08 September 2016

दर्दपुरा

(दैनिक जनसत्ता 04 सितम्बर 2016 में आई मेरी एक कहानी)    

 “क्या बतायें हम डॉक्टर साब, उसे एके-47 से इश्क़ हो गया और छोड़ कर चली गई हमको”, कहते-कहते माजीद की आँखें भर आई थीं | माजीद...माजीद अहमद वानी...उम्र करीब सैंतीस-अड़तीस के आस-पास, मुझसे बस कुछेक साल बड़ा...मेहदी से रंगी हुई सफ़ेद दाढ़ी पर चढ़े हल्के भूरे रंग की परत उसकी आँखों के  कत्थईपन को जैसे सार्थक करती है |  तक़रीबन छह महीने पहले जब क्लीनिक खोली मैंने अपनी, कुपवाड़ा के मेन मार्केट से ज़्यादा नहीं बस थोड़ा ही आगे, माजीद का फार्मेसी में डिप्लोमाधारी होना मेरे लिए इस दूर-दराज़ इलाक़े में एकदम से सुकून की साँस लेकर आया था |  परिचय यहीं के एडिशनल एसपी ने करवाया था यह कहते हुये कि अच्छा नौजवान है...आसपास के औसत युवाओं से एकदम अलग सोच वाला और सुलझा हुआ |

     एडिशनल एसपी, सुरेश रैना, ख़ुद ही बड़े ही मिलनसार और सुलझे हुये निकले...अपने कथित पुलिसिया रौब से परे, बहुत ही सहज और सरल | जम्मू से घर छोड़ते समय, जब पापा और माँ के लाख समझाने पर भी मैं राज़ी नहीं हुआ था अपनी प्रैक्टिस वहीं घर के आस-पास जमाने के लिए, तो पापा ने अपने बचपन के मित्र का हवाला दिया था | एडिशनल एसपी साब पापा के उसी मित्र के इकलौते पुत्र थे | कश्मीर आकर इस सुदूर कुपवाड़ा में क्लीनिक खोलने की मेरी ज़िद के पीछे जहाँ मेडिसीन के ख़ुदा, हिप्पोक्रेट्स की फिलॉसोफी को अंगीभूत करने का एक तरह का लाल-गुलाबी-नीला-नीला सा रोमांटिसिज़्म था, वहीं दूसरी ओर बत्तीस-तैंतीस वर्ष पहले अपने पूर्वजों की ज़मीन से ज़बरन बेदख़ल कर दिये जाने के हरे-हरे  से और काले से प्रतिरोध को आत्म-सात करना भी था |

     नब्बे के दशक के उन शुरुआती वर्षों के खौफ़ की दास्तान जाने कितनी बार माँ-पापा और दीदी से सुन चुका हूँ और उनकी आँखों में जीवंत होते देख चुका हूँ | जम्मू के शरणार्थी-शिविर में बीता बचपन और फिर पापा की कश्मीर यूनिवर्सिटी से छूट गई प्रोफेसरी का जम्मू के एक कॉलेज में लग जाना और माँ के बुटीक-शॉप का अपना मुक़ाम बनाना, दीदी और मेरी पढ़ाई का खर्चा व ठीक-ठाक मध्यमवर्गीय जीवन निकाल ले गए |  

     जम्मू मेडिकल कॉलेज में मेडिसीन की पढ़ाई के दौरान ही बावरे मन की बावरी बातों में आकर अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस को मैंने कुपवाड़ा जाकर स्थापित करने का निर्णय ले चुका था | दोस्तों ने यूँ तो समझ-समझ-के-समझ-को-समझो की तर्ज़ पर बहुत समझाने की कोशिश की थी कि कहाँ उस मिलिटेन्सी की तपिश में सुलग रहे इलाक़े में जा रहे हो...कश्मीरी पंडितों के लिए अभी भी वो हिस्सा सुरक्षित नहीं है...कश्मीर में ही करना है तो श्रीनगर में बेस बना लो, कुपवाड़ा हॉट है...वगैरह-वगैरह, लेकिन इस जानिब नासमझ सी धुन थी कि बस किसी ज़िद्दी की तरह गले में पैठ गई थी |  फिर काजीगुंड नाम के किसी गाँव में सेबों का पैतृक बगान और लकड़ियों के बने एक घर, जिनकी धुंधली स्मृतियाँ तीन वर्षीय बालमन के चिलमन से अभी भी इतने सालों बाद कई बार एकदम से उभर कर आ जाती हैं, की झलक देखने की इच्छा इस धुन को सप्तम पर लिए जाती थी |

     क्लीनिक स्थापित हुये दूसरा ही तो दिन था और कुपवाड़ा में आए हुये बस एक हफ़्ता ही तो बीता था, जब मार्च की एक ठिठुरती दोपहर को माजीद आया था मिलने मुझसे एडिशनल एसपी साब के हुक्म पर...

     “सलाम वलेकुम, साब ! वो डॉक्टर अशोक भान आप ही हैं ?”, किसी गहरे कुएं से आती हुई एक अजब सी कशिश से भरी आवाज़ वाला माजीद अहमद वानी उस दिन से मेरा लगभग सब कुछ हो चुका था...मेरा कम्पाउंडर, मेरा हमसाया...मेरा फ्रेंड-फिलॉसोफर-गाइड | उसकी आँखों में एक कैसा तो कत्थईपन था जो हर वक़्त मानो पूरी की पूरी झेलम का सैलाब समाये रखता था अपनी रंगत में और हाथ इतने सुघड़ कि क्लीनिक का हर हिस्सा हर घड़ी दमकता रहता था | उन सुघड़ हाथों की बनी रोटियाँ जैसे अपनी पूरी गोलाई में स्वाद का हिज्जे लिखा करती थीं और यही स्वाद जब उसके हाथों से उतर कर करम के साग या फिर मटन के मार्फत जिह्वा की तमाम स्वाद-ग्रंथियों तक पहुँचता तो मेरा उदर अपने फैले जाने की परवाह करना छोड़ देता | अभी उस रात जब उसके हाथों के पकाये वाजवान का लुत्फ़ लेते हुये मैंने कहा कि “माजीद, तेरी बीवी तो जान छिड़कती होगी तुम्हारे हाथों का रिस्ता और गुश्ताबा खा कर” तो एकदम से जैसे कत्थई आँखों में हर वक़्त उमड़ती झेलम अपना पूरा सैलाब लेकर कमरे में ही बहने लगी थी | पहले तो बस पल भर को एक विचित्र सी हँसी हँसा वो...वो हँसी जो उसके पतले होठों से फिसल कर उसकी मेहदी रंगी दाढ़ी में पहले तो देर तक कुलबुलाती रही और फिर धच्च से आकर धँस गई मेरे सीने में कहीं गहरे तक |

     “क्या बतायें हम डॉक्टर साब, उसे एके-47 से इश्क़ हो गया और छोड़ कर चली गई हमको !”, दाढ़ी में कुलबुलाती हँसी के ठीक पीछे-पीछे चंद हिचकियाँ भी आ गई थीं दबे पाँव |
     “क्या मतलब ? क्या कह रहे हो, माजीद ?”, अगला निवाला मेरे मुँह तक जाते-जाते वापस प्लेट में आकर ठिठक गया था |
     “हमारी मुहब्बत, दो धूप-सी खिली-खिली बेटियाँ, भरा-पूरा घर और आपका ये रिस्ता गुश्ताबा वगैरह कुछ भी तो नहीं रोक पाया हमारी कौंगपोश को | इन सब पर एके-47 का करिश्मा और नामुराद जिहाद का जादू ज़ियादा भारी पड़ा, डॉक्टर साब |”
     “कौंगपोश ? तुम्हारी बीवी का नाम है ? बड़ा खूबसूरत नाम है ये तो ! क्या मानी होता है इसका ?”
     “जी साब ! केसर का फूल...उतनी ही ख़ूबसूरत भी थी वो, बिलकुल केसर के फूल की तरह ही !”, हिचकियाँ जिस तरह दबे पाँव आई थीं, उसी तरह विलुप्त भी हो गईं, लेकिन झेलम का सैलाब अब भी उमड़ ही रहा था अपने पूरे उफ़ान पर |
     “हुआ क्या माजीद ? तुम चाहो तो शेयर कर सकते हो मेरे साथ सब बात...अब तो हमदोनों दोस्त हैं ना !”
     “आप बहुत अच्छे हो, डॉक्टर साब ! हुआ कुछ नहीं, बस हमारी क़िस्मत को हमारी मुहब्बत से रश्क होने लगा था और हमारी मुहब्बत ने इस कश्मीर वादी के आवाम की तरह ही एके-47 के आगे अपनी जबीं टेक दी |
     “तुम तो शायरी भी करते हो माजीद !”, उसे छेड़ते हुये मैंने कहा तो झेलम का उमड़ता सैलाब थोड़ा-सा थमक गया जैसे |
     “मुहब्बत ने जितने बड़े शायर नहीं पैदा किए होंगे, बेवफ़ाई ने उससे कहीं ज़ियादा और उससे कहीं बड़े-बड़े शायर दिये हैं इस जहान को | कौंगपोश को शायरी वाले माजीद से ज़ियादा एके-47 वाला उस्मान भाया और वो चली गई एक दिन हमको छोड़ के |”

     सिहरते हुये सितम्बर की जुम्मे वाली ये रात एक नए माजीद से मिलवा रही थी मुझे, जो इन छ महीनों में अब तक छिपा हुआ था मुझसे | खाना ख़त्म करके बर्तन वगैरह धुल जाने के बाद, जब वो गर्म-गर्म कहवा लेकर आया तो उसकी आँखों के कत्थईपन ने अब झेलम के सैलाब को पूरी तरह ढाँप लिया था | कहवे के कप से इलायची और केसर की मिली-जुली ख़ुशबू लेकर उठती हुई भाप, कमरे में एकदम से आन टपकी चुप्पी को एक अपरिभाषित-सा स्टीम-बाथ दे रही थी | फ़र्श पर चुकमुक बैठा अपने दोनों हाथों से कहवे के कप को थामे हुये माजीद बस अपने लौकिक अवतार में ही उपस्थित था मेरे साथ...जाने कहाँ विचरण कह रहा था उसका मन | देर बाद स्वत: ही उसकी आवाज़ ने मुझे कहवे के स्वाद और सुगंध की तिलिस्मी दुनिया से बाहर खींचा | कुआँ जैसे थोड़ा और गहरा हो गया था...

     “उस्मान नाम है उसका, साब ! हमारे ही गाँव दर्दपुरा का है | दस बरस पहले जिहादी हो गया | उस पार गया था ट्रेनिंग लेने | गाँव में आता था फ़ौज से छुप-छुपा कर और कौंगपोश से मिलता था | उसे रुपये-पैसे देता था और उसके लिए खूब सारे तोहफ़े भी लाता था | हमारे दर्दपुरा की लड़कियों पर एक अलग ही रौब रहता है, साब, इन जिहादियों का | तक़रीबन सत्तर घर वाले हमारे गाँव में कोई भी घर ऐसा नहीं है, जिसका लड़का जिहादी ना हो | एक तरह का रस्म है साब, हमारे दर्दपुरा का | मेरे दोनों बड़े भाई भी जिहादी थे...मारे गये फ़ौज के हाथों | मुझपे भी बड़ा ज़ोर था, साब, भाई के मरने के बाद...लेकिन मुझे कभी नहीं भाया ये जिहाद-विहाद |”
     “हासिल तो कुछ होना ही नहीं है इस जिहाद से और इस आज़ादी के नारों से, माजीद ! जिस पाकिस्तान की शह पर ये बंदूक उठाए घूमते हैं, उसी पाकिस्तान से अपना मुल्क तो संभलता नहीं !”, मुझसे रहा नहीं गया तो उबल सा पड़ा था मैं...माँ पापा और दीदी की आँखों में फैला वो खौफ़ का मंज़र एकदम से नाच उठा मेरे सामने |
     “ख़ता हमारे क़ौम की भी नहीं है, साब | शुरुआत में जो हुआ सो हुआ...उसके बाद हमारी पीढ़ी के लिए आज़ादी का नारा उस भूत की तरह हो गया है, जिसके क़िस्से हम बचपन में अपनी नानी-दादी और वालिदाओं से सुनते आते हैं और बड़े होने के बाद ये समझते-बूझते भी कि भूत-प्रेत कुछ नहीं होते, मगर फिर भी ज़िक्र किए जाते हैं |”
     “ख़ता कैसे नहीं हुई, माजीद ? एक पूरी क़ौम ने मेरी पूरी क़ौम को जलावतन कर दिया और तुम कहते हो कि ख़ता क़ौम की नहीं है ?”, माँ-पापा की आँखों वाला खौफ़ का वो अनदेखा मंज़र जैसे मैंने ख़ुद देख लिया हो अभी के अभी इसी वक़्त | माजीद थोड़ा सहम-सा गया था मेरी इस औचक प्रतिक्रिया पर |
     “आपका गुस्सा सर-आँखों पर डॉक्टर साब ! उस एक ख़ता की जो आपकी क़ौम के साथ हुई...उसकी तो कोई तौबा ही नहीं साब ! वो जाने किस क़ाबिल शायर ने कहा है ना साब कि लम्हों ने ख़ता की है सदियों ने सजा पायी...उसी की सजा तो हम भुगत रहे हैं | पूरी की पूरी एक पीढ़ी गुम हो गई है साब | निकाह के लिए लड़के नहीं हैं अब तो हमारी क़ौम में | आप यक़ीन करोगे साब, हमारे दर्दपुरा में कुंवारी लड़कियों की गिनती लड़कों से दूनी से भी ज़ियादा है | लड़के बचे ही नहीं इस नामुराद जिहाद के चक्कर में |”, वो गहरा कुआँ जैसे एकदम से भर सा गया था और मुझे ख़ुद पर अफ़सोस होने लगा अपने इस बेवजह के गुस्से से | ख़ुद पर बरस पड़ी खीझ की भरपाई करने के लिए, एकदम से कह उठा मैं उस से...

     “मुझे अपने गाँव कभी नहीं ले चलोगे, माजीद ?”

...और माजीद तो जैसे किलक ही पड़ा ये सुनकर | तय हुआ कि कल और परसों सप्ताहांत का फ़ायदा उठाते हुये क्लीनिक को अवकाश दिया जाये और चला जाये दर्दपुरा |           

     74.420 डिग्री के अक्षांश और 34.311 डिग्री देशांतर पर बसे इस गाँव तक पहुँचने के लिये कुपवाड़ा शहर को दायें छोड़ते हुये मुख्य सड़क से फिर से दायीं तरफ उतरना पड़ता है | पहाड़ों पर घूमती कच्ची सड़क पर लगभग साढ़े चार घंटे की हिचकोले खाती ड्राइव के पश्चात चारों तरफ से पहाड़ों से घिरे इस गाँव तक पहुँचने पर सम्राट जहांगीर के कहे “गर फ़िरदौस बर रूए ज़मीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त”... का यथार्थ मालूम चलता है | दर्दपुरा, जहाँ आजादी के इन अड़सठ सालों बाद भी बिजली का खंभा तक नहीं पहुंचा हैजहाँ भेड़ों की देखभाल के लिये एक देसी डॉक्टर तो है लेकिन इन्सानों के डॉक्टर के लिये यहाँ के बाशिंदों को लगभग सत्तर किलोमीटर दूर कुपवाड़ा जाना पड़ता है, इतना ख़ूबसूरत होगा, मेरी कल्पना से परे था | कश्मीर में टूरिस्ट बस गुलमर्ग और सोनमर्ग के मिडोज़ देखकर जन्नत का ख़्वाब बुन लेते हैं, यहाँ तो जैसे साक्षात जन्नत अपनी बाँह पसारे पहाड़ों के दामन में बैठा हुआ था |  सुबह जब माजीद के घर पहुँचा तो जैसे पूरे का पूरा गाँव उमड़ा पड़ा था स्वागत की ख़ातिर |



     माजीद का परिवार, जिसमें उसके अब्बू और अम्मी और उसकी दो छोटी बेटियाँ, हीपोश और शिरीनजैसे दूर जम्मू में बैठा हुआ मुझे अपना परिवार यहाँ मिल गया था | माजीद ने अपनी बड़ी वाली नौ साल की बेटी से बड़े गर्व से मिलवाया और ज़िद की कि मैं उस से इंगलिश में कुछ पूछूँ | सकुचाहट को बड़े ही अंदाज़ में साक्षात अवतरित सी करती हुई उस गोरी-चिट्ठी सेब सी लाल-लाल गालों वाली छुटकी से उसका नाम पूछा तो उसका “माय नेम इज हीपोश...हीपोश अहमद वानी” कहना जैसे इस सदी का अब तक गुनगुनाया हुआ सबसे ख़ूबसूरत नगमा था |

“एंड व्हाट डज हीपोश मीन माय डियर ?”
“ओ...इट्स अ फ्लावर, अंकल ! जेस्मीन फ्लावर !”

     मन किया उस सकुचाई-सी बोलती हुई जेस्मीन के फूल को गोदी में उठा लूँ |

     धीरे-धीरे जब अधिकांश गाँव वाले वहाँ से रुख़सत हुये तो चंद बुजुर्गों के साथ अब मैं माजीद के परिवार के साथ अकेला था | ये तय कर पाना लगभग असंभव था कि पूरे परिवार का और ख़ास तौर पर माजीद के अब्बू का मुझ पर उमड़ता स्नेह महज़ इस वज़ह से था कि मैं उस परिवार के इकलौते कमाने वाले की आय का साधन था या फिर वो स्नेह हर मेहमान के लिए नैसर्गिक ही था |

     दालान में सबके साथ बैठा नमकीन चाय के दौर पर दौर चल रहे गोल-गोल सख़्त मीठी रोटियों के साथ का लुत्फ़ उठाता बस चुपचाप सुने जा रहा था मैं वहाँ बैठे बुजुर्गों की बातें | माजीद के अब्बू और उनके हमउम्र बुजुर्गों की क़िस्सागोई जैसे मुझे नब्बे के दशक से पहले वाले ख़ुशहाल कश्मीर की यात्रा पर ले चली थी | एक अपनी ही तरह की टाइम-मशीन में बैठा मैं सत्तर और अस्सी के दशक वाले कश्मीर की यात्रा पर था और तभी नज़र पड़ी मेरी माजीद के अब्बू के बायें हाथ पर | अंगूठे के छोड़ कर बाकी सारी ऊँगलियाँ नदारद थीं उनके बायें हाथ की | एक अजीब सी झुरझुरी दौड़ गई मेरे पूरे वजूद में उस महज़ अंगूठे वाले हाथ को देखकर | पूछा जब मैंने कि ये कैसे हुआ तो वहाँ बैठे तमाम के तमाम लोगों का जबर्दस्त मिला-जुला ठहाका गूँज उठा | मैं तो अकबका कर देखने लगा था क्षण भर को | माजीद भी सबके साथ ठहाके तो नहीं, एक स्मित सी मुस्कान जरूर बिखेर रहा था ...और तब जो मैंने उन कटी ऊँगलियों की कहानी सुनी तो बस दंग रह गया |

     अपने अब्बू के बायें हाथ की चारों ऊँगालियों को ख़ुद माजीद ने काटा था...वो भी कुल्हाड़ी से और वो भी तब जब वो बस ग्यारह साल का था | भेड़ पालने के अलावा माजीद के अब्बू का जंगल से लकड़ी काट कर लाने का भी व्यवसाय था | आतंकवाद का उफ़ान चढ़ा ही था कश्मीर में तब | माजीद के दोनों बड़े भाई जा चुके थे उस पार पाक अधिकृत कश्मीर के जंगलों में चल रहे किसी जेहादी ट्रेनिंग कैम्प में और अपनी दो बहनों के साथ माजीद था बस अपने अब्बू और अम्मी के साथ...अब्बू की भेड़ों की देखभाल में हाथ बँटाते हुये और बचपन की सुहानी पगडंडी पर एकदम से जवान होते हुये | बर्फ की चादर में लिपटे सर्दी वाले उन्हीं दिनों में कभी इक रोज़ एक देवदार को अपनी कुल्हाड़ी से धराशायी करते हुये उसके अब्बू के बायें हाथ की तरजनी के जोड़ में भयानक दर्द उठा था | दो रोज़ लगातार भयानक पीड़ा सहते रहे वो, तर्जनी जहाँ हथेली से जुड़ी रहती है | अम्मी के चंद एक घरेलू उपचार बेअसर रहे थे और तीसरे दिन झिमी झिमी गिरते बर्फ के फाहों में बाहर अपनी बहनों के साथ उधम मचाते माजीद को पकड़ कर ले गए वो भेड़ों के बाड़े में | पहले से पड़े देवदार के एक कटे तने पर अपनी बायीं हथेली बिछाते हुये उन्होंने अपनी कुल्हाड़ी की तेज धार को तर्जनी और हथेली के जोड़ पर रखा और माजीद को वहीं पड़ा पत्थर उठा कर कुल्हाड़े पर प्रहार करने का हुक्म दिया | सहमा सा माजीद डर से मना करता रहा देर तक, लेकिन फिर एक ना चली उसकी अब्बू की तेज़ आवाज़ में बार-बार दिये जा रहे हुक्म के आगे | उधर माजीद के दोनों हाथों से पकड़ा हुआ पत्थर पड़ा कुल्हाड़े पर और उधर तरजनी छिटक कर अलग हुयी हथेली से | अगली तीन सर्दियों तक ये सिलसिला फिर फिर से दोहराया गया और तरजनी की तरह ही मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा अलग होती गईं इम्तियाज़ अहमद वानी की बायीं हथेली से |

     दर्दपुरा के उस बुजुर्ग, इम्तियाज़ अहमद वानी, का ये अपने तरीके का खास उपचार था चिल-ब्लेन्स से निबटने का | एक उस गाँव में, जहाँ आज भी किसी सच के डॉक्टर से मिलने के लिए सत्तर किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है और वो भी बर्फ़बारी में अगर रास्ता बंद न हो तब...जहाँ शाम को सूरज ढलने के बाद अब भी लकड़ी की मशाल और कैरोसीन वाले लालटेन जलते हों, उन कटी हुई ऊँगलियों की हैरतअंगेज़ दास्तान पर मेरी हैरानी को चुपचाप तकता हुआ दर्दपुरा जैसे हौले-हौले मुझे चिढ़ा रहा था |

     अगले दिन, रविवार की उस सिली सी दोपहर को वापसी की यात्रा में गाँव को पलट कर निहारता हुआ मैं सोच रहा था कि पापा की प्रतिक्रिया क्या होगी, जब मैं उनको बताऊँगा कि मैं अपना क्लीनिक कुपवाड़ा से उठा कर किसी अनाम से गाँव में स्थान्तरित कर रहा हूँ |

जीप के रियर-व्यू मिरर में पीछे छूटते दर्दपुरा का चिढ़ाना जाने क्यों मुझे एकदम से एक मुस्कुराहट में बदलता नज़र आ रहा था | पलट कर पिछली सीट पर बैठे माजीद को बताने के लिए कि देखो तुम्हारा गाँव मुस्कुरा रहा है, मुड़ा तो सीट की पुश्त पर सिर टिकाये उसका ऊंघना मुझे बस उसे निहारते रहने को विवश कर गया |
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(photo credit to Razaq Vance) 

10 May 2016

तीन रोज़ इश्क़

“चार दिन की ज़िंदगी, तीन रोज़ इश्क़”...गुलज़ार जब ऐसा कहते हैं तो जफ़र से कहीं बहुत आगे निकल आते हैं जिन्होंने कहा कि “उम्रे-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन, दो आरजू में कट गए दो इंतज़ार में” | बहुत-बहुत सारी ख़ुशी और बहुत-बहुत सारी उदासी के बीच कहीं डूबती-उतराती कहानियों के साथ पूजा उपाध्याय जब
अपनी किताब “तीन रोज़ इश्क़” लेकर आती हैं तो जफ़र से लेकर गुलज़ार के पड़ाव के बीच और फिर उस से आगे की...कहीं बहुत आगे की किसी गुमशुदा-सी यात्रा पर लिए चलती हैं हम पाठकों को | “तीन रोज़ इश्क़” को पढ़ना...यूँ कि जैसे अल्फ़ाज़ की खुदी हुई नींव पर कहानियों का नया प्लॉट खड़ा करना है...या कि जैसे क़िस्सागोई की किसी बुलंद इमारत पर चंद और  फ्लोर्स को उठाना...या...या कि जैसे आस-पास के लगते किरदारों के बीच कुछ एलिएन्स को आमंत्रित कर उन्हें अपने पड़ोस में बसा लेना |

तक़रीबन एक सौ सत्तर पृष्ठों में एक नहीं, दस नहीं...पूरी छियालीस कहानियों के ज़रिये लेखिका हमें इस डिजिटलाइज्ड हो चुकी दुनिया में रखते हुये भी क़िस्सागोई के पारम्परिक संसार में आव-भगत करती हैं और वो भी पूरे ढ़ोल-पिपही के साथ | कहने का मंतव्य ये कि समकालीन समय में लिखी जा रही अधिकांश कहानियाँ जब आस-पड़ोस की किसी न किसी घटना या फिर लेखक के अपने जीवन में घटित होने वाली बातों से प्रेरित रहती हैं, तीन रोज़ इश्क़” को पढ़ते हुये आप साफ़ महसूस करेंगे कि ये सारे क़िस्से लेखिका की कल्पनाशीलता...सिर्फ और सिर्फ कल्पनाशीलता की उपज हैं | पढ़ते हुये या पढ़ लेने के बाद इस अहसास के सिर उठाते ही आप लेखिका के प्रति एक अपरिभाषित से “आव”...एक...एक तारीफ़ भरे सम्मान या कुछ ऐसी ही मिली-जुली अनुभूतियों से भर उठते हैं |

किताब सुनाती है कहानी...एक नीली नदी के किनारे बसे ख़्वाब रंगते रंगरेजों और दुआएं बुनते जुलाहों की...मंटो से दोज़ख में हॉट-लाइन पर बात करती एक सरफ़िरी लड़की की...किसी गुमशुदा हॉस्पिटल के आदमख़ोर कमरों में क़ैद रूहों की बेआवाज़ क्रांतियों की...वायलिन की स्ट्रींग्स पर अपनी ऊँगलियों को लहूलुहान करती और भाई को याद करते हुये छुटकी पर लाड़ बरसाती इश्क़ियायी बहन की...रात के टीसते ज़ख़्मों पर सस्ती शराब छिड़क कर आग लगाते प्रेमियों की...सिगरेट की डिब्बी पर किसी लड़की के नाम के उर्वर अक्षरों को तलाशते एक लड़के की...अपनी मुहब्बत को अपने ही दोस्त पर क़ुरबान करते सुसाइडल आशिक़ के एकालाप की...रूठे सूरज की उदास नज़मों को सुनाने वाले एक पोस्टकार्ड की...कच्ची उम्र की पीठ पर शाबासी के लिए फेरे गए हाथों में छुपे घृणित वासनाओं की...लवर्स से बेस्ट फ्रेंड्स के दरम्यान के एक कनफ्यूज से टू एंड फ्रो जर्नी की...धड़कनों की डिसिप्लिन को तोड़ती किसी निगाहों में डूबी जाती चालीस साला स्त्री की...कुरियर के पार्सल में आये हुये किसी लम्स के फिंगरप्रिंट को समोए एक साबुन की...कलाई की नस काट कर खून की पिचकारी से बनाए गए किसी पेंटिंग की...कवि को लिखती हुई एक कविता की...और जिस्मों के काले जादू की |

कैसी तो कैसी कहानियाँ...टीस छेड़तीं...हुकहुकी उठातीं...अजब-गज़ब सी लड़कियों की कहानियाँ | कहानी...उस लड़की की जो कटी ऊँगली से रिसते ख़ून को व्हिस्की में डालकर कॉकटेल बनाती है | कहानी...उस लड़की की जिससे ख़ुद आसमान ही इश्क़ कर बैठा इक रोज़ | कहानी...उस लड़की की जो जब मुसकुराती है तो उसकी आँखों का काजल उसके प्रेमी की रातों में बह आता है | कहानी...उस लड़की की जो चाँद के संग अपने बाइक पर रेसिंग करती है | कहानी...नागफनी से आहिस्ता-आहिस्ता  टकीला बनती लड़की की | कहानी...वो एक नीली बोगनविलिया की टूटी पंखुरियाँ ढूँढने वाली लड़की की | कहानी...सुनहली रेत वाले देश के शहजादे को ऊसर मिट्टी की दास्तान सुनाने वाली लड़की की | कहानी...घोड़े पर शहर दर शहर दर घूम कर अनगिन पुरुषों से प्रेम करने वाली लड़की की | कैसी तो कैसी लड़कियाँ और उनकी कैसी तो कैसी कहानियाँ...कि इन कहानियों को पढ़ो तो उन लड़कियों को ढूंढ कर उनके इश्क़ में डूब जाने का जी करे |

ये कहानियाँ अपने मूल रूप में इश्क़ की कहानियाँ हैं | समस्त कहानियाँ आपस में जुदा होकर भी घुली-मिली सी...और कई बार एक-दूजे का एक्सटेंशन सी प्रतीत होती हैं | दरअसल पूजा उपाध्याय की ये कहानियाँ अपने-आप में क़िस्सागोई से परे कुछ अद्भुत किरदारों को बुनने की व्याकुलता है और इसी व्याकुलता के चरम पर कई बार कहानियाँ अपना कथ्य खोकर किरदार का एकालाप बन कर रह जाती हैं | लेकिन इस बारे में लेखिका कोई मुगालता भी नहीं रखतीं कि इस किताब का टैगलाइन ही है “गुम होती कहानियाँ” और किताब का बैक-कवर पहले ही ऐलान करता है कि “इन छोटी कहानियों में एक चोर दरवाज़ा है जिससे आप कहानी में दाख़िल होकर उसे जी सकते हैं” ...अब ये जिस चोर दरवाज़े का लेखिका ऐलान करती हैं, वो पाठक-दर-पाठक मुखतलिफ़ खुलता है | किसी पर कहानी की पहली पंक्ति के साथ ही तो किसी के साथ कहीं बीच में...एकदम भक्क से कि अरे ! ये क्या !! ...और इन सब पर तुर्रा ये कि भाषा-सौंदर्य की चौंध आपकी मिचमिचायी आँखों के सामने कब कोई नया दरवाज़ा खोल देगी, आपको पता ही नहीं चलेगा | ये कहानियाँ एक क़िस्म की ढीटाई सी करती हैं...पाठको को टीज़ करती हुई कि जैसे ही आप उस चोर दरवाज़े से अंदर दाख़िल हुए कि वो गुम हो गईं और ये ढिठाई जहाँ एक अजीब सा सस्पेंस देती है, वहीं क़िस्सागोई के शिल्प को एक नया आयाम भी |

ये छोटी-छोटी कहानियाँ बाज़ दफ़ा किरदारों की डायरियों के या उनके लिखे ख़तों का भान दिलाती हैं और कई-कई बार किसी क़िस्से के गुमशुदा पड़े विस्तृत प्लॉट की उपलब्धि का आभास भी कराती हैं | भगजोगनी याद होगा आप सब को...भगजोगनी...शिवपूजन सहाय की भगजोगनी...उनकी चर्चित कहानी “कहानी का प्लॉट” की भगजोगनी | तो ऐसी कई भगजोगनियाँ’, पूजा उपाध्याय अपनी इस किताब में हमारे लिए छोड़ गई हैं...कोई आए उठा ले इनको और बुन ले एक नई कहानी | इसे लेखिका का शायद ख़ुद का लिमिटेशन कहा जा सकता है, जो कि एक्सप्लोर किया जाना माँगता है...खुद उनके द्वारा ही | पूजा उपाध्याय की कहानी बुनने की कला जैसे कि मानो एक छुपा हुआ ब्लास्ट है, जिसकी तीव्रता अभी पाठकों तक पहुंचनी है | हम जैसे कुछ जो इस ब्लास्ट की रेडियस में आ चुके हैं, उनकी इस क़िस्सागोई के महत्तम तक जाना चाहते हैं अब | क्योंकि लेखिका के अंदर का छुपा हुआ कथाकार किताब की आख़िरी कहानी, जो इस किताब की शीर्षक कहानी है और जो इकलौती लंबी कहानी भी है, में हम पाठकों से मानो पूछता सा प्रतीत होता  है कि सुनो हम लम्बी कहानी भी सुना सकते हैं...वक़्त है तुम्हारे पास ना ?

किताब का आवरण टैगलाइन को सार्थक करता है, साथ ही पेंगुइन की छपाई और बाइंडिंग फील-गुड का अहसास देती है पढ़ते वक़्त | साल भर में अपने पहले संस्करण को सोल्ड आउट कर चुकी ये किताब इतनी घोषणा तो करती ही है कि इसे पाठकों द्वारा पसंद किया जा रहा है किताब ऑन-लाइन खरीदने के लिए इस लिंक पर जाया जा सकता है :-




अव्वलो आख़िरश दरम्याँ दरम्याँ...पूजा उपाध्याय को ढ़ेर दुआयें कुछ अद्भुत किरदारों से हमें मिलवाने के लिए और समस्त शुभकामनायें कि ये किताब और और पाठकों तक पहुँचें !

18 February 2016

झूठ भी तो एक कविता है

शब्दों की बेमानियाँ...बेईमानियाँ भी | लफ़्फ़ाजियाँ...जुमलेबाजियाँ...और इन सबके बीच बैठा निरीह सा सच | तुम्हारा भी...मेरा भी | 

तुम्हारे झूठ पर सच का लबादा
तुम्हारे मौन में भी शोर की सरगोशियाँ
तुम्हारे ढोंग पर मासूमियत की
न जाने कितनी परतें हैं चढी

मुलम्मा लेपने की हो
अगर प्रतियोगिता कोई
यक़ीनन ही विजय तुमको मिलेगी
विजेता तुम ही होगे

किसी के झूठ कह देने से होता हो 
अगर सच में कोई सच झूठ
तो लो फिर मैं भी कहता हूँ
कि तुम झूठे हो, झूठे तुम

तुम्हारा शोर झूठा है
तुम्हारा मौन झूठा है
तुम्हारे शब्द भी झूठे
तुम्हारी लेखनी में झूठ की स्याही भरी है बस

तुम्हें बस वो ही दिखता है
जो लिक्खे को तुम्हारे बेचता है
तुम्हारे सच को सुविधा की 
अजब आदत लगी है

यक़ीं मानो नहीं होता
समूचा झूठ बस इक झूठ भर
मगर फिर सोचता हूँ
कि ऐसा कह के भी हासिल
भला क्या
कि आख़िर झूठ भी तो एक कविता है
 

21 December 2015

तीन ख़्वाब, दो फोन-कॉल और एक रुकी हुई घड़ी...

( कथादेश के दिसम्बर 2015 अंक में प्रकाशित मेरी कहानी )

सर्दी की ठिठुरती हुई ये रात बेचैन थी | गुमशुदा धूप के लिए व्याकुल धुंध में लिपटे दिन की अकुलाहट को सहेजते-सहेजते रात की ठिठुरन अपने चरम पर थी | ...और रात की इसी बेचैनी में एक बेलिबास-सा ख़्वाब सिहरता रहा था नींद में, नींद भर । जलसा-सा कुछ था उस ख़्वाब के पर्दे पर | बड़ा-सा घर एक पॉश-कॉलोनी के लंबे-लंबे टावरों में किसी एक टावर के सातवें माले पर, एक खूबसूरत-सी लिफ्ट और घर की एक खूबसूरत बालकोनी | कॉलोनी के मध्य प्रांगण की ओर झाँकती वो बालकोनी खास थी सबसे | ख़्वाब का सबसे खास हिस्सा उस बालकोनी से नीचे देखना था | ख़्वाबों का हिसाब रखना यूँ तो आदत में शुमार नहीं, फिर भी ये याद रखना कोई बड़ी बात नहीं थी कि जिंदगी का ये बस दूसरा ही ख़्वाब तो था | इतनी फैली-सी, लंबी-सी जिंदगी और ख़्वाब बस दो...? अपने इस ख़्वाब में उस सातवें माले वाले घर की उस खूबसूरत बालकोनी और कॉलोनी के मध्य- प्रांगण में हो रहे जलसे के अलावा सकुचाया-सा चाँद खुद भी था और थी एक चमकती-सी धूप | चाँद लिफ्ट से होकर तनिक सहमते हुये आया था सातवें माले पर...धूप के दरवाजे को तलाशते हुये | धूप खुद को रोकते-रोकते भी खिलखिला कर हँस उठी थी दरवाजा खोलते ही, देखा जब उसने सहमे हुये चाँद का सकुचाना | जलसा ठिठक गया था पल भर को धूप की खिलखिलाहट पर और चाँद...? चाँद तो खुद ही जलसा बन गया था उस खिलखिलाती धूप को देखकर | धूप ने आगे बढ़ कर चाँद के दोनों गालों को पकड़ हिला दिया | बहती हवा नज़्म बन कर फैल गयी जलसे में और नींद भर चला ख़्वाब हड़बड़ाकर जग उठा | बगल में पड़ा हुआ मोबाइल एक अनजाने से नंबर को फ्लैश करता हुआ बजे जा रहा था | मिचमिचायी-निंदियायी आँखों के सामने न कोई दरवाजा था, न ही वो चमकीली धूप | दोनों गालों पर जरूर एक जलन सी थी, जहाँ ख़्वाब में धूप ने पकड़ा था अपने हाथों से...और हाँ नज़्म बनी हुई हवा भी तैर रही थी कमरे में मोबाइल के रिंग-टोन के साथ | टेबल पर लुढ़की
हुई कलाई-घड़ी पर नजर पड़ी तो वो तीन बजा रही थी | कौन कर सकता है सुबह के तीन बजे यूँ फोन... और अचानक से याद आया कि घड़ी तो जाने कब से रुकी पड़ी हुई है यूँ ही तीन बजाते हुये | बीती सदी में कभी देखे गए उस पहले ख़्वाब में आई हुई गर्मी की एक दोपहर से बंद पड़ी थी घड़ी यूँ ही...अब तक |

      मोबाइल बदस्तूर बजे जा रहा था और नज़्म बनी हुई धूप की खिलखिलाहट कमरे के दीवारों पर पर अभी भी टंगी थी...अभी भी बिस्तर पर उसके संग ही रज़ाई में लिपटी पड़ी थी | वो अनजाना सा नंबर स्क्रीन पर अपनी पूरी ज़िद के साथ चमक रहा था | एक बड़ी ही दिलकश और अनजानी सी आवाज थी मोबाइल के उस तरफ...अनजानी सी, मगर पहचान की एक थोड़ी-सी कशिश लपेटे हुये |  नींद से भरी और ख़्वाब में नहायी अपनी आवाज को भरसक सामान्य बनाता हुआ उठाया उसने मोबाइल...

"हैलो...!"
"हैलो, आपको डिस्टर्ब तो नहीं किया ?"
"नहीं, आप कौन बोल रही रही हैं ?"
"यूँ ही हूँ कोई | नाम क्या कीजियेगा जानकर |"
"........."
"अभी अभी आपकी कहानी...वो...वो 'धूप, चाँद और दो ख़्वाब' वाली...पढ़ कर उठी हूँ | आपने ही लिखी है ना ?"
"जी, मैंने ही लिखी है...लेकिन वो तो बहुत पुरानी कहानी है | साल हो गए उसे छपे तो |"
"जी, डेढ़ साल | आपका मोबाइल नंबर लिखा हुआ था परिचय के साथ, तो सोचा कि कॉल करूँ | अन्याय किया है आपने अपने पाठकों के साथ |"
"???????"
"कहानी अधुरी छोड़कर..."
"लेकिन कहानी तो मुकम्मल है |"
"मुझे सच-सच बता दीजिये प्लीज ?"
"क्या बताऊँ...????"
"यही कि चाँद सचमुच गया था क्या धूप की बालकोनी में या बस वो एक ख़्वाब ही था ?"
"मै', वो कहानी पूरी तरह काल्पनिक है |"
"बताइये ना प्लीज, वो ख़्वाब था बस या कुछ और ?"
"हा! हा!! मैं इसे अपनी लेखकीय सफलता मानता हूँ कि आपको ये सच जैसा कुछ लगा |"
"सब बड़बोलापन है ये आप लेखकों का |"
"ओह, कम ऑन मै'म ! वो सब एक कहानी है बस |"
"ओके बाय...!"
"अरे, अपना नाम तो बता दीजिये !!!"

      ...कॉल कट चुका था | मोबाइल सुबह का आठ बजा दिखा रहा था | खिड़की के बाहर दिन को धुंध ने अभी भी लपेट रखा था अपने आगोश में | नींद की खुमारी अब भी आँखों में विराजमान थी | कमरे में तैरती और रज़ाई में लिपटी हुई धूप की खिलखिलाहट लिए नज़्म अब भी अपनी उपस्थिति का अहसास दिला रही थी और वो विकल हो रहा था ख़्वाब के उस सातवें माले पर वापस जाने के लिये अपने जलते गालों को सहलाता हुआ | टेबल पर लुढकी हुई कलाई-घड़ी की सुईयाँ दुरूस्त नब्बे डिग्री का कोण बनाती हुईं पहले ख़्वाब की कहानी सुना रही थीं...जाने कब से | वो पहला ख़्वाब था | ज़िंदगी का...अब तक की ज़िंदगी का पहला ही तो ख़्वाब था वो | तब से रुकी पड़ी घड़ी, जहाँ एक ख़्वाब के ज़िंदा रहने की तासीर थी, वहीं ऊपर वाले परमपिता परमेश्वर का उसके साथ किए गए एक मज़ाक का सबूत भी | पहला ख़्वाब...गर्मी की चिलचिलाती दोपहर थी वो...सदियों पहले की गर्मी की दोपहर, जब चाँद पहली बार उतरा था धूप की बालकोनी में | पहली बार आ रहा था वो धूप से मिलने | सूरज कहीं बाहर गया था धूप को अकेली छोड़ कर अपनी ड्यूटी बजाने और चाँदनी भी मशरूफ़ थी कहीं दूर, बहुत दूर | धूप के डरे-डरे से आमंत्रण पे चाँद का झिझकता-सहमता आगमन था | उस डरे-डरे आमंत्रण पर वो झिझकता-सहमता आगमन बाइबल में वर्णित किसी वर्जित फल के विस्तार जैसा ही था कुछ | ...और उसी लिफ्ट से होते हुये सातवें माले पर उतरने से चंद लम्हे पहले होंठों में दबी सिगरेट का आखिरी कश लेकर परमपिता परमेश्वर से गुज़ारिश की थी चाँद ने दोनों हाथ जोड़कर वक्त को आज थोड़ी देर रोक लेने के लिये | दोपहर बीत जाने के बाद...धुंधलायी शाम के आने का बकायदा एलान हो चुकने के बाद, जब धूप और चाँद दोनों साथ खड़े उस खूबसूरत बालकोनी में आसमान के बनाए रस्मों पर बहस कर रहे थे, उसी बहस के बीच धूप ने इशारा किया था कि चाँद की घड़ी अब भी दोपहर के तीन ही बजा रही है | परमेश्वर के उस मजाक पर चाँद सदियों बाद तक मुस्कुराता रहा | उस ख़्वाब को याद करते हुये फिर से नज़र पड़ी टेबल पर लुढ़की कलाई-घड़ी की तरफ | एकदम दुरूस्त नब्बे डिग्री का कोण बनाते हुये कलाई-घड़ी बदस्तुर तीन बजाये जा रही थी | एक सदी ही तो गुज़र गई है जैसे | अब तो किसी घड़ीसाज से दिखलवा लेना चाहिए ही इस रुकी घड़ी को | ईश्वर का वो मज़ाक ही तो था कि उसके वक्त को रोक लेने की गुज़ारिश उसकी घड़ी को थाम कर पूरी की गई थी | ...और यदि उसने कुछ और माँग लिया होता उस दिन ईश्वर से ? यदि उसने धूप को ही माँग लिया होता ? क्या होता फिर ईश्वर के तमाम आसमानी रस्मों का ? सवाल अधूरे ही रह गये कि मोबाइल फिर से बज उठा था | वही नंबर फिर से फ्लैश कर रहा था...फिर से उसी अजीब-सी ज़िद के साथ...

"हैलोssss...!!!"
"वो बस एक ख़्वाब था क्या सच में ?"
"मै', वो बस एक कहानी है...यकीन मानें !"
"आप सिगरेट पीते हैं ?"
"हाँ, पीता हूँ |"
"जानती थी मैं | अच्छी तरह से जानती थी कि आप सिगरेट पीते होंगे |"
"कैसे जानती हैं आप ?"
"आपकी कहानी का हीरो...वो चाँद जो पीता रहता है घड़ी-घड़ी |"
"आप अपने बारे में तो कुछ बताइये |"
"पहले ये बताइये कि धूप और चाँद की फिर मुलाक़ात हुई कि नहीं ?"
"मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा मै'म कि आप क्या पूछ रही हैं ?"
"हद है, कैसे लेखक हैं आप ? अपनी कहानी तक याद नहीं आपको ?"
"अच्छा, आपको कहानी कैसी लगी ?"
"एकदम सच्ची...हा ! हा !! हा !!!" मोबाइल के उस पार की वो हँसी...उफ़्फ़, कितनी पहचानी-सी | ख़्वाब-सी, मगर कितनी जानी-सी | कमरे के दीवार पर टंगी वो नज़्म फिर से जीवंत हो कर जैसे हिली थी पल भर को |
"अब क्या बोलूँ मैं इस बात पर ?"
"आप अपनी इस कहानी का सिक्वेल भी लिखेंगे ना ?"
"नहीं मै', कहानी तो मुकम्मल थी वो |"
"ऐसे कैसे मुकम्मल थी ? आजकल तो सिक्वेल का जमाना है...लिखिये ना प्लीज़ !"
"आप अपना नाम तो बता दीजिये कम-से-कम |"
"पहले आप, सिक्वेल लिखने का वादा कीजिये!"
"हद है ये तो...क्या लिखूंगा मैं सिक्वेल में ?"
"कमाल है, लेखक आप हैं कि मैं ? कहानी को आगे बढ़ाइये | चाँद और धूप ने आसमान के बनाए कायदे की ख़ातिर आपस में नहीं मिलने का जो निर्णय लेते हैं आपकी कहानी में...उसके बाद की बात पर कुछ लिखें आप |"
"वो कहानी वहीं खत्म हो जाती है, मै'...ठीक उस निर्णय के बा द| उसके बाद कुछ बचता ही नहीं है |"
"अरे बाबा, कैसे कुछ नहीं बचता | दोनों मिल नहीं सकते, लेकिन चिट्ठी-पत्री तो हो सकती है, कॉल किया जा सकता है...तीसरा ख़्वाब देखा जा सकता है |"
"तीसरा ख़्वाब ?आप कौन बोल रही हैं ??"
"जितने बड़े लेखक हैं आप, उतने ही बड़े डम्बो भी !"
"आप...आप कौन हो ? प्लीज बता दो !"
"सिगरेट कम पीया कीजिये आप !"
"आप...आप...!!!"
"एकदम डम्बो हो आप | वो कलाई घड़ी आपकी अभी तक तीन ही बजा रही है या फिर ठीक करा लिया ?"
"धूप ?...तुम धूप हो ना ?"
"हा ! हा !! 'बाय...!!!"
"हैलो...हैलो...हैलो..."

      ...कॉल फिर कट चुका था | नींद अब पूरी तरह उड़ चुकी थी | बाहर दिन के खुलने का आज भी कोई आसार नज़र नहीं आ रहा था और नज़्म बनी हुई हवा अब भी टंगी हुई थी कमरे में, अब भी लिपटी हुई थी रज़ाई में | कानों में गूँजती हुई मोबाइल के उस पार की वो खनकती-सी खिलखिलाहट कमरे में टंगी हुई नज़्म के साथ जैसे अपनी धुन मिला रही थी और गालों पर की जलन जैसे थोड़ी बढ़ गई थी | सिगरेट की एकदम से उभर आई जबरदस्त तलब को दबाते हुये चाँद ने अपने गालों को सहलाया और मोबाइल के रिसिव-कॉल की फ़ेहरिश्त में सबसे ऊपर वाले उस अनजाने से नंबर को कांपती ऊंगालियों से डायल किया | मोबाइल के उस पार से आती "दिस नंबर डज नॉट एग्जिस्ट... आपने जो नंबर डाल किया है वो उपलब्ध नहीं है, कृपया नंबर जाँच कर दुबारा डायल करें" की लगातार बजती हुई मशीनी उद्घोषणा किसी तीसरे ख़्वाब के तामीर होने का ऐलान कर रही थी |


01 November 2015

टिम टिम रास्तों के अक्स


हर तर्क अंतत: एब्सर्ड ही होता है”... जैसा कि संजय व्यास अपनी किताब में “टिम टिम रास्तों के अक्स” में कहीं किसी पन्ने पर इस बात का ऐलान करते हैं और ये ऐलान कुछ इतनी मासूमियत से किया जाता है लेखक द्वारा कि आपको यक़ीन करना ही पड़ता | सच तो...आख़िर में हर दिया हुआ या दिया जा रहा तर्क कहीं ना कहीं किसी ना किसी दृष्टिकोण से अपने एब्सर्ड होने की ख़ुद ही तासीर देता है |  यही इस किताब की खूबसूरती है कि अपने कथेतर गद्य होने के विशेषण पर भी अपने ऐसे अनगिनत जुमलों में यह किताब हजारों कहानियों का विस्तार समोए हुये है |

“टिम टिम रास्तों के अक्स” को पढ़ना जैसे शब्दों के उजास में नहाना है...जैसे सुबह की स्नान के बाद पालथी मार के बैठ कर स्वच्छ हवा में प्राणायाम करना है | पहली झलक में, किताब में शामिल तमाम तैतीस गद्य के टुकड़े कुछ क़िस्सागोई से करते प्रतीत होते हैं, लेकिन गद्य के इन टुकड़ों से गुज़रते हुये आप महसूस कर रहे होते हैं कि इनमें महज क़िस्सागोई ही नहीं है...एक कविता का वितान भी है, तो कहीं पर किसी गीत का अतीत भी...किसी छूटे हुये उपन्यास की आस है कहीं, तो कहीं किसी डायरी के पन्नों पर गिरी हुई स्याही से अंजाने में उभरी हुई तस्वीर...कहीं पर किसी चितेरे द्वारा छोड़ दिया कोरा कैनवास है तो कहीं उसके ब्रश से छिड़के हुये रंगों का कोलाज और कहीं कहीं पर एकदम स्पष्ट नाक-नक्शे के साथ उकेरा हुआ कोई चेहरा | संजय ख़ुद ही बड़ी साफ़गोई से स्वीकार करते हैं अपने लेखकीय संवाद में भूमिका के तौर पर कि “संग्रह की रचनाएँ एक नज़र में क़िस्से-कहानियाँ लगती हैं | सब नहीं तो इनमें से कुछ तो तयशुदा तौर पर | पर दूसरी नज़र से देखने और ख़ासतौर पर इन्हें पढे जाने पर ऐसा नहीं महसूस होता |” अपनी भूमिका में संजय तनिक बोल्ड होते हुये इन गद्यान्शों को क़िस्से कहने की डींग तक का विशेषण दे जाते हैं और लेखक की इस साफ़गोई पर हौले से मुस्कुराये बिना रह नहीं पाते आप | लेकिन सच तो ये है कि भूमिका में बेशक लेखक ने शुरू के दो पन्ने को औपचारिक रूप से “लेखक की ओर से” जैसा कुछ कह कर पाठक से परोक्ष संवाद स्थापित किया है, लेकिन हक़ीक़त ये है कि पूरी की पूरी किताब एक तरह से आपसे संवाद करती है |

“टिम टिम रास्तों के अक्स” आपको अपने नाम के भूगोल से वाबस्ता करवाती है, कुछ ऐसी सुबहों से आपको मिलवाती है जो बस सुबहें होती हैं और कुछ नहीं, कुछ ऐसी ट्रिक्स से परिचय करवाती है आपका जिनकी वजह से आश्चर्यों को साधने का विश्वास पाया जा सकता है, मायालोक और यथार्थ के बीच की एक ऐसी यात्रा पर ले चलती है जहाँ अतीत आपके व्यक्तित्व का अंग होता है और वर्तमान आपकी नियती, एक ऐसे लालटेन की रौशनी दिखलाती है जिसके लौ की भभक अपनी ही पैदा की गई चमक को उचक-उचक कर निगलती है | किताब के किसी पन्ने पर अखाड़े में जीत के दर्प से चमकता हुआ योद्धा घर के मोर्चे पर लड़ाई हारता नज़र आता है तो किसी पन्ने पर भौतिकीय नियमों के परखच्चे उड़ाती हुई नर्तकी अपने नाच के वृत में गृहस्थी का आयत जोड़ती दिखती है, रेगिस्तान के विस्तार के साथ-साथ चलती हुई सरकारी बसों की लय सुनाई देती हैं किसी पन्ने पर तो किसी पन्ने पर ठेले पर रखी हुई कमीज़ों की आर्तनाद चीख़ें |  

एक सौ साठ पन्नों वाली हिन्द युग्म से प्रकाशित संजय व्यास की ये किताब पढे जाने की ज़िद करती है और आपकी किताबों की आलमारी में रखे जाने की मांग भी | किताब के कवर पर पुराने जमाने का अब लुप्तप्राय हो चुका बिजली का स्विच एक अपरिभाषित सा मूड तैयार करता है पढे जाने के लिए | हिन्द युग्म की किताबों की बाइन्डिंग और छपाई हमेशा दिलकश होती है और किताब पढ़ने का मज़ा दुगुना कर देती है | किताब ख़रीदने के लिए इस लिंक पर क्लिक किया जा सकता है :- 


...और अंत में समस्त शुभकानाओं के साथ कि संजय व्यास इसी तरह हमें अपनी लेखनी से चमत्कृत करते रहें !!!