25 June 2009

बिन बाप के होती हैं कैसे बेटियाँ इनकी बड़ी...


तीन महीने बाद वापसी सभ्यता में। छुट्टी पे हूँ। एक लंबित प्रतिक्षित छुट्टी पर। ...इस दौरान छुटकी तनया साढ़े तीन महीने और बड़ी हो गयी अपने पापा के बगैर, लेकिन जब अपने पापा से मिली इतने दिनों बाद तो सबको आश्चर्यचकित करते हुये एकदम से अपने पापा की गोद में आ गयी। तो एक शेर बना था कुछ यूं कि
बिन बाप के होती हैं कैसे बेटियाँ इनकी बड़ी
दिन-रात इन मुस्तैद सीमा-प्रहरियों से पूछ लो

पूरी ग़ज़ल फिर कभी सुनाऊँगा...

कश्मीर की ठंढ़ के बाद इस गर्मी में खौलते-उबलते छुट्टी के दिनों की बात ही कुछ और है। खैर नवगीत की पाठशाला से उठाया हुआ एक प्रयास मेरा नवगीत पर आपलोगों की नज्र कर रहा हूँ:-

जरा धूप फैली जो चुभती कड़कती
हवा गर्म चलने लगी है ससरती

पिघलती सी देखी
जो उजली ये वादी
परिंदों ने की है
शहर में मुनादी

दरीचे खुले हैं
सवेर-सवेरे
चिनारों पे आये
हैं पत्‍ते घनेरे

हँसी दूब देखो है कैसे किलकती

ये सूरज जरा-सा
हुआ है घमंडी
कसकती हैं यादें
पहन गर्म बंडी

उठी है तमन्ना
जरा कुनमुनायी
खयालों में आकर
जो तू मुस्कुरायी

ये दूरी हमारी लगे अब सिमटती

बगानों में फैली
जो आमों की गुठली
सँभलते-सँभलते
भी दोपहरी फिसली

दलानों में उड़ती
है मिट्टी सुगंधी
सुबह से थकी है
पड़ी शाम औंधी

सितारों भरी रात आयी झिझकती

....और छुट्टी की शुरूआत हुई थी दिल्ली में आयोजित एक नन्हे-से नशिस्त से, जिसमें मुफ़लिस जी, मनु जी, प्रकाश अर्श जी, दरपण जी और खाक़सार शामिल थे। अच्छी धूम मची इन ब्लौगर शायरों से दरपण जी के निवास-स्थान पर और भेद खुला दरपण के प्राची के पार का। रचनाओं की प्रस्तुति और विस्तृत रपट के साथ जल्द ही हाजिर होता हूँ।

12 June 2009

मेजर ऋषिकेश रमानी - शौर्य का नया नाम

विगत दस-एक सालों में, जब से ये हरी वर्दी शरीर का एक अंग बनी है, इन आँखों ने आँसु बहाने के कुछ अजब कायदे ढ़ूंढ़ निकाले हैं। किसी खूबसूरत कविता पे रो उठने वाली ये आँखें, कहानी-उपन्यासों में पलकें नम कर लेने वाली ये आँखें, किसी फिल्म के भावुक दृश्‍यों पे डबडबा जाने वाली ये आँखें, लता-रफ़ी-जगजीत-मेहदी-ब्रायन एडम्स की आवाजों पर धुंधला जाने वाली ये आँखें, मुल्क के इस सुदूर कोने में फोन पर अपनी दूर-निवासी प्रेयसी की बातें सुन कर भीग जाने वाली आँखें, हर छुट्टी से वापस ड्‍यूटी पर आते समय माँ के आँसुओं का मुँह फेर कर साथ निभाने वाली ये आँखें---- आश्‍चर्यजनक रूप से किसी मौत पर आँसु नहीं बहाती हैं। परसों भी नहीं रोयीं, जब अपना ये "यंगस्टर" सीने में तेरह गोलियाँ समोये अपने से ज्यादा फ़िक्र अपने गिरे हुये जवान की जान बचाने के लिये करता हुआ शहीद हो गया।

शौर्य ने एक नया नाम लिया खुद के लिये- ऋषिकेश रमानी । अपना छोटु था वो। उम्र के 25वें पायदान पर खड़ा आपके-हमारे पड़ोस के नुक्कड़ पर रहने वाला बिल्कुल एक आम नौजवान, फर्क बस इतना कि जहाँ उसके साथी आई.आई.टी., मेडिकल्स, कैट के लिये प्रयत्नशील थे, उसने अपने मुल्क के लिये हरी वर्दी पहनने की ठानी। ...और उसका ये मुल्क जब सात समन्दर पार खेल रही अपनी क्रिकेट-टीम की जीत पर जश्‍न मना रहा था, वो जाबांज बगैर किसी चियरिंग या चियर-लिडर्स के एक अनाम-सी लड़ाई लड़ रहा था। आनेवाले स्वतंत्रता-दिवस पर यही उसका ये मुल्क उसको एक तमगा पकड़ा देगा। आप तब तक बहादुर नहीं हैं, जब तक आप शहीद नहीं हो जाते । कई दिनों से ये "शहीद" शब्द मुझे जाने क्यों मुँह चिढ़ाता-सा नजर आ रहा है...!!! छः महीनों में तीन दोस्तों को खो चुका हूँ...पहले उन्नी, फिर मोहित और आज ऋषि

सोचा कुछ तस्वीरें दिखा दूँ आप सब को इस unsung hero की, शौर्य के इस नये चेहरे की:-





भारतीय सेना अपने आफिसर्स-कैडर्स पर गर्व करती है, जिन्होंने हमेशा से नेतृत्व का उदाहरण दिया है। स्वतंत्रता के बाद की लड़ी गयी हर लड़ाई का आँकड़ा इस बात की कहानी कहता है... चाहे वो 47 की लड़ाई हो, या 62 का युद्ध या 65 का संग्राम या 71का विजयघोष या फिर 99 का कारगिल और या फिर कश्मीर और उत्तर-पूर्व में आतंकवाद के खिलाफ़ चल रहा संघर्ष।

हैरान करती है ये बात कि देश के किसी समाचार-पत्र ने ऋषि के इस अद्‍भुत शौर्य को मुख-पृष्ठ के काबिल भी नहीं समझा...!!! सैनिकों के दर्द की एक छोटी-सी झलक देखिये प्रियंका जी की इस खूबसूरत कविता में।

i salute you, Rushikesh !

01 June 2009

इस मोड़ से आते हैं...

{द्विमासिक पत्रिका  "परिकथा" के जनवरी-फरवरी 2011 अंक में प्रकाशित मेरी कहानी}


"आप बड़े ही ज़हीन हो, कैप्टेन शब्बीर ! हमारी बहन से शादी कर लो...!" साज़िया के इन शब्दों को सुन कर कैसा चौंक उठा था मैं।
वो गुनगुनी धूप वाली सर्दियों की एक दोपहर थी। वर्ष 2000 का नवंबर महीना। तारीख ठीक से याद नहीं। जुम्मे का दिन था, इतना यकीनन कह सकता हूँ। श्रीनगर के इक़बाल पार्क में बना वो नया-नवेला कैफेटेरिया, साज़िया ने ही सुझाया था मिलने के लिये। हमारी पाँचवीं या छठी मुलाकात थी विगत डेढ़ साल से भी ऊपर के वक्फ़े में। वैसे भी ज्यादा मिलना-जुलना खतरे से खाली नहीं था- न मेरे लिये और न ही साज़िया के लिये। फोन पर ज्यादा बातें होती थी। ये उन दिनों की बात है, जब मोबाइल का पदार्पण धरती के इस कथित जन्नत में हुआ नहीं था।

उम्र में मुझसे तकरीबन आठ-नौ साल बड़ी और वजन में लगभग डेढ़ गुनी होने के बावजूद उसकी चेहरे की खूबसूरती का एक अपरिभाषित-सा रौब था। तीन बच्चों की माँ, साजिया अपने अब्बू और छोटी बहन सक़ीना के साथ श्रीनगर के डाउन-टाउन इलाके में रहती थी। माँ छोटी उम्र में गुजर चुकी थी। दो भाई थे...पिछले साल मारे गये थे हमारे ही एक आपरेशन में। जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते ही जेहाद का शौक चर्राया था। उस पार हो आये कुछ सरफिरों के साथ उठना-बैठना हो गया दोनों का और फिर नशा चढ़ गया हाथ में एके-47 को लिये घूमने का। नाम ठीक से याद नहीं आ रहा उनका- शायद शौकत और ज़लाल। वैसे भी आपरेशन में मारे जाने के बाद ये सरफिरे नाम वाले कहाँ रह जाते हैं। ये तो नम्बर में तब्दील हो जाते हैं गिनती रखने के लिये। साज़िया को सब मालूम था इस बाबत। लेकिन वो बिल्कुल सहज रहती थी इस बारे में। जिससे इश्क किया, वो भी शादी रचा कर और निशानी के रूप में दो बेटे और एक फूल-सी बेटी देकर उस पार चला गया। तीन साल पहले। कोई खबर नहीं। क्या पता, कोई गोली उसके नाम की भी चल चुकी हो। किंतु साज़िया इस बारे में भी कोई मुगालता नहीं रखती थी।

वो मेरे पे-रोल पर थी और समय-असमय महत्वपूर्ण सूचनायें देती थी। उस रोज भी हमारा मिलना किसी ऐसे ही खबर के सिलसिले में था। थोड़ी-सी घबरायी हुई थी वो, क्योंकि खबर उसके पड़ोसी के घर के बारे में थी। उसे सहज करने के लिये मैंने बातों का रूख जो मोड़ा, तो अचानक से अपनी बहन के लिये इस अनूठे प्रणय-निवेदन से हैरान कर दिया मुझे। तीन-चार बार जा चुका था उसके घर। साज़िया के अब्बू को मैं पसंद नहीं था, भले ही मेरी वजह से घर में रोटी आती हो। अपने जवान बेटों की मौत का जिम्मेदार जो मानते थे मुझे। सक़ीना को देखा था मैंने। उफ़्फ़्फ़! शायद "बला की खूबसूरत" जैसा कोई विशेषण उसे देख कर ही बनाया गया होगा। उसके अब्बू ने शर्तिया मुझे दो-तीन बार सक़ीना को घूरते हुए पकड़ा होगा। लगभग अस्सी को छूते अब्बू की आँखें चीरती-सी उतरती थी मेरे वजूद में। साज़िया के घर के उन गिनेचुने भ्रमणों में कई दफ़ा मुझे लगा कि अब्बू को मेरी असलियत पता है और इसी वजह से मैं बाहर बुलाने लगा था साज़िया को, जब भी कोई खास खबर होती। हाँ, अब्बू के हाथों की बेक की हुई केक को जरूर तरसता था खाने को। ये कश्मीरी कमबख्त केक बड़ी अच्छी बनाते हैं सब-के-सब।

"अपने अब्बू वाला एक केक तो ले आतीं आप साथ में" - मैंने उस अप्रत्याशित प्रणय-निवेदन को टालने की गरज से बातचीत का रूख दूसरी तरफ मोड़ना चाहा।

"सक़ीना से निकाह रचा लो शब्बीर साब! अल्लाह आपको बरकतों से नवाज़ेगा और इंशाल्लाह एक दिन आप इस कैप्टेन से जेनरल बनोगे। फिर जी भर कर केक खाते रहना। अब्बू की वो पक्की शागिर्द है। ता-उम्र तुम्हें वैसा ही केक खिलाते रहेगी।" - वो मगर वहीं पे अड़ी थी।

मैंने अपनी झेंप मिटाने के लिये सिगरेट सुलगा ली। विल्स क्लासिक का हर कश एक जमाने से मुझे ग़ालिब के शेरों सा मजा देता रहा है।

"कैसे मुसलमान हो? सिगरेट पीते हो? लेकिन फिर भी सक़ीना के लिये सब मंजूर है हमें।"- वो अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे सम्मोहित कर रही थी।

"थिंग्स आई डू फौर माय कंट्री"....जेम्स बांड बने हालिवुड-अभिनेता सौन कौनरी के उस प्रसिद्ध डायलाग को मन-ही-मन दोहरा कर मुस्कुराया मैं।

दोपहर ढ़लने को थी और मैं साज़िया की दी हुई महत्वपूर्ण खबर को लेकर अपने हेडक्वार्टर में लौटने को बेताब था। दो सरफिरों के उसके पड़ोस वाले घर में छूपे होने की खबर थी। देर शाम जब अपने हेडक्वार्टर लौटा, कमांडिंग आफिसर मेरी ही प्रतिक्षा में थे।

"बड़ी देर लगा दी, मोहित! साज़िया से इश्क-विश्क तो नहीं कर बैठे हो तुम?- बास छेड़ने के अंदाज में पूछते हैं।

"सुना है उसकी छोटी बहन बहुत सुंदर है?"

"बला की खूबसूरत, सर!"

"बाय दी वे, तुम्हारी पोस्टिंग आ गयी है। पुणे जा रहे हो तुम दो साल के लिये। खुश? योअर गर्ल-फ्रेंड इज देयर औनली, आई बिलिव!"- बास ने ये खबर सुनायी, तो खुशी से उछल ही पड़ा था मैं।

और उसी खुशी के जोश में साज़िया की खबर पर रात में एक सफल आपरेशन संपन्न हुआ।

"मेरी पोस्टिंग आ गयी है, साज़िया और अगले हफ़्ते मैं जा रहा हूँ यहाँ से।"- दूसरे दिन जब मैं साज़िया से मिलने और उस सफल आपरेशन के लिये कमांडिंग आफिसर की तरफ से विशेष उपहार लेकर गया तो उसे अपनी पोस्टिंग की खबर भी सुना दी। हमेशा सम्मोहित करती उन आँखों में एक विचित्र-सी उदासी थी।

"फिर कब आना होगा?"

"अरे, दो साल बाद तो यहीं लौटना है। ये वैली तो हमारी कर्मभूमि है।"

"अपना ख्याल रखना एंड बी इन टच"- आँखों की उदासी गहराती जा रही थी।

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वर्ष 2003 का अगस्त महीना। वैली में वापसी। लगभग ढ़ाई सालों बाद मिल रहा था मैं साज़िया से। थोड़ी-सी दुबली हो गयी थी।

"अभी तक कैप्टेन के ही रैंक पर हो शब्बीर साब? अभी भी कहती हूँ, सक़ीना से निकाह रचा लो...देखो प्रोमोशन कैसे मिलता है फटाफट!"

"आप जानती हो, साज़िया। मैं किसी और से इश्क करता हूँ।"

"..तो क्या हुआ? तुम मर्दों को तो चार बीवियां लागु हैं।"- इन बीते वर्षों में उन आँखों का सम्मोहन अभी भी कम नहीं हुआ था।

जन्नत में मोबाईल का आगमन हो चुका था। मोबाईल सेट अभी भी मँहगे थे। किंतु साज़िया को सरकारी फंड से मोबाईल दिलवाना निहायत ही जरूरी था। सूचनाओं की आवाजाही तीव्र हो गयी थी और साज़िया को दिया हुआ मोबाईल हमारे लिये वरदान साबित हो रहा था। कुछ बड़े ही सफल आपरेशन हो पाये थे उस मोबाईल की बदौलत। सब कुछ लगभग वैसा ही थी इन ढ़ाई सालों के उपरांत भी। नहीं सब कुछ नहीं...अब्बू और बूढ़े हो चले थे...निगाहें उनकी और-और गहराईयों तक चीरती उतरती थी, जैसे सब जानती हो वो निगाहें मेरी असलियत के बारे में...उनका बेक किया हुआ केक और स्वादिष्ट हो गया था...और सक़ीना- बला से ऊपर भी कुछ होता है? मालूम नहीं। कुछ अजीब नजरों से देखती थी वो मुझे। ये मेरा अपराध-भाव से ग्रसित मन था या वो नजरें कुछ और कहना चाहती थीं? उसकी खूबसूरती यूं विवश तो करती थी मुझे उसे देर तक जी भर कर देखने को, किंतु खुद पर जबरदस्त नियंत्रण रख कर मन को समझाना पड़ता। कोई औचित्य नहीं बनता था एक ऐसी किसी संभावना को बढ़ावा देने का और वैसे भी पुणे में नेहा के रहते हुये ऐसी कोई संभावना थी भी नहीं इधर सक़ीना के साथ। ...किंतु अपनी छोटी बहन की तरफ से साज़िया का प्रणय-निवेदन बदस्तुर जारी था और जो हर खबर, हर सूचना के साथ अपनी तीव्रता बढ़ाये जा रहा था।

श्‍नैः-श्‍नैः बीतता वक्‍त। 2005 का साल अपने समापन पर था। एक और पोस्टिंग। वैली से फिर से कूच करने का समय आ गया था दो साल की इस फिल्ड पोस्टिंग के बाद उत्तरांचल की मनोरम पहाड़ियों में बसे रानीखेत में एक आराम और सकून के दिन गुजारने के लिये। वो दिसम्बर की धुंधली-सी शाम थी। डल लेक के गिर्द अपनी सर्पिली मोड़ों के साथ बलखाती हुई वो बुलेवर्ड रोड। साज़िया अपनी फूल-सी बिटिया रौशनी के साथ आयी थी मिलने। डेढ़ साल की रौशनी ने चेहरा अपने लापता बाप से लिया था, लेकिन आँखें वही साज़िया वाली।

"तो कब रचा रहे हो निकाह हमारी सक़ीना के साथ, शब्बीर साब?"- साज़िया रौशनी को मेरे गोद में देते हुये कहती है।

"देखो तो कितना मेल खाता है शब्बीर नाम सक़ीना के साथ। अब मान भी जाओ कैप्टेन!"- अजीब ठुनक के साथ कहा था उसने।

"मैं जा रहा हूँ। पोस्टिंग आ गयी है और आने वाले मार्च में शादी तय हो गयी है मेरी, साज़िया।" - इससे आगे और कुछ न कह पाया, जबकि सोच कर आया था कि आज सब सच बता दूँगा। उन आँखों के सम्मोहन ने सारे अल्फ़ाज़ अंदर रोक दिये।

"आओगे तो वापस इधर ही फिर से दो-ढ़ाई साल बाद। कर्मभूमि जो ठहरी ये तुम्हारी...है कि नहीं? - उदास आँखों से कहती है वो।

मैं बस हामी में सिर हिला कर रह जाता हूँ।

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अप्रैल 2009| लगभग साढ़े तीन साल बाद वापसी हो रही थी इस बार अपनी कर्मभूमि पर। कितना कुछ बदल गया है वैली में। मैं खुश हूँ...हर घर में डिश टीवी, टाटा स्काई के गोल-चमकते डिस्क को लगे देख कर...सड़क पर दौड़ती सुंदर मँहगी कारों को देख कर...श्रीनगर में नये बनते माल्‍स, रेस्टोरेंट्‍स को देख कर। एक ऐसे ही आवारा-सी सोच का उन्वान बनता है कि इस जलती वैली में जो काम लड़खड़ाती राजनीति, हुक्मरानों की कमजोर इच्छा-शक्‍ति और राइफलों से उगलती गोलियां न कर पायीं, वो काम शायद आने वाले वर्षों में इन सैटेलाइट चैनलों पे आते स्प्लीट विला या एमटीवी रोडीज और इन जैसे अन्य रियालिटी शो कर दे....!!! शायद...!!! इस वर्तमान पीढ़ी को ही तो बदलने की दरकार है बस। पिछली पीढ़ी- साज़िया के साथ वाली पीढ़ी का लगभग सत्तर प्रतिशत तो आतंकवाद की सुलगती धूनि में होम हो गयी। इस पीढ़ी को बदलने की जरूरत है। इस पीढ़ी को नये जमाने की लत लगाने की जरूरत है। खूब खुश हो मुस्कुरा उठता हूँ मैं अपनी इस नायाब सोच पर। खुद को ही शाबासी देता हुआ अपने-आप से बोल पड़ता हूँ- "वाह, मेजर मोहित साब! तूने तो बैठे बिठाये इस बीस साल पुरानी समस्या का हल ढूंढ़ लिया..."।

लेकिन साज़िया का कहीं पता नहीं।
वो नंबर अब स्थायी रूप से सेवा में नहीं है।
उसका घर वीरान पड़ा हुआ है।
पास-पड़ोस को कुछ नहीं मालूम। या शायद मालूम है, मगर कोई बताना नहीं चाहता।
वैसे भी उस इलाके से बहुत दूर हूँ, तो बार-बार जाना भी संभव नहीं।

उससे मिलना चाहता हूँ।
दिखाना चाहता हूँ उसे प्रोमोशन के बाद मिला अपना मेजर का रैंक।

और बताना चाहता हूँ उसे अपना असली नाम............