कई दिन हो गए थे ब्लौग पर अपनी कोई ग़ज़ल लगाए हुये, तो एक पुरानी ग़ज़ल जो आपसब में कुछ लोगों ने पहले ही यहाँ पढ़ी होगी, पेश है| ग़ज़ल में इन नए बिंबों के इस्तेमाल का विचार बशीर बद्र साब के एक शेर से मिला| उनका ये शेर " शावर के नीचे घुलती जाती है शाम/मेरी आँखों पर इक टावल लिपटी है " मुझे बहुत ही पसंद है| ये रही मेरे ग़ज़ल:-
जब तौलिये से कसमसाकर ज़ुल्फ उसकी खुल गयी
फिर बालकोनी में हमारे झूम कर बारिश गिरी
करवट बदल कर सो गया था बिस्तरा फिर नींद में
बस आह भरती रह गयी प्याली अकेली चाय की
इक गुनगुनी-सी सुब्ह शावर में नहा कर देर तक
बाहर जब आई, सुगबुगा कर धूप छत पर जग उठी
उलझी हुई थी जब रसोई सेंकने में रोटियाँ
सिगरेट के कश ले रही थी बैठकी औंधी पड़ी
इक फोन टेबल पर रखा बजता रहा, बजता रहा
उट्ठी नहीं वो 'दोपहर' बैठी रही बस ऊँघती
लौटा नहीं है दिन अभी तक आज आफिस से, इधर
बैठी हुई है शाम ड्योढ़ी पर ज़रा बेचैन-सी
क्यूँ खिलखिला कर हँस पड़ा झूला भला वो लॉन का
आई ज़रा जब झूलने को एक नन्ही-सी परी
...रज़ज की इस बहर पर कई प्यारी धुनें हैं| कुछ ग़ज़ल जो इस वक्त याद आ रही हैं मुझे ... एक तो इब्ने इंशा की "कल चौदवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा" , दूसरी बशीर बद्र साब का ही "सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं" और तीसरी मोहसिन साब की "ये दिल ये पागल दिल मेरा क्यों बुझ गया आवारगी"....
फिलहाल विदा!
52 टिप्पणियाँ:
kyaa baat hai bahut de rang bikhre hai
जब आप प्रतीकों के माध्यम से बात करते हैं तो बस क़यामत .... क़यामत.... क़यामत....
थोड़ा सा रूमानी हो जायें............. :)
उलझी हुई थी जब रसोई सेंकने में रोटियाँ
सिगरेट के कश ले रही थी बैठकी औंधी पड़ी
बिलकुल सही तस्वीर पेश की है गौतम :)
क्यूँ खिलखिला कर हँस पड़ा झूला भला वो लॉन का
आई ज़रा जब झूलने को एक नन्ही-सी परी
क्यूँ खिलखिला कर हँस पड़ा झूला भला वो लॉन का
बहुत प्यारा शेर !
"क्यूँ खिलखिला कर हँस पड़ा झूला भला वो लॉन का
आई ज़रा जब झूलने को एक नन्ही-सी परी
"
This was really good... I loved it.
holi shubh ho
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (17-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com/
achhi ghazal.
उलझी हुई थी जब रसोई सेंकने में रोटियाँ
सिगरेट के कश ही ले रही थी बैठकी औंधी पड़ी
वाह !
वाह !!
वाह !!!
ये इस्तिआरे, ये लक़ब, ये पेशकश, ये बानगी
हैरान हो देखा किये, बस बाँध कर हम टिकटिकी
गौतम भाई
छुट्टियों का आनंद उठा रहे हो ये बात आपकी इस ग़ज़ल से स्पष्ट हो गयी., इसे जब जब पढता हूँ मन में एक झुरझुरी सी आ जाती है...शब्दों का नूठा प्रयोग किया है आपने जो दर्शाता अब आप किस पाए के शायर हो गए हैं...मेरी दुआ है के आप ऐसी ही बेहतरीन ग़ज़लें हमेशा कहते रहें...ये शेर मेरे पास है और हमेशा रहेंगें:-
इक गुनगुनी-सी सुब्ह शावर में नहा कर देर तक
बाहर जब आई, सुगबुगा कर धूप छत पर जग उठी
लौटा नहीं है दिन अभी तक आज आफिस से, इधर
बैठी हुई है शाम ड्योढ़ी पर ज़रा बेचैन-सी
क्यूँ खिलखिला कर हँस पड़ा झूला भला वो लॉन का
आई ज़रा जब झूलने को एक नन्ही-सी परी
चाहता हूँ जब तक थकूं नहीं इस ग़ज़ल को पढता रहूँ और तालियाँ बजता रहूँ...
नीरज
गुरुदेव को एक ग़ज़ल भेजी थी इस्लाह के लिए जो अभी भी उनके दरबार में झुकी कोर्निश बजा रही हैं लेकिन हुज़ूर शायद फुर्सत में नहीं हैं, अपनी नज़रे इनायत ही नहीं फरमा रहे...खैर ग़ज़ल के आखिर में एक शेर, जो ग़ज़ल के बाहर है, भी भेजा था जिसे आपकी छुट्टियों की खबर जानने के बाद कहा था सुनिए:-
छुट्टी मिली थी फ़ौज से बस एक माह की
अफ़सोस तिश्नगी को महीना बढ़ा गया
nice thoughts. ur story in Hans is also quite impressive...Kudos..!
करवट बदल कर सो गया था बिस्तरा फिर नींद में
बस आह भरती रह गयी प्याली अकेली चाय की
अब ठण्डी होती चाय को इतना काव्यात्मक रूप मिल जायेगा, यह आपकी ही कल्पना से संभव है।
दुनिया में दो तरह के लोग हैं,
एक जिन्होंने ये ग़ज़ल पढ़ी है.
और दुसरे तरह के लोगों के ऊपर अफ़सोस है मुझे...
क्यूँ खिलखिला कर हँस पड़ा झूला भला वो लॉन का
आई ज़रा जब झूलने को एक नन्ही-सी परी
wah kya ghazal h..
ek ek sher beshkeemti h..
abhaar.
लौटा नहीं है दिन अभी तक आज आफिस से, इधर
बैठी हुई है शाम ड्योढ़ी पर ज़रा बेचैन-सी
क्या बात है गौतम जी. हमने नहीं पढी थी ये ग़ज़ल, अच्छा किया दोबारा पोस्ट कर के. बहुत सुन्दर.
इक गुनगुनी-सी सुब्ह शावर में नहा कर देर तक
बाहर जब आई, सुगबुगा कर धूप छत पर जग उठी
-वाह!! क्या बत है.
गजब-गजब गजल लिख रहे हैं आजकल जी। तारीफ़ के लिये मजबूर करते हैं! शानदार!
ब्लाग भी कुछ ज्यादा ही हसीन लग रहा है। बधाई हो!
लौटा नहीं है दिन अभी तक आज आफिस से, इधर
बैठी हुई है शाम ड्योढ़ी पर ज़रा बेचैन-सी
..यह प्रयोग नया / अच्छा लगा।
:-)
इस गजल की जितनी तारीफ की जाए कम है। बेहद गुनगुना सा अहसास।
गुनगुनाती सुबह का शावर में नहाना ,दोपहर का ऊँघना , शाम की बेचैनी ...
लाजवाब , और क्या कहें !
शानदार। इससे बेहतर और क्या तारीफ करू। आभार। होली की शुभकामनाएॅ।
पढ़कर गजल ये मन मेरा चढ़ अटरिया पे गया,
हर शेर मुझको यूं लगा जैसे कंवारा हो अभी /
मन मस्तिष्क में सदा सदा के लिए घर कर चुकी इस ग़ज़ल को दोबारा पढ़ कर बहुत अच्छा लगा गौतम भाई| समस्या पूर्ति ब्लॉग पर पंकज जी के दोहे पढ़ने के लिए पधारिएगा http://samasyapoorti.blogspot.com/
टाइटल ने तो ग़ज़ब ढ़ा दिया...... मुझे तो दौड़ कर अपनी बालकनी में जाना पडा.... और देखा तो हर तरफ बारिश गिरी पड़ी थी... हर बारिश को मुझे समेटना पडा और समेट कर ..... कमेन्ट करना पडा... हर अश' र ग़ज़ब के हैं... और परीवश ...तासीर है...
गजल की विधान, व्याकरण अपन से दूर है तो हम रोमांटिज्म्म पर बात कर सकते हैं :)
हम आये हुए/कहे हुए कमेंट्स की बात कर सकते हैं मसलन चार चाँद (आपका लिखा) और एक और पांचवां सिर्फ आपके कहे हुए से नहीं लग रहा, मसलन -
इससे
छुट्टी मिली थी फ़ौज से बस एक माह की
अफ़सोस तिश्नगी को महीना बढ़ा गया
इससे
दुनिया में दो तरह के लोग हैं,
एक जिन्होंने ये ग़ज़ल पढ़ी है.
और दुसरे तरह के लोगों के ऊपर अफ़सोस है मुझे...
और इससे भी लग रहा है
जब आप प्रतीकों के माध्यम से बात करते हैं तो बस क़यामत .... क़यामत.... क़यामत.
अंत में अपनी बात, छुट्टी जो ना कराये :):):)
हाँ, शीर्षक ने इश्तियाक पैदा कर दी... जाहिर है यह भी सबका अपना अपना होता है :)
बेहतरीन गज़ल । आभार ।
इन दिनों मूड कुछ अजीब सी बेख्याली में है..... कुछ अजीब सा दिन ....जहाँ सोच ग्राफ की माफिक इतने कर्व लेती है .......के .....
छुट्टिया कितनी लाजिमी होती है न....कलम वास्ते भी ...डेस्क से पर स्टूल पे रखे उस गिलास वास्ते भी.....ओर मेजर वास्ते भी......
लोग कहते है तुम अब मेजर से ऊँचे हो गए तो तुम्हे मेजर न कहूँ.......
पर ये मेजर तुम्हे बहुत "सूट" करता है ...है न मेजर !!
गज़ब के बिम्ब हैं ...लाजबाब.
बड़ी ही अनूठी और अच्छी लगी आपकी प्रस्तुति..........
होली का त्यौहार आपके सुखद जीवन और सुखी परिवार में और भी रंग विरंगी खुशयां बिखेरे यही कामना
इसमें जो आनंद है भाई सा उसे बताने को एक ग़ज़ल कहनी पड़ेगी मुझे. फिर कभी फुर्सत में.
होली तो आचार्य जी संग मन चुके हमलोग. अब नींदिया आ रही, सुबह ऑफिस के लिए उठाना है. शब्-खैर.
बालकोनी,बिस्तरा,शावर,लान ....
शायरी में नए नए शब्दों का इस्तेमाल खूब भा रहा है मेज़र...
डॉक्टर साब की बात से सौ प्रतिशत सहमत...
दिल चाहता है कि आप को ईश्वर भारतीय सेना के सर्वोच्च स्थान पर बैठाए...
पर इस कमबख्त जुबां का क्या करें....
जो मेज़र से आगे सरकती ही नहीं है...
कुछ आप पर ये मेज़र शब्द सूट भी ज़्यादा ही करता है...कुछ हमारा अपना भी स्वार्थ है...
:)
एकदम तरोताजा कर देने वाले शे'र पेश किये हैं...
एक ही ग़ज़ल में बारिश कि हलकी फुहार का....नहाने का...
नींद का और चाय का....
सिगरेट का और रोटी का....
दोपहर के मस्त अलसाने का....और शाम के खुशनुमा इंतज़ार का....
सारे रंग बेहद आनंद दे रहे हैं.....
कमेन्ट के लिए दो तीन दिन से कमेन्ट बॉक्स खोलते थे...कुछ देर सोचने के बाद वापस बैक करते थे...दोबारा पढने के लिए...
और फिर जाने कब सोचते मुस्कुराते हुए कोई न कोई बच्चा आकर बैठ जाता था...कि पापा...
नेट से उठो..मुझे काम करना है....
:)
और हाँ..
आखिरी शे'र में 'नन्ही-परी' शब्द का बहुत ही दिलकश प्रयोग किये हो......
इसे पढ़ते हैं और नन्ही परी का चेहरा आँखों के आगे लाने की कोशिश करते हैं...
:)
oos taraf sabhi ko hairan-parishan kar..........is taraf as-aar pharma rahe hain barkhurdar....aur hame khabar bhi nahi........
jitna waffa yahan major ko(is post) dekhne/samjhne me lagaye utne me darzan/aadh darzan galiyan ghoom kar
farig ho leta........
sallute to you major.
सुपरलाईक्ड इट..
गौतम भाई.....
यकीन मानिये, ब्लॉग पर जिस आदमी की पोस्ट पढने को मन हमेशा बेताब रहता है वो आप ही हैं. आपके लेखन से एक अजीब सी मोहब्बत है मुझे. उस पर कहीं आपकी ग़ज़ल मिल जाये तो फिर क्या कहने.....! ये नयी ग़ज़ल तो बद्र साहब के ट्रैक पर लिखी हुयी वो बेहतरीन ग़ज़ल है जिसमे नए नए इफेक्ट और नए नए इमेजिनेसंस हैं...! ग़ज़ल क्या .... पोर्टेट है दोस्त, तारीफ जितनी की जाये उतनी कम.....! बद्र साहब की कई ग़ज़लें याद आ गयी आपके बहाने. फिलहाल तो आपकी ग़ज़ल के हर शेर पर भरपूर दाद....!
क्यूँ खिलखिला कर हँस पड़ा झूला भला वो लॉन का
आई ज़रा जब झूलने को एक नन्ही-सी परी
इस शेर पर दाद क़ुबूल करें क्योंकि इस शेर में प्रयोग नए हैं मगर एहसास वही हैं जो सदियों से हरेक बाप के जेहनो-दिल में पाले चले आ रहे हों.....!
****** ये शेर तो हम जैसे सरकारी गुलामों पर कहीं ज्यादा मुफीद लगता है.....
लौटा नहीं है दिन अभी तक आज आफिस से, इधर
बैठी हुई है शाम ड्योढ़ी पर ज़रा बेचैन-सी
लौटा नहीं है दिन अभी तक आज आफिस से, इधर
बैठी हुई है शाम ड्योढ़ी पर ज़रा बेचैन-सी
Kya anokhe prateek istemal kiye hain. Bahut hee achchee lagi ye gajal.
गौतम जी, हालांकि परंपरागत क़ाफ़ियों का प्रयोग अपनी जगह होता है, और उसमें हर शायर अपने अपने तौर पर बेहतर कहने की कोशिश भी करता है. इससे अलग, जब भी शायरी में खूबसूरत प्रयोग हुआ है, उसे सभी ने पसंद किया है. और आपकी ये ग़ज़ल इस बात की दलील बन गई है...
मुबारकबाद कबूल फ़रमाएं.
bahut khoob....likha apne!!
Jai HO Mangalmay ho
बेहतरीन .......
कमाल कर दिया
वाह! वाह!
sir ji aapki "tauliye" waali shayeri ne to dewwana kar diya aapki kala ka. . :)
sir ji hamare kushkikritiyan.blogspot.com ki hindi rachnayo per aapki tippani badi madadgaar siddh ho sakti hai mere liye. . kripya kasht karen. . :)
बेहतरीन ग़ज़ल !
मुझे ख़ुशी है कि मैं दर्पण साह जी के 'दुसरे तरह के लोगों वाली' कटेगरी में नहीं हूँ :)
उस तौलिये से इस कदर सैलाब आया मरहबा,
सब्र का झट बांध टूटा कि क़यामत आ गई.
शुष्क रेगिस्तान जलता, जलजले से यूँ पटा ,
कमनीय काया सा भिगोया वो रुपहला बुर्ज दुबई.
मोती मिला मानुष हिला कि चून गीला हो गया,
जो सून बिन-पानी रहे, पानी हुए पानी हुए
वे कंटीले झाड़ सारे, खिलखिलाकर हँस पड़े
संग जिनके अब खिलेंगे, प्यार के अरुणिम-गुलाब
आस्मां हरदम जहाँ होता रहा था आसमानी
पहली दफा वो जिंदगी में इन्द्र-धनुषी हो गया
तेल के सूखे कुएं में आज पानी जा घुसा
मंडूक ने टर-टर सुनाई मीन प्यासी मर गई
उफ्फ्फ्फ़...........
यूँ तो हर शेर बेहतरीन है, मगर इस शेर की मासूमियत, खूबसूरती जानलेवा है.
"क्यूँ खिलखिला कर हँस पड़ा झूला भला वो लॉन का
आई ज़रा जब झूलने को एक नन्ही-सी परी"
From: Roopam Chopra
To: gautam rajrishi
Sent: Sat, 26 March, 2011 8:09:43 AM
Subject: जब तौलिये से कसमसाकर ज़ुल्फ उसकी खुल गयी
जब तौलिये से कसमसाकर ज़ुल्फ उसकी खुल गयी
this one is so beautiful !!!! It has its own special and different fragrance .. i think you have a unique ability to pick speicalities of common life and you can set your own different and new style in Shayari if you write more like this. Just like Munavvar Rana has his own style, you wd be very famous with this Rajrishi style. People do write like this but this is really different and wonderful.
Badhai.
किसने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी...
झूम के आई घटा टूट के बरसा पानी...
इसे पढ़ कर दिमाग में यही घूमने लगा.
गजलों की जुबान में शब्दों का एकदम नया प्रयोग चौंकाता तो है लेकिन अच्छा है । दरअस्ल, गजल की नाजुकता थोडे रफ शब्दों से हैरान हुई लगती है लेकिन कथ्य का नयापन सब मंजूर करता है । बधाई ।
gazab ki likhai. man prafullit ho gaya. imandaar aur bebak tippani kaise den. khushi lafzo me bayan nahi ki jaa sakti .
बहुत खूब सर!
सादर
आनंद आया शानदार गज़ल पढ़कर...
सादर आभार.
lajabab!!:)
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