सोचा, बहुत दिन हो गये आपलोगों को अपनी ग़ज़ल से बोर किये हुये। तो आज एक ग़ज़ल- एकदम नयी ताजी। जमीन अता़ की है फ़िराक़ गोरखपुरी साब ने...."बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं/तुझे ए ज़िन्दगी, हम दूर से पहचान लेते हैं"...सुना ही होगा आपसब ने?...तो इसी जमीन पर एक तरही मुशायरे का आयोजन हुआ था आज की ग़ज़ल के पन्नों पर। उसी मुशायरे से पेश है मेरी ग़ज़ल:-
हमारे हौसलों को ठीक से जब जान लेते हैं
अलग ही रास्ते फिर आँधी औ’ तूफ़ान लेते हैं
बहुत है नाज़ रुतबे पर उन्हें अपने, चलो माना
कहाँ हम भी किसी मगरूर का अहसान लेते हैं
तपिश में धूप की बरसों पिघलते हैं ये पर्वत जब
जरा फिर लुत्फ़ नदियों का ये तब मैदान लेते हैं
हुआ बेटा बड़ा हाक़िम, भला उसको बताना क्या
कि करवट बाप के सीने में कुछ अरमान लेते हैं
हो बीती उम्र शोलों पर ही चलते-दौड़ते जिनकी
कदम उनके कहाँ कब रास्ते आसान लेते हैं
इशारा वो करें बेशक उधर हल्का-सा भी कोई
इधर हम तो खुदाया का समझ फ़रमान लेते हैं
है ढ़लती शाम जब, तो पूछता है दिन थका-सा रोज
"सितारे डूबते सूरज से क्या सामान लेते हैं?"
...बहरे हज़ज के इस मीटर पर कुछ गीतों और ग़ज़लों के बारे में जिक्र किया था मैंने अपनी पिछली ग़ज़ल सुनाते समय। फिलहाल कुछ और गाने जो याद आ रहे हैं इस बहरो-वजन पर...एक तो रफ़ी साब का गाया बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है...रफ़ी साब की ही गायी एक लाजवाब ग़ज़ल भरी दुनिया में आखिर दिल को समझाने कहाँ जाये...और एक याद आता है मुकेश की आवाज वाला तीसरी कसम का वो अमर गीत सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है। इस बहर पर एक गीत जो सुनाना चाहूंगा, वो है गीता दत्त और मुकेश की आवाज में फिल्म बावरे नैन का जो मुझे बेहद पसंद है खयालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते । लीजिये सुनिये गीता दत्त की मखमली आवाज:-
पुनश्चः -
अपनी लिखी ग़ज़लों के बहरो-वजन पर उपलब्ध फिल्मी गीत या सुनी ग़ज़लों का जो मैं अक्सर जिक्र करते रहता हूँ अपनी पोस्ट पर, उसका उद्देश्य कहीं से भी अपना ज्ञान बघारना नहीं है, बल्कि मैं खुद के लिये इसी बहाने एक डाटा बेस तैयार कर रहा हूँ और मेरे ही जैसे अन्य नौसिखुये को ये बताना है कि एक बहरो-वजन की किसी भी धुनों पर हम अपनी उसी बहरो-वजन पे लिखी रचना को गुनगुना सकते हैं। इधर छुट्टियाँ संपन्न होने को आयी। अगली पोस्ट में मिलूँगा आपसब को वादिये-कश्मीर से।
मैं
- गौतम राजरिशी
- वो कौन हैं जिन्हें तौबा की मिल गयी फ़ुरसत / हमें तो गुनाह करने को जिंदगी कम है...
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सितारे डूबते सूरज से क्या सामान लेते हैं
Monday 23 November 2009प्रस्तुतकर्ता गौतम राजरिशी पर 6:00 AM 48 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: बहरे हज़ज, ग़ज़ल, फ़िराक गोरखपुरी
हे हर, हमहु पैहरब गहना...
Monday 16 November 2009छुट्टियाँ बीत रही हैं....बीतती जा रही हैं। हर रोज मिलने-जुलने वालों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा और मिलने-जुलने वाले घाव-चोट से अधिक इच्छुक उस घटना का विस्तार जानने में रहते हैं। मिथिलावासियों को वैसे भी गप्प-सरक्का का व्यसन होता है। मैं मैथिल हूँ और अचानक से ये मैथिल होना मेरे ब्लौगर होने को धिक्कारने लगा कि कैसा मैथिल हूँ कि अभी तक बस अपने लिखे ग़ज़लों से बोर करता रहा हूँ आपसब को।...तो आज परिचय करवाता हूँ एक बहुत ही सुंदर मैथिली गीत से।
विख्यात मैथिली-कवि विद्यापति के नाम से तो आपसब परिचित ही होंगे। उनके लिखे गीत खूब उपलब्ध हैं नेट पर भी। लेकिन जो गीत मैं सुनाने जा रहा हूँ, वो उनका लिखा तो नहीं किंतु उन्हीं की शैली में है बहुत ही प्यारी धुन पर।
गीत में गौरी{पार्वती, उमा} शिकायत करती हैं शिव से कि उनके पास पहनने को कोई गहना नहीं है। लक्ष्मी और सरस्वती तो खूब हीरे-मोतियों के गहने पहनी रहती हैं और उनका उपहास उड़ाती हैं। शिव करूणामय हो उठते हैं और अपने शरीर से एक चुटकी भस्म निकाल कर गौरी को देते हैं और गौरी को उस भस्म के साथ कुबेर{धनपति} के यहाँ भेजते हैं। कुबेर उस एक चुटकी भस्म को देखकर गौरी से कहते हैं कि इस भस्म के समतुल्य तो संसार का कोई गहना ही नहीं है और साबित करने के लिये उस एक चुटकी भस्म को तौलने के लिये पलड़े पे रख देते हैं। कुबेर के भंडार की समस्त संपत्ति दूसरे पलड़े पे चढ़ जाती है लेकिन वो भस्म वाला पलड़ा फिर भी नहीं उठता है। चकित गौरी वो एक चुटकी भस्म उठाये वापस शिव के चरणों मे आ गिरती हैं और कहती हैं कि उन्हें अब कोई गहना नहीं चाहिये।
अब सुनिये ये अद्भुत गीत मेरी सबसे पसंदीदा गायिका की आवाज में...नहीं, दूसरी सबसे पसंदीदा गायिका की आवाज में। सर्वाधिक पसंदीदा गायिका का खिताब आजकल छुटकी तनया ने हथिया लिया है।...तो पेश है ये बेमिसाल गीत तनया की मम्मी की आवाज में:-
हे हर, हमरो किन दिय गहना
हे हर, हमहु पैहरब गहना
लक्ष्मी और शारदा पैहरथि
हीरा-मोती के गहना
ई उपहास सहल नहि जाई अछि
झहैर रहल दुनु नैना
हे हर......
देखि दशा गौरी अति व्याकुल
शिव जी के उपजल करूणा
एक चुटकी लैय भस्म पठौलैन
गौरी के धनपति अंगना
हे हर.....
भस्म देखि कर जोड़ धनपति
कहलनि सुनु हे उमा
एहि भस्मक समतुल्य एको नहि
त्रिभुवन के ये हि गहना
हे हर...
एक पलड़ा पर भस्म के राखल
एक पलड़ा पर गहना
भंडारक सब संपत्ति चढ़ि गेल
पलड़ा रहि गेल ओहिना
हे हर...
लीला देखि चकित भेलि गौरी
देखु भस्मक महिमा
भस्म उठाय परौलिन गौरी
खसलनि शिव जी के चरणा
हे हर, हम नै लेब आब गहना
हे हर, अहिं थिकौं हमर गहना
...कैसा लगा आपसब को ये गीत? बताइयेगा जरूर!
प्रस्तुतकर्ता गौतम राजरिशी पर 6:00 AM 70 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: एक ब्लौगर की डायरी से..., गीत
चंद सौलिड ख्वाहिशों का मरहमी लिक्विडिफिकेशन...
Monday 9 November 2009
श्रीनगर से पटना तक की दूरी- बीच में पीरपंजाल रेंज को लांघना शामिल- महज पाँच घंटे में पूरी होती है...लेकिन पटना से सहरसा तक की पाँच घंटे वाली दूरी खत्म होने का नाम नहीं लेती, जबकि नौवां घंटा समापन पर है। ट्रेन की रफ़्तार मोटिवेट कर रही है मुझे नीचे उतर कर इसके संग पैदल चलने को। इस ट्रेन के इकलौते एसी चेयर-कार में रिजर्वेशन नहीं है मेरा...लेकिन कुंदन प्रसाद जी जानते हैं मुझे, बाई नेम...कुंदन इसी इकलौते एसी कोच के अप्वाइंटेड टीटी हैं और इस बात को लेकर खासे परेशान हैं, ये मुझे बाद में पता चलता है...मेरा नाम मेरे मुँह से सुनकर वो चौंक जाते हैं और एक साधुनुमा बाबा को उठाकर मुझे विंडो वाली सीट देते हैं...लेफ्ट विंडो वाली सीट ताकि मेरा प्लास्टर चढ़ा हुआ बाँया हाथ सेफ रहे।
एसी अपने फुल-स्विंग पर है तो टीस उठने लगती है फिर से बाँये हाथ की हड्डी में...पेन-किलर की ख्वाहिश...दरवाजा खोल कर बाहर आता हूँ टायलेट के पास...विल्स वालों ने किंग-साइज में कितना इफैक्टिव पेन-किलर बनाया है ये खुद विल्स वालों को भी नहीं मालूम होगा...कुंदन प्रसाद जी मेरे इर्द-गिर्द मंडरा रहे हैं...मैं भांप जाता हूँ उनकी मंशा और एक किंग-साइज पेन-किलर उन्हें भी आफर करता हूँ...सकुचाया-सा बढ़ता है उनका हाथ और गुफ़्तगु का सिलसिला शुरू होता है...मेरे इस वाले इन्काउंटर की कहानी सुनना चाहते हैं जनाब..."सच आपसे हजम नहीं होगा और झूठ मैं कह नहीं पाऊँगा"- मेरे इस भारी-भरकम डायलाग को सुनकर वो उल्टा और इनकरेज्ड होते हैं कहानी सुनने को...इसी दौरान उनसे पता चलता है कि यहाँ के चंदेक लोकल न्यूज-पेपरों ने हीरो बना दिया है मुझे और खूब नमक-मिर्च लगा कर छापी है इस कहानी को...कहानी के बाद कुछ सुने-सुनाये जुमले फिर से सुनने को मिलते हैं...आपलोग जागते हैं तो हम सोते हैं वगैरह-वगैरह...मुझे वोमिंटिंग-सा फील होता है इन जुमलों को सुनकर...मेरा दर्द बढ़ने लगता और मोबाइल बज उठता है...थैंक गाड...कुंदन जी से राहत मिली...
रात के {या सुबह के?} ढ़ाई बज रहे हैं जब ट्रेन सहरसा स्टेशन पर पहुँचती है...माँ के आँसु तब भी जगे हुये हैं...ये खुदा भी ना, दुनिया की हर माँ को इंसोमेनियाक आँसुओं से क्यों नवाज़ता है?...पापा देखकर हँसने की असफल कोशिश करते हैं...संजीता कनफ्युज्ड-सी है कि चेहरा देखे कि प्लास्टर लगा हाथ...और वो छुटकी तनया मसहरी के अंदर तकियों में घिरी बेसुध सो रही है...मैं हल्ला कर जगाता हूँ...वो मिचमिची आँखों से देर तक घूरती है मुझे...और फिर स्माइल देती है...ये लम्हा कमबख्त यहीं थमक कर रुक क्यों नहीं जाता है...वो फिर से स्माइल देती है...वो मुझे पहचान गयी, याहूsssss!!! she recognised me, ye! ye!! वो मुस्कुराती है...मैं मुस्कुराता हूँ...संक्रमित हो कर जिंदगी मुस्कुराती है...दर्द सारा काफ़ूर हो जाता है...!!!
चलते-चलते एक त्रिवेणी बकायदा बहरो-वजन में:-
दर्द-सा हो दर्द कोई तो कहूँ कुछ तुमसे मैं
चाँद सुन लेगा अगर तो रात कर उठ्ठेगी शोर
ख्वाहिशें पिघला के मल मरहम-सा मेरी चोट पर
डिसक्लेमर या डिसक्लेमर जैसा ही कुछ :-
ये पोस्ट, इस पोस्ट का शिर्षक, पोस्ट की बातें और इस कथित त्रिवेणी का तड़का यदि आपसब को डा० अनुराग या फिर उनके ब्लौग दिल की बात का भान दिलाता हो तो मुझे जरा भी क्षोभ नहीं। दोष डाक्टर साब का है पूर्णतया। मोबाइल स्विच-आफ करने को सामाजिक अपराध मानने वाला ये गैर-पेशेवर इंसान आदतन संक्रामक है। ग़ज़ब का संक्रामक। मैं और मेरी तुच्छ लेखनी उस एक मुलाकात के बाद से अनुरागमय हो चुके हैं।
प्रस्तुतकर्ता गौतम राजरिशी पर 6:00 AM 67 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: एक ब्लौगर की डायरी से...
प्रथम परमवीरचक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा की स्मृति में
Tuesday 3 November 2009बात पुरानी तो है, लेकिन इतनी भी पुरानी नहीं कि उसे भूला दिया जाये। बस बासठ साल पहले की ही तो बात है...आज ही का दिन, बासठ वर्ष पहले। पाकिस्तानी सेना और कबाईलियों की मिली-जुली पाँच सौ से भी ज्यादा फौज के खिलाफ़ वो अपने गिने-चुने पचपन जवानों के साथ भिड़ गये थे। वो थे सोमनाथ शर्मा- मेजर सोमनाथ शर्मा, भारत के सर्वोच्च वीरता-पुरूस्कार परमवीरचक्र के प्रथम विजेता।

सोच कर सिहर उठता हूँ कि उस रोज- उस 3 नवंबर 1947 को मेजर सोमनाथ शर्मा अगर अपनी बहादुर डॆल्टा कंपनी के पचास-एक जवानों के साथ श्रीनगर एयर-पोर्ट से सटे उस टीले पर वक्त से नहीं पहुँचे होते तो भारत का नक्शा कैसा होता...!
26 अक्टूबर 1947 को जब बड़ी जद्दोजहद और लौह-पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल के अथक प्रयासों के बाद आखिरकार कश्मीर के तात्कालिन शासक महाराज हरी सिंह ने प्रस्ताव पर दस्तखत किये तो भारतीय सेना की पहली टुकड़ी कश्मीर रवाना होने के लिये तैयार हुई। भारतीय सेना की दो इंफैन्ट्री बटालियन 4 कुमाऊँ{FOUR KUMAON} और 1 सिख{ONE SIKH} को इस पहली टुकड़ी के तौर पर चुना गया। 27 अक्टूबर 1947- जब भारतीय सेना की पहली टुकड़ी ने श्रीनगर हवाई-अड्डॆ पर लैंड किया, इतिहास ने खुद को एक नये तेवर में सजते देखा और इस तारीख को तब से ही भारतीय सेना में इंफैन्ट्री-दिवस के रूप में मनाया जाता है।
मेजर सोमनाथ शर्मा इसी कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन{FOUR KUMAON} की डेल्टा कंपनी के कंपनी-कमांडर थे और उन दिनों अपना बाँया हाथ टूट जाने की वजह से हास्पिटल में भर्ती थे। जब उन्हें पता चला कि 4 कुमाऊँ युद्ध के लिये कश्मीर जा रही है, वो हास्पिटल से भाग कर एयरपोर्ट आ गये और शामिल हो गये अपनी जाँबाज डेल्टा कंपनी के साथ। नीचे की तस्वीर में आप देख सकते हैं मेजर सोमनाथ को हाथ में प्लास्टर लगाये:-
उधर कबाईलियों का विशाल हुजूम कत्ले-आम मचाता हुआ बरामुला शहर तक पहुँच चुका था। उनकी बर्बरता की निशानियाँ और दर्द भरी कहानियाँ अभी भी इस शहर के गली-कुचों में देखी और सुनी जा सकती है। ...और जब दुश्मनों की फौज को पता चला कि भारतीय सेना की अतिरिक्त टुकड़ियाँ भी श्रीनगर हवाई-अड्डे पर लैंड करने वाली है, तो वो बढ़ चले उसे कब्जाने। उस वक्त मेजर सोमनाथ अपनी डेल्टा कंपनी के साथ करीब ही युद्ध लड़ रहे थे जब उन्हें हुक्म मिला श्रीनगर हवाई-अड्डे की रखवाली का...और फिर इतिहास साक्षी बना शौर्य, पराक्रम और कुर्बानी की एक अभूतपूर्व मिसाल का जिसमें पचपन जांबाजों ने पाँच सौ से ऊपर दुश्मन की फौज को छः घंटे से तक रोके रखा जब तक कि अपने सेना की अतिरिक्त मदद पहुँच नहीं गयी। मेजर सोमनाथ के साथ 4 कुमाऊँ की वो डेल्टा-कंपनी पूरी-की-पूरी बलिदान हो गयी। मृत्यु से कुछ क्षणों पहले मेजर सोमनाथ द्वारा भेजा गया रेडियो पर संदेश:-
“I SHALL NOT WITHDRAW AN INCH BUT WILL FIGHT TO THE LAST MAN & LAST ROUND"{मै एक इंच पीछे नहीं हटूंगा और तब तक लड़ता रहूँगा, जब तक कि मेरे पास आखिरी जवान और आखिरी गोली है}
मेजर सोमनाथ शर्मा को मरणोपरांत स्वतंत्र भारत के सर्वोच्च वीरता पुरुस्कार "परमवीर चक्र" से नवाजा गया और वो इस पुरुस्कार को पाने वाले प्रथम भारतीय बने। संयोग की बात देखिये 4 कुमाऊँ की इसी डेल्टा-कंपनी के संग युद्ध के दौरान शहीद हुये पाकिस्तानी सेना के कैप्टेन मोहम्मद सरवर को भी मरणोपरांत पाकिस्तान का सर्वोच्च वीरता पुरुस्कार "निशान-ए-हैदर" से सम्मानित किया गया था और वो भी इस पुरुस्कार को पाने वाले प्रथम पाकिस्तानी थे।
आप सब में से कोई अगर कुमाऊँ की पहाड़ियाँ नैनिताल आदि घूमने जायें, तो रानीखेत अवस्थित कुमाऊँ रेजिमेंट के म्यूजियम में अवश्य जाईयेगा...शौर्य की इस अनूठी दास्तान को करीब से देखने-जानने का मौका मिलेगा। जो लोग कश्मीर-वादी की सैर को हवाई-रास्ते से आते हों तो श्रीनगर एयरपोर्ट से बाहर निकलने के बाद तनिक ठिठक कर दो पल को हमारे हीरो मेजर सोमनाथ की प्रतिमा को सलाम जरूर दीजियेगा।...और जिन लोगों को कभी मौका मिले हमारे 4 कुमाऊँ के आफिसर्स-मेस में आने का,तो उन्हें दिखाऊँगा वो पहला परमवीर चक्र का असली पदक जो मेजर सोमनाथ के परिजनों ने हमारे मेस को सौंप दिया है श्रद्धापूर्वक।
प्रस्तुतकर्ता गौतम राजरिशी पर 6:00 AM 67 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
खुद से ही बाजी लगी है, हाय कैसी जिंदगी है
Monday 26 October 2009उधर इलाहा्बाद में वो ब्लौगर-संगोष्ठी क्या संपन्न हुयी, विवादों के नये पिटारे खुल गये हैं। समझ में नहीं आता कि हम सबलोगों ने हर चीज का सकारात्मक पहलु देखना बंद क्यों कर दिया है। एक व्यर्थ की तना-तनी के लिये सब कोई कमर कसे तैयार बैठे रहते हैं। एक पहल हुई है, एक प्रशंसनीय शुरूआत है...उसकी सराहना करने के बजाय हम सब जुटे हुये हैं उसके तमाम कमजोर पहलुओं को बेवजह का मुद्दा बनाने में।
खैर, ...अलीगढ़ से निकलने वाली मासिक पत्रिका "वर्तमान साहित्य" के अगस्त अंक में छपी अपनी एक ग़ज़ल पेश करता हूँ फिलहाल, इस प्रार्थना से साथ कि अपने इस दुलारे हिंदी ब्लौग-जगत में सौहार्द का माहौल कायम रहे सदा-सदा के लिये।
खुद से ही बाजी लगी है
हाय कैसी जिंदगी है
जब रिवाजें तोड़ता हूँ
घेरे क्यों बेचारगी है
करवटों में बीती रातें
इश्क ने दी पेशगी है
रोया जब तन्हा वो तकिया
रात भर चादर जगी है
अर्थ शब्दों का जो समझो
दोस्ती माने ठगी है
दर-ब-दर भटके हवा क्यूं
मौसमे-आवारगी है
कत्ल कर के मुस्कुराये
क्या कहें क्या सादगी है
{फ़ायलातुन-फ़ायलातुन}
...बहरे रमल की इस दो रूक्नी मीटर{मुरब्बा सालिम} पर अपने ब्लौग-जगत में बिखरे चंद ग़ज़ल रूपी हीरे-मोती-पन्ने ढ़ूंढ़ने की कोशिश में कुछ लाजवाब ग़ज़लें पढ़ने को मिलीं। श्रद्धेय प्राण साब की इसी बहरो-वजन पर एक बेहतरीन ग़ज़ल पढिये नीरज जी के ब्लौग पर यहाँ। आदरणीय सर्वत जमाल साब की दो लाजवाब ग़ज़लें इसी बहरो-वजन पर पढ़िये यहाँ और यहाँ। दीपक गुप्ता जी की एक नायाब ग़ज़ल इसी बहर में पढ़ें यहाँ। युवा शायर अंकित सफ़र की एक बेहद खूबसूरत ग़ज़ल जो इसी बहरो-वजन पे बुनी गयी है को पढ़ने के लिये यहाँ क्लीक करें।...और चलते-चलते वीनस केसरी का कमाल देखिये इस बहर पे लिखी हुई सबसे छोटे मीटर{एक रूकनी} वाली ग़ज़ल यहाँ।
पुनःश्च :-
हास्पिटल के सफेद-नीले लिबास से निजात पाये तीन दिन हो चुके हैं। काफी सुधार है। हाथ में कुछ अजीब सी पट्टियाँ बाँधे रखने का आदेश दिया है डाक्टरों ने और डेढ़ महीने बाद वापस बुलाया है। अभी फिलहाल अपने बेस हेड-क्वार्टर में हूँ और पाँच दिनों बाद जा रहा हूँ चार हफ़्ते के अवकाश पर।...तो अगली पोस्ट कोसी-तीरे बसे बिहार के एक सुदूर गाँव से।
...अरे हाँ, इन सब बातों में डाक्टर अनुराग तो रह ही गये! नहीं, उन्होंने मना किया है इस खासम-खास मुलाकात पर कुछ भी लिखने से।
श्रीनगर की उस शाम-विशेष के लिये ढ़ेरम-ढ़ेर शुक्रिया डाक्टर साब...!!!
प्रस्तुतकर्ता गौतम राजरिशी पर 6:00 AM 76 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: बहरे रमल, वर्तमान साहित्य(अगस्त ०९), ग़ज़ल
ऊँड़स ली तू ने जब साड़ी में गुच्छी चाभियों वाली
Monday 19 October 2009उम्र के इस पायदान पर भी अंदर का बचपन किलकारियाँ मार उठता है छोटी-छोटी खुशियों पर भी। छोटी-छोटी खुशियाँ...जैसे कि दीपावली की शाम को एक स्नेहिल नर्स द्वारा चुपके से आकर कैडबरिज का फ्रूट एंड नट वाला बड़ा-सा पैकेट पकड़ा देना। छोटी-छोटी खुशियाँ...जैसे कि एक दूर-निवासी दोस्त की तरफ से खूब अच्छे से पैक किया हुआ पार्सल का मिलना, जो मेरी पसंदीदा फिल्मों की ढ़ेर सारी डीवीडी से भरा हुआ होता है। छोटी-छोटी खुशियाँ...जैसे कि भारतीय भाषा परिषद की कोलकाता से निकलने वाली मासिक पत्रिका वागर्थ के इस अक्टूबर वाले अंक में अपनी दो ग़ज़लों को छपा देखना...!!! अब वो कैडबरिज या डीवीडी तो आपलोगों के साथ शेयर नहीं कर सकता, हाँ, वागर्थ में छपी अपनी दो ग़ज़लों में से एक जरूर शेयर करूँगा। तो पेश है, मुलाहिजा फरमायें:-
ऊँड़स ली तू ने जब साड़ी में गुच्छी चाभियों वाली
हुई ये जिंदगी इक चाय ताजी चुस्कियों वाली
कहाँ वो लुत्फ़ शहरों में भला डामर की सड़कों पर
मजा देती है जो घाटी कोई पगडंडियों वाली
जिन्हें झुकना नहीं आया, शजर वो टूट कर बिखरे
हवाओं ने झलक दिखलायी जब भी आँधियों वाली
भरे-पूरे से घर में तब से ही तन्हा हुआ हूँ मैं
गुमी है पोटली जब से पुरानी चिट्ठियों वाली
बरस बीते गली छोड़े, मगर है याद वो अब भी
जो इक दीवार थी कोने में नीली खिड़कियों वाली
खिली-सी धूप में भी बज उठी बरसात की रुन-झुन
उड़ी जब ओढ़नी वो छोटी-छोटी घंटियों वाली
दुआओं का हमारे हाल होता है सदा ऐसा
कि जैसे लापता फाइल हो कोई अर्जियों वाली
लड़ा तूफ़ान से वो खुश्क पत्ता इस तरह दिन भर
हवा चलने लगी है चाल अब बैसाखियों वाली
बहुत दिन हो चुके रंगीनियों में शह्र की ’गौतम’
चलो चल कर चखें फिर धूल वो रणभूमियों वाली
{1222-1222-1222-1222}
...ग़ज़ल यदि कहने लायक और जरा भी दाद के काबिल बनी है तो गुरूदेव के इस्लाह और डंडे से। इस बहरो-वजन पर बेशुमार गज़लें और गाने लिखे और गाये गये हैं। चंदेक जो अभी याद आ रहे हैं...चचा गालिब की "हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले" और फिर जगजीत सिंह की गायी वो प्यारी-सी ग़ज़ल तो आप सब ने सुनी ही होगी "सरकती जाये है रुख से नकाब आहिस्ता-आहिस्ता"...। इसी मीटर पर रफ़ी साब का गाया गाना याद आ रहा है जो मैं अक्सर गुनगुनाता हूँ "खुदा भी आस्मां से जब जमीं पर देखता होगा..."। इस बहर पर एक और रफ़ी साब का बहुत ही पुराना युगल गीत चलते-चलते याद आ गया। मेरे ख्याल से "भाभी" फिल्म का है और मुझे बहुत पसंद है- "छुपा कर मेरी आँखों को..."। चलिये ये गाना सुनाता हूँ आपसब को:-
इसी बहर पर अंकित सफ़र की एक बेहतरीन ग़ज़ल पढ़िये यहाँ और उनके ब्लौग पर जाकर इस नौजवां शायर की हौसलाअफ़जाई कीजिये।
प्रस्तुतकर्ता गौतम राजरिशी पर 6:00 AM 77 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: बहरे हज़ज, वागर्थ(अक्टूबर ०९), ग़ज़ल
हेडलाइन टूडे के रिपोर्टर गौरव सावंत के नाम
Thursday 15 October 2009अमूमन हफ़्ते में एक ही पोस्ट लगाता हूँ मैं, लेकिन आज इस पोस्ट को लगाने की एक खास वजह है। विगत तीन दिनों से मन की विचलित हालत सबकुछ अस्त-व्यस्त किये हुये थी। ...और मन की ये विचलित हालत थी इस एक रिपोर्ट की बिना पर। गौरव सावंत एक बहुत ही सम्मानित और भरोसेमंद रिपोर्टर हैं इंडिया टूडे ग्रुप के और मैंने हमेशा उनकी रिपोर्टिंग फौलो की है। विशेष कर उनकी लिखी डेटलाइन कारगिल का मैं फैन रहा हूँ।
इंडिया टूडे ग्रुप की ही चर्चित हेडलाइन टूडे का अपना एक ब्लौग है Hawk Eye जिसके मुख्य कंट्रीब्युटर हैं हेडलाइन टूडे के स्टार कौरेस्पांडेन्ट गौरव सावंत । इसी ब्लौग पर उनकी 25 सितम्बर की प्रविष्टि है, जिसके बारे में मुझे जानकारी बस परसों ही मिली थी। किंतु उनकी ये प्रविष्टि बेसिर पैर की और इधर-उधर की सुनी-सुनाई बातों पर है। अब जिस घटना पर गौरव साब ने इतना कुछ लिखा है, उस घटना को मुझसे ज्यादा करीब से तो किसी ने देखा ही नहीं होगा। खुद वो सृष्टि-निर्माता सर्वशक्तिमान ने भी नहीं । ...और अब जो मैं अपने कमेंट के तौर पर इस स्टार रिपोर्टर की कथित सनसनिखेज प्रविष्टि पर कुछ लिखता हूँ उनके कमेंट बक्से में जाकर तो वो छपता ही नहीं। अपनी सैन्य नजदीकीयों और पारिवारिक पृष्ठ-भूमि का फायदा उठा कर सेना से जुड़े चंदेक खास शब्दों और टर्मिनौलोजी का इस्तेमाल कर लेने से रिपोर्टिंग भारी-भरकम और आकर्षक तो जरूर बन जाती है, लेकिन सत्य से परे होना कई लोगों के लिये दुख और पीड़ा का कारण बन जाती है- इस बात से गौरव साब को क्या मतलब हो सकता है भला।
मुझे नहीं लगता की मेजर सुरेश की दिवंगत आत्मा या पल्लवी या मुझे और मेरे संगी-साथियों को इस गलत और बेबुनियाद रिपोर्टिंग से पहुँचे कष्ट और व्यथा की खबर तक पहुँचेगी गौरव साब को। हिंदी कहाँ पढ़ते होंगे श्रीमान जी???...और मेरी इंगलिश में लिखी टिप्पणियों को उनका ब्लौग स्वीकार नहीं कर रहा। वैसे लिखने को तो ऐसी कई प्रविष्टियाँ मैं इंगलिश में भी लिख सकता हूँ और गौरव साब से कहीं बेहतर इंगलिश में, लेकिन न तो इतना समय है मेरे पास और न ही इच्छा-शक्ति।
चलते-चलते, गौरव साब से बस इतनी-सी इल्तजा है कि get your facts and figures straight sir before writing such reports. for you it may be just the matter of sensationalisation and increased TRP...whereas for others it may be pride-honour as well as pain & death !
प्रस्तुतकर्ता गौतम राजरिशी पर 6:00 AM 62 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: एक ब्लौगर की डायरी से...
गुरुजी के जन्म-दिवस पर उनकी एक सुलगती कविता
Sunday 11 October 2009कोई पावन-सी सुबह ये...कोई पवित्र-सा दिन ये...कोई खास-सी तारीख ये- अक्टूबर 11 की । हाँ, खास-पवित्र-पावन...!!! हमारे उस्ताद, हमारे गुरूदेव श्रद्धेय पंकज सुबीर जी का जन्म-दिन। सोचा कैसे सेलेब्रेट करूँ इस दिन को...कैसे करूँ? हमारी बिसात क्या कि खुद दो लाईन रच सकूँ उनके लिये। फिर एक खजाने को खंगालने का विचार आया। उनकी लेखनी का खजाना। खजाने में बेतरतीब फैले हीरे-पन्ने-माणिक में से एक नायाब रत्न निकाल कर लाया हूँ आपसब के लिये- गुरूदेव के इस दिन-विशेष पर उनकी लेखनी से निकला एक अंगारा...उनके लिये समस्त शुभकामनाओं सहित कि साहित्य के इस जगमग ज्योति-पुंज की रौशनी एक प्रखर सूर्य बनकर पूरे जग को प्रकाशवान करें। ...तो आइये सुनते हैं पहले गुरूजी की ये अद्भुत कविता पहले उन्हीं की आवाज में:-
आवाज़ों पर लगे मौन के पहरे हैं
देखो तो सन्नाटे कितने गहरे हैं
देख रहे हैं सब कुछ, पर लाचारी से
लोग यहां के गूंगे हैं और बहरे हैं
तुम कहते हो अब आवाज़ उठाऊं मैं
किन्तु यहां किसकी ख़ातिर चिल्लाऊं मैं
चारों तरफ अंधेरी काली सांझ हुई
क्या करिये जब स्वयं रोशनी बांझ हुई
दिखती बाहर से तो बहुत उजाली है
किन्तु रोशनी अंदर से ये काली है
तुम कहते हो कोई दीप जलाऊं मैं
किन्तु बताओ आग कहां से लाऊं मैं
कोई कोलाहल है ना कोई शोर यहां
रातों के जैसी नीरव है भोर यहां
कोई प्रश्न नहीं उठता है आज कहीं
कैसे फिर विश्वास करूं सब मरे नहीं
तुम कहते हो राग प्रभाती गाऊं मैं
किन्तु सभी लाशें हैं किसे जगाऊं मैं
बिना रीढ़ की हड्डी के इन्सान हैं ये
अपनी ही ताकत से तक अन्जान हैं ये
कायरता को नाम दिया लाचारी का
क़त्ल कर चुके अंदर की चिंगारी का
तुम कहते हो हलचल कोई मचाऊं मैं
किन्तु तीलियां सीली क्या सुलगाऊं मैं
सिर्फ प्रतीक्षा करती है अवतारों की
देखो कितनी भीड़ खड़ी लाचारों की
तेजी से चलते फिरते कुछ चेहरे हैं
दौड़ रहे हैं बाहर अंदर ठहरे हैं
तुम कहते हो जीना इन्हें सिखाऊं मैं
किन्तु कहीं इन जैसा ना हो जाऊं मैं
किन्तु कहीं इन जैसा ना हो जाऊं मैं...
पिछले साल उनके जन्म-दिन पर देहरादून की उस ओस से नहायी सुबह में मोबाइल पर हुई एक लंबी बातचीत याद हो आयी। कुछ तस्वीरें देखिये उनके पिछले जन्म-दिन की सीहोर में परिजनों संग मनी:-
मुबारक सालगिरह :-
माँ का आशिर्वाद :-
केक का आनंद :-
...और चलते-चलते सुनिये गुरूदेव की ही आवाज में उनकी एक ग़ज़ल:-
गुरूजी के इस दिन-विशेष पर कुछ बेहतरीन पोस्ट पढिये---गीतों के जादूगर राकेश खंडेलवाल का गुरूजी को समर्पित एक गीत ...जेरी बनी कंचन द्वारा उनकी "ईस्ट इंडिया कहानी" कंपनी की समीक्षा पढ़िये यहाँ और रवि ला रहा है गुरूदेव की जिंदगी के कुछ अनछुये पहलु एक अनूठी डायरी के जरिये और गुरूदेव की एक बहुचर्चित कहानी "महुआ घटवारिन" को पढ़ने के लिये यहाँ क्लीक करें।
पुनःश्च :-
उन्नीस दिन हो गये हैं इधर इस उजले-नीले लिबास में लिपटे हास्पिटल के इस बेड पर। सब ठीक है।...और सकून की बात ये है कि स्टिचेज खुल गये हैं। ढ़ेर सारे स्टिचेज के उन छोटे-छोटे काले धागों के खुलने की चुभन और तत्पश्चात का हल्कापन- अहा !!! उधर अर्धांगिनी का एक अजीब-सा हुक्म मिला कि मुझे स्टिचेज के इन तमाम काले धागों के टुकड़ों को और आपरेशन के बाद निकाले गये उस छोटे से बुलेट को संभाल कर रखना है उसके लिये...। मैं सोच में पड़ गया हूँ कि इस बार छुट्टी जाने पर कोई नई रेसिपीज तो नहीं बनेगी इनसे...!!!
प्रस्तुतकर्ता गौतम राजरिशी पर 6:00 AM 50 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: कविता, पंकज सुबीर
सुरेश की स्मृति में...
Monday 5 October 2009आज की शाम तय थी वैसे तो एक बर्थ-डे बैश के लिये, किंतु नियती ने कुछ और ही तय कर रखा था।
वो इकतीस का होता आज। अभी उस 22 सितम्बर की सुबह तक तो हमने आज के इस शाम की बातें की थी...एक खास डांस-स्टेप की बात, जो उसे सिखना था...जो मुझे सिखाना था। मिलेट्री हास्पिटल के इस बेड पर लेटा अब सोच रहा हूँ कि जब मैं ठीक हो जाऊँगा तो क्या अपना वो सिगनेचर स्टेप फिर कभी कहीं डांस करते हुये कर पाऊँगा...? सोच तो ये भी रहा हूँ कि क्या सहज हो कर डांस भी कर पाऊँगा अब मैं कभी...??
मार्च की वो कोई शुरूआती तारीख थी। देहरादून की एक अलसायी दोपहर। एक दिन पहले ही मेरा पोस्टिंग-आर्डर आया था इधर कश्मीर वादी के लिये। मेरा मोबाईल बजा। एक अनजाना-सा नंबर स्क्रीन पर फ्लैश हो रहा था। मेरे हैलो कहते ही उधर से एक गर्मजोशी भरी आवाज आयी थी-" हाय सर! मेजर सुरेश सूरी दिस साइड..." और लगभग आधे घंटे की बातचीत के बाद मुझे इस अनदेखे यंगस्टर के प्रति एक त्वरित लगाव पैदा हो गया था। फिर अपने नये प्लेस आफ ड्यूटी पे रिपोर्ट करने तक सुरेश हर रोज मुझसे रिलिजियसली बात करता रहा और 25 मार्च को हम पहली बार मिले जब वो मुझे रिसिव करने के लिये आया था।
कितनी बातें, कितनी यादें इन विगत छः महीनों की... उसकी हँसी, वो हरेक बात पे उसका "बढ़िया है, सरssss" कहना और कहते हुये "सर" को लंबा खिंचना, उसकी गज़ब की सिंसियेरिटि, उसके वो हैरान कर देने वाले जुगाड़, वो जलन पैदा करने वाला डिवोशन, हर शुक्रवार को रखा जाने वाला उसका व्रत और इस व्रत को लेकर कितनी दफ़ा मेरे द्वारा उड़ाया गया उसका मजाक, वो साथ-साथ लंच करते हुये सैकड़ों बार चंद हैदराबादी रेसिपिज का उसका विस्तृत वर्णन, पार्टियों के दौरान उसके बनाये गये मौकटेल्स और कौकटेल्स, मेरी छुट्टी के दौरान हर रोज उसका वो फोन करके मुझे वैली का अपडेट्स देना और अभी-अभी तो आया था वो खुद ही एक महीने की छुट्टी से वापस पल्लवी को साथ लेकर...
...और इन सबके दरम्यान जाने कहाँ से आ टपकी ये तारीख बाइस सितम्बर वाली। ईद के ठीक बाद वाली तारीख। फिर उसकी तमाम स्मृतियों को भुलाती हुई उसकी वो आखिरी पलों वाली जिद याद आती है अब। बस वो जिद। सोचता हूँ, उन आखिरी क्षणों में उसने जो वो जिद न की होती तो क्या मैं ये पोस्ट लिख रहा होता...? सब कुछ तो प्लान के मुताबिक ही चला था। सब कुछ...??? हमारी ट्रेनिंग के दौरान राइफल की नली से निकलने वाली बुलेट की रफ़्तार, उसका प्रति मिनट कितने चक्कर लगाना, उसकी ट्रेजेक्टरी, उसका इमपैक्ट, उसका इफैक्ट ये सब तो विस्तार से बताया-सिखाया-पढ़ाया जाता है...किंतु प्रारब्ध की रफ़्तार और इसकी ट्रेजेक्टरी के बारे में तो कोई नहीं बताता, कोई नहीं सिखाता है। उसकी सिखलाई OJT होती है- on the job training...उसे वो सर्वशक्तिमान खुद अपने अंदाज़ में सिखाता है।
...बहुत कुछ सुना था, पढ़ा था जिंदगी के आखिरी क्षणों के बारे में कि ये होता है, वो होता है। कोई दिव्य-ग्यान जैसा कुछ होता है। सच कहूँ तो सितम्बर की इस बाइस तारीख को सीखा मैंने कि जिंदगी का कोई क्षण आखिरी नहीं होता। प्रारब्ध जब किसी के होने के लिये किसी और का न होना तय करता है, तो सारी जिंदगी बेमानी नजर आने लगती है...फिर क्या अव्वल, क्या दरम्यां और क्या आखिरी??? बस शेष रह जाते हैं कुछ पल्लवियों के आँसु और शेष रह जाती हैं चंद तस्वीरें :-
I salute you BOY for everything you were...!!!
पुनःश्च :-
आप सब के स्नेह, चिंता, दुआओं, शुभकामनाओं से अभिभूत हूँ। फिलहाल एक सुदूर मिलेट्री हास्पिटल के सफेद-नीले लिबास में लिपटा आप सब के असीम प्यार में डूबा अपनी कर्म-भूमि में वापस लौट जाने के दिन गिन रहा हूँ। जल्द ही ठीक हो जाऊँगा। कभी सोचा भी नहीं था कि अपने इस अभासी दुनिया के रिश्तों से इतना प्यार और स्नेह मिलेगा। ’शुक्रिया’ जैसे किसी शब्द से इसका अपमान नहीं कर सकता...
प्रस्तुतकर्ता गौतम राजरिशी पर 6:00 AM 79 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: एक फौजी की डायरी से...
कभी मौत पर गुनगुना कर चले...
Monday 21 September 2009ईद का दिन है गले आज तो मिल ले ज़ालिम
रस्मे-दुनिया भी है, मौका भी है, दस्तूर भी है
मुगलिया सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के इस शेर को ईद के पावन मौके पर सुनाने से रोक नहीं पाता खुद को- विशेष कर अपनी चंद महिला-मित्रों को। फिलहाल चलिये एक ग़ज़ल सुनाता हूँ अपनी। ज़मीन अता की सुख़नवरी के पितामह मीर ने। "दिखाई दिये यूँ कि बेखुद किया, हमें आपसे ही जुदा कर चले" - इस एक ग़ज़ल के लिये शायद अब तक की सबसे महानतम जुगलबंदी हुई है। देखिये ना, अब जिस ग़ज़ल को लिखा हो मीर ने, संगीत पे ढ़ाला हो खय्याम ने और स्वर दिया हो लता जी ने...ऐसी बंदिश पे तो कुछ भी कहना हिमाकत ही होगी। ...और इस ग़ज़ल का ये शेर "परस्तिश की याँ तक कि ऐ बुत तुझे / नजर में सभू की खुदा कर चले" मुझे एक जमाने से पसंद रहा है। इसी शेर का मिस्रा दिया गया था तरही के लिये आज की ग़ज़ल पे एक बेमिसाल मुशायरे के लिये। तो पेश है मेरी ये ग़ज़ल:-
हुई राह मुश्किल तो क्या कर चले
कदम-दर-कदम हौसला कर चले
उबरते रहे हादसों से सदा
गिरे, फिर उठे, मुस्कुरा कर चले
लिखा जिंदगी पर फ़साना कभी
कभी मौत पर गुनगुना कर चले
वो आये जो महफ़िल में मेरी, मुझे
नजर में सभी की खुदा कर चले
बनाया, सजाया, सँवारा जिन्हें
वही लोग हमको मिटा कर चले
खड़ा हूँ हमेशा से बन के रदीफ़
वो खुद को मगर काफ़िया कर चले
उन्हें रूठने की है आदत पड़ी
हमारी भी जिद है, मना कर चले
जो कमबख्त होता था अपना कभी
उसी दिल को हम आपका कर चले
...इस ज़मीन से परे लेकिन इसी बहर पे एक ग़ज़ल जो याद आती है वो बशीर बद्र साब की लिखी और चंदन दास की गायी "न जी भर के देखा न कुछ बात की / बड़ी आरजू थी मुलाकात की" तो आप सब ने सुनी ही होगी। अरे हाँ, प्रिंस फिल्म में जब शम्मी कपूर महफ़िल में बैजन्ती माला को देखकर एक खास लटक-झटक के साथ गाते हैं बदन पे सितारे लपेटे हुए..., तो इसी बहर पे गाते हैं।
इधर ब्लौग-जगत अपना फिर से व्यर्थ के विवादों में पड़ा है। विवादों से परे हटकर जरा लता दी की "दिखाई दिये यूं..." को रफ़ी साब की मस्ती में "बदन पे सितारे..." की धुन पे गाईये, या उल्टा! बड़ा मजा आयेगा...!
चलते-चलते, मनु जी का ये बेमिसाल शेर सुन लीजिये इसी मुशायरे से:-
खुदाया रहेगी कि जायेगी जां
कसम मेरी जां की वो खा कर चले
प्रस्तुतकर्ता गौतम राजरिशी पर 6:00 AM 87 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: तरही मुशायरा, बहरे मुतकारिब, मीर, ग़ज़ल


