश्मीर का जहन तुमने जिसकी यादें सोते जागते भी साथ हैं. बहुत संवेदनशील पोस्ट और एक प्रश्नचिन्ह लगाती जिम्मेदार लोगो के निर्णय लेने की क्षमता पर.

SKT said...

एक कवि हृदय सैनिक का घाटी के हालातों पर सुंदर तफ़सरा!!

ajit gupta said...

आपका दर्द आपके शब्‍दों से बह निकला है। आज उन्‍हें जरूरत नहीं है सेना की, लेकिन कल फिर जरूरत आन पडेगी तब? तब कितना कठिन होगा परिस्थितियों को सम्‍भालना, ये बाते राजनीतिज्ञ नहीं जानते। बहुत से राज हैं सियासत के।

Abhishek Ojha said...

I still think I can not feel even a fraction of what you do... but still...

रंजना said...

दर्द इन शब्दों संग बह दिल में उतर आया ... जमी पडी आक्रोश और पीड़ा उबल कर बहने लगीं आँखों से...

सियासत इतनी गंदी क्यों होती है...???

यह मरना मारना,लुकाछिपी...क्या आम लोगों की पसंद है...???

डिम्पल मल्होत्रा said...

हम्म ..सुबह के देखे सपने जो किसी को बताओ नही तो सच हो जाते है जो बता दो तो झूठ...

आशा जोगळेकर said...

.बाद में, बहुत बाद में वापस तो नहीं बुला लोगे जब देखोगे कि वो खास ज़ायका कहवे का तो गुम हुआ जा रहा है फिर से...जब पाओगे कि कालीनों के धागे तोड़े जा रहे हैं दोबारा...जब महसूस करोगे कि सेबों की लालिमा तो दिख ही नहीं रही और तार-तार हुये फिरन में छुपे कांगड़ियों का धुआँ तक नहीं रहा शेष| ।

यही सवाल हर जवान को और हर सिविलियन को घेरे हैं ।

आपकी जीवट शक्ती को सलाम ।

Manish Kumar said...

सैनिकों की मनःस्थिति को बड़ी खूबसूरती से व्यक्त कर गया आपका ये पाडकास्ट !

डॉ .अनुराग said...

साडा हक से इन्स पायर्ड हो गए मेजर .....रतजगे की आदत बड़ी जालिम है ...एडिक्शन का खतरा बना रहता है ....कश्मीर अभी तुम्हारी नसों में कई रोज बहेगा ........

manu said...

:)

chaliye...
kam-se-kam post hi aayi....

अंकित "सफ़र" said...

कई सवालों की तासीर ही ऐसी होती है कि उनके लिए कोई मुकम्मल जवाब नहीं होता.

singhSDM said...

गौतम जी
अरसे बाद आयी आपकी इस पोस्ट के मार्फ़त झेलम की कराह सुनने को मिली.....!
साहब जी ..... क्या लिखते हैं आप, दिमाग के सारे तंतु हिला देते हैं..... हम सब कश्मीर के हाल से मुतास्सिर हैं भले ही हममें से बहुत से लोगों ने कश्मीर कभी न देखा हो..... चूँकि हमने तो कश्मीर को और वहां के समग्र जनजीवन को समीप से देखा है,तो यह दर्द और भी महसूस होता है.
सार्थक प्रस्तुति भोगे हुए और जीए हुए सच के साथ....!

sumit said...

dear sir
your posts are as refreshing as ever.
using net after more than 2 years.
the post echoes the same sentiments which i felt after leaving the valley.
i can clearly recognise the picture in blog,the quintessential chinar tree, the bend of river jhelum, and the village on far bank.
i feel coonected to the post an i believe the feeling is mutual.

anju(anu) choudhary said...

काश्मीर समस्या ...इतना दर्द समेटे हुआ है आपके इस लेख में ....और कोई नहीं जनता की इस दर्द की कोई सीमा है भी या नहीं ...

अजय कुमार झा said...

सोचता हूं जो ये मेजर ब्लॉगर न होता ...तो कैसे ये दर्द ये सोच , ये अहसास ठीक ठीक वैसा का वैसा हम तक पहुंचता ।

कीप गोइंग मेज़र , कीप गोइंग ।

बहुत बहुत शुभकामनाएं आपको

RC said...

Leaves you speechless and with a sigh.

avanti singh said...

kya kaha jaye ye post padh kar.....khamosh rhna hi behtr hai....behtareen.....

Udan Tashtari said...

एक सच्चे सैनिक की मानसिक उथल पुथल...बेहतरीन प्रस्तुति!! अहसासा इसे करीब से. अनेक शुभकामनाएँ.

अल्तमश इक़बाल said...

गौतम सा'ब जंग तो चंद रोज़ की होती है, इंसानियत सदियों रोती है. रश्क होता है कभी पंछी, नदिया, पवन के झोकों से...